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मंगलवार, 28 जुलाई 2026

"चला घुमा दे ऐ गोरी जीला कुशीनगर में"

#लोकरंग #traindiary

खेतों की सोंधी मिट्टी से उपजे शमशुद्दीन की रस भरी आवाज़ में सुनिये

"चला घुमा दे ऐ गोरी जीला कुशीनगर में"

शमशुद्दीन कुशीनगर के खड्डा मील के निवासी हैं। वह 30 साल के हैं। यूँ तो वह मात्र कक्षा 8 तक ही पढ़ पाए। पर जीवन में माता पिता के प्रेम, आदर्श जीवन, लोगों से सौहार्द और मोहब्बत का सलीका उन्होंने सरल ग्रामीण जीवनशैली से सीखा। ट्रेन की छोटी सी यात्रा के दौरान उनकी एक टिप्पड़ी "पुराने गानों में रस होता है" ने उनके संगीत प्रेम को हमारे सामने ज़ाहिर कर दिया। वो अपने गाने खुद ही लिखते हैं और उनको संगीत और आवाज़ भी खुद ही देते हैं। अपनी आवाज़ के साथ अपने हांथों का इस्तेमाल ताल देने में करते हैं। वो कभी अपने पैरों को तो कभी अक्सर जनरल बोगी में दिखने वाले छोटे प्लास्टिक के ड्रम को तबले की तरह इस्तेमाल करते हैं। वो याद करके बताते हैं, कि एक बार उन्होंने भोजपुरी गायन की दुनिया में काफी नाम कमा चुके गुड्डू रंगीला को एक गाना दिया था। जिससे उनको 35000 की आमदनी हुई थी। वो अपने गांव में खेती करते हैं और गायन लेखन से थोड़ा बहुत कमा पाते हैं। एक कलाकार की कला को दिल से सुना जाना, सहेजा जाना ही उसकी कला का असल सम्मान है। वही हमने भी किया। लीजिये सुनिये शमशुद्दीन को।

* शमशुद्दीन जैसे तमाम कलाकार अपनी कला में अश्लीलता, फुहड़पन के रंगीन चटखारे नही भरते। वो अपनी कला को जीते हैं, और सृजन में खोए रहते हैं।
* यदि आपको पसंद आये शमशुद्दीन का फन तो उन्हें खुद ही संपर्क कर सकते हैं - 89-68-308720

इस गाने में उनका साथ दे रहे हैं, Ashfaq Khan जो कि अपने हांथों को साज़ बना लेते हैं।

सिगरेट !

सड़क किनारे

सड़क किनारे माचिस के खोखो पर
सिगरेट फूँकती आकण्ठ
तनाव की नज़र
कौन सी फ़िल्म देखती होगी ?

न जी गयी कई कहानियाँ
फेफड़ों से धुआँ उगलती

मुँह
साधारण से दिखने
हर कश में बदल जाती होंगी
जितनी गहरी कश

उतनी गहरी ख़्याल की बुनावट

मंत्री की सुरक्षा काफिले का
पहला व्यक्ति बेस्ट ट्रैफिक मैनेजमेंट का
अवार्ड नही लिए होता।

मैं जब वहां होता हूं ।

मैं जब वहां होता हूं । यहां नहीं होता। मैं जब यहां होता हूं , वहां  नहीं होता हूं। सच ! मैं न वहां रहता हूं , ना यहां रहता हूं। मैं ! असल में मैं  हूं ही नहीं । मैंने छोड़ा था बहुत पहले खुद को ठीक उसी जगह। जहां पर मैं था। मैं वहां से घूम घूम के आता रहता हूं , लगभग हर मौसम में। पर "मैं ", मुझे महसूस क्यों नहीं होता । ये "मैं" पहले मैं और तुम हुआ । फिर हम हुआ। फिर हमारे ।
       भागते भागते "हमारे " थकने लगा। हमारे का बोझ बढ़ता रहा। हमारे लोग। हमारी जमीन। हमारा पैसा। हमारा दर्द। हमारे की पीठ पर सवार "मैं " डरने लगा। मैं हूं कौन यार ? डर....?
       भक्क ! मैं बीज हूं। उगा ... बढ़ा... पेड़ हुआ... फिर पंछी हो गया। उड़ गया ! उड़ के जा बैठा दूसरे पेड़ पर। मैं उड़ने में पारंगत तेज़ उड़ने लगा। 

चौकीदार

 आज मैंने फिर एक चौकीदार रखा । इससे पहले भी रखा था। पर वो न जाने क्यों चला गया। उसे जाना था , इस लिए वो चला ही गया। उसने ज्यादा दिन काम नहीं किया था। बुज़ुर्ग सा था। कहीं ऊंची जगह से चोरी , कामचोरी के आरोप में भगा दिया गया था। उसके तुरंत बाद वो मेरे पास आया । मैंने उसे रख लिया।  किस्सागोई उसपर खूब जचती थी। लंबी चौड़ी हांकना।  उसकी सीटी की लम्बी आवाज़ उसकी बीड़ी से बड़ी होती  और वह लाठी जमीन पर ऊंची आवाज़ में बजाता । 

    अजीब सी कहानी थी उसकी। अधेड़ उम्र से बुढ़ापे के बीच में शादी। और फिर एक बच्चा अपना। दो उसकी  पत्नी के  पहले से थे। उसकी पत्नी झारखंड के किसी आदिवासी इलाके से थी। कभी किसी जगह शराब के ठेके पर सेल्समैन थी। मैं चौकीदार को मेरे यहां चौकीदारी करने से  पहले से जानता था। उसकी बातों में कई बार आया। कई बार लगा कि उससे कह दूं कि जाओ भाई। तुम्हारे हिस्से का संघर्ष झेलना फिलहाल मेरे बस की बात नहीं। नहीं कह पाया कुछ भी उससे। उसकी पत्नी मुझे अक्सर फोन कर के कहती कि उनका ख्याल रखना। उसके बदले में वो मुझे झारखंड की कोई पारंपरिक मिठाई खिलाने की बात कहती। फिर फोन रखते वक़्त कह ही देती। " भाई जी , बच्चे हैं, खाना बनाना पड़ता है और जानवर देखने पड़ते हैं। इसलिए वहां आना संभव नहीं " और ये तो बिल्कुल बेकार आदमी है। बस इसका ख्याल रखना। जितना कमावत है सब बहाए देत है। पर हम से प्यार बहुत करता है। जहां वो पहले काम करता था वहां उसके साथ काम करने वाले कम उम्र के लड़के उसकी पत्नी को फोन कर के परेशान किया करते थे। खैर उसको जाना था । वो चला गया। 

 वो कुल जमा 7 रातों में 3 ही दिन जाग पाया। बाकी 3 दिन सोया । एक छुट्टी भी । उसके बावजूद 500 रुपए मांगने की हिम्मत उसने की । उसने बताया कि उसकी पत्नी की तबियत खराब है।  जब वो छुट्टी से लौट कर आया। उसने बताया कि जन्माष्टमी में उसने झांकी सजाई थी। रात भर जागरण हुआ। पूरे गांव को प्रसाद बटा। उसने वो सारे पैसे उसमें खर्च हो गए। वो उसका आखरी दिन था ।


  साल पहले जब मैं यहां आया था। मुझे बताया जाता कि यहां बहुत चोरियां होती है। चोरियां का कारण जानने में किसी को दिलचस्पी नहीं रहती। पर मुझे थी . क्यों कि चोरियां वहां होती हैं जहाँ कोई रहता नहीं है या रहते हुए भी लोग निष्क्रिय रहते हैं . 

मैं आश्चर्य से सोचता। "कस्बे के मुहाने पर एक ऐसी जगह जहां दस बीस घर फौजियों के। क्षेत्रीय विधायक के कार्यालय की गश्त सुना है बड़ी तगड़ी होती है। फिर भी इतनी शातिर चोरियां। कभी कभी दबंगई के साथ चोरियां। " 

        मेरे घरवाले मुझसे पूछते हैं कि मैं जागता क्यूं हूं। जागे न तो चोरी हो जाएगी । मुझे आज तक कोई आदमी चोरी होते नहीं दिखा। और न ही आस पास के लोग उठते दिखे . 

ये नया चौकीदार , चौकीदार नहीं लगता है .  



ये दुनिया !

कभी छोड़ देते ये बच्चों की दुनिया 

कभी पूछ लेते मांओं की दुनिया

कभी हम जमीन पर आकर तो देखें

हजारों पिटारों में सहती यह दुनिया

मेरा काम है मैं लड़ूंगा यूं हीं

सितारे जमीन पर ना आते कभी... 

मेरा साथ दोगे तो पहलू में दुनिया


पुकारो तो मुंह फेर लेती ये दुनिया

न कहती न बुनती न सुनती ये दुनिया

अजीब ओ गरीब अह्मकाना ये दुनिया

ये दुनिया नहीं आशियाना है दुनिया ! 




लिखना जरुरी है !

 लिखना जरुरी है . क्यों की लिखे को मिटाया जा सकता है . लिखने के पहले , लिखने वाली बात पर सतर्कता से ध्यान लगाया जाता है . ध्यान लगाने से भीतर की दुनिया की सैर की जा सकती है . सैर से न दर्ज हुयी कहानियां हलचल पैदा करती है . निकलने को बाहर आतुर होती हैं . न जाने उन कहानियों से किनका भला होगा ? फिर भी लिखना जरुरी है क्यों की लिखने से मन शांत होता है . 

मैं जब लिखने को पहचानने की कोशिश करता हूँ . तो मुझे अधिकतर लोग लिखते  हुए दिखाई देते हैं . थाने का मुंशी तहरीर लिख रहा होता है . डॉक्टर पर्चे लिख रहा होता है . मां हिसाब लिख रही होती है . साहित्य लिखने वाले कवितायेँ लिख रहे हैं , कहानियां लिख रहे होते हैं . पन्ने दर पन्ने लिखा जा रहा है . पन्नों की चिंता किसे है ! पन्ना ख़त्म होते ही दूसरा पन्ना इस्तेमाल आता है . उसके ठीक पहले का पन्ना उम्र काट रहा होता है . फिर भी लिखना जरुरी है . क्यों की लिखने से मन के पन्ने खाली होते हैं . खाली मन पर कोई सुखद याद लिखी जा सकती है . 

मैं अपने आस पास हर शख्स से लिखने की आदत में विस्तार की सलाह देता हूँ .   

मैं रह गया !

 

मैं कहने की चाह में 

कहता कहता रह गया 

चाहत, चिता, चित्त 

ढोते ढोते रह गया  


रात जागी दिन जगाया 

सोता सोता रह गया 

बे - बात , बित्ता बात 

सुनते सुनते रो गया !


औरतें !

 तीन माएं खो चुका हूँ . मेरी अम्मा , बड़ी अम्मा , मेरी दूसरी माँ . तीनों के घर बेतरतीब चल  रहे हैं . सब परेशान हैं . उस बात से जिस बात को कभी भी तरजीह नहीं दी गयी . औरत ! 

हां औरत ! 

या यूँ कहें औरतें .... ! 

अम्मा बहुत दयालु थी . वो इसी को भूखा नहीं सोने देती थी . घर के बच्चे , दादा जी , पापा को , काम को आये लेबरों को , किसानों को खाना जरुर देती थी . वो अन्नपूर्णा थी . घर का लें दें सब उन्ही के हांथों . वो जब बैठीहोती थी . तब वो एक राजा की रानी की तरह बैठती थी . 


बड़ी अम्मा ! एक दम शहद सी . उनकी भाषा , सा को श कहना और हमेशा शिष्टाचार के नितांत हिलोरें पैदा करना . मास्टरनी ! अकेले जीप से विद्यालय के कार्यों से दौड़ती , भागती अपने बच्चों को एक आदमी से बचाती रहती थी . सरकारी नौकरी का पूरा का पूरा मान रखना . अम्मा की भाषा बोली स्वयं में एक शिक्षक थी . 


मेरी माँ के बाद दूसरी माँ ....

क्या गजब का स्टैमिना था उनमें . सुबह से लेकर शाम तक काम काम और काम .... ! उसकी जुबान पर हमेशा दुवाएं रहती थी . हाय मोरा बेटा , हाय मोरी बिटिया .... मा को कई साड़ी भाषाएँ  आती थी . पंजाबी , मराठी , गुजराती . हिंदी , अंग्रेजी सीख रही थी वो .  दुनिया भर की ख़ुशी का भार जैसे उनके ही कन्धों पर था . 


तीनों माओं के जाने के बाद सब के घर तितर बितर हुए पड़े हैं . 

माओं के जाने का सिलसिला ऐसा चला . दो अस्पतालों की नाकामी में चली गयी . एक अपने आप ही छोड़ गयी एक भरा पूरा परिवार . दूरी की डोरी बहुत मजबूत नहीं होती . 

अम्मा ने आखरी के कुछ महीनों में वो दर्द देखा है . जिसे देख के तीमारदार घबरा जाए . मैं भी बना था चौबीस घंटे के इए तीमारदार . अम्मा के यहाँ से नली , वहां से नली , पूरा शरीर फूला हुआ . आँखें भिछी हुयी . अम्मा अम्मा कहने पर दीप्तमान होकर फिर बुत जाती . डॉक्टर कहते और चौबीस घंटे , और चौबीस घंटे ... ! कभी साँसे चला दिखाते तो कभी आँखें ! लाखों रुपये का मीटर चल रहा . एक महीने वेंतिलाटर पर . हमारी आधुनिक क्रान्ति के  उपकरणों ने एक महीने माँ को ज़िंदा रखा . 


बड़ी अम्मा के डायपर घर के पिछवाड़े पेड़ों में टंगा जब जब मैंने देखा . मुझे हैरानी होती रही . हमारी कॉलोनी के सामने एक बड़े से तालाब में मैंने कई एडल्ट डायपर कुत्तों को नोचते देखा है . वो दोनों दृश्य वीभत्स दृश्य हैं . कैसे कोई माँ बाप अपने माँ को इस तरह  से समाज में प्रतिष्ठित कर सकता है ? 




या मैं पागल हो जाऊं .... !

आज फिर सुबह हुयी बीती रात के बाद . आज फिर सूरज निकला अँधेरी रात के बाद . घड़ी अपनी गति से आगे बढ़ रही है . घडी के साथ साथ सुबह बीत रही है . कुछ देर बाद दोपहर होने को है . और फिर शाम . फिर रात . ऐसा लगता है सोने और जागने के बीच जिन्दगी बीत रही है . यूँ ही बीतते रहने के साथ रहते हुए अब  ऊब सी हो चली है . इस ऊब से निपटने के लिए कभी टी वी का सहारा लेता हूँ , कभी रेडियो का . 
   वैसे मोबाइल तो हमेशा साथ रहता है , धड़कन की तरह . हाँ , मोबाइल अब हमारी जिन्दगी की धड़कन है . मोबाइल न हो तो ऐसा लगता है जैसे किसी ने साँसें छीन ली हों . इसलिए वह हमेशा साथ रहता है . सुख , दुःख , उत्सव हर समय कभी ऊपर वाली बायीं जेब में  तो कभी हाँथ में तो कभी पेंट के जेब में .
    बड़ा सा घर है . घर में सब हैं . जो एक घर में होते हैं . सारी सुविधायें हैं जो एक घर में होनी चाहिए भी सुलभ हैं  . एक काम करने की जगह है . जहां एक दर्जन लोग काम करते हैं . हम सभी के घरवालों को मिला कर करीब आधा सैकड़ा लोग तो उस काम की जगह के होने से चल रहे हैं . 
   यह सब होता चला आ रहा है एक दशक से ऊपर के समय से . इस चलने को क्या जिन्दगी कहा जा सकता है ! कहते तो सुनता अपने इर्द गिर्द अभी लोगों कि हाँ यही जिन्दगी है . अगर यही जिन्दगी है . तो यह भरती क्यूँ नहीं है भीतर को . हमेशा खाली खाली सा महसूस हुआ करता है . इतने संसाधन , इतने लोगों से घिरे  होने के बाद भी यह खालीपन अजीब सा महसूस कराता रहता है . लम्बे समय से इस अजीब से महसूसने से छुटकारा पाने के लिए क्या विकल्प हो सकते हैं ? 

बिक गयीं संवेदनाएं ....

 बिक गयीं संवेदनाएं ....


बिक गयीं संवेदनाएं 

थक गया है जोश रे 

क्या करें हम फिर से आके 

ये बताओ होश में 

क्या करें हम फिर से आके 

ये बताओ होश में ....



"चला घुमा दे ऐ गोरी जीला कुशीनगर में"

#लोकरंग #traindiary खेतों की सोंधी मिट्टी से उपजे शमशुद्दीन की रस भरी आवाज़ में सुनिये "चला घुमा दे ऐ गोरी जीला कुशीनगर में" ...