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मंगलवार, 28 जुलाई 2026

सिगरेट !

सड़क किनारे

सड़क किनारे माचिस के खोखो पर
सिगरेट फूँकती आकण्ठ
तनाव की नज़र
कौन सी फ़िल्म देखती होगी ?

न जी गयी कई कहानियाँ
फेफड़ों से धुआँ उगलती

मुँह
साधारण से दिखने
हर कश में बदल जाती होंगी
जितनी गहरी कश

उतनी गहरी ख़्याल की बुनावट

मंत्री की सुरक्षा काफिले का
पहला व्यक्ति बेस्ट ट्रैफिक मैनेजमेंट का
अवार्ड नही लिए होता।

मैं जब वहां होता हूं ।

मैं जब वहां होता हूं । यहां नहीं होता। मैं जब यहां होता हूं , वहां  नहीं होता हूं। सच ! मैं न वहां रहता हूं , ना यहां रहता हूं। मैं ! असल में मैं  हूं ही नहीं । मैंने छोड़ा था बहुत पहले खुद को ठीक उसी जगह। जहां पर मैं था। मैं वहां से घूम घूम के आता रहता हूं , लगभग हर मौसम में। पर "मैं ", मुझे महसूस क्यों नहीं होता । ये "मैं" पहले मैं और तुम हुआ । फिर हम हुआ। फिर हमारे ।
       भागते भागते "हमारे " थकने लगा। हमारे का बोझ बढ़ता रहा। हमारे लोग। हमारी जमीन। हमारा पैसा। हमारा दर्द। हमारे की पीठ पर सवार "मैं " डरने लगा। मैं हूं कौन यार ? डर....?
       भक्क ! मैं बीज हूं। उगा ... बढ़ा... पेड़ हुआ... फिर पंछी हो गया। उड़ गया ! उड़ के जा बैठा दूसरे पेड़ पर। मैं उड़ने में पारंगत तेज़ उड़ने लगा। 

चौकीदार

 आज मैंने फिर एक चौकीदार रखा । इससे पहले भी रखा था। पर वो न जाने क्यों चला गया। उसे जाना था , इस लिए वो चला ही गया। उसने ज्यादा दिन काम नहीं किया था। बुज़ुर्ग सा था। कहीं ऊंची जगह से चोरी , कामचोरी के आरोप में भगा दिया गया था। उसके तुरंत बाद वो मेरे पास आया । मैंने उसे रख लिया।  किस्सागोई उसपर खूब जचती थी। लंबी चौड़ी हांकना।  उसकी सीटी की लम्बी आवाज़ उसकी बीड़ी से बड़ी होती  और वह लाठी जमीन पर ऊंची आवाज़ में बजाता । 

    अजीब सी कहानी थी उसकी। अधेड़ उम्र से बुढ़ापे के बीच में शादी। और फिर एक बच्चा अपना। दो उसकी  पत्नी के  पहले से थे। उसकी पत्नी झारखंड के किसी आदिवासी इलाके से थी। कभी किसी जगह शराब के ठेके पर सेल्समैन थी। मैं चौकीदार को मेरे यहां चौकीदारी करने से  पहले से जानता था। उसकी बातों में कई बार आया। कई बार लगा कि उससे कह दूं कि जाओ भाई। तुम्हारे हिस्से का संघर्ष झेलना फिलहाल मेरे बस की बात नहीं। नहीं कह पाया कुछ भी उससे। उसकी पत्नी मुझे अक्सर फोन कर के कहती कि उनका ख्याल रखना। उसके बदले में वो मुझे झारखंड की कोई पारंपरिक मिठाई खिलाने की बात कहती। फिर फोन रखते वक़्त कह ही देती। " भाई जी , बच्चे हैं, खाना बनाना पड़ता है और जानवर देखने पड़ते हैं। इसलिए वहां आना संभव नहीं " और ये तो बिल्कुल बेकार आदमी है। बस इसका ख्याल रखना। जितना कमावत है सब बहाए देत है। पर हम से प्यार बहुत करता है। जहां वो पहले काम करता था वहां उसके साथ काम करने वाले कम उम्र के लड़के उसकी पत्नी को फोन कर के परेशान किया करते थे। खैर उसको जाना था । वो चला गया। 

 वो कुल जमा 7 रातों में 3 ही दिन जाग पाया। बाकी 3 दिन सोया । एक छुट्टी भी । उसके बावजूद 500 रुपए मांगने की हिम्मत उसने की । उसने बताया कि उसकी पत्नी की तबियत खराब है।  जब वो छुट्टी से लौट कर आया। उसने बताया कि जन्माष्टमी में उसने झांकी सजाई थी। रात भर जागरण हुआ। पूरे गांव को प्रसाद बटा। उसने वो सारे पैसे उसमें खर्च हो गए। वो उसका आखरी दिन था ।


  साल पहले जब मैं यहां आया था। मुझे बताया जाता कि यहां बहुत चोरियां होती है। चोरियां का कारण जानने में किसी को दिलचस्पी नहीं रहती। पर मुझे थी . क्यों कि चोरियां वहां होती हैं जहाँ कोई रहता नहीं है या रहते हुए भी लोग निष्क्रिय रहते हैं . 

मैं आश्चर्य से सोचता। "कस्बे के मुहाने पर एक ऐसी जगह जहां दस बीस घर फौजियों के। क्षेत्रीय विधायक के कार्यालय की गश्त सुना है बड़ी तगड़ी होती है। फिर भी इतनी शातिर चोरियां। कभी कभी दबंगई के साथ चोरियां। " 

        मेरे घरवाले मुझसे पूछते हैं कि मैं जागता क्यूं हूं। जागे न तो चोरी हो जाएगी । मुझे आज तक कोई आदमी चोरी होते नहीं दिखा। और न ही आस पास के लोग उठते दिखे . 

ये नया चौकीदार , चौकीदार नहीं लगता है .  



ये दुनिया !

कभी छोड़ देते ये बच्चों की दुनिया 

कभी पूछ लेते मांओं की दुनिया

कभी हम जमीन पर आकर तो देखें

हजारों पिटारों में सहती यह दुनिया

मेरा काम है मैं लड़ूंगा यूं हीं

सितारे जमीन पर ना आते कभी... 

मेरा साथ दोगे तो पहलू में दुनिया


पुकारो तो मुंह फेर लेती ये दुनिया

न कहती न बुनती न सुनती ये दुनिया

अजीब ओ गरीब अह्मकाना ये दुनिया

ये दुनिया नहीं आशियाना है दुनिया ! 




लिखना जरुरी है !

 लिखना जरुरी है . क्यों की लिखे को मिटाया जा सकता है . लिखने के पहले , लिखने वाली बात पर सतर्कता से ध्यान लगाया जाता है . ध्यान लगाने से भीतर की दुनिया की सैर की जा सकती है . सैर से न दर्ज हुयी कहानियां हलचल पैदा करती है . निकलने को बाहर आतुर होती हैं . न जाने उन कहानियों से किनका भला होगा ? फिर भी लिखना जरुरी है क्यों की लिखने से मन शांत होता है . 

मैं जब लिखने को पहचानने की कोशिश करता हूँ . तो मुझे अधिकतर लोग लिखते  हुए दिखाई देते हैं . थाने का मुंशी तहरीर लिख रहा होता है . डॉक्टर पर्चे लिख रहा होता है . मां हिसाब लिख रही होती है . साहित्य लिखने वाले कवितायेँ लिख रहे हैं , कहानियां लिख रहे होते हैं . पन्ने दर पन्ने लिखा जा रहा है . पन्नों की चिंता किसे है ! पन्ना ख़त्म होते ही दूसरा पन्ना इस्तेमाल आता है . उसके ठीक पहले का पन्ना उम्र काट रहा होता है . फिर भी लिखना जरुरी है . क्यों की लिखने से मन के पन्ने खाली होते हैं . खाली मन पर कोई सुखद याद लिखी जा सकती है . 

मैं अपने आस पास हर शख्स से लिखने की आदत में विस्तार की सलाह देता हूँ .   

सिगरेट !

सड़क किनारे सड़क किनारे माचिस के खोखो पर सिगरेट फूँकती आकण्ठ तनाव की नज़र कौन सी फ़िल्म देखती होगी ? न जी गयी कई कहानियाँ फेफड़ों से धुआ...