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बुधवार, 5 अगस्त 2026

बैटरियां !

 


ये बैटरियों  ने आज कल नाक में दम कर के रखा हुआ है . पिछले कुछ सालों से ऐसा लगता है जैसे बतेरियाँ ही बदलवा रहा हूँ . 

कभी धंधे की , कभी घर की , कभी गाँव घर की .  तो कभी कार की , कभी स्कूटी की , तो कभी  बाइक की  .

समझ में ही नहीं आता इन बैटरियों ने कब जीवन में इतनी निर्भरता भर दी है . पैसे खर्च करो . फिर पानी चेक करो . फिर इनवर्टर और बैटरी का मधुर सम्बन्ध बना रहे . यह भी ध्यान में रखना पड़ता है . किसी एक की नहीं बनी तो दुसरे को ले डूबेगी . 

बचपन में बैटरी तो केवल टोर्च में होती थी और रेडियो में . यहाँ तक हमारे गाँव में टोर्च का नाम ही बैटरी पड़ गया था . टोर्च खोजते तो बैटरी बोलते . रेडियो के सेल या बैटरी . 

फिर आया ज़माना घडी का सेल , टी वि रिमोट का सेल , फिर बाद में एयर कंडीशन के रिमोट का सेल . 

अब इस नए जमाने ने सब कुछ बैटरी पर निर्भर करवा दिया . मानों लाईट का वैकल्पिक श्रोत यही बचा है . वह भी किसी न किसी ऊर्जा पर निर्धारित . मतलब ऊर्जा का श्रोत बनाए रखने के लिए आप को फुल ड्यूटी लगेगी . 


इनवर्टर बैटरी , सोलर बैटरी , लिथियम बैटरी , तेज़ाब बैटरी ! 

साल में 12 इनवर्टर बैटरी 2 सोलर  बड़े बैटरी , 2 कार की बैटरी , एक स्कूटी की और एक बाइक की बैटरी का ख्याल रखना पड़ता है . उफ्फ्फ बैटरी ! 


हमेशा अंदेशा सा लगा रहता है . कि कब बैट्री बोल जाए . बतेरियां लेते समय 3 साल की गारंटी , 5 साल की गारंटी और दो साल की गारंटी . 

कभी कभी मन करता है सभी बैट्री को एक साथ बदलवाने भेज दूँ  . सभी की तारीख एक समय . लेकिन डर लगता है इनकी तारेखीं निश्चित नहीं होती . 

बस बतेरी का पानी सुलभ रखो . और जब कभी गड़बड़ करे . तो रास्ते हैं . एक बैटरी को खोल के जुम्मन मियाँ के यहाँ ले जाओ . और उसे चार्गिंग पर लगवाओ कम से कम आठ घंटे . बैटरी उठी तो ठीक , वरना डेड . दुसरा सबसे सहज और खर्चीला . फोन करो , कंप्लेंट करो . और इंतज़ार करो . उनकी कृपा होगी तो घर बैठे वरना बैटरी सर्विस सेंटर दौड़ो . 


इन बैटरियों में तेज़ाब दौड़ता है . अत्यंत जलनशील पदार्थ . सफ़ेद को पीला कर दे और कपडे लट्टे , लोहा और चमड़ी को जला दे . 


जहां रख दो वहाँ की फर्श , दीवाल खाने लगती है . 

बहुत बार सोचता हूँ . क्या सच में जो बड़े अमीर लोग होते होंगे . वो अपनी बतेरी का ख्याल रख पाते होंगे ? वो देखभाल करते होंगे या उनके नौकर ! 


पता नहीं बैटरी इतनी भारी क्यों होती है . गाँवों में मैंने देखा है बरसात में , सर्दियों में , गर्मियिओं में ग्रामीणों को बतेरियाँ अपने दुपहिया वाहन पर ढोते हुए . 

ऐसा लगता है बहुत बड़ा कारोबार है बैटरी . 


सरकार की इतनी बड़ी बड़ी इमारतें , बड़े बड़े प्रोजेक्ट्स , अधिकारियों , मान्न्नियों के घरों की बैटरियां कैसी होती होंगी ? 


इतना तेज़ाब आता कहाँ से होगा ? 

ये वो वाला तेज़ाब नहीं होता , जो हम टॉयलेट क्लीनर के नाम से लेते हैं . मुझे याद है शहर की एक गली , जहां तेज़ाब मिलता था . पक्का वाला तेज़ाब . पर इधर कुछ सालों से खुले आम बिकना बंद हो गया है .

 मेरे यहाँ एक टॉयलेट साफ़ करने वाली महिला आती थी . जिनका नाम था कांति ! 

वो बहुत तेज तर्रार महिला थी . एक दम तूफ़ान के साथ आती , काम करती और गायब हो जाती . जब वो जाती थी तब बाथरूम एक दम चमाचम . कई घनते मछार और मक्खी बाथरूम में आते नहीं थे . क्यों की वो तेज़ाब से बाथरूम साफ़ करती थी . हार्पिक , साबुन के विकल्प के बाद भी वो तेज़ाब इस्तेमाल ज्कारती थी . 

हमेशा उनको देख कर लगता था की वो शराब का सेवन करती होंगी  उनके कठिन काम को शायद शराब की जरुरत हो .... . 

एक बार मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि वो शराब नहीं पीती. उनके चेहरे पर तेज़ाब का भभका स्किन को जला देता है . 


अभी कुछ दिन से वो कैंसर से जूझ रही हैं . उन्ही के स्थान पर नयी सफैकर्मी अब हार्पिक का इस्तेमाल कर रही हैं . 

कांति तेज़ाब से खेलती थी . ऐसे ही बैटरी बनाने वाले , सुधारने वाले , पुरानी बैटरी का लें दें करने वालों की क्या दशा होगी . राम ही जाने ! 


मुझे तो अपनी ही चिंता खायी जाती है  . 


इस सावन तो गजब ही हो गया . एक साथ घर की , दो कार की , दो दुपहिया की बैट्री मात्र 15 दिन के अंदर अचानक से डेड हो गयी .  एक पांच साल पहले , एक 3 साल पहले और एक 2 साल से कुछ कम पहले खरीदी गयी थी . उनमें खरीदने की तारीखें नहीं थी . मैन्युफैक्चरिंग से पता चलता है . 


एक अचानक खुश दिन आप के चक्कों की बतेरियाँ डेड हो गयी . जिस गाड़ी को स्टार्ट कर रहे हो , वो हो नहीं रही .  असंभव ! 

बारी बारी बैटरी , कार मैकेनिक को रिक्शा से कभी तो कभी बन चुकी बतेरी वाले वाहन पर ढोते रहते . 

मैंने कई बतेरी वालों से बात की . उन्होंने कहा की आजकल बहुत ज्यादा कंप्लेंट आ रही हैं . 


ये बत्तेरियां भी काफी नाच नाचती हैं . पता नहीं इनपर नाचने के लिए मैं तैयार था . 







मंगलवार, 28 जुलाई 2026

लिखना जरुरी है !

 लिखना जरुरी है . क्यों की लिखे को मिटाया जा सकता है . लिखने के पहले , लिखने वाली बात पर सतर्कता से ध्यान लगाया जाता है . ध्यान लगाने से भीतर की दुनिया की सैर की जा सकती है . सैर से न दर्ज हुयी कहानियां हलचल पैदा करती है . निकलने को बाहर आतुर होती हैं . न जाने उन कहानियों से किनका भला होगा ? फिर भी लिखना जरुरी है क्यों की लिखने से मन शांत होता है . 

मैं जब लिखने को पहचानने की कोशिश करता हूँ . तो मुझे अधिकतर लोग लिखते  हुए दिखाई देते हैं . थाने का मुंशी तहरीर लिख रहा होता है . डॉक्टर पर्चे लिख रहा होता है . मां हिसाब लिख रही होती है . साहित्य लिखने वाले कवितायेँ लिख रहे हैं , कहानियां लिख रहे होते हैं . पन्ने दर पन्ने लिखा जा रहा है . पन्नों की चिंता किसे है ! पन्ना ख़त्म होते ही दूसरा पन्ना इस्तेमाल आता है . उसके ठीक पहले का पन्ना उम्र काट रहा होता है . फिर भी लिखना जरुरी है . क्यों की लिखने से मन के पन्ने खाली होते हैं . खाली मन पर कोई सुखद याद लिखी जा सकती है . 

मैं अपने आस पास हर शख्स से लिखने की आदत में विस्तार की सलाह देता हूँ .   

औरतें !

 तीन माएं खो चुका हूँ . मेरी अम्मा , बड़ी अम्मा , मेरी दूसरी माँ . तीनों के घर बेतरतीब चल  रहे हैं . सब परेशान हैं . उस बात से जिस बात को कभी भी तरजीह नहीं दी गयी . औरत ! 

हां औरत ! 

या यूँ कहें औरतें .... ! 

अम्मा बहुत दयालु थी . वो इसी को भूखा नहीं सोने देती थी . घर के बच्चे , दादा जी , पापा को , काम को आये लेबरों को , किसानों को खाना जरुर देती थी . वो अन्नपूर्णा थी . घर का लें दें सब उन्ही के हांथों . वो जब बैठीहोती थी . तब वो एक राजा की रानी की तरह बैठती थी . 


बड़ी अम्मा ! एक दम शहद सी . उनकी भाषा , सा को श कहना और हमेशा शिष्टाचार के नितांत हिलोरें पैदा करना . मास्टरनी ! अकेले जीप से विद्यालय के कार्यों से दौड़ती , भागती अपने बच्चों को एक आदमी से बचाती रहती थी . सरकारी नौकरी का पूरा का पूरा मान रखना . अम्मा की भाषा बोली स्वयं में एक शिक्षक थी . 


मेरी माँ के बाद दूसरी माँ ....

क्या गजब का स्टैमिना था उनमें . सुबह से लेकर शाम तक काम काम और काम .... ! उसकी जुबान पर हमेशा दुवाएं रहती थी . हाय मोरा बेटा , हाय मोरी बिटिया .... मा को कई साड़ी भाषाएँ  आती थी . पंजाबी , मराठी , गुजराती . हिंदी , अंग्रेजी सीख रही थी वो .  दुनिया भर की ख़ुशी का भार जैसे उनके ही कन्धों पर था . 


तीनों माओं के जाने के बाद सब के घर तितर बितर हुए पड़े हैं . 

माओं के जाने का सिलसिला ऐसा चला . दो अस्पतालों की नाकामी में चली गयी . एक अपने आप ही छोड़ गयी एक भरा पूरा परिवार . दूरी की डोरी बहुत मजबूत नहीं होती . 

अम्मा ने आखरी के कुछ महीनों में वो दर्द देखा है . जिसे देख के तीमारदार घबरा जाए . मैं भी बना था चौबीस घंटे के इए तीमारदार . अम्मा के यहाँ से नली , वहां से नली , पूरा शरीर फूला हुआ . आँखें भिछी हुयी . अम्मा अम्मा कहने पर दीप्तमान होकर फिर बुत जाती . डॉक्टर कहते और चौबीस घंटे , और चौबीस घंटे ... ! कभी साँसे चला दिखाते तो कभी आँखें ! लाखों रुपये का मीटर चल रहा . एक महीने वेंतिलाटर पर . हमारी आधुनिक क्रान्ति के  उपकरणों ने एक महीने माँ को ज़िंदा रखा . 


बड़ी अम्मा के डायपर घर के पिछवाड़े पेड़ों में टंगा जब जब मैंने देखा . मुझे हैरानी होती रही . हमारी कॉलोनी के सामने एक बड़े से तालाब में मैंने कई एडल्ट डायपर कुत्तों को नोचते देखा है . वो दोनों दृश्य वीभत्स दृश्य हैं . कैसे कोई माँ बाप अपने माँ को इस तरह  से समाज में प्रतिष्ठित कर सकता है ? 




या मैं पागल हो जाऊं .... !

आज फिर सुबह हुयी बीती रात के बाद . आज फिर सूरज निकला अँधेरी रात के बाद . घड़ी अपनी गति से आगे बढ़ रही है . घडी के साथ साथ सुबह बीत रही है . कुछ देर बाद दोपहर होने को है . और फिर शाम . फिर रात . ऐसा लगता है सोने और जागने के बीच जिन्दगी बीत रही है . यूँ ही बीतते रहने के साथ रहते हुए अब  ऊब सी हो चली है . इस ऊब से निपटने के लिए कभी टी वी का सहारा लेता हूँ , कभी रेडियो का . 
   वैसे मोबाइल तो हमेशा साथ रहता है , धड़कन की तरह . हाँ , मोबाइल अब हमारी जिन्दगी की धड़कन है . मोबाइल न हो तो ऐसा लगता है जैसे किसी ने साँसें छीन ली हों . इसलिए वह हमेशा साथ रहता है . सुख , दुःख , उत्सव हर समय कभी ऊपर वाली बायीं जेब में  तो कभी हाँथ में तो कभी पेंट के जेब में .
    बड़ा सा घर है . घर में सब हैं . जो एक घर में होते हैं . सारी सुविधायें हैं जो एक घर में होनी चाहिए भी सुलभ हैं  . एक काम करने की जगह है . जहां एक दर्जन लोग काम करते हैं . हम सभी के घरवालों को मिला कर करीब आधा सैकड़ा लोग तो उस काम की जगह के होने से चल रहे हैं . 
   यह सब होता चला आ रहा है एक दशक से ऊपर के समय से . इस चलने को क्या जिन्दगी कहा जा सकता है ! कहते तो सुनता अपने इर्द गिर्द अभी लोगों कि हाँ यही जिन्दगी है . अगर यही जिन्दगी है . तो यह भरती क्यूँ नहीं है भीतर को . हमेशा खाली खाली सा महसूस हुआ करता है . इतने संसाधन , इतने लोगों से घिरे  होने के बाद भी यह खालीपन अजीब सा महसूस कराता रहता है . लम्बे समय से इस अजीब से महसूसने से छुटकारा पाने के लिए क्या विकल्प हो सकते हैं ? 

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2025

मैं गिद्ध हो चला हूं ...

 


पिछले 3 महीने में 4 प्रियजनों की आकस्मिक मृत्यु देख चुका हूं । आज जब किसी एक और प्रियजन के अंतिम संस्कार में मेहदी घाट पहुंचा । तो सन्न रह गया । सैकड़ों की संख्या में छोटे छोटे टीले दिखे । टीले 4 फुट से 6 फुट के । उनपर भगवा अथवा सफेद कपड़े ढके हुए । कुछ के उड़ के न जाने कहां गए । 

एक तरफ गंगा की धार को छूते आधा दर्जन अंतिम संस्कार की सराओं के झुंड थे । दूसरी तरफ कुछ फर्लांग गंगा की रेती की सफेद चादर पर सैकड़ों टीले , आकाश को निहार रहे थे । 

धूं धूं होते अपने प्रियजन की पीड़ा को पार करते इन टीलों के पास गया । और रिवर बेड पर मात्र दो फुट गहरे नीचे 3 फुट ऊंचे नए टीलों को बनते देखा । पूछा ! दफनाना , कब्र जैसे शब्दों का कोई अस्तित्व नहीं है हमारे धर्म में । फिर ऐसा क्यों । 

सफाई कर्मचारी से लेकर कुछ के परिजनों ने बताया । कि समाधि तब दी जाती है । जब कोई व्यक्ति अविवाहित मृत्यु को प्राप्त हुआ हो । हे ईश्वर .... यानी कि जो टीले हैं , वो बच्चों के हैं , किशोरों के हैं और सिर्फ अविवाहितों के हैं । मेरा शरीर उच्च ताप से जलने लगा । हृदय गति रुकने सी लगी । 

मैं उनकी समाधि के अस्तित्व में होने से अधिक उनकी संख्या से विचलित हो रहा था । मैं अपने प्रियजन की अंत्येष्टि क्रिया को बीच में छोड़ के वहां से निकल आया । 

मानसपटल पर छोटे छोटे टीले अबोध कोमल और ऊर्जा से भरे चेहरों की शक्ल लेने लगे जो मेरे आस पास हैं ।

अखबारों के पन्नों में , सड़कों पर , अस्पतालों में , घाटों पर  , विद्युत शवदाह गृहों पर मृत्यु मृत्यु और मृत्यु ! 

क्या कोई सांख्यिकीय बढ़ती मृत्यु दर पर नजर बनाए हुए या नहीं ! जन्म दर के सापेक्ष मृत्यु दर का संतुलन कहीं बिगड़ तो नहीं रहा ? 

ये मृत्यु की आकाश गंगा पंगु एवं लाचार स्वास्थ्य व्यवस्था के कारण है या किसी प्रकार की अराजकता मौन साधे जन समूह को लील रही है ! मुझे नहीं पता । किसी को पता है या नहीं , ये भी नहीं मालूम । 

आए दिन अपने आप पास नए अस्पतालों को पनपते देखता हूं । उनके बिल बोर्ड पर जुखाम से लेकर कैंसर तक के इलाज को शर्तिया ठीक करने का दावा गौर से पढ़ता हूं । स्वास्थ्य सेवाओं में आधुनिक मशीनों और जीवन रक्षक दवाओं से सुसज्जित सरकारी प्राथमिक , सामूहिक , मल्टीस्पेशलिटी अस्पतालों के किस्से सुनता हूं । बड़े बड़े ब्रांड वाले अस्पतालों के लंबे चौड़े विज्ञापनों को गौर से देखता हूं । 

फिर भी इन सब दावों से इतर साधारण सी बीमारी को असाध्य होता देखता हूं । बड़ी बीमारियों और आकस्मिक दुर्घटनाओं में लाखों रुपए खर्च होने के किस्से भी सुनता हूं । इनक्यूबेटर से वेंटिलेटर तक के सफर को केवल तीमारदार ही समझ सकता है । 

खैर ! अपने प्रियजनों , निकटवर्ती और मेरे जैसे शक्ल और सूरत वाले लोगों की अकाल मृत्यु को देखते देखते मुझे लगता है , मैं गिद्ध हो चला हूं । 

 ये सब फर्जी के सवाल हैं । इन सवालों के उठने की प्रक्रिया को निश्चक्रिय करने के लिए एक पोस्ट लिख रहा हूं । 

मुझे गर्व है । मैं एक उत्सव प्रधान देश का नागरिक हूं । जहां हर फसल के बाद , हर मौसम में एक उत्सव है । उत्सव के बाद उत्सव है।  

अंजान मृत देह को प्रणाम कर आगे की ओर बढ़ जाने और जान पहचान की मृत देह की अंत्येष्टि में  शामिल होने की आदत विकसित करनी होगी । 


तस्वीर आज दोपहर दिनांक 28/2/2025 की हैं ।

बुधवार, 12 जून 2024

बधाई हो बल्ला !




बल्ला और उसका 8 लोगों का परिवार हमेशा हमेशा के लिए सो गया । बल्ला बधाई के पलों में लोगों के घर ढोलक बजाता था । कभी कभी गाय , भैंस बकरियों के गर्भधारण करवा करवाता था । कभी मल्लावां के आतताई बंदरों को मोहल्ले से भगाने के लिए लंगूर घुमाता था । 
उसकी पत्नी , बच्चे , बिटिया दामाद रोज की तरह बीती रात सड़क किनारे झोपड़े के बाहर सो रहे थे । तभी उसकी झोपड़ी के सामने सड़क पर ब्रेकर से लहराता हुआ बालू भरा ट्रक उनकी चारपाइयों पर फट पड़ता है । बल्ला और उसके परिवार के 8 लोग मौके पर ही दम तोड देते हैं । उसके परिवार की एक दुधमुही बच्ची बची है  केवल । 
सुबह सरकारी अस्पताल से लेकर घटना स्थल तक सैकड़ों की तादात में बल्ला की नट बिरादरी के लोग मातम मना रहे हैं । 
बल्ला की झोपड़ी के सामने गंगा की रेत के ढेर पर बल्ला का कुत्ता सुस्त बैठा है । 
बल्ला को जानने वाले लोग उसकी तारीफ में कसीदे पढ़ते हैं । बल्ला ने आम नागरिकों से ज्यादा बधाई ली हैं और दी हैं । 
बल्ला जैसे सैकड़ों बल्ला बिना जमीन जायदाद के सड़क किनारे डेरा डाले रहते हैं । वो यहां तीन पीढ़ियों से रह रहे हैं । सरकारें बनती हैं , बिगड़ती हैं ।  बल्ला की बिरादरी पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ता । 
उनके पास जमीनें नहीं हैं । इसलिए प्रधानमंत्री आवास भी नहीं हैं । और न ही अन्य बुनियादी सुविधाएं । 
 सड़क किसी के बाप की नही होती । इसलिए बल्ला की बिरादरी के लिए सड़क का किनारा सबसे सुरक्षित होता है । कोई रोक टोक नही । 
सड़क और यातायात व्यवस्था का तो क्या ही कहना । बरसात में मौरंग , बालू के ठेके बंद होने से पहले मौरंग बालू का स्टॉक किया जाता है ।जिससे कि बरसात में लोगों के घर बनना बंद न हों । 
ओवरलोडेड ट्रक को सारे नाकों से कुछ लेन देन कर के पास कर ही दिया जाता है। 
 बल्ला और उसका परिवार हमेशा के लिए सो गया । अब उसे घर न होने का कभी मलाल नहीं होगा ।
बल्ला के परिवार के लिए जनप्रतिनिधियों की शोक संवेदनाएं सोशियल मीडिया पर प्रेषित हो रही हैं । पुलिस हादसे की विवेचना कर रही है । जिले के आला अधिकारी सायरन बजा बजा के घटना स्थल पर आ रहे हैं ।

बुधवार, 8 फ़रवरी 2023

इन दिनों पक्षियों का न लौटना अच्छा नही लगता !

 


इन दिनों पंछियों का न लौटना अच्छा नही लगता । कुल जमा चार पंछियों को लाया था । एक बड़ा सा पिंजड़ा ( हा हा हा ) खरीदा । तमाम इंतजाम किए । खूब चहकती थीं सुबह शाम । मैं रोज उनकी बातें करने लगा था । कहते हैं वो गाना बजाती हैं । उनकी प्रजाति में उन्हें लल मुनिया कहा जाता है । जब पास होता । तो उनके तरह तरह के इंतजाम करता । कभी हरी घास उनके लिए जमीन बनाने को । कभी गमलों में उगे पेड़ों से उस पिंजड़े को ढांक देता । कि लगे वो प्रकृति में हैं । लगातार खोज में रहता । कैसे वो नन्ही चिड़िया मेरे या हम में किसी के उसके करीब आने पर असहज न हों । सोचता कभी इन्हे बाहर की सैर कराऊंगा । पर एक लंबे अरसे बाद घर वापसी की तो । वो पिंजड़ों में नही थे । दिल चाक हो गया । जब पता चला । वे सब अब नही हैं ।

उनकी चहचहाट के शब्द मेरे पास नहीं थे । और न ही मेरे आस पास के लोगों के पास । एक ने तो तभी दम तोड़ा था । जब हम समझ रहे थे । कि शायद अंकुरण की तैयारी है । उनमें से एक चिड़या खूब तंदरुस्त हो रही थी । ज्यादा खा रही थी ।  हम सभी खुश थे । वो जो सबसे ज्यादा चहकती थी। वही नही थी बाकी तीन के बीच । उसका जाना मेरे लिए आत्म ग्लानि की पराकाष्ठा थी ।
    उनके रहते ! बार बार मन करता था । उड़ा दूं। पर किसी न किसी कहने में हामी मिलाते हुए टाल जाता । उन चार चिड़ियों के अलावा उसी प्रजाति की एक और चिड़िया आने लगी थी पिंजड़े के बाहर , पिंजड़े के भीतर झांकती । कुछ कबूतर छितरे काकुनी के दाने खाने आते । करीब 8 महीने पहले लाया था इन्हे । एक बहेलिए से । बचपन की किताबों की पढ़ाई मैने उस दिन बिसुरा दी थी । बहेलिया चिड़िया को जाल में फंसा लेता है । बचपन में बहेलिए पर गुस्सा और चिड़ियों पर तरस आता था । पर उस दिन धुन सवार थी । चिड़िया लानी हैं । मैं लाया चिड़िया । बहेलिए ने सवा घंटे की मेहनत के बाद चार चिड़ियां अपने बाड़े से पकड़ी । और एक छोटे से पिंजड़े में दे दी। मुझे उस समय लगा । कि बड़ा पिंजड़ा मैं इसके लिए लाने वाला हूं । वो इससे बड़ा होगा । तो उन्हें कुछ राहत मिलेगी । खैर अब तो वो नही रही ।
   पर उनकी याद मुझे निरंतर भटका रही है । वो जबसे जीवन में आईं थीं । तबसे चिड़ियों की आवाज़ें पहचान आने लगी थी । मेरे कान चिड़ियों की आवाज़ें खोजने लगते हैं । उस दिन सोचा कि चलो देखें । जिस देश से वो आईं थी।  नाहक सांडी पक्षी विहार की ओर राहें जाने लगीं । तराई क्षेत्र का यह रास्ता बेहद खूबसूरत है । सड़क के दोनों ओर बेतहाशा हरा । और पंछियों का कलरव । जल क्षेत्र के नज़दीक जाते जाते दुनिया बदलती महसूस होती है । आब ओ हवा में ताज़गी आने लगती है । इससे पहले बरसात में गया था । तब सैलानियों के तौर पर मैं अकेला था । पूरे पक्षी विहार में । लेकिन तालाब में अनगिनत वनस्पित्यां थीं । पर इस बार ठंड थी ।
पक्षी विहार के टिकट काउंटर पर मैं पहला व्यक्ति था । कुछ समय बाद एक नौ जवान जोड़ा आया । जो कुछ दूर चलने के बाद बैठ गया कहीं । मैं दूर तक जाना चाहता था ।  पक्षी विहार की परिधि लगभग 6 किलोमीटर की है । मुझे आशा थी कि सर्दियों वाले सैलानी पक्षियों की भरमार दिखेगी । गुफा नुमा पगडंडी पर पतझड़ और सामने बड़ा सा जलाशय । जलाशय के दूसरे छोर पर कुछ पानी का श्रोत। उनके इर्द गिर्द कुछ जाने पहचाने से पक्षी । मैने जब जब उनके करीब जाकर देखने की कोशिश की वो आधा किलोमीटर दूर जा बैठे । आखेट का इरादा एकदम नही था । पर मोबाइल के कैमरा से शूट करने का इरादा था । कुछ कोशिशों के बाद उन्हें दूर से ही तस्वीरों में कैद कर लिया । गुनगुनी धूप के कुछ घण्टे अनगिनत घोंघे और पक्षियों के बीच गुजारे । वापसी में दिमाग में ये सवाल कौंध रहा था । कि इस बार पक्षी कम क्यों आए । पक्षी विहार के गेट पर ये सवाल लिए मैं एक घण्टे खड़ा रहा । पक्षी विहार की दूरबीन वाली निघाओं ने उस जोड़े को धर लिया था । जो किसी एक की गोद में बैठा था । मामला सुलटता न होता देख । मैने सवाल कर ही दिया । टिकट बाबू का जवाब था । कि अभी कुछ दिन पहले पत्थर (ओला वृष्टि ) गिरे थे । इसलिए पक्षी चले गए । मेरा एक जवाब मुझे मिल चुका था । दूसरा उन जोड़े की माफियां सवाल खड़े कर रही थी ।
मैं वापस आया । मुझे फिर से वही खाली पिंजड़ा दिखा । उसमें किसी होने की कहानियां लिखी थीं । मुझे एक बार किसी छोटी बच्ची ने और छोटे बच्चे ने कहा था । बर्डस तो उड़ती हैं । उन्हे पिंजड़े में नही रखना चाहिए ।

गुरुवार, 17 नवंबर 2022

कहानियों का अंत !

कला का पात्र  !

तुम्हारे लिखे में मेरी याद के अलावा कुछ नहीं होता . लिखना कितना जरुरी है यह बात मैंने तुम्ही से जानी .  तुमको अक्सर देखा मैंने रोते हुए . कभी रसोईं में,  कभी छत पर . कभी शाम की चाय पर,  तो  कभी बाज़ार से सब्जियां लाते वक़्त  . तुम कभी कभी हँसते हुए भी रो देती  .
       मैंने जब भी तुम्हारे रोने की वजह पूछी . तुम भटके हुए राही की तरह गहरे मौन में चली जातीं . कोई सुबह चुपके से मेरी झोली में एक कहानी डाल जाती. मैं उन्हें कहानियों के तौर पर पढता. तुम्हारे लिखने के कौशल पर विस्मित  होता. वाह और आह के बीच का वन लाइनर तुम्हे सहृदय प्रस्तुत कर देता . पर तुम्हारा रोना कभी ख़त्म नहीं हुआ , जैसे तुम्हारी कहानियां कभी ख़त्म नहीं होती.
तुमने मेरे भीतर पढने की आदत बोने के लिए कई कहानियाँ लिखीं . मेरी हर एक आदत पर एक किरदार गढ़ा . हर किरदार के इर्द गिर्द एक संसार रचा . उस संसार में तुम्हारे मन की थाह होती. थाह से गहरी होती तुम्हारी उदासी .
हम कहानियों के माध्यम से, परत दर परत खुलते गए. खुलती परतों में हमने पाया कि हम कभी मिले ही नहीं . जो मिले थे वो हम नहीं थे . अब तक !  जब मैंने कुछ कुछ पढना सीख लिया था  . तुम्हारी मोटी कहानियों वाली डायरी भर चुकी थी .
डायरी में दर्ज आखरी कहानी ने तुम्हे बुरी तरह झुलसा  दिया था . तुम्हारे हाँथ कांपते, हृदय गति रुक जाती , कई बार बेसुध पायी जाती तुम . यदि तुम्हे कुछ हो जाता तो !   इस कहानी का  किरदार लम्बे समय तक अटका रहा तुम्हारे गले में, फांस की तरह .  लम्बा सांवला मुस्टंड   , घुंघराले बाल , पकी दाढ़ी, बड़ी बड़ी डरावनी आँखें ......  गिठी  , कोमल, छोटी आँखों में बड़े ख्व़ाब लिए तितली की तरह उसकी प्रेयसी  . उनके बीच ज्वाला बन चुके आक्रांत  प्रेम में कुछ नहीं बचना था  . तुम उस कहानी का सुखान्त चाहती थीं . मार देना चाहती थीं उन दोनों में से किसी एक को .
उस डायरी की आखरी कहानी खूब सराही गयी . तुम्हे कहानीकार कहलाना पसंद नहीं था. इसलिए तुमने लिखना बन्द कर दिया . तुम्हारी आँखों ने अब कहानियां पीना भी सीख लिया था .

बचपन में एक उड़न खटोले पर मैं और मेरी नानी लेटे लेटे तारों को देखते . नानी पूछती ! इन अनगिनत कहानियों में से कौन सी कहानी सुनोगे . मैं किसी एक तारे की और इशारा करता . नानी शुरू हो जाती.  नानी की कहानियों के पात्र जैसे उसकी खेती थी .  शेर  , शिकारी , गिलहरी, बिल्ली , मोर .... जंगल , खेत खलिहान,पगडण्डी , आले, डिबरी .... नानी पढ़ी लिखी नही थी . शायद इसी लिए उसकी कहानियों में प्रेम और सीख सरीखे  शब्द नहीं होते . उसकी कहानियों का  अंत  " ख़ुशी ख़ुशी रहन " से होता. 
      

     
    

सोमवार, 29 नवंबर 2021

ढाँक लिया तुमने अपने सफेद आँचल से !

 


ना उम्मीदी के सूखे पन से धरती की नमी सूखने लगी थी। ये सूखना दर असल सूखना नहीं था, ये ख़त्म होना था। ख़त्म होना उसे महसूस हो रहा था लंबे समय से। लगातार ख़त्म होने के एहसास के साथ साथ एक बिंदु पर उम्मीद ने भी साथ छोड़ दिया। पिछली बार  प्रेम की पैदाइश के बाद धरती की कोख को आग के हवाले कर दिया गया था। वो अंदर ही अंदर सुलग रही थी। भीतर की आग और सूरज की बे रोक टोक तपिश सब कुछ भस्म कर देने को तड़प रही थी। गर्म सूखी हवा से परत दर परत मिट्टी उखड़ते हुए धूल बनकर आसमान को छू लेना चाहती थी। 

फेफड़ों में धूल और धुएं की परतें जैसे ही सांस के बीच आने लगी, हर तरफ अफरा तफरी मच गयी। लोगों का दम घुटने लगा। धरती के उस रौद्र रूप के काल से बचने के सारे प्रयास विफल होने लगे। जो कभी जीवन देती थी, उसने जीवन ले लेने का थोड़ा सा आभास कराया तो सारी समझ धरी की धरी रह गयी। ना समझी जब समझ का ताज़ पेहेन ले तब ना समझी से उपजी आपदा की आहट तक महसूस नहीं होती। 

      पर धरती तो धरती ही है। उसका निश्छल और अथाह प्रेम ही उसकी असीमित ताकत है। प्रेम में गहरे से गहरे घाव जज़्ब कर लेने की ताकत है। हर आघात उसकी ऊर्जा बन जाती है। इस सुबह जब कुछ नमी लिए कोहरे की सफ़ेद चादर छायी दिखी, तो लगा किसी प्रेम के आँचल ने फिर से ढाँक लिया हो। जीवन फिर से कौंधने लगा है। पर उस आँचल में संघर्ष की थकावट है। उस आँचल को प्रेम के बदले प्रेम की सख्त ज़रूरत है। जो उसकी पनपने की ऊर्जा भी है और सब कुछ तहस नहस कर देने की ताकत भी। उसके इस आँचल को सहेज लो, उसके प्रेम को सीने से लगा लो, उसे महसूस करो। वो धरा है, और प्रेम की धारा भी।

शुक्रवार, 9 मार्च 2018


लखनऊ - बनारस का होली मिलन

होली के एक दिन पहले बनारस लखनऊ से मिलने आया ! बनारस बता के नही आया, कि लखनऊ से मिलने जा रहा हूँ। बताता तो शायद बनारस वहीं छूट जाता, और लखनऊ से मिलने शहर नही आ पाता। लखनऊ पहले अपनी अना में रहा, जैसे ही बनारस से मिला वो अना अमाँ में बदल गयी। बनारस और लखनऊ की मुलाकात का वक़्त और जगह मुकर्रर होने के बावजूद भी, बड़ा प्रश्न था...कि इस मुलाकात का कौन सा हिस्सा तमाशे से उकताए हुए दोनों शहरों को सुकून दे पाएगा।
    फन मॉल की रंगीनी, मिस्टर ब्राउन के दिल शेप वाली काफी को नज़रअंदाज़ करते हुए दोनों गोमती किनारे बैठ जाते हैं उस काली बदबू देती मृतप्राय गोमती किनारे । स्कूली बच्चे अबीर गुलाल का खेल खेल रहे थे। लखनऊ गहरी सोच में डूबते हुए दास्तान की गलियों में बनारस को ले जा रहा था । कभी शहर के बीचों बीच खिलखिलाती नदी, पीपे वाला हिलता डुलता पुल, लखनऊ हज़रत गंज से देर रात पैदल आता, पीपे वाले पुल पर खड़ा होकर उस नदी की उमंग को महसूस करता। 15 सालों में लखनऊ ने गोमती को मरते हुए देखा है। लंदन की थेम्स नदी की तर्ज़ पर बनने वाले गोमती रिवर फ्रंट की आहट से गोमती कभी मुस्कुराई होगी। लखनऊ की गोद में गोमती की किलकारियां भरने की उम्मीद जगी होगी। पर गोमती मर चुकी है कब की। गोमती का शव काला पड़ गया था। बनारस डबडबाई आंखों से लखनऊ के कंधे पर हाँथ रख सांत्वना देता है, ढांढस के पुल बाँधता है। अपने कोख में पल रही गंगा के कुछ दुख भरे किस्से सुनाता है।
        बनारस लखनऊ को कुछ और महसूस करना चाहता था। दोनों निकल पड़ते हैं पैदल एक अदत अच्छी चाय की तलाश में। 5 कालिदास मार्ग, माल एवेन्यू, हज़रत गंज, लालबाग...! शाम-ए-अवध में शायद चाय का चलन अब रहा ही नही हो, ऐसा लगता रहा। बनारस को उसकी संकरी गलियों में मिलने वाली 5 रुपये वाली बढ़िया चाय का लोभ छोड़ना ही पड़ा। बनारस को पुराने लखनऊ की तलब थी। बेगम हज़रत महल पार्क टैक्सी स्टैंड पर चौक चौक की आवाज़ उसे अपनी ओर आकर्षित कर रही थी। बनारस टैक्सी में ड्राइवर वाली सीट के पास बैठ के दाएं बाएं लखनऊ को देखना चाह रहा था। लखनऊ पीछे वाली सीट पर बैठता है। वो अब नए लखनऊ में रहता है, जहाँ से पुराने लखनऊ की दूरी बहुत ज़्यादा लगती है। पीछे वाली सीट पर एक परिवार लखनवी तलफ़्फ़ुज़ में किसी ब्याह के दस्तरख़्वान की बातें करता है। लखनऊ उनकी गोद में बैठी नन्ही बच्ची की आंखों में खो जाता है।
         200 रुपये में चिकेन के कुर्ते, 400 रुपये की जैकेट, 100 रुपये में दो शर्ट और कई तरह के सस्ते माल की आवाजों से चौक गुलज़ार था। सड़क किनारे दोनों पैदल पटरियां बेचनेवालों ख़रीदारों से भरी। बड़े बड़े चाय की केतलियों में मसाला कश्मीरी चाय, छोटे छोटे खाने पीने की दुकानों में शीरमाल, ख़मीरी, क़बाब, कलेजी, वेज क़बाब, हलवा पराठा, मलाई मक्खन, गर्म दूध ... ! बाज़ार में भीड़ थी, शोर था, सड़के जाम होती चलती। जब नए लखनऊ का दिन मानसिक शारीरिक थकन से परेशान देर शाम घर की तरफ रुख करता है। तब पुराना लखनऊ सड़कों पर निकल आता है।
          लखनऊ बनारस के हाँथ में हाँथ डाले लोगों से उन गलियों का पता पूछता है, जहाँ वो अपनी शामें गुजरता था। अगला पड़ाव अकबरी गेट है। चहकते चौक चौराहों से अंधेरी गलियों को पार करना लखनऊ की रवायत है। अकबरी गेट पास था। टुंडे के क़बाब, रहीम की निहारी कुलचा, मुबीन की बिरयानी...! जैसे खाना पीना, खिलाना रात की इबादत हो। लखनऊ और बनारस दोनों टाइम मशीन में बैठे सदियों की यात्रा में थे। यात्रा के हर पड़ाव में सलाहियत थी, सलीका था, साथ लेकर बढ़ने का हौसला था। भेद नही मिला किसी जगह। हिन्दू - मुसलमान, हिन्दी-उर्दू, मंदिर - मस्जिद, बड़े का गोश्त- मटन, साइकिल- कार..सब अपने अपने रास्ते मिलते झूलते टकराते। आधी रात बीत चुकी थी उन गलियों में। लखनऊ बनारस को इन्ही हल्के फुल्के लम्हों के साथ विदा करना चाहता था। जिससे बनारस में लखनऊ से फिर मिलने की तलब बनी रहे। दोनों टैक्सी में बैठ चारबाग की राह लेते हैं। रास्ते में नए पुराने समय के इश्तिहार नही लगे थे, अलग अलग नाम, मज़हब, फितरत के लोग भी नही थे। खाली सड़क पर टैक्सी तेज़ चल पा रही थी, फिर भी नए पुराने लखनऊ की दूरी दशकों की लगी। बनारस इस नए पुराने का लखनऊ संस्करण लेकर विदा लेता है। लखनऊ यादगार संग साथ और दशकों की यात्रा को एक दिन में जी कर अपने नए पन में गायब हो जाता है।

बुधवार, 20 सितंबर 2017


चारबाग की शाम में पंछियों का राग "जुटान"

कभी शहर लखनऊ के शोर शराबे, जाम से परेशान हों, और सुकून के कुछ पल तालशने हों तो चले जाइयेगा चारबाग रेलवे स्टेशन पर। बड़े मोटर साइकिल स्टैंड के सामने मंदिर के पास सुस्ता रहे रिक्शों पर बैठिएगा। शाम ढलते ही आसमान में हजारों की संख्या में चीं चीं करते पक्षियों का झुंड कुछ पेड़ों पर शाम बिताने आता है। वो उन पेड़ों पर बसेरा लेने से पहले आसमान में चक्कर लगाते हैं, सब एक साथ झुंड में, न आगे न पीछे, न छोटा न बड़ा, न रौंद के आगे निकलने की होड़ । वो रोशनी रहने तक चारबाग के आसमान के कई चक्कर लगाते हैं। और रोशनी खत्म होते ही सभी दो पेड़ों पर आकर ठहर जाते हैं। वो शोर करते हैं, उनकी एक साथ चीं चीं की आवाज़ को सुनकर लग सकता है कि वो लड़ रहे होंगे।  पेड़ों के करीब जाकर देखेंगे तो पाएंगे वो साथ की यात्रा को, साथ के बसेरे को उत्साह से उत्सव में बदल देते हैं। लखनऊ शहर के भीतर शायद ही किसी पेड़ के इर्द गिर्द मंडराते, पेड़ों पर बसेरा लेते इतने पक्षियों की आवाज़ें सुनाई दें। एक स्वर में पंछियों का कलरव शाम का कोई नया राग बन जाता है। राग "जुटान" । उस राग में भीतर के शोर, मंदिर के लाउड स्पीकर से उठती सीता राम की रट, जाम में फंसी गाड़ियों की पों पों, रेलवे स्टेशन की अनाउंसमेंट सब दब जाती हैं। यह राग रोज शाम को हज़ारों पंछियों द्वारा गाया जाता है।  इस मनोरम दृश्य को देख कर सुन कर ये सवाल भी उठ सकता है कि कौन सिखाता होगा उन्हें एक साथ रहना ? एक स्वर में अपने मन के भावों को पिरोना, ऊपर से उन्हें भी क्या आदमियों के झुंड एक साथ नज़र आते होंगे ?

मंगलवार, 19 सितंबर 2017


अजोध्या की सरजू

न न...राम की अजोध्या कहने में आपको कोर्ट के फैसले का इंतज़ार करना पड़ेगा। राम अपने ही जन्म स्थल पर अभी न्यायिक हिरासत में हैं। वो कैद हैं, 14 टुकड़ी पी ए सी, 2 टुकड़ी सी आर पी एफ (सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स) और सैकड़ों पुलिस कर्मियों की देख रेख में एक तिरपाल के नीचे। अजोध्या तो फिलहाल सरजू की ही है। उसको किसी के फैसले का इंतज़ार नही है। वो बह रही है निर्बाध। उसके किसी भी स्पर्श, भाव, विचार पर कोई पाबंदी नही है। कैसे लगाओगे पाबंदी ? वो तुम्हारी हद में नही है।  तुमने राम को जना, तो वो भौतिक संसार की भौतिकी से कैसे बच पाएंगे ? खुद फंसे हो और राम को उनके ही घर में कैद करके रखा हुआ है।
      अमानती सामान की जमानत, 5 जगह सघन सुरक्षा जांच, घंटे भर संकरे जाली नुमा पिंजड़े में जलेबी की तरह घूमते घूमते एक जगह किसी पंडे ने राम नामी प्रसाद पकड़ा दिया। सोचा आगे कहीं चढ़ाना होगा। जाली के ऊपर से आततायी बंदरों के पेशाब व लार गिरने का डर और कतार में बेकल श्रद्धालुओं की आपाधापी में वो जगह दिखी ही नही। जाली वाले पिंजड़े से जैसे ही बाहर निकला तो एक बोर्ड पर लिखा था "बाहर जाने का रास्ता"। मैं ठगा सा रह गया। ठीक उसी वक़्त दिमाग में अमानती लॉकर से लेकर बाहर जाने के रास्ते वाले बोर्ड तक वो यात्रा तड़क गयी। वो जगह कहाँ कब निकली , पूछने पर किसी ने कहा कि भगवान राम नाराज़ होंगे इसलिए नही दिखे। हा हा हा...जोरदार हंसी फुट पड़ी। जैसे सबने दर्शन किये हों राम के।
     उधर सूरज सरजू (सरयु नदी) के आलिंगन की तैयारी में था। प्रेम में डूबने को लालायित , वो अलौकिक प्राकृतिक छटा की लालिमा ने घसीट लिया वहाँ से विक्षत मन को, थके तन को । सूरज आहिस्ता आहिस्ता वृहद रूप ले रहा था। सरजू की लहरें कभी लाल तो कभी स्याह हो रही थीं। सूरज जैसे ही सरजू में विलीन हुआ। आसमान में तारे चमक उठे। अजोध्या सरजू किनारे आजादी की सांस लेती है। राम इंतज़ार में बैठे हैं।

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चौरासी गुणा = महा गरीब/गरीब/राजा/महाराजा

चौरासी कोसी, चौरासी लाख देवी देवता, चौरासी गुणा...चौरासी चौरासी । चौरासी का महत्व तब समझ में आता है जब अजोध्या में पंडा पिंड दान करते वक़्त दक्षिणा को 84 से गुणा कर देता है। यजमान की दक्षिणा के आधार पर पुण्य और पाप दोनों ही 84 गुना होने की संभावना रहती है। पितरों के पिंड दान के समय पढ़े जाने वाले श्लोकों के बीच में ही दक्षिणा का संकल्प पंडा बड़ी चतुराई से करवा लेता है। संकल्प के दौरान पिंड दान करते हुए यजमान को महाराजा की तरह पिंड दान करने का संकल्प करवाया जाता है। पिंड दान की आखरी कड़ी में पंडा दक्षिणा रखने की बात करता है। फिर यजमान की स्वीकृति अस्वीकृति के बाद उसे महाराजा/राजा/गरीब/महागरीब घोषित करके पुण्य और पाप के 84 गुने हो जाने की हिदायत देता है। इस क्रिया क्रम में अंत खटास से ही होता है। या तो पंडा नाराज़ होगा, या यजमान का नाराज़ होना तय है। पितरे तो दोनों को ही देख के तर जाते होंगे कि अच्छा हुआ वो यहां से निकल गए। अब चौरासी का खेल देखिये, दक्षिणा 51 रुपये गुणे 84 = 4284 रुपये = महाराजा, दक्षिणा 21 रुपये गुणे 84 = 1764 रुपये=राजा, दक्षिणा 11 रुपये गुणा 84 =924 रुपये= गरीब, दक्षिणा 5 रुपये गुणा 84 = 420 रुपये = महागरीब। ये भी हो सकता है कि दक्षिणा को पितरों की संख्या के साथ गुणा कर दिया जाए। घर के जितने लोगों का पिंड दान उतने गुने दक्षिणा। और गो दान की दक्षिणा अलग से। जो कि इस पैकेज में शामिल नही होता।

तस्वीर - एक पंडा जजमान को 84 का गुणांक समझाता हुआ, मामला महागरीब से भी नीचे चला गया। जजमान 151 ही दे पाया।

राम के अयोध्या से पहली मुलाकात

सोमवार, 11 सितंबर 2017

मैं तुम्हे सम्मानित करता हूँ ...!

मुझे मालूम था , तुम्हे सम्मान पाना अच्छा लगता है। तुम खुश होगे जब मैं तुम्हे सम्मानित कर रहा होऊंगा। पर सम्मानित होने के बाद कभी भी शिकायत भरी नजरों से मत देखना, जब मैं किसी और को सम्मानित कर रहा होऊंगा। मैं औसतन हर दूसरे दिन किसी का सम्मान करता हूँ। मैं सम्मानित करने से सम्मानित महसूस करता हूँ। और सम्मानित होता हुआ दूसरे के गालों पर सम्मान की गुलाबी मुस्कान देखता हूँ। मेरे हर सम्मान समारोह में मंच पर बैठे सम्मान के चश्मदीद, मुझपर यकीन रखते हैं कि मैं एक दिन उन्हें भी सम्मानित करूँगा। सम्मान खालिस लेन देन का विषय है। ये मूक सहमति होती है सम्मान देने और पाने वाले के बीच।
       मुझे याद आ रहा है एक मंच सम्मान समारोह का। जहाँ एक व्यक्ति ने सम्मानित होने के क्रम को खंडित करते हुए पूछा था, ये सम्मान समारोह किस लिए, किसके लिए ? सबने खीझते हुए एक स्वर में पूछा क्या इस लिए तुम्हे इस समारोह में आमंत्रित किया गया था ? ये सम्मान का कार्यक्रम है, उसपर सवाल उठाने वालों का नही। विशिष्टिता, बौद्धिकता, सृजनात्मकता, रचनाधर्मिता सब आधुनिक काल के सम्मान शास्त्र पर आधारित हैं। तुम्हें नही मालूम ? सब सम्मान से ही चलता है, घर, व्यवहार, यहाँ तक सरकारें भी। प्रश्न उठाने वाले के चेहरे पर प्रतिरोध की सबल मुस्कुराहट देख कार्यक्रम में गहरी खामोशी पसर गयी । वो चल पड़ा दरवाजे की ओर, सम्मानित मंच और ऊंघते दर्शकों की खुली आँखों में झांकते हुए। मेरी नज़रे उसको सम्मान पूर्वक दरवाज़े तक छोड़ कर आयीं। उसके बाद वो हममे से किसी को नही दिखा। मेरी नज़रें तुम्हे खोजती है, मैं तुम्हे सम्मानित करना चाहता हूँ।

एक काव्य संग्रह के लोकार्पण कार्यक्रम में जैसा महसूस हुआ

शनिवार, 26 अगस्त 2017

एक स्कूल से पहाड़ की खिड़की खुली

एक स्कूल से पहाड़ की खिड़की खुली

शहर के बीचो बीच नगर पालिका की कुछ एक दुकानों में चलते स्कूल को जब शहर से 4 किलोमीटर दूर ही सही बड़ी सी इमारत मिली, तो बच्चों के भीतर स्कूल और माँ बाप के लिए फक्र के बांध टूट गए। बड़ी सी इमारत, बड़े से दो ग्राउंड आगे पीछे, ट्वायलेट, प्रिंसिपल ऑफिस, स्टोर रूम, असेम्बली एरिया और न जाने क्या क्या। पर इमारत की भव्यता, बस से बच्चों और टीचरों के साथ लंबी दूरी तय करने का सुख कुछ ही दिन का रहा। फिर वही, एक के बाद एक क्लास, हिंदी, इंग्लिश, संस्कृत,मैथ्स, साइंस, जियोग्राफी, सोशियल साइंस...बीच में इंटरवल।
       टीचरों में डबराल, थपलियाल, भट्ट, जोज़फ़, जोसलिन, जोजो, यादव, पांडेय,त्रिपाठी...आदि आदि। पहाड़ी, दक्षिण भारतीय नाम और उनके तेवर हम बच्चों के लिए किसी दूसरे ग्रह के लगते थे। दक्षिण भारतीय नाम के हम बच्चे आदी थे। पर डबराल, थपलियाल उपनाम बच्चों में हमेशा चर्चा में रहते। देहरादून की संस्था श्री गुरु राम राय पब्लिक स्कूल और जनपद हरदोई के लोकल मैनेजमेंट के बीच की राजनीति टॉप मैनेजमेंट से होते हुए टीचरों से छन के बच्चों तक आ ही जाती। संस्था की कोशिश रहती पहाड़ से आये हुए टीचर ज्यादा रहें, और लोकल मैनेजमेंट की कोशिश कि वो कम से कम रहें। खेमे बाजी का सिलसिला हाईस्कूल इंटर तक रहता। संस्था द्वारा समय समय पर ग्राउंड रिपोर्ट जानने के लिए एक टीम देहरादून से आती, जिसे लोकल मैनेजमेंट कुछ कुछ वैसे ही सजा के दिखा देता जैसे कार बाजार में थर्ड हैंड कार।
    पर इन सब के बीच कुछ कुछ जबरदस्ती सी पढ़ाई लिखाई के इतर एक सपना हर बच्चे के अंदर पलता था। वो था पहाड़ों की गोद में बसे देहरादून में आयोजित होने वाले बोर्ड के इम्तिहान। चूंकि मैंने अपने जीवन में कभी पहाड़ नही देखे थे, उन पहाड़ी टीचरों के नाम, गुनगुनायी गयी पहाड़ी धुनें, पहनावे उड़ावे, रहन सहन देख के पहाड़ के प्रति हमेशा कौतूहल रहा। आठवें तक ये लगता था, कि इतने महंगे स्कूल में हम इतने सालों तक टिक भी पाएंगे या नही। पर आठवां, नवाँ पार होते रहे। पढ़ाई से हमेशा छत्तीस का आंकड़ा रहा। फिर भी हर महीने दी जाने वाली फीस धक्का देती रहती थी पीछे से। बोर्ड का हौवा हम सब के ऊपर था। पर उस हौवे को हल्का करने वाला पहाड़ की गोद में एक महीने का प्रवास ज्यादा बलिष्ठ था। शायद ही देश के किसी भी अन्य स्कूल के बोर्ड इम्तिहान बच्चों के लिए इतने रूमानी तरीके से आते हों। सीनियर्स की फेयरवेल पार्टी में उस एक महीने के प्रवास के सैकड़ों किस्से होते । बोर्ड की धुकधुकी के बीच वो समय आ ही गया एक दिन।
      वैसे जनता और दून एक्सप्रेस अनाउंसमेंट और उसकी धड़धड़ाहट कानों में गूंजने लगी थी बहुत दिनों से। बेड होल्डाल, सूट केस में अलग अलग विषयों की प्रतिनिधि किताबें,माँ के हांथों बनाया हुआ नाश्ता, और ठंड के कहकहों से बचने के लिए गर्म कपड़े। स्टेशन पर हर बच्चा छोड़ने वाले अभिभावकों के हाँथ से छूट कर ट्रेन में चढ़ते ही बड़ा हो जाने वाला था। मेरे लिए पहाड़ जैसे रास्ता देख रहा हो, मैं उससे मिलकर बड़ा होना चाहता था। ट्रेन छूट चुकी थी, ट्रेन के भीतर बर्थ के साथ साथ साथियों की शैतानियां, अल्हड़पन खुलने लगा था। टीम को लीड कर रहे दो अदद टीचरों के भीतर भी कुछ खुला था। वो उतने सहज कभी नही महसूस हुए। तयशुदा रतजगे के बाद हरिद्वार, रायवाला, डोईवाला...गुजरते गए...एक के बाद एक। पीछे पहाड़ का बैकग्राउंड अभी भी फोटो स्टूडियो के पर्दे की तरह लग रहा था। देहरादून स्टेशन पर खिली हुई धूप ठंढ का हल्का दुशाला ओढ़े स्वागत करती है। किसी एक टीचर ने लाद दिया था हम कुछ चुनिंदा लड़कों के कंधों पर लड़कियों का जरूरत से ज्यादा भारी सामान। सामान के साथ टीचर की कुटिल मुस्कान और लड़कियों का खिलखिलाकर खाली हाँथ चलना उस दिन रेसिस्ट नही लगा। हम उस हॉस्टल पहुंच चुके थे। जहाँ हमारे भविष्य का मील का एक पत्थर आकार लेने वाला था। कई कमरों के बीचो बीच आंगन में रखी टेबलों पर मेरठ, हरदोई व अन्य शहरों के बोर्ड लगे थे। अपने शहर की टेबल पर सुबह का नाश्ता, दिन का लंच और रात का डिनर समयानुसार। दिन भी बिना सोये ही गुजरा वहाँ की आबो हवा से परिचय के साथ। रात में कमरे की बत्ती जैसे ही बंद हुई, तो खिड़की से दूसरी दुनिया की बत्तियां जगमगाने लगीं। सामने टिमटिमाता मसूरी सजा था, खिड़की की आयताकार प्लेट में। कमरे के भीतर लाइन से लगे सफेद बिस्तर की कतार में मेरा तेरा, यहां वहाँ से सरहदें खींची जा रही थी। मैं अपना बिस्तर खो चुका था। किताबें खो चुकी थीं। लगभग महीने भर के पहाड़ प्रेम ने बोर्ड एक्ज़ाम की सफलता में असफलता का एक दाग तो दे दिया था, पर कम्पार्टमेंट की शक्ल में पहाड़ से मिलने का दूसरा मौका भी दिया।
       आज लगभग 20 सालों बाद शाम के वक़्त स्कूल बंद था, पर असेम्बली ग्राउंड में पुराने बच्चों का शोर था, उन टीचरों की डांट थी, ..प्रिंसिपल ऑफिस में नाक पर चश्मा, हाँथ में पुलिस वाला रूल लिए प्रिंसिपल पी ए जोज़फ़ से गुलज़ार था। मैं स्कूल से पहाड़ की पहली मुलाकात के सफर में था।

बुधवार, 23 अगस्त 2017

मम्मा.....पापा की रेल टूट जाएगी क्या ?

4 साल का बच्चा बीती शाम से ही विचलित था, मैं अक्सर ट्रेन से लखनऊ और हरदोई के बीच यात्रा करता हूँ। लिहाज़ा  वह मां से बार बार सवाल करता "पापा की रेल टूट जाएगी", माँ कहती नही टूटेगी, इस सवाल का पीछा करता दूसरा सवाल , क्या पापा की ट्रेन प्लास्टिक की है ? बच्चे के लिए इस दुनिया में प्लास्टिक सबसे मजबूत द्रव्य है। माँ उत्तर देती है नही रेल लोहे की होती है, इसलिए नही टूटेगी। बच्चा फिर सवाल करता है लोहे की है फिर कैसे टूट गयी रेल....मम्मा....? बच्चे के दिमाग में टीवी, अखबार में रेल के आड़े तिरछे डिब्बों की तस्वीर नाच रही है, और उन तस्वीरों में उसका पापा दबा कहीं फंसा पड़ा है, यह दृश्य उसके गले में फंसा उसका गला बैठाए दे रहा है। देर रात जब घर पहुंचा तो पता चला उसकी बेचैनी...बताया गया कितनी मुश्किल से वो सो पाया। ऐसे ही न जाने कितने बच्चों की नींदें उड़ी होंगी, कितनी माओं को झूठ का सहारा लेना पड़ा होगा। पर हादसों का क्या...आंखें भी खोलते हैं, और कमियों पर पर्दा डालने की हिम्मत भी दे देते हैं।
     मानस रेल के लिए बचपन से ही दीवाना है, मुझे डर है कि हादसों की तस्वीरें उसके दिमाग में रेल के लिए नफरत न पैदा कर दें। एक जहाज लिया था परसों...अपनी ऑफिस टेबल पर रखने को,सोचा बच्चे को दूंगा। रेल की टूटी तस्वीर से दिमाग हटेगा। जब उसको जहाज दिया...उसका पहला सवाल था, पापा ये जहाज प्लास्टिक का है ? मैंने कहा लोहे का।

एक माह में दो रेल हादसों के बाद।

सोमवार, 24 जुलाई 2017

ऐ शहर ये तुमको हुआ क्या है ?
५ जून २०१७ 

एक और रात नींद को सिरे से ख़ारिज़ करने के लिए आमादा थी। भीषण गर्मी से भट्ठी हुए कमरे में तंदूरी नाइट का खौफ सर पर आग के शोलों की तरह धधक रहा था। खुद से लंबे झगड़े के बाद खाली शाम हाँथ आयी चिल और मस्त रहने की सलाह ने बियर शॉप की राह दिखा दी। दो अदत चिल्ड बियर शरीर और रूम टेम्परेचर को दो घंटे ट्यून करती रही। घूंट घूंट रात बामुश्किल आधा सफर ही तय कर पाई। ख़्वामखां जौं के पानी से उम्मीद लगाई...आधी रात न नींद थी, न बेवक़्त किसी पुकार कि गुंजाइश और न ही नशा। अचानक जेहन में रमज़ान के वक़्त पुराने शहर के रौशन चौक चौराहे याद आये। पुराने शहर ने कई बार पहले भी नींद से छूटे अकेलेपन को भरा है। सोसाइटी के गार्ड की नींद तोड़ने का गिल्ट लिये निकल भागा अपने शहर में दूसरे शहर की ओर। रास्ते भर सड़कें खाली, जाने और आने वाली सड़कों के बीच डिवाइडर पर कतार में सोती सैकड़ों बेधड़क नींद। पुराने लखनऊ की गलियां सोई पड़ी थी। चौराहे पर इक्का दुक्का चाय की दुकान।
राम जाने रमज़ान के वक़्त कभी जश्न में डूबे शहर को अब हुआ क्या है ? अमीनाबाद, चौक, ठाकुरगंज दुकानों के ग्लो साइन बोर्ड चमक रहे थे। सहरी के वक़्त की तैयारियों में बाज़ार गुलज़ार नही था। अवैध बूचड़खाने, कुछ एक किस्म के गोश्त पर पाबंदी के सरकारी फरमान के पर्चे सड़कों, गलियों और चौराहों की हवाओं में चिपके हुए थे। शायद इससे ज्यादा कोई पाबंदी नही लगाई गई। फिर भी एक अजीब सा खौफ है। चौराहों पर पुलिस की जीप के मत्थे पर कई तरह की रंगीन रोशनी आंख टिकने नही दे रही थी।
खामोश पुराने लखनऊ में रूमी दरवाज़ा बुलंद खड़ा किसी याद में डूबा हुआ था। रूमी, इक्के वाले कि शक्ल में सोए हुए थे अपने इक्के (तांगा) पर दरवाज़े के ही पास। सहरी के वक़्त की अज़ान के ऐलान के बाद पुराना शहर निकल पड़ा इबादतगाह की ओर। चिड़ियों की चहचहाट भोर की अगुवानी में पेड़ों को झींके दे रही थी। गाड़ी के दो पहियों में रात लिपटती हुई जा पहुंची नए शहर के लोहिया पार्क में। जहां जॉगिंग ट्रैक पर बेखौफ कदम ताल स्वस्थ हवा को महसूस कर रहे थे। बिना सोकर जागे ही आदतन मोबाइल खोल लिया, दूर कहीं दूसरे देश के शहर लंदन में आतंकी हमले की खबर ने स्तब्ध कर दिया। मोबाइल बंद कर, पार्क में एक झूले की झींक और ठंढी हवा के झोंके ने कुछ देर बहलाये रखा। दो किशोर कूद के झूलते हुए झूले पर सवार हो गए मेरे दाएं बाएं। मोबाइल गेम में खो गए वो दोनों। मेरे पैर जमीन से टिके झूले को झूंक देते रहे।
जून 17 

जब शहर के शहर पहाड़ों की ओर दौड़े चले जा रहे हों, तो क्यों न शहर में ही मिट्टी के टीले को पहाड़, घने शहर के बीच ठहरी नदी के किनारे को किसी घाटी के बीच कल कल बहती नदी, घिरती घटाओं को भरे बादल, कुछ जंगली पेड़ों को चीड़ देवदार, घुमावदार पगडंडियों को घूमते पहाड़ी रास्ते और तेज़ धूल भरी आंधी को बर्फीली हवाएं मान लिया जाए। मान लिया जाए कि ये सब वहीं से आ रहा है, जहां हम जाना चाहते हैं। हां वहां मैं तब जाना चाहूंगा जब वहां कोई नही जाएगा। जैसे अभी यहां कोई नही है।
1 july २०१७ 

अभी सुना कि लखनऊ में पिछले दो घंटे से झमाझम बारिश हो रही है, मेरे 4 बाई 8 के कमरे को बामुश्किल 1 घंटे बारिश झेलने की आदत है। कमरे के भीतर तीन तरफ से मूसलाधार बारिश प्रवेश करती है। 1 घंटे से ऊपर की बारिश कमरे में टपकने लगती है, ठहरने लगती है। यूँ तो कमरे में छत है, एक लंबा सा खिड़की कम रोशनदान, लोहे की सरियों से बना जालीदार दरवाज़ा है, और एक अलमारी है जिसमें कोई अबूझ पतली सी आधा इंची सुरंग है। कमरे की दीवारें तख्त के दो किनारों से सटी हुई हैं। उनपर हाल ही में मकानमालिक द्वारा दिये गए क्वायर और फोम के गद्दे हैं । अलमारी में ढेरों किताबें हैं, अखबार हैं, तैयार कपड़े हैं। जमीन पर फूल झाड़ू है, छोटी टेबल के टॉप से अक्सर ज्यादा वाला सामान नीचे गिर जाता है, जो कि जगह की कमी के चलते उठाया नही जाता।
मैं हरदोई से लखनऊ के बीच की यात्रा में हूँ। हरदोई स्टेशन पर ही पता चला था कि पिछले 2 घंटे से बारिश हो रही है, और लगता है कि अगले कुछ घंटे होगी। फिलहाल 100 किलोमीटर की दूरी के सफर में दोनों तरफ हरे भरे खेत खलियान, पेड़ पौधे ट्रेन के साथ दौड़ रहे हैं। मेरी दिमाग में कमरे के भीतर तैरती भीगती वस्तुएं घूम रही हैं। लखनऊ पहुंचते ही ऑफिस जाऊंगा फिर रात में कमरा मिलेगा। रात में शायद ही कमरे में कोई जगह सूखी मिले। निचोड़ने सुखाने का भी समय नही होगा।
मैं रोमांचित हूँ। रात का बेसब्र इंतज़ार है। हर बारिश ऐसा ही कुछ होता है। दीवालें साल भर सीली रहती हैं। सारे मौसम कमरे में आते हैं। 4 बाई 8 कमरा सुकून का मचान है। मैं उन लेखकों, साहित्यकारों, संपादकों, प्रकाशकों,धर्म उपदेशकों, मित्रो को यकीन दिलाना चाहता हूं कि उनकी रचनाये, पुस्तकें , पत्र और उपहार सारे मौसम देखते हैं 4 बाई 8 के कमरे में सुरक्षित। हालांकि मैने उस कमरे में मैं अपनी सुरक्षा की गारंटी नही ले पाया। पुर सुकून, अपनापन, एकांत और मौसम की गारंटी हमेशा रहती है।
भीगना जरूरी है !
2 July 2017
अलमारी के बीच के खण्ड में पता नही कितनी ही कहानियां जिनमे बारिश, नदी, पहाड़, प्रेम, जीवन, संघर्ष, सहन, याद, स्त्री, पुरुष अलमारी में सूख रही थी। अलमारी के सबसे नीचे खण्ड में रखे अखबारों में पिछले सूखे से जूझते किसान और उनकी आत्महत्याओं से हिली सरकारों की खबरें अक्षरशाही से दबा दी गयी थीं। अलमारी के सबसे ऊपर खण्ड में रखी खुली साबुन, अगरबत्ती, मार्टीन क्वायल, माचिस , नमक, डेली डायरी, टेबल कैलेंडर, कॉर्ड लेस कीबोर्ड माउस, धूल खा रहे थे।
लंबे अरसे से एक 6 फिट का आदमी 4 बाई 8 के कमरे में आता ठहरता तो था, पर उसे अपने ही कमरे की चीज़ें इस्तेमाल करने छूने से डर लगता था। उसे लगता था वो कुछ छुएगा तो वो उसे संभाल नही पायेगा। कहानियां उसे उसके खिलाफ खड़ा कर देंगी। अखबार की खबरें उससे सवाल करेंगी कि फॉलोअप में तुमने क्या किया ? साबुन हाँथ से फिसल जाएगा, अगरबत्ती की खुशबू दम घोंटेगी, माचिस जला सकती है।
कमरे की एक दीवाल के टूटे हुए जोड़ से टिप टिप तेज़ धीमी बारिश की धार अलमारी को भिगो रही है। बाकी रोशनदान से और दरवाज़े की तरफ से आती बारिश की बूंदे मन के भीतर ढेर सारी ऊर्जा बो रही है। भीगना भीगने देना इतना राहत भरा हो सकता है कभी महसूस नही हुआ। भीगने के बाद सवालों ने जवाब ढूंढ लिए हों जैसे। कमरे के भीतर रखी हर निर्जीव वस्तु जीवित हो चली है। सब संवाद में हैं, सूखे और भीगने के बाद के अंतर को साझा कर रही हैं। सब अपनी अपनी भाषा में अपनी जरूरत अपनी अहमियत को चिल्ला चिल्ला के शोर करते थे। अब कमरे के भीतर बाहर बारिश के स्वर हैं, भीगना स्थायी राग है ठीक वैसे ही मन के भीतर बाहर भी।

बच्चों को उड़ने दो ..

 उड़ने दो , उड़ने दो  बच्चों को उड़ने दो ... गर नाक अटक जाए  तो भी तो  उड़ने दो ..   जिस ऊर्जा का  संचार प्रवाह  हो उद्दंड  उसको भी  उड़ने दो  कह...