ये बैटरियों ने आज कल नाक में दम कर के रखा हुआ है . पिछले कुछ सालों से ऐसा लगता है जैसे बतेरियाँ ही बदलवा रहा हूँ .
कभी धंधे की , कभी घर की , कभी गाँव घर की . तो कभी कार की , कभी स्कूटी की , तो कभी बाइक की .
समझ में ही नहीं आता इन बैटरियों ने कब जीवन में इतनी निर्भरता भर दी है . पैसे खर्च करो . फिर पानी चेक करो . फिर इनवर्टर और बैटरी का मधुर सम्बन्ध बना रहे . यह भी ध्यान में रखना पड़ता है . किसी एक की नहीं बनी तो दुसरे को ले डूबेगी .
बचपन में बैटरी तो केवल टोर्च में होती थी और रेडियो में . यहाँ तक हमारे गाँव में टोर्च का नाम ही बैटरी पड़ गया था . टोर्च खोजते तो बैटरी बोलते . रेडियो के सेल या बैटरी .
फिर आया ज़माना घडी का सेल , टी वि रिमोट का सेल , फिर बाद में एयर कंडीशन के रिमोट का सेल .
अब इस नए जमाने ने सब कुछ बैटरी पर निर्भर करवा दिया . मानों लाईट का वैकल्पिक श्रोत यही बचा है . वह भी किसी न किसी ऊर्जा पर निर्धारित . मतलब ऊर्जा का श्रोत बनाए रखने के लिए आप को फुल ड्यूटी लगेगी .
इनवर्टर बैटरी , सोलर बैटरी , लिथियम बैटरी , तेज़ाब बैटरी !
साल में 12 इनवर्टर बैटरी 2 सोलर बड़े बैटरी , 2 कार की बैटरी , एक स्कूटी की और एक बाइक की बैटरी का ख्याल रखना पड़ता है . उफ्फ्फ बैटरी !
हमेशा अंदेशा सा लगा रहता है . कि कब बैट्री बोल जाए . बतेरियां लेते समय 3 साल की गारंटी , 5 साल की गारंटी और दो साल की गारंटी .
कभी कभी मन करता है सभी बैट्री को एक साथ बदलवाने भेज दूँ . सभी की तारीख एक समय . लेकिन डर लगता है इनकी तारेखीं निश्चित नहीं होती .
बस बतेरी का पानी सुलभ रखो . और जब कभी गड़बड़ करे . तो रास्ते हैं . एक बैटरी को खोल के जुम्मन मियाँ के यहाँ ले जाओ . और उसे चार्गिंग पर लगवाओ कम से कम आठ घंटे . बैटरी उठी तो ठीक , वरना डेड . दुसरा सबसे सहज और खर्चीला . फोन करो , कंप्लेंट करो . और इंतज़ार करो . उनकी कृपा होगी तो घर बैठे वरना बैटरी सर्विस सेंटर दौड़ो .
इन बैटरियों में तेज़ाब दौड़ता है . अत्यंत जलनशील पदार्थ . सफ़ेद को पीला कर दे और कपडे लट्टे , लोहा और चमड़ी को जला दे .
जहां रख दो वहाँ की फर्श , दीवाल खाने लगती है .
बहुत बार सोचता हूँ . क्या सच में जो बड़े अमीर लोग होते होंगे . वो अपनी बतेरी का ख्याल रख पाते होंगे ? वो देखभाल करते होंगे या उनके नौकर !
पता नहीं बैटरी इतनी भारी क्यों होती है . गाँवों में मैंने देखा है बरसात में , सर्दियों में , गर्मियिओं में ग्रामीणों को बतेरियाँ अपने दुपहिया वाहन पर ढोते हुए .
ऐसा लगता है बहुत बड़ा कारोबार है बैटरी .
सरकार की इतनी बड़ी बड़ी इमारतें , बड़े बड़े प्रोजेक्ट्स , अधिकारियों , मान्न्नियों के घरों की बैटरियां कैसी होती होंगी ?
इतना तेज़ाब आता कहाँ से होगा ?
ये वो वाला तेज़ाब नहीं होता , जो हम टॉयलेट क्लीनर के नाम से लेते हैं . मुझे याद है शहर की एक गली , जहां तेज़ाब मिलता था . पक्का वाला तेज़ाब . पर इधर कुछ सालों से खुले आम बिकना बंद हो गया है .
मेरे यहाँ एक टॉयलेट साफ़ करने वाली महिला आती थी . जिनका नाम था कांति !
वो बहुत तेज तर्रार महिला थी . एक दम तूफ़ान के साथ आती , काम करती और गायब हो जाती . जब वो जाती थी तब बाथरूम एक दम चमाचम . कई घनते मछार और मक्खी बाथरूम में आते नहीं थे . क्यों की वो तेज़ाब से बाथरूम साफ़ करती थी . हार्पिक , साबुन के विकल्प के बाद भी वो तेज़ाब इस्तेमाल ज्कारती थी .
हमेशा उनको देख कर लगता था की वो शराब का सेवन करती होंगी उनके कठिन काम को शायद शराब की जरुरत हो .... .
एक बार मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि वो शराब नहीं पीती. उनके चेहरे पर तेज़ाब का भभका स्किन को जला देता है .
अभी कुछ दिन से वो कैंसर से जूझ रही हैं . उन्ही के स्थान पर नयी सफैकर्मी अब हार्पिक का इस्तेमाल कर रही हैं .
कांति तेज़ाब से खेलती थी . ऐसे ही बैटरी बनाने वाले , सुधारने वाले , पुरानी बैटरी का लें दें करने वालों की क्या दशा होगी . राम ही जाने !
मुझे तो अपनी ही चिंता खायी जाती है .
इस सावन तो गजब ही हो गया . एक साथ घर की , दो कार की , दो दुपहिया की बैट्री मात्र 15 दिन के अंदर अचानक से डेड हो गयी . एक पांच साल पहले , एक 3 साल पहले और एक 2 साल से कुछ कम पहले खरीदी गयी थी . उनमें खरीदने की तारीखें नहीं थी . मैन्युफैक्चरिंग से पता चलता है .
एक अचानक खुश दिन आप के चक्कों की बतेरियाँ डेड हो गयी . जिस गाड़ी को स्टार्ट कर रहे हो , वो हो नहीं रही . असंभव !
बारी बारी बैटरी , कार मैकेनिक को रिक्शा से कभी तो कभी बन चुकी बतेरी वाले वाहन पर ढोते रहते .
मैंने कई बतेरी वालों से बात की . उन्होंने कहा की आजकल बहुत ज्यादा कंप्लेंट आ रही हैं .
ये बत्तेरियां भी काफी नाच नाचती हैं . पता नहीं इनपर नाचने के लिए मैं तैयार था .

