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मंगलवार, 4 अगस्त 2026

बुद्ध की नमी !



कितनी शांत है यहाँ 

बुद्ध की शरण में 

लताएँ ! 

बेझिझक लिपटने की 

आज़ादी के आनंद 

में सराबोर 

पैरों से होते हुए 

नाभि , वक्ष स्थल 

फिर गले पड़ते  , 

दुशाला बन जाती हैं  


उम्हे बढना है 

बुद्ध को ध्यान में बैठे रहना है 


मानसून की नमी 

में कुछ तो ख़ास है 

लताएँ बेधड़क बढती हैं 

तेज़ी से सभी वनस्पतियों से आगे 

चढ़ जाना चाहती हैं 

कहीं भी , कितनी भी ऊँचाई में 


जीवन के निर्जन समय में 

अपने तत्व को सुरक्षित रखना 

बारिश के पहले बोसे से 

फूट पढ़ना 

उन्हें कितना अच्छा आता है 


भरोसा ऐसा ही तो होता है 

शांत , ध्यान में बैठना 


सावन के हरे और 

बुद्ध के ध्यान की गहराइयों 

में डूब के लताएँ 

खिल उठती हैं 


वर्षों से बुत बने बुद्ध 

अब संसार से अलोप हो रहे हैं 


होटलों , स्पा सेण्टर  , ओयो में 

या कहीं अपने  काल के 

अवशेषों स्तूपों में 

विराजमान हैं 


बुद्ध की नमी 

अपना सावन तालश रही है .....


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