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बुधवार, 5 अगस्त 2026

बैटरियां !

 


ये बैटरियों  ने आज कल नाक में दम कर के रखा हुआ है . पिछले कुछ सालों से ऐसा लगता है जैसे बतेरियाँ ही बदलवा रहा हूँ . 

कभी धंधे की , कभी घर की , कभी गाँव घर की .  तो कभी कार की , कभी स्कूटी की , तो कभी  बाइक की  .

समझ में ही नहीं आता इन बैटरियों ने कब जीवन में इतनी निर्भरता भर दी है . पैसे खर्च करो . फिर पानी चेक करो . फिर इनवर्टर और बैटरी का मधुर सम्बन्ध बना रहे . यह भी ध्यान में रखना पड़ता है . किसी एक की नहीं बनी तो दुसरे को ले डूबेगी . 

बचपन में बैटरी तो केवल टोर्च में होती थी और रेडियो में . यहाँ तक हमारे गाँव में टोर्च का नाम ही बैटरी पड़ गया था . टोर्च खोजते तो बैटरी बोलते . रेडियो के सेल या बैटरी . 

फिर आया ज़माना घडी का सेल , टी वि रिमोट का सेल , फिर बाद में एयर कंडीशन के रिमोट का सेल . 

अब इस नए जमाने ने सब कुछ बैटरी पर निर्भर करवा दिया . मानों लाईट का वैकल्पिक श्रोत यही बचा है . वह भी किसी न किसी ऊर्जा पर निर्धारित . मतलब ऊर्जा का श्रोत बनाए रखने के लिए आप को फुल ड्यूटी लगेगी . 


इनवर्टर बैटरी , सोलर बैटरी , लिथियम बैटरी , तेज़ाब बैटरी ! 

साल में 12 इनवर्टर बैटरी 2 सोलर  बड़े बैटरी , 2 कार की बैटरी , एक स्कूटी की और एक बाइक की बैटरी का ख्याल रखना पड़ता है . उफ्फ्फ बैटरी ! 


हमेशा अंदेशा सा लगा रहता है . कि कब बैट्री बोल जाए . बतेरियां लेते समय 3 साल की गारंटी , 5 साल की गारंटी और दो साल की गारंटी . 

कभी कभी मन करता है सभी बैट्री को एक साथ बदलवाने भेज दूँ  . सभी की तारीख एक समय . लेकिन डर लगता है इनकी तारेखीं निश्चित नहीं होती . 

बस बतेरी का पानी सुलभ रखो . और जब कभी गड़बड़ करे . तो रास्ते हैं . एक बैटरी को खोल के जुम्मन मियाँ के यहाँ ले जाओ . और उसे चार्गिंग पर लगवाओ कम से कम आठ घंटे . बैटरी उठी तो ठीक , वरना डेड . दुसरा सबसे सहज और खर्चीला . फोन करो , कंप्लेंट करो . और इंतज़ार करो . उनकी कृपा होगी तो घर बैठे वरना बैटरी सर्विस सेंटर दौड़ो . 


इन बैटरियों में तेज़ाब दौड़ता है . अत्यंत जलनशील पदार्थ . सफ़ेद को पीला कर दे और कपडे लट्टे , लोहा और चमड़ी को जला दे . 


जहां रख दो वहाँ की फर्श , दीवाल खाने लगती है . 

बहुत बार सोचता हूँ . क्या सच में जो बड़े अमीर लोग होते होंगे . वो अपनी बतेरी का ख्याल रख पाते होंगे ? वो देखभाल करते होंगे या उनके नौकर ! 


पता नहीं बैटरी इतनी भारी क्यों होती है . गाँवों में मैंने देखा है बरसात में , सर्दियों में , गर्मियिओं में ग्रामीणों को बतेरियाँ अपने दुपहिया वाहन पर ढोते हुए . 

ऐसा लगता है बहुत बड़ा कारोबार है बैटरी . 


सरकार की इतनी बड़ी बड़ी इमारतें , बड़े बड़े प्रोजेक्ट्स , अधिकारियों , मान्न्नियों के घरों की बैटरियां कैसी होती होंगी ? 


इतना तेज़ाब आता कहाँ से होगा ? 

ये वो वाला तेज़ाब नहीं होता , जो हम टॉयलेट क्लीनर के नाम से लेते हैं . मुझे याद है शहर की एक गली , जहां तेज़ाब मिलता था . पक्का वाला तेज़ाब . पर इधर कुछ सालों से खुले आम बिकना बंद हो गया है .

 मेरे यहाँ एक टॉयलेट साफ़ करने वाली महिला आती थी . जिनका नाम था कांति ! 

वो बहुत तेज तर्रार महिला थी . एक दम तूफ़ान के साथ आती , काम करती और गायब हो जाती . जब वो जाती थी तब बाथरूम एक दम चमाचम . कई घनते मछार और मक्खी बाथरूम में आते नहीं थे . क्यों की वो तेज़ाब से बाथरूम साफ़ करती थी . हार्पिक , साबुन के विकल्प के बाद भी वो तेज़ाब इस्तेमाल ज्कारती थी . 

हमेशा उनको देख कर लगता था की वो शराब का सेवन करती होंगी  उनके कठिन काम को शायद शराब की जरुरत हो .... . 

एक बार मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि वो शराब नहीं पीती. उनके चेहरे पर तेज़ाब का भभका स्किन को जला देता है . 


अभी कुछ दिन से वो कैंसर से जूझ रही हैं . उन्ही के स्थान पर नयी सफैकर्मी अब हार्पिक का इस्तेमाल कर रही हैं . 

कांति तेज़ाब से खेलती थी . ऐसे ही बैटरी बनाने वाले , सुधारने वाले , पुरानी बैटरी का लें दें करने वालों की क्या दशा होगी . राम ही जाने ! 


मुझे तो अपनी ही चिंता खायी जाती है  . 


इस सावन तो गजब ही हो गया . एक साथ घर की , दो कार की , दो दुपहिया की बैट्री मात्र 15 दिन के अंदर अचानक से डेड हो गयी .  एक पांच साल पहले , एक 3 साल पहले और एक 2 साल से कुछ कम पहले खरीदी गयी थी . उनमें खरीदने की तारीखें नहीं थी . मैन्युफैक्चरिंग से पता चलता है . 


एक अचानक खुश दिन आप के चक्कों की बतेरियाँ डेड हो गयी . जिस गाड़ी को स्टार्ट कर रहे हो , वो हो नहीं रही .  असंभव ! 

बारी बारी बैटरी , कार मैकेनिक को रिक्शा से कभी तो कभी बन चुकी बतेरी वाले वाहन पर ढोते रहते . 

मैंने कई बतेरी वालों से बात की . उन्होंने कहा की आजकल बहुत ज्यादा कंप्लेंट आ रही हैं . 


ये बत्तेरियां भी काफी नाच नाचती हैं . पता नहीं इनपर नाचने के लिए मैं तैयार था . 







मंगलवार, 4 अगस्त 2026

बुद्ध की नमी !



कितनी शांत है यहाँ 

बुद्ध की शरण में 

लताएँ ! 

बेझिझक लिपटने की 

आज़ादी के आनंद 

में सराबोर 

पैरों से होते हुए 

नाभि , वक्ष स्थल 

फिर गले पड़ते  , 

दुशाला बन जाती हैं  


उम्हे बढना है 

बुद्ध को ध्यान में बैठे रहना है 


मानसून की नमी 

में कुछ तो ख़ास है 

लताएँ बेधड़क बढती हैं 

तेज़ी से सभी वनस्पतियों से आगे 

चढ़ जाना चाहती हैं 

कहीं भी , कितनी भी ऊँचाई में 


जीवन के निर्जन समय में 

अपने तत्व को सुरक्षित रखना 

बारिश के पहले बोसे से 

फूट पढ़ना 

उन्हें कितना अच्छा आता है 


भरोसा ऐसा ही तो होता है 

शांत , ध्यान में बैठना 


सावन के हरे और 

बुद्ध के ध्यान की गहराइयों 

में डूब के लताएँ 

खिल उठती हैं 


वर्षों से बुत बने बुद्ध 

अब संसार से अलोप हो रहे हैं 


होटलों , स्पा सेण्टर  , ओयो में 

या कहीं अपने  काल के 

अवशेषों स्तूपों में 

विराजमान हैं 


बुद्ध की नमी 

अपना सावन तालश रही है .....


मंगलवार, 28 जुलाई 2026

सिगरेट !

सड़क किनारे

सड़क किनारे माचिस के खोखो पर
सिगरेट फूँकती आकण्ठ
तनाव की नज़र
कौन सी फ़िल्म देखती होगी ?

न जी गयी कई कहानियाँ
फेफड़ों से धुआँ उगलती

मुँह
साधारण से दिखने
हर कश में बदल जाती होंगी
जितनी गहरी कश

उतनी गहरी ख़्याल की बुनावट

मंत्री की सुरक्षा काफिले का
पहला व्यक्ति बेस्ट ट्रैफिक मैनेजमेंट का
अवार्ड नही लिए होता।

मैं जब वहां होता हूं ।

मैं जब वहां होता हूं । यहां नहीं होता। मैं जब यहां होता हूं , वहां  नहीं होता हूं। सच ! मैं न वहां रहता हूं , ना यहां रहता हूं। मैं ! असल में मैं  हूं ही नहीं । मैंने छोड़ा था बहुत पहले खुद को ठीक उसी जगह। जहां पर मैं था। मैं वहां से घूम घूम के आता रहता हूं , लगभग हर मौसम में। पर "मैं ", मुझे महसूस क्यों नहीं होता । ये "मैं" पहले मैं और तुम हुआ । फिर हम हुआ। फिर हमारे ।
       भागते भागते "हमारे " थकने लगा। हमारे का बोझ बढ़ता रहा। हमारे लोग। हमारी जमीन। हमारा पैसा। हमारा दर्द। हमारे की पीठ पर सवार "मैं " डरने लगा। मैं हूं कौन यार ? डर....?
       भक्क ! मैं बीज हूं। उगा ... बढ़ा... पेड़ हुआ... फिर पंछी हो गया। उड़ गया ! उड़ के जा बैठा दूसरे पेड़ पर। मैं उड़ने में पारंगत तेज़ उड़ने लगा। 

चौकीदार

 आज मैंने फिर एक चौकीदार रखा । इससे पहले भी रखा था। पर वो न जाने क्यों चला गया। उसे जाना था , इस लिए वो चला ही गया। उसने ज्यादा दिन काम नहीं किया था। बुज़ुर्ग सा था। कहीं ऊंची जगह से चोरी , कामचोरी के आरोप में भगा दिया गया था। उसके तुरंत बाद वो मेरे पास आया । मैंने उसे रख लिया।  किस्सागोई उसपर खूब जचती थी। लंबी चौड़ी हांकना।  उसकी सीटी की लम्बी आवाज़ उसकी बीड़ी से बड़ी होती  और वह लाठी जमीन पर ऊंची आवाज़ में बजाता । 

    अजीब सी कहानी थी उसकी। अधेड़ उम्र से बुढ़ापे के बीच में शादी। और फिर एक बच्चा अपना। दो उसकी  पत्नी के  पहले से थे। उसकी पत्नी झारखंड के किसी आदिवासी इलाके से थी। कभी किसी जगह शराब के ठेके पर सेल्समैन थी। मैं चौकीदार को मेरे यहां चौकीदारी करने से  पहले से जानता था। उसकी बातों में कई बार आया। कई बार लगा कि उससे कह दूं कि जाओ भाई। तुम्हारे हिस्से का संघर्ष झेलना फिलहाल मेरे बस की बात नहीं। नहीं कह पाया कुछ भी उससे। उसकी पत्नी मुझे अक्सर फोन कर के कहती कि उनका ख्याल रखना। उसके बदले में वो मुझे झारखंड की कोई पारंपरिक मिठाई खिलाने की बात कहती। फिर फोन रखते वक़्त कह ही देती। " भाई जी , बच्चे हैं, खाना बनाना पड़ता है और जानवर देखने पड़ते हैं। इसलिए वहां आना संभव नहीं " और ये तो बिल्कुल बेकार आदमी है। बस इसका ख्याल रखना। जितना कमावत है सब बहाए देत है। पर हम से प्यार बहुत करता है। जहां वो पहले काम करता था वहां उसके साथ काम करने वाले कम उम्र के लड़के उसकी पत्नी को फोन कर के परेशान किया करते थे। खैर उसको जाना था । वो चला गया। 

 वो कुल जमा 7 रातों में 3 ही दिन जाग पाया। बाकी 3 दिन सोया । एक छुट्टी भी । उसके बावजूद 500 रुपए मांगने की हिम्मत उसने की । उसने बताया कि उसकी पत्नी की तबियत खराब है।  जब वो छुट्टी से लौट कर आया। उसने बताया कि जन्माष्टमी में उसने झांकी सजाई थी। रात भर जागरण हुआ। पूरे गांव को प्रसाद बटा। उसने वो सारे पैसे उसमें खर्च हो गए। वो उसका आखरी दिन था ।


  साल पहले जब मैं यहां आया था। मुझे बताया जाता कि यहां बहुत चोरियां होती है। चोरियां का कारण जानने में किसी को दिलचस्पी नहीं रहती। पर मुझे थी . क्यों कि चोरियां वहां होती हैं जहाँ कोई रहता नहीं है या रहते हुए भी लोग निष्क्रिय रहते हैं . 

मैं आश्चर्य से सोचता। "कस्बे के मुहाने पर एक ऐसी जगह जहां दस बीस घर फौजियों के। क्षेत्रीय विधायक के कार्यालय की गश्त सुना है बड़ी तगड़ी होती है। फिर भी इतनी शातिर चोरियां। कभी कभी दबंगई के साथ चोरियां। " 

        मेरे घरवाले मुझसे पूछते हैं कि मैं जागता क्यूं हूं। जागे न तो चोरी हो जाएगी । मुझे आज तक कोई आदमी चोरी होते नहीं दिखा। और न ही आस पास के लोग उठते दिखे . 

ये नया चौकीदार , चौकीदार नहीं लगता है .  



बैटरियां !

  ये बैटरियों  ने आज कल नाक में दम कर के रखा हुआ है . पिछले कुछ सालों से ऐसा लगता है जैसे बतेरियाँ ही बदलवा रहा हूँ .  कभी धंधे की , कभी घर ...