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मंगलवार, 28 जुलाई 2026

या मैं पागल हो जाऊं .... !

आज फिर सुबह हुयी बीती रात के बाद . आज फिर सूरज निकला अँधेरी रात के बाद . घड़ी अपनी गति से आगे बढ़ रही है . घडी के साथ साथ सुबह बीत रही है . कुछ देर बाद दोपहर होने को है . और फिर शाम . फिर रात . ऐसा लगता है सोने और जागने के बीच जिन्दगी बीत रही है . यूँ ही बीतते रहने के साथ रहते हुए अब  ऊब सी हो चली है . इस ऊब से निपटने के लिए कभी टी वी का सहारा लेता हूँ , कभी रेडियो का . 
   वैसे मोबाइल तो हमेशा साथ रहता है , धड़कन की तरह . हाँ , मोबाइल अब हमारी जिन्दगी की धड़कन है . मोबाइल न हो तो ऐसा लगता है जैसे किसी ने साँसें छीन ली हों . इसलिए वह हमेशा साथ रहता है . सुख , दुःख , उत्सव हर समय कभी ऊपर वाली बायीं जेब में  तो कभी हाँथ में तो कभी पेंट के जेब में .
    बड़ा सा घर है . घर में सब हैं . जो एक घर में होते हैं . सारी सुविधायें हैं जो एक घर में होनी चाहिए भी सुलभ हैं  . एक काम करने की जगह है . जहां एक दर्जन लोग काम करते हैं . हम सभी के घरवालों को मिला कर करीब आधा सैकड़ा लोग तो उस काम की जगह के होने से चल रहे हैं . 
   यह सब होता चला आ रहा है एक दशक से ऊपर के समय से . इस चलने को क्या जिन्दगी कहा जा सकता है ! कहते तो सुनता अपने इर्द गिर्द अभी लोगों कि हाँ यही जिन्दगी है . अगर यही जिन्दगी है . तो यह भरती क्यूँ नहीं है भीतर को . हमेशा खाली खाली सा महसूस हुआ करता है . इतने संसाधन , इतने लोगों से घिरे  होने के बाद भी यह खालीपन अजीब सा महसूस कराता रहता है . लम्बे समय से इस अजीब से महसूसने से छुटकारा पाने के लिए क्या विकल्प हो सकते हैं ? 

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