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बुधवार, 5 मार्च 2025

चौधरी की दुनिया

 प्लॉट : 

भयंकर आर्थिक मंदी, बेरोजगारी और सामाजिक ताने बाने में उथल पुथल के चलते शहर का हैप्पीनेस इंडेक्स लगातार गिरता चला जा रहा है । 

पर कानपुर से लखनऊ आए एक अजीबो गरीब परिवार की आमद से लखनऊ का डालीगंज लहलहा उठता है । नौकरी , काम धंधे में कोई खास हासिल न होने के बावजूद भी चौधरी मेवालाल का परिवार खुशहाल जीवन जीने की कला जानता है । परिवार से ताल्लुक रखने वाले  लोगों के संसाधनों , सेवाओं का भरपूर लाभ लेकर बदले में खुशहाली का लॉलीपॉप थमा देना ही इस परिवार की उपलब्धि है । खिलखिलाहट और हंसी ठिठोली के भंवर में फंसे हुए लोग कुछ न कुछ पूजाने के बाद भी इस परिवार के प्रति कृतज्ञ रहते हैं । क्यों की खुशियां अनमोल होती हैं ....


कैरक्टर :

पिता : चौधरी मेवालाल

उम्र : 55 वर्ष

कानपुर से एक परिवार लखनऊ के डालीगंज में ट्रांसफर लेकर आता है । घर के मुखिया यानी चौधरी मेवालाल 55 साल के हैं । चौधरी मेवालाल काफी रंगीन मिजाज के हैं ।   उनका मानना है । जिंदगी कैसी भी हो पर हुलिया एक दम टीम टाम होना चाहिए । 

आंखों पर काला चश्मा , ऊपर से नीचे तक रंगीन परिधान , नए नए तरह के जूते चप्पल और रंग बिरंगे रुमाल उनकी शान में चार चांद लगाते हैं । कपड़े सस्ते होने चाहिए लेकिन वैरायटी खूब होनी चाहिए । ऐसा उनका मानना है । इसलिए हर हफ्ते उनके गेट अप में भारी बदलाव देखने को मिलता है । 

कभी स्पोर्ट्सवेयर , कभी फॉर्मल तो कभी कैजुअल आउटलुक में उनके साथ आए दिन कैजुअलिटी होती रहती है । 

उनके रहन सहन से उनके घरवालों और मोहल्ले वालों को हमेशा आपत्ति रहती है । आपत्तियों से उन्हें ऊर्जा मिलती है । 

बड़ा बेटा : शंकर लाल उर्फ सैंकी 

उम्र : 30 वर्ष

30 बसंत देख चुके बड़े बेटे सैंकी के सपने उनके पिता चौधरी मेवालाल से भी बड़े हैं । हर सुबह कुछ कर गुजरने की चाह रखने वाले सैंकी शाम आते आते ठंडे पड़ जाते हैं । नौकरी के नाम पर उन्होंने कई कॉल सेंटरों की खाक छान रखी है । इसलिए फ्रैंकनेस और स्टाइल दोनों से भरपूर हैं । आशिक मिजाज़ सैंकी के पास नए नवेले आइडिया की भरमार रहती है । तड़ से दोस्ती भड़ से जुगाड उन्हें परिवार का लाडला बनाए रखता है । 


छोटा बेटा : राधे लाल उर्फ रॉकी

उम्र:  24 वर्ष 

चौधरी मेवालाल के छोटे बेटे 24 वर्षीय रॉकी ट्रैवल एजेंट हैं । घर बैठे वो लोगों को देश दुनिया की सैर कराते हैं । उनकी किस्मत उनके काम का साथ कभी कभी दे पाती है । महीने के उनके खर्चे आमदनी से हर बार ऊपर शूट कर जाते हैं । इसलिए घर में रखे वॉलेट , हैंड बैग और पेंट की पॉकेट्स अक्सर साफ हो जाती हैं । इन हांथ की सफाई की घटनाओं में अधिकतर सैंकी को शक के घेरे में कैद कर लिया जाता है । 


सबसे छोटी बेटी : स्वाति उर्फ स्वीटी 

उम्र : 19 वर्ष 

मेवालाल की सबसे छोटी फूल सी बेटी स्वीटी Gen Z की पैदाइश हैं । 19 साल की उम्र में उनके खर्चे और नखरे उठाने के लिए कई नौकरीपेशा नव युवक आतुर रहते हैं । पिंक कलर की उनकी स्कूटी उनके पंख हैं । उनका फ्रेंड सर्कल उनके परिवार से बढ़ कर है । उनका सपना है एयर होस्टेस बनना । 


पत्नी : मनोरमा उर्फ मनु

उम्र : 50 वर्ष

मेवालाल जी की पत्नी होम मेकर के साथ साथ एम एल एम यानी मल्टी लेवल मार्केटिंग कंपनी में एमरल्ड प्लैनर हैं । उनके बिजनेस के तीन लेग्स उनके परिवार के सदस्यों के नाम से रजिस्टर्ड हैं । पिछले दस साल से वो घर के कामों से खाली समय में बिजनेस प्लान समझाती हैं । और डील क्रैक होने पर अपलाइन और डाउनलाइन की पार्टी करती हैं ।

हमेशा कंट्रास्ट आउटलाइन के साथ सुर्ख लाल , कभी चॉकलेटी लिपस्टिक के साथ अन्य मेकअप के सामान उनके चेहरे की चढ़ती उम्र छुपा ले जाती है । 

बेडौल शरीर पर नए जमाने के परिधान और अंग्रेजी की खिल्ली उड़ाती भाषा में बिजनेस प्रोडक्ट्स और बिजनेस की पिचिंग 

लोगों को गुदगुदाती है । 



एपिसोड 1. 

स्वागत है श्रीमान ...


8- 10 घरों की दौलत राम रेजिडेंसी के आस पास घनी बस्ती है । रेजिडेंसी के तीन गेट हैं । जिनके बाहर अक्सर बस्ती के कूड़े का ढेर जमा रहता है । रेजिडेंसी के पास थोक और फुटकर बाजार है। डालीगंज का मुख्य बाजार मंगल यानी साप्ताहिक बंदी को छोड़ खरीदारों से पटा रहता है।  

सोसायटी के भीतर और बाहर एकदम उलट माहौल रहता है । सोसाइटी के भीतर एक छोटा सा पार्क है । 

आज की सुबह दौलत राम रेजिडेंसी के लिए कुछ खास है । रेजिडेंट सोसाइटी के सभी गेट पर चूना पड़ा हुआ है । गेट पर वेलकम नोट के साथ हंसते हुए मेवालाल एंड फैमिली की बड़ी सी तस्वीर लटक रही है । वेलकम नोट पर लिखा है 

" करो जश्न की तैयारी 

आ रहे हैं सुविधाधारी " 

नगर निगम के सफाई कर्मचारी फुल ड्रेस में सोसाइटी की साफ सफाई में जुटे हुए हैं । जैसे कोई वी वी आई पी की विजिट हो । 

ढोल नगाड़े की आवाज सोसायटी में जैसे ही फूटती है । दौलत राम रेजिडेंसी के लोग छत से झांकने लगते हैं । तभी ढोल बाजे लेकर खुली जीप सोसायटी के बाहर हॉर्न बजाती है । सोसाइटी का चौकीदार गेट खोलता है । जीप के पीछे फूलों से सजी डी सी एम ट्रक है । और उसके पीछे एक कार भी ।

इस शानदार इंट्री से सोसायटी के लोग हक्का बक्का हुए जा रहे हैं । लोग आलीशान बंगलों की बालकनी से नाइट गाउन में सोसाइटी की बदली हवा को गौर से रहे हैं । 

सभी गाड़ियां सोसायटी के अंदर प्रवेश करती हैं । ढोल की  आवाज और ऊंची और थाप और तेज होने लगती है । 

काफिले की आखिरी वाली गाड़ी (कार ) से चौधरी मेवालाल और उनका परिवार उतरता है । चौधरी मेवालाल जगह पर ही खड़े होकर पूरी सोसायटी को गर्दन घुमाते हुए देखते हैं । 

नगर निगम के सफाई कर्मचारी नमस्ते बाबू जी कहते हुए मेवालाल के पास आते हैं । " बाबू जी ठेकेदार साहेब ने आप के आने की सूचना पहले ही दे दी थी । उनका सख्त आदेश था कि बड़े बाबू के स्वागत में सोसाइटी का चप्पा चप्पा साफ होना चाहिए । हम सब सुबह 4 बजे से लगे हैं । कैसी लगी सफाई व्यवस्था ? 

बहुत बढ़िया ! चौधरी साहब ने काला चश्मा उतारते हुए सफाई कर्मचारी से कहा । और जीप में बज रहे ढोल वालों को ढोल बंद करने का इशारा किया । सोसायटी की छतों पर और दरवाजों पर लोग बाहर निकल के इस स्वागत को देख रहे थे । और आपस में बातचीत करते हुए मुस्कुरा रहे हैं। 

अरे सुनो ! इधर आओ सब लोग । सारे सफाई कर्मचारी चौधरी साहब के पास आ जाते हैं । ठेकेदार ने सामान उतरवाने की भी बात बताई होगी तुम लोगों को । चौधरी ने बड़े रुतबे से कहा । 

जो साहब बताई थी । आप चिंता ना करें । आप लोग पार्क में आराम से बैठिए । हम सब लोग सामान उतरवा लेंगे । बस साहब ! हम लोग सुबह 3 बजे से लगे हैं । पेट में कुछ भी गया नहीं है । बस थोड़ा बहुत नाश्ते पानी का खर्चा पानी दे दीजिए । दो घंटे में सब सामान उतरवा देंगे हम सब । 

हां हां क्यों नहीं । चिंता मत करो चौधरी साहब किसी का हक नहीं मारते । चौधरी साहब की पत्नी सामने आकर सभी को आश्वासन देती हैं । 

चौधरी साहब का बड़ा बेटा सैंकी छोटे भाई के साथ सामने घर का दरवाजा खोलता है । सफाई कर्मचारी डीसीएम का डाला खोल कर खड़े हो जाते हैं । 

साहब कुछ नेग वगैरह न्योछावर कर देयो , फिर काम शुरू  किन जाए । 

हा हा हा ! चौधरी साहब ठहाके लगा कर हंसते हुए सफाई कर्मचारी के कंधे पर हांथ रखते हैं । और कहते हैं तुम लोग कर्म करो फल की चिंता मत करो । और हां ज़रा सम्भाल के उतारना । काफी कीमती और नाजुक चीजें भी हैं । कुछ टूट फूट हुई तो ठेकेदार को ही भरना पड़ेगा । 

यह कहते हुए चौधरी साहब पत्नी का हांथ पकड़ के घर की तरफ बढ़ चले । उनकी छोटी बेटी भी पीछे पीछे साथ हो ली । 

सफाई कर्मचारी पीठ पीछे बुरा भला बकते हुए सामान उतारते रहे । 

पुराना फ्रिज , पुराना वाशिंग मशीन , पुरानी ड्रेसिंग टेबल , पुरानी डायनिंग टेबल , दो स्टडी टेबल ,  तीन तख्त , पुराना स्कूटर और कई किचेन के नए पुराने सामान गठरियों में भरे हुए डी सी एम में लद कर आया है । चौधरी परिवार की एक एक चीज के उतरने और घर के मुख्य दरवाजे से अंदर जाते सामान पर चौधरी परिवार की पैनी नजर स्कैन करती रही।  


दो तीन घंटे की मशक्कत के बाद सारा सामान उतार लिया गया । घर के भीतर छोटे से लॉन में सारा सामान लगा कर  सारे कर्मचारी हांथ झाड़ते हुए चौधरी साहब से मुखातिब होते हैं । 

जी बाबूजी  ! उतर गया सब सामान । अब थोड़ा खर्चा पानी दे दीजिए । 

चौधरी साहब अपनी पत्नी से ...

अरे सुनती हो ... जरा इन लोगों का मुंह मीठा करवाओ । बड़ी मेहनत की है इन लोगों ने । 

चौधरी साहेब की पत्नी कानपुर मशहूर ठग्गू के लड्डू लेकर आती हैं । और सारे कर्मचारियों को एक एक कर के खिलाती हैं । चौधरी साहब की बिटिया जग से कर्मचारियों के चुल्लू में पानी भर भर पिलाती हैं । 

चौधरी साहेब दोनों लड़के डालीगंज बाजार से पुड़ी कचौड़ी और दही जलेबी का नाश्ता सब के सामने दोने में पत्तल में परोस के धर देते हैं । 

चौधरी साहब का पूरा परिवार कर्मचारियों के साथ नाश्ता करता है । 

तभी ढोल भांगड़े वाले भी घर के भीतर आते हैं।  और खाने पीने के उस दौर पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं ...

अरे साहेब हम लोगों को भूल गए क्या ! सुबह से हम सब भी ढोल बजा रहे हैं आप के स्वागत में । और आप हम लोगों को छोड़ कर यहां नाश्ता कर रहे हैं । 

चौधरी साहब : 

आप लोगों को कैसे भूल सकते हैं । हमने सोचा कि पहले इन लोगों को विदा कर फिर आप लोगों की खातिरदारी करते । खैर ! चौधरी साहब अपने बेटों से और नाश्ता लगाने की ओर इशारा करते हैं । 


चौधरी साहब बारी बारी से सभी का नाम पूछते हैं । और लखऊ की अब ओ हवा की खोज खबर करते हैं । 



सोमवार, 9 सितंबर 2024

कबाब में हड्डी !

 फिर क्या सबब

फेंकने को कबाब 

न मै जुदा हुआ

न आलू जनाब ! 


1. ये फूहड़ सी कविता कह कर मानव उठ जाता है । उठ के बाथरूम की तरफ भागता है । शीशे के सामने अपने को घूर कर , दो उंगलियां हलक में डूबो देते हैं । एक बड़ी सी पलटी मार के वो एक दम हीरो की तरह आते हैं । 

महफिल की तरफ बढ़ते हैं । कुछ उठाने के लिए झुकते हैं । और महफिल से चल देते हैं । महफिल में उनके नाते रिश्तेदार भौचक रह जाते हैं । डाइनिंग टेबल पर सजे गलावटी कबाब , शीरमाल और मटन ठंडे पड़ चुके हैं ।


कट टू 


V/O 

2. मानव के दिमाग में पिछले सभी दृश्य एक एक कर आंखों के सामने आते रहे । ससुराल की दीवारें इतनी संकुचित हो सकती हैं । उसने कभी सोचा नहीं था । शादी , विवाह घर द्वार सब की दास्तानें आंखों के सामने फिल्म की तरह चलने लगीं । खाना पीना किसी परिवार के लिए 


मानव अपने कमरे में आ जाता है जहां पत्नी आभा कपड़ों पर प्रेस कर रही है । 

कमरे में घुप्प खामोशी है । केवल आभा की हरी चूड़ियां ही गुस्से में तेज तेज खनक रही है । 

मानव चुपचाप आकर सोफे पर बैठ जाता है । एक किताब उठाता है और पढ़ने लगता है । 

पिछले एक हफ्ते से मानव अपने परिवार के साथ लखनऊ के एक होटल में रह रहा है । 


. आभा पूरे कमरे की सफाई के बाद लेट गई । मानव सोफे पर बैठा किताब की आड़ से आभा के हाव भाव देख रहा था । वो एक झटके से सोफे से उठता है । और सीधे आभा के ऊपर लद जाता । आभा उसे हांथ से किनारे की ओर धकेलती है । मानव कुछ सेकंड दूसरी तरफ मुंह करे फिर से आभा के पास जाने की हिम्मत जुटाता है । मानव छिपकली के ऐसे घात लगा कर फिर से आभा को दबोच लेता है । 

आभा का विरोध इस बार कुछ कम बल का था । पर आँखें बंद थी । मुट्ठियां भींची हुई थी । मानव उसकी देह पर रेंगने लगा । उसने कई बार मानव को बताया कि वो व्रत है । 

आभा का दिल और दिमाग दोनों उस वक्त मानव से मेल नहीं खा रहे थे । मानव के ऊपर कुछ साबित करने का भूत सवार था । 


दोनों जब एक दूसरे से छूटे तो पस्त पड़ गए थे । काफी देर बाद मानव आभा के एकदम नजदीक आकर पूछता है । 

तुम परेशान हो ? 

आभा ने फिर एक बार मानव को धक्का दिया । और ऊंची आवाज में कहा " तुम लोगों ने परेशान कर रखा है " । जब से मैं तुम लोगों के घर पर रह रही हूं । तब से एक दिन भी चैन से नहीं गुजरा है । तुम्हारे मां पिता के लिए रोटियां सेकती रहूं , तुम्हारे बच्चे की परवरिश करूं , तुम्हारी चड्ढियों से लेकर घर का राशन पानी तक मै लाऊं । 


बस करो आभा ! मानव अपना दाहिना हाथ आभा के मुंह पर रख देता है । कुछ क्षण के लिए दोनों एक दूसरे के बेहद करीब आंखों में आँखें डाल घूरते रहे । 

मेरी चुप्पी को तुम हवा में मत उछाला करो । हज़ार बार कहा है । कहीं का गुस्सा कहीं पर मत निकाला करो । नहीं बात करनी तुमसे । देखता हूं कब तक यूं जाली रस्सी की तरह ऐंठी रहोगी । मानव कपड़े पहनता है । और निकल जाता है बुदबुदाते । 


होटल के अन्य कमरों में मानव के रिश्तेदार भी ठहरे हैं । लगभग शाम के खाने पर सभी लोग मिलते हैं । सुबह नाश्ते पर । फिर दिन भर सब अपने अपने रास्ते । 


आभा के भाई , उसकी पत्नी , बच्चा मां पिता एक लक्जरी सूट में रुके हैं । और मानव के मां पिता डीलक्स डबल बेडरूम । मानव का बेटा कभी दादा दादी के कमरे में तो कभी मानव और आभा के कमरे में । 


मानव के पिता जुगुल किशोर पुराने इत्र के कारोबारी हैं । फूल पौधों का रस निचोड़ कर वो इत्र बनाते थे । और इत्र को घर बैठे बेंच लिया करते थे।  उनके हिसाब से महक का कारोबार बड़ा सुगंधित होता है । महक के जानकारों को यदि सौ गरज हो तो वो आवै । 


आभा के पिता मास्टर जी , और मां रिटायर मास्टरनी । भाई अधिकारी , भाभी अधिकारी । 


दोनों लोगों के परिवार किसी कारण से यहां डेरा डाले पड़े हैं । 


मानव कुछ देर बाहर गुजार कर कमरे में आता है । आभा बेड के एक कोने पर बैठ , नेल पॉलिश लगा रही है । मानव की बॉडी लैंग्वेज बहुत सधी लग रही है । 

क्या इस झगड़े को यहीं खत्म नहीं किया जा सकता ? मानव की गहरी निगाहें आभा के हाथों पैरों में नील पोलिश को देखती हैं । 


आभा अपनी नेलपॉलिश को फूंकती है और बड़ी तहजीब से " नहीं " कहती है । 


मानव : क्या मतलब ? 

आभा : मतलब मै समझाऊं या तुम समझाओ ! मेरा दिमाग मत खराब करो । नहीं तो मैं यहां से उठ के चल दूंगी । मुझे शांति चाहिए ! शांति .... इसलिए चुप रह रही हूं । बाकी तुम्हारी मर्जी । अब मेरे और तुम्हारे बीच में कुछ बचा नहीं है । हम लोग यहां अलग होने आए हैं । अलग होकर ही रहेंगे । तुम्हारा काम है पेपर वर्क का । जल्द से जल्द कागज़ बनवा के अलग होइए । मैं और तमाशा बर्दाश्त नहीं करूंगी।  

बस एक सहयोग तुमसे चाहती हूं । कि 

ये काम होने तक किसी को पता भी नहीं होना चाहिए । वरना हमारे घरवाले फिर से हमें एक साथ फंसा देंगे । 

लाइट बंद कर देना । कहकर आभा चादर ओढ कर लेट गई । 


मानव भी एक किनारे सो जाता है । शाम होते ही बेल बजती है । आभा झटपट संभलती है । और दरवाज़ा खोलती है । 


जुगुल किशोर जी अपना टूटा मोबाइल दिखाते हुए कहते हैं । ज़रा देखना तो इसमें क्या हो गया ? 

आभा आराम से टूटने को समझाती है । और उन्हें वापस कर देती है । ससुर जी बैरन लौट जाते हैं ।


थोड़ी देर बाद पूरा परिवार एक साथ होटल के डाइनिंग हॉल में इकट्ठा होता है । 


दोनों परिवार देखने सुनने में एक जैसे । पर आचार विचार एक दम अलग । 


चूंकि होटल के इंतजाम मानव ने करवाया था । इसलिए सब कुछ उसके हिसाब से था । मेहराबदार दरीचे , पुराने शहर के पुराने खान पान सब मिल जाते हैं यहां । 


आज का खाना बाहर से आया था । होटल के बंधे खाने से आजादी का दिन है । सब खाने खुल खुल के प्लेट्स में लगाए जा रहे हैं । 


तभी आभा खड़ी होती है । सबका अटेंशन मांगती है । 

आप सब को लगता होगा कि हम सब यहां घूमने आए हैं ।हम यहां घूमने नहीं आए हैं । मैं और मानव एक दूसरे से छुटकारा पाना चाहते हैं । इसके लिए कोर्ट में पेपर पड़े हुए हैं । हम स्वेक्षा से दोनों लोग अलग हो रहे हैं ।  


जुगुल किशोर : इस बात का तो मुझे पहले से ही एहसास था । लेकिन किससे कहूं । इसलिए चुप रहा । 


आभा : पापा आप चुप रहे ? आप को अपने बेटे की खराबी नहीं दिखाई देती तो मेरी अच्छाई कैसे दिखाई दे । इस घर को केवल खाना खाना और खाना की पड़ी रहती है । 

न पढ़ाई की बात , न जीने का सलीका । सिर्फ अच्छा खाना और पड़े रहना घर में । ये कोई जीवन है ! 

ऊपर से ये लुमड़ मानव जी । पूछिए कितने साल हो गए हैं शादी को ? दिया क्या है इन्होंने । सिर्फ एक बच्चे के सिवा।  एक बच्चा , मां बाप और घर सब मेरे कांधे । और ये महाशय दुनिया की सैर काटें। 

अपने आप को हरफनमौला समझते हैं । हांथ में फूटी कौड़ी नहीं जुड़ती।  ये आदमी मेरे पर्स से पैसे चुराता है । बच्चे के गुल्लक से पैसे निकालता है । अय्याशियां करता है । 

आभा इतना कह कर अपने कमरे में चली जाती है । डाइनिंग टेबल पर आंधियां उड़ रही थी । सब की नजरें मानव पर लगी रही । मानव गुस्से से उठता है । और अपने कमरे की ओर बढ़ जाता है । 


मानव ने डोर बेल बजाई  , एक बार , दो बार फिर तीसरी बार । जोर जोर से दरवाजा पीटा । लगभग 1 मिनट के बाद आभा दरवाजा खोलती है । वो फोन पर किसी से बात कर रही है । उसने हाथों में नेल पॉलिश लगाई है । फोन कंधे से दबाए सभी उंगलियां फैलाए वो ए.सी के ठीक सामने बैठ गई । मानव परेशान हाल में सोफे पर बैठ जाता है । 


कुछ मिनटों बाद आभा फोन डिस्कनेक्ट करती है । और रील्स को स्क्रॉल करने लगती है । 


मानव : बस शुरू हो गया तुम्हारा । रील रील 

आभा : तुम से मतलब , मैं चाहे जो भी करूं ।

मानव : वो जो तांडव करके आई हो सब के बीच । उसके बाद रील देख रही हो आराम से । कमाल हो तुम ।

आभा : तुम्हे क्या लगता है ? मैं रोऊं , गिड़गिड़ाऊं तुम सब के सामने । ऐसा भूल जाओ । 10 साल मैने तुम सब की गुलामी की है । रोटियां बनाई हैं । कपड़े धुले हैं । तुम्हारी मां के तुम्हारे पिता के । तुम्हारे शरीर पर जो कुछ भी है । सब मेरा लाया हुआ है । बच्चे की पढ़ाई से लेकर घर के आम खर्चे । सब मैं ही करती हूं । 

बदले में तुम लोगों ने मुझे क्या दिया ? गालियां ! 


मानव : स्टॉप दिस नॉनसेंस ! तुम से बात करना बेकार है ।  मानव उठता है और चल देता है । बाहर की ओर । 

आभा : बस ! हो गया .... अब तुम निकल जाओगे । फिर आओगे थोड़ी देर के बाद । सब कुछ भूल के । हंसोगे , फूहड़ किस्से कहोगे । तुम लोगों के लिए ऐसा करना बहुत आसान है । पर हमारे लिए इज्जत बहुत बड़ी चीज है । हमारे लिए स्वाभिमान और स्वयं का सम्मान बहुत मैटर करता है । 


मुझे बस इतना बता दो । कि हम लोग कब निकल रहे हैं यहां से । मेरा दम घुट रहा है यहां । तुम लोगों की शक्लें देख देख मुझे अजीब सी उलझन हो रही है । 


मानव : आज भर और रुकेंगे । कल हम लोग निकल लेंगे घर के लिए।  मानव इतना कह कर रूम के बाहर निकल जाता है । 

होटल के नीचे , दो सिगरेट लगातार एक के बाद एक फूंकता है । वापस आता है । सभी को डाइनिंग टेबल पर खाना खाते हुए देखने लगा । 


दोनों परिवारों में मानव का परिवार मांसाहारी , और आभा का परिवार शुद्ध शाकाहारी और कर्म कांडी है । यही वजह है दोनों के संबंध हमेशा हाशिए पर रहते हैं ।  उन के अलग होने के फैसले पर इस बात का गहरा प्रभाव है । दोनों परिवार एक दूसरे से भिन्न । 


कट टू 


आभा कमरे में लेटी हुई है । मोबाइल पर कुछ स्क्रॉल कर रही है । मानव अपने कपड़े पैक कर रहा है । 


आभा : कहां जा रहे हो ? 

मानव : कहीं भी , तुमसे मतलब ! 

आभा : और मम्मी पापा सब ? 

मानव : उन सब को तुम ले जाना , जब मन करे । होटल का पेमेंट अगले तीन दिनों तक के लिए कर दिया है । खाने का भी । उसके आगे तुम लोगों को यहां रुकना हो । तो बता देना । मैं पेयमनेट कर दूंगा । 

  तंग आ चुका हूं तुम लोगों की झिक झिक से । तुम्हे तो मेरा दोस्त होना था । लेकिन तुम पत्नी ही बने रहना । अपने तीज त्योहार , व्रत , जिद लेके पड़ी रहो घर में । 


आभा : पड़ी रहो घर में ..... ( आभा भयंकर गुस्से में उठती है । मोबाइल , बेड पर पटक कर मानव के सामने अड़ के खड़ी हो जाती है । ) समझते क्या हो अपने आप को ? बिजनेसमैन , लेखक , निर्देशक या घर संभालने वाला पति ? 

इनमें से कुछ भी नही हो तुम । कुछ भी नही हो तुम । 


मानव तना खड़ा रहा । दोनों की नजरें और देह कुछ देर के बाद ढीली हुई । मानव फिर पैकिंग करने लगता है । 


आभा : बताओ कहां जा रहे हो ? 

मानव : हुंह ! पहाड़ पर । 

आभा : क्यों वहां क्या है ? तुम्हारी कोई प्रेमिका रहती है । जो जब मुंह उठाओ चल देते हो । 

मेरे साथ केवल एक बार गए । जो नाटक दिखाए थे तुमने । मुझे अच्छे से याद है । तुम्हे पता है , तुम्हारी सबसे बड़ी कमी क्या है ? तुम होल्ड नही कर पाते हो । न रिश्ते और न ही खुद को । बिखरे बिखरे , उखड़े उखड़े । 

तुम्हारी जिंदगी का मकसद क्या है ? 

मेरी जिंदगी का मकसद है आवारगी ! 


.......... क्रमशः 



बच्चों को उड़ने दो ..

 उड़ने दो , उड़ने दो  बच्चों को उड़ने दो ... गर नाक अटक जाए  तो भी तो  उड़ने दो ..   जिस ऊर्जा का  संचार प्रवाह  हो उद्दंड  उसको भी  उड़ने दो  कह...