वैसे मोबाइल तो हमेशा साथ रहता है , धड़कन की तरह . हाँ , मोबाइल अब हमारी जिन्दगी की धड़कन है . मोबाइल न हो तो ऐसा लगता है जैसे किसी ने साँसें छीन ली हों . इसलिए वह हमेशा साथ रहता है . सुख , दुःख , उत्सव हर समय कभी ऊपर वाली बायीं जेब में तो कभी हाँथ में तो कभी पेंट के जेब में .
बड़ा सा घर है . घर में सब हैं . जो एक घर में होते हैं . सारी सुविधायें हैं जो एक घर में होनी चाहिए भी सुलभ हैं . एक काम करने की जगह है . जहां एक दर्जन लोग काम करते हैं . हम सभी के घरवालों को मिला कर करीब आधा सैकड़ा लोग तो उस काम की जगह के होने से चल रहे हैं .
यह सब होता चला आ रहा है एक दशक से ऊपर के समय से . इस चलने को क्या जिन्दगी कहा जा सकता है ! कहते तो सुनता अपने इर्द गिर्द अभी लोगों कि हाँ यही जिन्दगी है . अगर यही जिन्दगी है . तो यह भरती क्यूँ नहीं है भीतर को . हमेशा खाली खाली सा महसूस हुआ करता है . इतने संसाधन , इतने लोगों से घिरे होने के बाद भी यह खालीपन अजीब सा महसूस कराता रहता है . लम्बे समय से इस अजीब से महसूसने से छुटकारा पाने के लिए क्या विकल्प हो सकते हैं ?
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