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रविवार, 16 अगस्त 2026

बच्चों को उड़ने दो ..


 उड़ने दो , उड़ने दो 

बच्चों को उड़ने दो ...

गर नाक अटक जाए 

तो भी तो 

उड़ने दो ..  


जिस ऊर्जा का 

संचार प्रवाह 

हो उद्दंड 

उसको भी 

उड़ने दो 


कहने को क्या 

ले जाएगा 

जब राह भटक के 

सही गलत का 

फैसला खुद कर पायेगा 

तब लौटेगा 

न लौटे तो भी 

उड़ने दो उड़ने 

बच्चों को .....


80 50 का हेरा फेरा 

लोभ लोक का लेखा जोखा 

कंधनी बांधे बेड़ा पार 

न पहुचे उस पार 

फिर भी उड़ने दो 

बच्चों को उड़ने दो ..


बच्चों सा होना

बच्चों में खोना 

कठिन है 

उनकी ऐसी सोच 

वैसी सोच कैसी भी 

साझा न करने पाए 

तो बच्चों को 

बोलने दो !


मंगलवार, 28 जुलाई 2026

ये दुनिया !


कभी छोड़ देते ये बच्चों की दुनिया 

कभी पूछ लेते मांओं की दुनिया

कभी हम जमीन पर आकर तो देखें

हजारों पिटारों में सहती यह दुनिया

मेरा काम है मैं लड़ूंगा यूं हीं

सितारे जमीन पर ना आते कभी... 

मेरा साथ दोगे तो पहलू में दुनिया


पुकारो तो मुंह फेर लेती ये दुनिया

न कहती न बुनती न सुनती ये दुनिया

अजीब ओ गरीब अह्मकाना ये दुनिया

ये दुनिया नहीं आशियाना है दुनिया ! 




सोमवार, 24 नवंबर 2025

कौन हो तुम ....



कौन हो तुम 

जो समय की खिड़की से

झांक कर ओझल हो जाती हो 

तुम्हारे जाने के बाद 

तुम्हारे ताज़ा निशान 

भीनी खुशबू और 

गुम हो जाने वाला पता 

महसूस तो होता है 

पर तुम्हारा सामना करने की

राह नहीं मिलती 

तुम्हारे होने न होने के बीच

का फासला हमेशा धुंधला

ही क्यों होता है ?


कौन हो तुम 

जो ठहरना भूल गई हो 

हवा से बातें करतीं 

पंख फड़फड़ाती उड़ती

उन्मुक्त आकाश में 

पहाड़ी सर्द हवाओं पर सवार 

ऊंघते जीवन को 


झंकृत कर जाती हो ! 



रविवार, 28 सितंबर 2025

कोई है जो इन दिनों...

 


कोई है जो इन दिनों 

तितलियों के भेष में 

उड़ाती रंग पंखों से


कोई है जो इन दिनों

बारिशों के देश में

भिगाती अंग फाहों से


कोई है जो इन दिनों 

ख्वाहिशों के शेष में 

सताती संग यादों से 


कोई है जो इन दिनों 

कैसिनो के कैश में

जिताती चाल चालों से


कोई है जो इन दिनों

रोमियों के देश में

जगाती रात आंखों से


कोई नहीं है इन दिनों

पत्थरों के ठेस में 

भुला दी बात बातों से ।

मंगलवार, 16 सितंबर 2025

बारिश का वो दिन !


याद है तुम्हे ? 

बारिश का वो दिन !

पहाड़ की किसी सड़क पर 

बस स्टैंड हमें आश्रय देकर 

बचा रहा था , भीगने से 

हम भीगते तो क्या हो जाता 

ये हमें नहीं पता था 

बस स्टैंड को पता था 


शाम से रात होने को आई थी 

सड़क पर केवल बारिश झर रही थी 

तुम चिपक कर बैठी थी मुझसे 

सर टिका लिया था कंधे पर 

दो हाँथ लिपटे थे जैसे कोई बरसाती बेल 

अन्धेरा ढक चुका था हमें 

फरवरी की रात ताप बनकर 

चढ़ रही थी हम दोनों पर 

हमें इन्तजार था 

पर किसका , हमें नहीं पता था 


पहली बार तुम्हारे उंहू उंहू पर 

गुस्सा नहीं आ रहा था मुझे 

मेरे बार बार सिगरेट पीने

की तलब पर तुम चुप थी 


आधी रात तक हम हार चुके थे 

बारिश की जिद के सामने 

पर हमारी जिद का क्या 

न जाने देने की जिद 


हम दोनों हठी निकल चुके थे 

बारिश में भीगते , ठिठुरते 

उस ढलान वाले रास्ते पर 

ठहर जाने को किसी ठीहे पर 

पर हम ठहरे नहीं कहीं 

पार कर गए एक दूसरे को 


इससे पहले कई शामें 

कई बारिशें , कई यात्राएँ 

हमने साथ की थीं 

फोन पर घन्टों बतियाते 

कई बार कई बसें छोड़ी थी 

बस स्टैंड पर तुमने 

कई बार मैंने 

कि अगली बस से क्या पता 

हम में से कोई 

हमसफ़र हो लेता 

एक लम्बी यात्रा पर .  







 


शुक्रवार, 5 सितंबर 2025

मैं चुप होना चाहता हूँ .



आवाज़ देता हूँ 

तो कोई आवाज़ आती नहीं 

पलट कर मेरे पास 


आवाज़ ढूंढती  है मुझे 

और मेरे कानों को 

मैं छिपता फिरता 

भागता जा पहुचता हूँ 

कोलाहल में कहीं . 

सुनना नहीं चाहता 

अब और सबकी 

आवाजें 


बंद होने को है 

मेरी सुनवाई भी 

मैंने सुना नहीं खुद को 

या दुःख को एक दशक से 

अब चुप हो जाओ सब 

मैं  चुप होना चाहता हूँ . 

शुक्रवार, 25 अप्रैल 2025

नागरिकता !


भारत का नागरिक होने के नाते

मैं और मेरी नागरिकता

मुझसे सवाल नहीं करती 


मैं हिन्द देश का नागरिक

हिंदू परिवार का हिंदुस्तान 

यूं ही नहीं बना


मेरे बाप दादाओं ने 

घोर तप , यज्ञ और मानताओं 

के बाद मुझे हांसिल किया 


खुशी का ठिकाना नहीं रहा

हिंदू कुल का वंश बढ़ाने

मैं , मां भारती में जन्मा 


पला बढ़ा संयुक्त परिवार

के मुक्त आंगन में 

और सयाना बना 

वीर सैनिकों के बीच 


एक युवा नागरिक

ऊर्जा से भरपूर 

लौटता है एक वरिष्ठ

नागरिक के वी. आर. एस.

के साथ 

अपनी जड़ों की ओर 


एक खिड़की 

एक दरवाज़े वाले 

दो कमरों का घर

घर में आजाद खयालों

के बंद दरवाजे 

मुझसे सवाल करने लगे


एक नागरिक को पता चलती है 

उसकी नागरिकता

जाति, धर्म , 

इतिहास और भूगोल 

की सीमाएं 


स्वजाति , स्वधर्म , स्वनागरिक

और स्व स्वभुगोल

के दायरे में नागरिक 

डूबता जाता है 


घर के मुक्त आंगन

से देश के मुक्तांगन

की उड़ी उड़ान 

यादों में जड़ होने 

लगती हैं 


 स्व

और स्वयं 

के घेरे में रचने बसने 

की नसीहतें कभी कभी

हिंसक होने लगती हैं 


भाषा की मर्यादाएं 

टूटने लगती हैं 

खाली बर्तन

टकराने लगते हैं 

सवालों के जवाब 

न दिए जाने में ही

समझी जाती है 

घर की भलाई 


नागरिक बदहवास 

छोड़ जाना चाहता है 

अपनी नागरिकता 

और उतार फेंकना चाहता है

अपनों का ढोंग 


तमाम भावनात्मक

बेड़ियों में उलझ 

आख़िर में वो 

स्वीकारता है 

नागरिकता 

कुनबे की 

वंशावली की 

और समाज की !



भेड़ों की भीड़ !

 


भीड़ में एक आदमी

गुम होता है 

जैसे भेड़ों में एक आदमी


आदम युग से

सीखता आया है आदमी

गुम होना

और भेड़ों को हांकना 


भेड़िया भेड़ के भेष में

भीड़ को रिझाता है 

उठा लाता है 

किसी एक भेड़ को 

दिखाने भेड़ियों के झुंड


सहमी भेड़ 

लाती है रोज 

एक और भेड़ को

भेंट में


भीड़ छटने लगती है 

भेड़िए के भेष में

भेड़ का चेहरा 

साफ होता जाता है !

शुक्रवार, 18 अप्रैल 2025

जब पिता मर जाते हैं !



बच्चे मर जाते हैं 

जब पिता मर जाते हैं 

और मर जाते हैं 

बच्चों के भीतर 

अनुत्तरित हजारों सवाल 


बच्चे मर कर

जी कर जब 

बनते हैं एक पिता

तो मारते हैं एक

पिता को वो भी 


पिता पुत्र के बीच

की खाई को सिर्फ

मौन पाट पाता है 

संवाद के 

अनगिनत बहाने

ढूंढ लेती है

पिघली बर्फ


दोनों तरसते हैं

तिल तिल

गले मिलने को 

नहीं मिलते विचार

फिर भी आदतें

मिलती हैं 


शीत युद्ध के

कुचक्र से 

क्षत विक्षत 

पिसते हैं 

पिता पुत्र 

के संबंध

लंबे अरसे तक 


सम्मान की सफेद 

चादर में लिपटे

जज़्बात छटपटाते हैं 

आत्मग्लानि के बोध

से ढह जाते हैं

आशाओं के किले

और छत्र छाया

का आभास टूट कर

बिखर जाता है 

तब पिता के साथ

पुत्र भी नहीं रहते । 

बुधवार, 2 अप्रैल 2025

ईद मलीदा !



मैं गया था और 

लौट आया सकुशल

बगैर किसी

शारीरिक क्षति

और धार्मिक ठेस के 


घनी बस्ती की संकरी

गलियों की नालियों में

कहीं खून का एक कतरा

न दिखा मुझे 

छतों पर पत्थर 

कमरों में तलवारें

चापड़, बंदूकें 

छुरी और

बम - तोप का

नाम ओ निशाँ न मिला


सफेद जो गंदा होता है 

जल्द , आसानी से 

पहने हुए लोग 

गले मिलते दिखाई दिए 

किसी की छाती पर

गंदगी नहीं दिखी


असलम , हामिद , रेहान

कुछ नहीं लेते आए हैं

दशकों मुझसे 

मैं ही जाता हूं

साल दर साल 

उनके घर ईद पर 


जुबां पर 

मां - बहनों के हाथों बनाई

किमामी सेंवई , दही फुल्की

छोले , ज़र्दा 

खीर का स्वाद 

और मुस्कुराहट के साथ

" फिर आना " की ताक़ीद 

ने कभी ठगा नहीं मुझे


बचपन से देखता 

आया हूं उन्हें 

क्लास में , बस में

खेल के मैदान में 

टेलर की दुकान में 

जूते के कुटीर उद्योग में

केमेस्ट्री के प्रोफेसर के घर में


कौन हैं वो

कहां से आएं हैं

और क्यों हैं वो यहां

कभी सवाल नहीं उपजा

दिल और दिमाग में


सवाल अजनबियों से होते हैं

या दुश्मनों की आहट से

दूरियां नजदीकियां 

शिकवे शिकायतें

कहां नहीं होते

मिलते रहने से 

मिटते हैं सारे भ्रम


मिलने से खिलती हैं

आपसदारियां

पनपती है 

विभिन्न रंगों से सजी

दुनिया की समझदारियां ।

मंगलवार, 18 मार्च 2025

किस्सा प्रेम का ...



 ठहर कर

एक पल

मादक वसंत

झरने सा 

झर झर 

बह गया

लहर कर

गाल ऊपर

बाल काले

मोहक छवि

को गढ़ गया

दुबक कर

आंख का

काजल

सुनहरे

मोतियों

में ढल गया

गुलाबी

नर्म होंठों पर

न जाने

कौन सा 

किस्सा

अधूरा रह गया


रविवार, 16 मार्च 2025

एअर फोर्स की होली


याद बहुत आती है मुझको

एयर फोर्स की अपनी होली

धूम मचाने जहां निकलती

 बिंदास बैचलर्स की टोली

याद बहुत आती है मुझको

एयर फोर्स की अपनी होली


मिश्रा भाभी का मीठी गुजिया से

मुंह मीठा करवाना

दही बड़े जो बड़े बड़े थे

गुप्ता जी के घर पर

हक जमाकर प्लेट उठाकर

झट से चट कर जाना

यादव सर का दुध का शर्बत

कहकर भांग पिलाना

इसी खुमारी में रेड्डी का

सी ओ संग भंगडा पाना

राव गारू की इडली चटनी

चौबे का लिट्टी चोखा

मलिक और राठी के घर पर

हर बार मिला जो धोखा

दिखा पकौड़े, डंडे कोड़े

मुहब्बत भरे खिलाना

पिल्लै सर का लिटिल लिटिल

कहकर हमें पिलाना

अहमद और जैकब का हैप्पी

होली कहकर गले लगाना

गुलाल लगाकर रफीक का

मेरे बदले ड्यूटी जाना

भूला कहां मैं शेखावत का

वो रजपूती बाणा

 बिना सुर के सांझ ढले तक

उसका राजस्थानी गाना


लगा एक कैंप नहीं

एक परिवार हैं हम

संग संग जीने का 

आधार हैं हम

एक इकाई, पड़ी दिखाई

भले संस्कृति रही 

सबकी अलग अलग

अलग अलग रही सबकी बोली

याद बहुत आती है मुझको

एयर फोर्स की अपनी होली

धूम मचाने जहां निकलती

बिंदास बैचलर्स की टोली.


वायु सेना की यादें,,,,,,,



प्रताप सिंह 

रि. वायु सैनिक 

भारतीय वायु सेना 

सोमवार, 24 फ़रवरी 2025

मुट्ठी भर तारे ...



तुम जहां कहीं भी

हो आसमान में

लौट सके तो

लौटना

तोड़ लाना तारे

मुट्ठी भर कुछ

मेरे लिए


रोज रात आसमान में

नजरें गड़ाए 

ढूंढता हूं तुमको

अनगिनत तारों और

एक चंद्रमा के अलावा

कुछ नहीं देख पाता


यहां को छोड़ गए लोग

बताए जाते हैं 

जाते हैं वहां आसमान में !

गुरुवार, 12 दिसंबर 2024

कलम चोर !

एक बड़ी संस्था के 

ऑफिस टेबल के नीचे

ठीक बीचों बीच 

एक पेन तीन दिन पड़ा रहा 

ऑफिस में आने वाले

अधिकारी , कर्मचारियों

की रीढ़ की हड्डी की लोच 

खत्म हो गई होगी शायद

चौथे दिन सफाई वाली

आंटी भी पेन वाले 

हिस्से को छोड़ 

पूरे ऑफिस में 

झाड़ू पोछा कर देती 

ऑफिस में चाय वाले

छोटू की नज़र 

रोज़ उस पेन पर पड़ती

एक दिन छोटू ने 

मौका देख पेन जेब 

में रखा और चला गया 

दूसरे दिन 

पेन के गायब होने की

शिकायत एक दूसरे से 

करते नज़र आए कर्मचारी , अधिकारी

सी सी टी वी में

पेन को उठाते हुए 

छोटू को देख 

सब भड़के 

छोटू को धमकी 

हिदायतों के साथ 

उसकी चाय पर 

प्रतिबंध लगाया गया 

और उससे वो पेन

वापस टेबल के ऊपर

रखवा लिया गया ।

रविवार, 1 सितंबर 2024

तुम कुछ और .......

 


मेरी माफी का जिक्र 

मुझसे न करना 

तुम कुछ और बह लेना 


कह लेना मुझसे 

मेरे कुफ्र की बातें 

कभी जब तन्हा 

तुम कुछ और रह लेना 


अभी कहा कहां हैं 

कहां जाने को हूं मैं 

यकीन आए तो तलबगार

तुम कुछ और सह लेना 


बुरा भला अब कहां 

मेरे बस में 

मेरे मौन को चीत्कार में

तुम कुछ और कह लेना !


गुरुवार, 1 अगस्त 2024

सुनो !


पूछते क्यों नही 

आकाश का पानी

कहाँ गया सारा


धरा की प्यास

बुझी नही 

क्यों अब तक ?


कब तलक

झुकी घटाएं 

नाट्य रूपांतरण

करती रहेंगी 


मेरी प्यास पर 

रोना आता है मुझे

मुझे मेरी तरह 

निबाह लो !


गुरुवार, 25 जुलाई 2024

आवारगी बेईमान !


एक दम निपट खाली 

आवारगी अपना चेहरा

बना लेती है सोंठ

की तरह 


आवारगी मोल लेती है 

अपना , अपनों के 

तीष्ण बाणों से 

सवालों से घिरी रहती 

पता पा लेने वालों से 

पता पूछती है 

गुमशुदा लोगों से 


विदा का खेल है

आना जाना और गुम 

रास्तों को भूलना 

बिना कोई ठेस पहुंचाए

निकलना कोई धोखा नही 


आवारगी धाम है मेरा

आवारा सड़कों पर 

निगाह ढूंढती है आवारा 

जंगली का ताज लिए 

घूमता हूं भटक जाने तक


काम से निकले काम 

की राह भटक जाना

गुण है शायद 

आवारगी का


घर में चावल , चीनी

लाने भेजा जाता है 

भटक कर झील की

राह आंखों में तैरते

सपने सुकून से देखता हूं 


रोज रोज भटकने का

मन करता जरूर है 

पर जाऊं कहां 

कितनी दूर , कितने समय को 

जाऊं , छूट जाए दिनचर्या

का भाव , बह जाएं

छूट जाने के दुःख 


सब कुछ हासिल करने

की ज़िद और आरामतलबी 

कभी न कभी छीन लेती है 

गतिशीलता के गुणधर्म को 


उम्र पर चढ़ती झाइयां 

राशन से निकलती नही


अटक जाते हैं हम

एक मकान , एक परिवार

एक जिंदगी 

के फेर में

देहरी के उस पार

भटकती दुनिया दिखती है ।



गुरुवार, 4 जुलाई 2024

मैं कौन ?



दुख के संजीदा लम्हों में 

मैने दुखते हृदय बुहारे 

मेरी इन सांसों का कर्जा

जाने कौन उतारे 


मैं हूं 

मैं ही हूं 

मेरा सब कुछ 

मैं ही हूं 

मुझसे मुझमें पूछे कौन 

कौन डुबाए कौन उबारे ...


इस अवसर के उस अक्सर को

मोह दिया सब त्याग

मणि कर्णिका के घाटों का 

अब पानी कौन उतारे 


उतराता मैं इतराता

जानू ज्ञान गंगा के घाट 

बसी अजोध्या जी जू में

राह बिसूरे राम के ठाठ 

मुझसे मेरा ब्रम्ह भ्रमण 

नयना क्यों दुखियारे 


मैं हूं 

मैं की इति हूं

अतिरेक का दर्पण हूं 

मुझसे मेरा मैं मूर्छित कर 

मुझको दिखा दिया रे ....


शुक्रवार, 7 जून 2024

वो जो खिड़की है न !

 


वो जो खिड़की है न 

फ्रेम है तुम्हारी सुबहों का 


बाहर से भीतर झांकती

रोशनी तुम्हारे कदमों को

चूमती हुई तुम्हारी आंखों

में चमक कर खुलती है 


एक कोमल सहज स्पर्श

बदन पर पसर जाता है 

खिड़की पर छापे सा 

बोगेनवेलिया तुम्हे निहारता है


2.

एक खिड़की जागती

अल सुबह मदमस्त झूमती

सिरहाने भोर की दस्तक देती

पसर जाती अलसाई देह पर


दुनिया की तीक्ष्ण , तेज़ 

हवाओं से कुम्हलाए मन को

साधती , सहलाती नेह से

भरती आंखों में नई उम्मीद


खुलती बंद होती 

कमरे की खिड़की 

मन की खिड़की 

से खुलती है 


खिड़की का खुलना

बंद होना दर असल 

मन का होना होता है !


मंगलवार, 17 अक्टूबर 2023

इन दिनों मैं लिए घूमता हूं भगवान !



इन दिनों मैं भगवान लाया हूं

कमरे की छोटी सी अलमारी में 

जो लेने गया था बाज़ार में 

वो तो न मिला 

पर फ्रेम वाली फोटो हनुमान की

कांच का शिवलिंग मिला कस्बे में 


अलमारी में 

किताबे भी रखी हैं नई पुरानी

छिपकलियां घूमती हैं जिसमें

दादी की सील चुकी फ्रेम तस्वीर

के पीछे छिप रहती हैं अक्सर


मैं भगवान के साथ

खूब ढेर सारी धूप , अगरबत्ती 

हवन सामग्री , लोबान , गुग्गल, कपूर 

और कुछ ज्यादा ठंडा करने वाला चंदन

टूटी आम की लकड़ियां सुलगाने 

पिछले महीने लिए खाने वाला घी

काम आया हवन में , 

स्थापना के वक्त


इन दिनों मैं रोज सुबह शाम 

धूप जलाता हूं , घी का दीपक जलाता हूं 

अगरबत्ती सुलगाता हूं 

और कुछ नई स्तुतियां गाता हूं 


मैने सीख लिया है हमारे बीच नहीं रहे

पूर्वजों के आगे धूप जलाना 

अन्य भगवानों के लिए दीप जलाना

कुछ आशीष के आकांक्षा लिए 

हांथ जुड़ते हैं , होंठ बुदबुदाते हैं 


इन दिनों जो में काम कर रहा हूं 

ये कई वर्षों से किया जाता रहा है 

मेरे करीबियों के जीवन में 

मेरे मार्गदर्शकों के घरों में 


घर के उस कोने में छिपकलियां 

अब नही आती , 

मच्छर भी धूप धुएं से 

कम हैं पहले से 


इन सारे उपायों के केंद्र बिंदु में 

मन के भीतर से जब भी कोई 

मांग करता हूं


मन भटक जाता है 

मैं , मेरा परिवार , मेरी संपत्ति 

या अमन चैन

से होता हुआ मन

यात्रा करता है 

मणिपुर , यूक्रेन , रूस , इजराइल 


कितना कुछ है मांगने को 

पर मांगना क्यों ? 

ईश्वर मुझसे कहता है 

मांगना क्यों ? 


मैं बंद कर देता हूं पूजा

कस लेता हूं जूते

निकल पड़ता हूं

लंबी यात्रा पर 

इन दिनों मैं 

भगवान लिए घूमता हूं । 


बच्चों को उड़ने दो ..

 उड़ने दो , उड़ने दो  बच्चों को उड़ने दो ... गर नाक अटक जाए  तो भी तो  उड़ने दो ..   जिस ऊर्जा का  संचार प्रवाह  हो उद्दंड  उसको भी  उड़ने दो  कह...