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मंगलवार, 28 अक्टूबर 2025
प्रिय पहाड़ , शायद तुम्हे छोड़ने आऊँ !
गुरुवार, 9 जनवरी 2025
जाती हुई मां ...
प्रिय मां ,
मां तीसरा दिन है आज तुम्हे गए हुए । तीन दिन से तुम्हारी आत्मा को शांति देने के लिए न जाने कितने प्रयत्न कर लिए हमने । पर तुम्हारी याद अचानक से सहमा देती है । तुम्हारे बच्चों के आंखों में आंसू कभी भी छलक जाते हैं । फफक फफक कर पापा रो पड़ते हैं ।
तुम्हारी , घर के रोम रोम में हलचल रहती है । एक तुम्ही तो नहीं हो घर में । दीदी हैं , भईया हैं , पापा हैं और जीजा जी , चाचा जी ताऊ जी । सब तो हैं । जैसे सब मिले थे कुछ साल पहले बिटिया की शादी में। तुम नहीं हो बस । बाकी सब हैं न । ऊंची इमारत में तुम्हारा घर । कितनी लंबी चढ़ाई को दर्शाता है । तुम्हारे न रहने के बाद तुम्हे पता है मां ! कितने लोग तुम्हे देखने आए ? तुम्हारी बातें कर कर के रोते हैं ।
ऊंची इमारत में तुम्हारे छोटे से घर की साफ सफाई , रख रखाई देखते ही बनती है । तुम जहां जहां रह कर आईं । तुमने अपनी साफ सफाई से सबको चौंकाया है । पूजा पाठ , शादी विवाह , कर्म कांड , लेन देन व्यवहार । सब तुम्हारा चौकस । तुम किसी का उधार नहीं रखती । तुम्हारी रोजमर्रा की चिंता में तुम्हारे बच्चों की तरक्की की दुवाएं होती थी । तुम्हारा क्रिकेट प्रेम , तुम्हारा देश विदेश की खबरों पर नजर और उनके प्रति चिंताएं। तुम्हारी सोसायटी के लोगों के दुख सुख में शरीक होना या फिर मेहमानों और मान्यों की खातिरदारी में कोई कोर कसर ।
तुम्हारे सफेद चेहरे पर चटख रंग तुम्हारे सौंदर्य को और निखारते थे । मातृत्व के वात्सल्य में तुम्हारी आंखों से छलक आते आंसू हम सब पर भारी पड़ती है ।
तुम सदैव घर की रीढ़ की हड्डी रही। दीदी की शादी , भईया की शादी , दीदी के बच्चे , भैय्या के बच्चे और फिर मेरी भी । तुम्हारी झोली में कुछ बचे न बचे । जरूरत से पहले दे देती । हमारे सभी फैसलों पर सही गलत की मोहर लगाने से पहले तुमने हमारे करियर के बारे में सोचा । पुरुष प्रधान समाज में महिलाएं आसानी से , कहां कुछ बड़ा सोच सकती हैं भला ।
ये तुम्हारी जीवटता ही है । जो हम सबको संबल देती है । तुम्हारे किस्से आज पूरे घर में बिखरे पड़े हैं । बस तुम नहीं हो ! हो सकता था तुम्हे इतनी तारीफ बर्दाश्त नहीं होती । बाद बिटिया , भईया , दीदी , भाई साहब तुम्हारे जीवन में कोई और संबोधन नहीं सुना तुम्हारे मुंह से ।
बहुत पहले से शायद तुम्हारे दिल और दिमाग में कभी यह बात नहीं रही होगी । कि तुम्हारे बच्चे ऊंचाइयों को छुएंगे । या तुम्हारी इच्छाशक्ति रही होगी । उन्हें उस काबिल बनाना । तुम्हारी देह के न रहने की खबर देने में सबको खासा तकलीफ हो रही थी ।
पर खबर कहां रुकती है । जैसे तुम नहीं रुकती थी कभी , न थकती थीं । सुदूर देश से तुम्हारी लाडली खबर पाते ही दौड़ पड़ी वापस । तुम्हारा बेटा जंगलों से लौट आया बीच रास्ते से । तुम्हारी बेटी पहाड़ों को छोड़ चली आई तुम्हारे पास ।
24 घंटों में तुम्हारे चाहने वाले तुम्हारे अंतिम दर्शन को व्याकुल हो उठे । सभी बाधाओं को धता बता के तुम्हारे पास सब आ बैठे । पर तुम अपने शरीर को छोड़ उड़ चली जहां तुम वर्षों से जाना चाहती थीं ।
आज चौथा दिन है तुम्हे गए हुए । तुम्हारे कर्म कांड की प्रक्रिया लगातार चल रही है । अंत्येष्टि क्रिया , अस्थि विसर्जन , शुद्धिकरण , हवन - ब्रह्म भोज , पिंड दान सब हो चुके हैं । आज चौथे दिन घर के चूल्हे में हल्दी पड़ी है । कल भी हवन , सामूहिक भोजन होगा । संभतः परसों से सब अपने अपने घरौंदों को वापस जाने लगेंगे । इस बार तुम सबसे ज्यादा जाओगी सबके साथ ।
तुम्हारी याद और तुम्हारी मीठी वाणी हम सबको उदास करती रहेगी ।
मैने तुम्हारे साथ कम , मगर क्वालिटी टाइम गुजारा है । मुझे तुम्हारे रहते तुम से केवल एक ही शिकायत थी । तुम्हारा धर्म और आस्था में डूबे रहना । शायद यही बात तुम्हारे जीवन के एकांत को तृप्त करती थी । उस ब्राह्मण की हर बात का अक्षरशः पालन करती थी। जो तुम्हे हर संभावनाओं के पहले कोई न कोई धार्मिक अनुष्ठान करने को प्रेरित करता था।
तुम्हे पता है ? जब से तुम गई हो ! मैं चाहता हूं तुम्हारी हंसते हुए चेहरे को जिऊं। वो सब काम कर के जिनसे तुम प्रसन्न हुआ करती थीं। मगर ऐसा संभव कहां । तुम्हारे पथ प्रदर्शक ब्राह्मण की एक एक बात का अक्षरशः पालन हम सभी कर रहे हैं । चार दिन से घर के मंदिर के कपाट बंद हैं । जहां तुम सुबह शाम घंटों गुजार दिया करती थीं। बालकनी में रखे तुलसी , केले के पौधे में जल नहीं दिया गया । तुम्हारी खींची हुई तस्वीर के प्रिंट को मैं चार दिन से देखना चाहता हूं । पर वो अखबार में लिपटी हुई कल का इंतजार कर रही है ।
कल होगा । तुम्हारी तस्वीर रखी जाएगी किसी कुर्सी या मेज पर । फूल माला की न्योछावर होगी । अफसोस , दुख , संताप प्रकट होगा । भोज होगा । हवन होगा । हम सब में , जिसने जिसने तुम्हारे मृत शरीर को छुआ था या देखा था । वो सब पूर्ण रूप से शुद्ध हो जाएंगे । घर फिर से शुद्ध हो जाएगा । और मंदिर के कपाट खुल जाएंगे । और तुम ?
तुम्हारा ...
शनिवार, 27 जुलाई 2024
प्रिय पहाड़ ,
प्रिय पहाड़ ,
कैसे हो ? मैं यहां ठीक से हूं । आशा है तुम भी वहां लाख आपदाएं सहकर ठीक से होगे ! मैं जब तुम्हारे खूबसूरती पर कसीदें पढ़ने वाले लोगों की आंखों में भय देखता हूं । तो सोच में पड़ जाता हूं । तुम्हारी खबरें मुझे यहां मैदान में ही मिलती रहती है । अब सूचना और प्रसारण के युग में पहाड़ और नदियों के हाल न मिले । तो आश्चर्य तो होगा ही ।
तुम्हारे नदियों के ऊपर गिरने की सबसे ज्यादा खबरें होती हैं । तुम्हारे गिरने को लैंडस्लाइड कहते हैं शायद । टीवी पर , अखबारों में , सोशल मीडिया पर तुम्हारी तबाही की तस्वीरें खूब मार्मिक ढंग से बतलाई जाती हैं । तुम्हारे सर से , कांधों से उतर कर लाखों लोग मैदान पर रह रहे हैं । वो सब ऐसी ही बाते बताते हैं ।
कभी धरती के दो टुकड़ों के टकराने से बने पहाड़ों की छाती पर हम इंसान चढ़ गए हैं । कुदाल , फावड़ा तसला और अर्थ मूवर मशीन लेकर हम तुम्हारे कांधों पर सवार हो गए हैं । तुम्हारे आकार प्रकार के सामने हम इंसान चिटियों की तरह तुम्हारे श्रृंखलाओं पर दिन रात चलते रहते हैं । हमारे देव स्थान तुम्हारी चोटियों पर हैं । तुम्हारी चोटियों पर शायद इसलिए हों । कि हमें तुम्हारी खबर रहे ।
मूरख हैं हम सब । पहाड़ ! यार तुम समझते क्यों नहीं हो । तुम्हारे भीतर कितना धैर्य है ? तुम्हारी तथस्तता , तुम्हारा अटल खड़े रहना हमको अच्छा नहीं लगता है । हम चाहते हैं कि इस पृथ्वी की हर वस्तु हमारे काम आ जाए । हमारे लॉन में आकर सज जाए । जब नही सजती तो फिर प्रयोग करते हैं । तुम्हे पा लेने के । मुझे दया आती है । उन पर्वतारोहियों पर । इतनी कड़ी मेहनत कर के तुम्हारे शिखर को छू कर आने का हौंसला पहाड़ इतना बड़ा हो सकता है ।
लेकिन आस्था के नाम पर गांव शहर बसते । पहाड़ों पर बढ़ती आबादी , बढ़ते कंक्रीट के ढांचे तुम्हे नुकसान पहुंचा रहे हैं । मल, मूत्र प्लास्टिक कचड़ा , इलेक्ट्रॉनिक्स सब तुम्हारे जीवन धारा को अवरूद्ध कर रहे हैं ।
तुम्हारी देह को सांस लेने में दिक्कत हो रही होगी ।
तुम्हे याद है न ! जब मैं और तुम रात कहीं गुम हो गए थे । मैं पैदल चलता जा रहा था । तुम मुझे कहीं भी थकने नही दे रहे थे । पूरी रात मैं चला पैदल तुम्हारे साथ । और कोई इंसान नही था उस रात हमारे बीच । मैं केवल मौन चल रहा था । तुम्हारे ऊपर रहने वाले अनगिनत जीव जंतु जंगल की खूबसूरती को रात के अंधेरे में एंजॉय कर रहे थे । चांद कभी पेड़ो में छिपता तो कभी पहाड़ों में ।
पहाड़ तुम धरती का ही हिस्सा हो । मैं मानता हूं । पर ...
हमारे लोग तुम्हारे भीतर सीमेंट और लोहा भर दे रहे हैं । तुम्हारा प्राकृतिक आनंद जा रहा है । मुझे डर है । कहीं तुम सूख तो नही रहे हो ।
तुम्हारा सूखना , मतलब दरकना और दरकना मतलब तबाही । देखो ना ! तुम्हे मै डरा हुआ सा महसूस हो सकता हूं । मैं वाकई हूं । तुम्हारी फिक्र भी है मुझे । पर मैं क्या कर सकता हूं । मैं कोई सरकार नही ।
मैं कोई क्रांतिकारी नही , मैं कोई इतनी बड़ी ताकत नहीं जो तुम्हारे साथ हो रहे दुर्व्यवहार को मैं खत्म कर सकूं ।लेकिन हां ! वो लोग सब मेरे जैसे ही हैं ।
मैं नहीं आया बहुत साल से तेरे पास । गुस्सा आता था मुझे । तुम्हारे ऊपर हो रहे अतिक्रमण और जोर जबरदस्ती को देख कर । कितने साल हो गए ! तुमसे मिले हुए । दस साल से शायद । अब तो सब और बदल गया होगा । कुछ नई हवाएं , घनघोर विकास की हवाएं चली हैं इधर । उनका तुम पर क्या असर पड़ रहा होगा । इस बात को तुम बताते भी नही ।
तुम मेरी तरह खत नही लिख सकते । अनपढ़ कहीं के ! बुद्धू ! लोग ठीक ही कहते हैं जो बड़ा होता है उसका दिमाग पैरों में आ जाता है ।
मैं तुम्हारी जगह होता । तो एक बार में करवट बदलता । बस सब झील झांझर जमीन में या नदियों में । किसी नुकसान का ठेका न लिया होता ।
मेरे साहसी पहाड़ , अपना ख्याल रखो । रख पाओ जैसे रख पाओ । हमारी चिंताएं करनी छोड़ो ।
हम तो चीटियां हैं । अपना काम करते रहते हैं । हमारे पास हेलीकॉप्टर है , हमारे पास बारूद है । हमारे पास रॉकेट है परमाणु है । वैसे हमारी तादात इतनी है कि 8 से 10 हजार लोग एकसाथ न रहे । तो कोई फर्क नहीं । हम जब किसी हादसे से बच जाते हैं । तो हमें लगता है । हम खुदा हो गए हैं । सोचता हूं इस खत के तुरंत बाद या थोड़े समय के बाद । मैं आ पाऊं तुमसे मिलने ! मुझे स्वीकार तो करोगे ना । मैं दबे पांव आऊंगा तुम्हारे पास । तुम्हारी ओट में कहीं शरण पाऊंगा । और कुछ दिन गुजारूंगा तुम्हारे साथ , बिना तुम्हे सताए ।
मैं तुम्हारे शिखरों पर विराजमान देवताओं से तुम्हारी रक्षा का आवाहन करता हूं । तुम्हारे शिखाओ पर शोभायमान समस्त देवियों से प्रार्थना करता हूं । कि तुम्हे हमारे प्रकोप से बचाए ।
प्रिय पहाड़ , अपनी नदियों को संभाल के रखना । मैं आता हूं जल्द तुम से मिलने।
तुम्हारा
मैं !
गुरुवार, 9 नवंबर 2023
प्रिय तुम !
जब तुमने जन्म लिया था । तो तुमको बहुत देर छूने से गुरेज़ करता रहा । बहन ने रख दिया था । तुम्हे मेरे हाथों में । अपनी पतले हाथों की हड्डियों पर मैं तुम्हे महसूस कर रहा था । मुझे डर लग रहा था । मेरे हड्डियों वाले हाथ तुम्हे कहीं तकलीफ न दे। मैं तुम्हे टेलीफोन की उन तरंगों से बचा लेना चाहता था । जो लगातार मेरे मोबाइल में बज रहा था । मुझे याद है । तुम्हे मैने कई घंटों बाद छुआ था ।
तुम्हारी तस्वीर कहीं होगी । पर मेरे दिमाग में उस चित्र की कोमलता महसूस होती है हमेशा ।
इन दिनों तुम कई मोर्चों से लड़ रहे हो । क्रिकेट वाला मोर्चा सबसे कमज़ोर पड़ जाता है । पढ़ाई में तुम्हारा मन नहीं लगता । ये बात कुछ तकनीकी पचड़े में पड़ के नेपथ्य में जाती रही है।
मुझे अफसोस है । कि मैं तुम्हारी डायरियां चुपके से पढ़ लेता था । फिर भी मैं तुम से सामंजस्य नहीं बैठाल पा रहा हूं। शायद यही कारण हो । तुम्हे तुम्हारी मन की बात जान कर उस पर तीखी प्रतिक्रियाएं तो दी हैं । बगैर तुम्हे जताए कि मैं तुम्हारी डायरी पढ़ता हूं ।
तुम्हारी हर झूठ के पीछे मै अपने भीतर टटोलने लगता हूं। अपने आस पास के वातावरण को देखने लगता हूं। तुम बहुत तेज़ी से बड़े हो रहे हो । तुम बड़े हो रहे हो । इस बात का एहसास हम हमेशा तुम्हे कराते रहते हैं। पुरुष होने के नाते मैं तुम्हारे शरीर में हो रहे बदलावों को महसूस करता हूं। तुम्हारी मनः स्थिति कुछ कुछ समझ आती है । समय का बीतता हर लम्हा तुम अपनी मुठ्ठी में गेंद बना कर खेलना चाहते हो । मुझे तुम खेलते हुए बहुत सुंदर लगते हो। मेहनत करते हुए । अपने हम उम्र के साथ दौड़ते भागते हुए । कुछ बंदिशों को तो शाम का एक घंटा भी बहुत हल्का लगता है ।
तुम्हारी ट्रेन की दिवानगी देखी है मैने । महसूस की है बहुत । तभी मैं पिछले कुछ सालों से स्टेशन , ट्रेन , आती जाती आवाज़ें , रेल का एक लंबा सफर मिस करता हूं । तुमने तो बहुत किया होगा । तुम्हारे जन्म का समय हमारे सबसे खराब दिनों में पूरे परिवार को बांधे रखा है । एक बड़े से परिवार का टूटना जड़ों को हिला देता है । उस हिलते , डुलते हिंडोले में कोरोना । तुम बढ़ते हुए रोज कई कहानियों से गुजर रहे होते हो। मम्मा की , पापा की , दादा दादी की । और चाचा ताऊ अंतहीन रिश्तों की कहानियां तुम्हे सुनाई देती होंगी । उन कहानियों में तुम्हारे कानों ने क्या सुना होगा । वो केवल तुम ही जानते पहचानते होगे।
हमारे समाज में पिता के सामने बोलना , मां के सामने बोलना और बड़ों से बात करना बहुत सिखाया जाता है । चौबीस घंटे में हर बड़ा कुछ न कुछ नसीहते दे रहा होता है । डांट से , मार से , भय से बाहुबल से तुम्हे दबाने की कोशिश कर रहे होते हैं हम । प्यार की आड़ में । तुम्हारे ख्याल के सार्टिफकेट तुम्हे दिखाते ।
मैने भी कई बार आपा खोया है । तुम्हारे शरीर पर मेरे बल के निशान बहुत समय तक मेरी देह को महसूस होते हैं ।हम सब अपने अपने हारने की खीझ को कहीं न कहीं जाया कर रहे हैं । तुम्हारी ऊर्जा का जवाब हमारे किसी के पास नही है ।
तुम्हारे किशोरावस्था में प्रवेश का दिन तारीख तो नही निश्चित है । पर कहीं से तो तय करना पड़ेगा । तुम्हारे जन्मदिन के तोहफे के रूप में तुम्हे कुछ ऐसा दे पाऊं । जो मेरे तुम्हारे बीच के वात को भर पाए ।
मैं हमेशा सोच में रहता हूं । कि तुम से अपने दिल की बातें साझा करूं । पर नही हो पाता । शायद तुम भी कहीं न कहीं अपने पापा को मिस करते होगे। मैं तुम्हारा बचपना बहुत मिस करता हूं । तुम मुझसे बच्चे बन के कई सारी बातें मनवा लेते हो । पर मैं तुम्हारा बड़ा होना महसूस कर पा रहा हूं।
तुम्हारे बड़े होते कदमों में कदम ताल कर के हम कोशिश करें अपने स्थापित मापदंडों को पर रख कर । मुझे मालूम है अच्छे जीवन के लिए प्रेम होना जरूरी है । प्रेम से स्फुटित तमाम धाराएं संयोजित होती हैं । मैं भी अभी तुम्हे अपना दोस्त तक न बना पाया । दोस्ती हो तो प्यार हो ।
मैं खुद को अभी इतना बड़ा नही मानता । कि तुम्हे कहूं कि तुम ये बनो , वो बनो । तुम्हारी रुचियों को मैं सुनने की कोशिश करता हूं । उन्हें पुष्पित पल्लवित करने की सोचता हूं ।
बच्चे जो बड़े होने की दहलीज़ को छू रहे हों । उन्हें कंधों की जरूरत होती है। कंधों की जगह क्रोध से भरी आंखें मिले तो वो क्यों कर महसूस करें ।
मैं तुम्हारे 12 वें जन्मदिन पर हर बार की तरह कुछ नही दे पा रहा हूं । मैं कोशिश करूंगा तुम्हे एक डायरी भेंट करूं । कुछ किताबें और लाकर दूं । एक ट्रिप कहीं लंबी ट्रेन वाली उड़ चलें हम साथ । जीवन के मोती चुनने । एक क्रिकेट किट तुम्हे उपहार दे सकूं ।
और सच पूछो । जो किताबें तुम्हारे पास हैं । उन्हें गुरु बनाने के मौके मत छोड़ना ।
तुम्हारे लिए खत लिखना मुझे अच्छा लग रहा है । मैं इस बहाने खुद को टटोल लेता हूं ।
शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2023
प्रिय नाटककार !
प्रिय नाटककार ,
बड़ी ही नज़ाकत से हम आप की परेशानी को खारिज करते हैं । ऐसी परेशानियां हम सब महसूस करते हैं । मुद्रा राक्षसी हंसी लेकर हम सब को दस्ती रहती है। हम छिपाते हैं । जो छिपाते हैं वही काल बन जाता है । नशा काम का हो तो एक बार समझा जा सकता है । मैने आप की अदाकारी देखी है परदे पर । किरदार को ओढ़ना आप को खूब आता है। आप देखने में एक दम कभी देवा नंद बन जाते हो तो कभी राजेश खन्ना । कभी गुस्सैल, लड़खड़ाते हुए अमिताभ बच्चन वाला रोल आप के जीवन पर आधारित लगता है ।
आप की आर्थिक इंडेक्स के उतार चढ़ाव वाली कहानी रोचक लगती है । या यूं कहें उतार की चढ़ास बे तलब हो लेती है । बहुत नेक दिल हैं आप । पर आप पर आप का नशा सर चढ़ के बोलने लगता है । तब समस्या नाजायज लगने लगती है ।
आप को तो पता होगा पहले कोरोना फिर युद्ध पे युद्ध । ग्लोबलाइजेशन और डिजिटाइजेशन के इस दौर में हमारी जेबें कैसे न प्रभावित हों । पिछले कुछ महीनों से मुझसे मांगने वालों की तादात बढ़ती जा रही है । कुछ को दिया तो वापस नहीं आया । कुछ को वापस न आने समझ दे दिया। बामुश्किल दाल रोटी कमाने वाला भला कितना देगा ।
आप से असमर्थता जता देने के बाद भी आप की मांग मुझे परेशान कर रही है । और मना करना आप के सम्मान को ठेस पहुंचाना साबित होगा । इसलिए आप के बार बार कॉल करने पर भी फोन नही उठाया जा सका । आशा ही नही पूर्ण विश्वास है । कि अब आप मेरा जवाब समझ गए होंगे । पर मांगने के लिए कल कभी जाता नही कहीं ।
मुझे आश्चर्य होता है । जब कोई कलाकार किसी मॉडल शॉप से अपनी किल्लत की दुहाई दे । घर में रोटी न ले जाने का आफोस जताए ।
आप ही के जुबान से मैने आप की नाकामियों को छिपाने के लिए कई झूठ सुने हैं । उन झूठ पर हंस हंस गुलाटियां खाते देखा है ।
आप के भीतर एक अभिनेता, रोज आप की शामों में जागता होगा । सुबह सफेद करने का संकल्प लेता होगा । लेकिन शाम किसी से एडवांस ली गई रकम के धुएं में राख हो चुकी होती है । सुबह , शाम के अफसोस के उतार को तलाशती है । मैं बार बार ये अफसोस जाहिर करना चाहता हूं । कि आप की मदद नही कर सकता । हो सके तो मुझे माफ करिएगा । जब कभी इस पत्र से गुजरे तो । अपनी किसी शाम में मुझे शरीक कीजिएगा ।
आप का शुभचिंतक ।
सोमवार, 25 सितंबर 2023
नासवी !
बधाई नासवी ( नेशनल एसोसिएशन ऑफ स्ट्रीट वेंडर्स ऑफ इंडिया )
अच्छा लग रहा है । इस विशालकाय संस्था को 25 वर्ष के संघर्ष और सफलता की कहानियों को सुनते हुए । संस्था से जुड़े देश भर के लाखों पटरी दुकानदारों और संस्था के समस्त कर्मनिष्ठों को शुभकामनाएं ।
प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से नासवी के जुड़े रहने का मौका मुझे भी कई बार मिला । दिन उगने से लेकर शाम ढलने तक रोज कोई न कोई नई चुनौतियों का सामना नासवी कैसे करती है । इसका अंदाजा संस्था के साथ काम करने के बाद ही पता चलता है ।
कभी लखनऊ में संस्था के द्वारा आयोजित स्ट्रीट फूड फेस्टिवल के वक्त मेरा इस संस्था को जानने पहचाने का मौका मिला। उसके बाद कई महत्वपूर्ण अवसरों पर संस्था के साथ काम करने का अवसर मिला । । संस्था को जितना बारीकी से देखो उसकी जड़ें और गहरी महसूस होती है । मास बॉन्डिंग के लिए दिल में उतरना पड़ता है ।
देश के पटरी दुकानदारों के लिए इतने वृहद स्तर पर काम करने वाली संस्था शायद ही कोई हो । पटरी दुकानदारों के उन्नयन और उनके अधिकारों की लड़ाई का सिलसिला पिछले 25 वर्षों से लगातार चल रहा है । इनमें अनगिनत कहानियां निहित हैं । पटरी दुकानदारों के कानून से लेकर उनके कौशल और आजीविका को मजबूती देना इस संस्था का अर्क है ।
किसी छोटी सी नगर पालिका से लेकर महानगर कॉरपोरेट तक । सड़क किनारे बैठे , खड़े पटरी दुकानदारों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है । उनको देख कर लगता ही नही कि भारत में सड़क की तरफ पक्की दुकानें बढ़ती हैं । मकान बढ़ते हैं । पटरी दुकानदारों के लिए सड़क नही बढ़ती दिखती थी पहले । संस्था ने बड़े ही रणनीतिक तौर पर पटरी दुकानदारों को एकजुट किया । उनकी समस्याओं को सुना । समाधान की संभावनाओं को तलाशा । और उनकी पैरोकारी की ।
देश के लाखों पटरी दुकानदारों की जुबान पर नासवी एक संघर्ष की दास्तान है । यह उनकी कमाई है ।
संस्था के प्रमुख एवं मजबूत स्तंभ अरबिंद सिंह जी , संस्था की बुनकर संगीता जी के साथ संस्था के पदाधिकारी गण , कार्यकर्ता और देश के तमाम पटरी दुकानदारों को बधाई । भविष्य के लिए शुभकामनाएं ।
प्रभात सिंह
रविवार, 29 जनवरी 2023
प्रिय तुम ....
प्रिय तुम ....
तुम्हारी बात पर मुझे यकीन नहीं होता . कितना यकीन करूँ ? यकीन के तो पहाड़ लांग लिए हैं मैंने . यकीन मेरे भीतर असीम प्रेम लिए जड़ हो गया है . तुम्हारी अकड़ ताड़ के पेड़ जैसी है . मेरे घर के पीछे दो ताड़ हैं . दोनों दस फीट की दूरी पर . उन ताड़ों की उम्र और कद इतनी हो गयी है . कि उनपर कोई चढ़ नहीं पाता . मदिया के हत्थे अभी भी रस से छलछला उठते हैं . बताते है नर ताड़ की ताड़ी खट्टी होती है . और मदिया की मीठी . हमारे ग्रामीण अंचल में ताड़ का व्यवसाय खूब होता है . पर इस तरह प्रेम में डूबे हुए ताड़ इतने करीब नहीं देखे . वो मात्र 10 फीट की दूरी पर हैं . उनकी उंचाई 100 फीट से ऊपर है . पर मज़ाल क्या है एक दूसरे के हाँथ छू जाएँ .
तुम्हारी पसंद और नापसंद की क़द्र है मुझे . तुम्हे भी है . मैं जानता हूँ . तुम्हे बात करना एक दम पसंद नहीं . आज अचानक अपने ही कमरे में बगैर बत्ती जलाए जाने का मन हुआ मुझे , खिडकियों से बाहर की स्ट्रीट लाईट, डिम स्पॉट लाईट की तरह दीवारों पर पद रही थी . बाहर की चकाचौन्द से आया मैं , जैसे ही अन्दर घुसा सामने खाली कुर्सी पर जैसे किसी ने मुझे खींच लिया . इतना सुकून मिला . इतना सुकून मिला ... मेरे हाँथ में मोबाइल नहीं था . कितने ही दिनों के बाद आज कमरे में टी वि नहीं चला .
बुधवार, 3 अगस्त 2022
प्रिय भारत पेट्रोलियम !
प्रिय भारत पेट्रोलियम ,
मैं अक्सर तुम्हारी शालीनता की चर्चा अपने कर्मचारियों से किया करता हूं । मैने तुम्हारी शालीनता का बहुत गहनता से अनुभव किया है । तुम्हारा नीला पीला रंग मेरी जुबान से उतरता ही नही । तुम्हारे रंगों से मैने कई बदरंग वस्तुओं , लोगों की सूरत बदलते देखा है । देखो ना ! तुम्हारे पुराने विज्ञापनों में दिखने वाला गधा ज्यादा बोझा उठाने और तेज कदम के बाद भी खुश नज़र आता है ।
मैं बचपन में जब भी अपने गांव आता । तुम्हारी तेल की धार को देखता । तुम्हारी तारीफें मैने उन बुजुर्ग किसानों से सुनी हैं। जो अंत्योदय पर जीवन यापन करते थे । कम पूंजी में जब वो अपने इंजन से ज्यादा माइलेज निकलता देखते थे । तो वो कहते थे । आप का तेल बहुत अच्छा है । कोई बच्चा किसी दूर गांव से आता । साइकिल से 20 लीटर की कैन उतारता । और कहता दद्दा कहते हैं कि वही टंकी से तेल लाओ ।
मैं उस समय उन्हे समझाता था कि। कि ये हमारा तेल नही । भारत पेट्रोलियम का तेल है । हमको जैसा मिलता है । वैसा हम दे देते हैं। अच्छा लगता है । जब कोई अपने जेब खर्च का सही मोल पाता है । तुम्हारे सफेद तेल का लोहा माना जाता है । तुम्हारा तेल जब पंजाबियों के ट्रक में जाता है । तो उनकी रोज़ी का ख्याल बढ़ जाता है । मैने कई पंजाबियों को कहते सुना । तेल तो पड़ेगा तो भारत का । कितना सहज लगता हैं न ! तुम्हारा नाम लेना । भारत !
बीच में जब तुम्हारी बोली लगने को आई। तो मुझे कुछ असहज लग रहा था । पता नही चल रहा था । तुम्हारा कौन सा रंग होने वाला है । तुम्हारी शालीनता कहीं प्रतिस्पर्धा में अराजक बाज़ार न हो जाए । मैं अक्सर लोगों को जाते हुए लोगों के बारे में कहते सुना है । कि अच्छे लोगों को भगवान जल्दी बुला लेता है । तुम सबसे सुन्दर दिखते थे। तुम्हारे तेल ने मुनाफे के कीर्तिमान गढ़े थे । सरकार तुम्हारे परफॉर्मेंस को देख कर लट्टू हो गई । कौन न चाहता तुम्हारे तेल पर दौड़ना । लाखों करोड़ों चक्कों की टंकियों में , किसानों के खेत खैलियानों के पानी में , आम आदमी की दैनिक जरूरतों में मैने तुम्हारी मोहब्बत देखी है ।
सदी की सबसे बड़ी त्रासदी कोरोना का हाल तुमसे छिपा नहीं है । दुनिया भर में ऊंच नीच , उथल पुथल । मुझे याद है वो ढलती शाम । एक किसान अपने पत्नी के जेवर लाया था । गिरवी रख कर , कुछ तेल उधार चाहता था । मैं ऊपर छत पर था । छत के ठीक नीचे तुम्हारे नाम का लोगो बना था । उस किसान ने खुली अंजुरी में जेवर उठा के कुछ मांगा था। उसकी मांग पूरी हुई । वो आज भी छलक कर वो दिन याद करता है ।
मैने कई बार सोचा कि तुम्हारी तारीफों को कैद कर लूं । फिर लगा कि तारीफें कैद नही होती । देश आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा है । तुम्हारे तेल से डूबते देश के हवाई जहाज उड़ रहे हैं । तुम्हारी हरित ऊर्जा स्याह दिनों में मन को तसल्ली देती है । तुम्हारे साथ आजादी का महोत्सव मनाना अच्छा लग रहा है ।
तुम्हारा
जय किसान !
शनिवार, 25 सितंबर 2021
माँ के नाम एक ख़त
प्यारी माँ ,
माँ ! तुम्हे याद है ? हमारे पुराने वाले मकान में एक कमरा हुआ करता था। छोटा सा कमरा । एक डबल बेड । एक स्टोर। एक टाँड़। हमारे उस घर के एक कमरे को , मैंने अपना कमरा बना लिया था। तुम्हे याद है वो कमरा ? तुम्हे जरूर याद होगा।
उसकी एक दीवाल पर एक पोस्टर लगा था । खूँटियों पर हमारे कपड़े टंगे होते। टाँड़ पर बस्ता किताबें। मुझे तब यकीन होता था कि मैं पढ़ने में औसत हूँ।
तुम कहती " मूंगफली का ठेला लगाना बड़े होकर " । तुम कहती "बोलो तुम्हारे मन से क्या है "। तुम्हारे प्रश्न बहुत कड़वे होते थे। कड़वा उनका स्वाद नही था। हमारे उन प्रश्नों को समझने का माद्दा नही था।
मुझे आज तक नही मालूम चला । कि तुम्हारी वो गुस्सा हमें किस राह पर ले जाना चाहती । और हम कहाँ भटक जाते। छोटा भाई जब तुमसे मार खाता था। तब मुझे उसके बचपने वाली तस्वीर याद आ जाती। गोल मटोल 2 काले टीके लगे। उस तस्वीर को देख कर आज भी लगता है कि उसे खिला लूँ।
वो खूब चिल्लाता तुम्हारी मार से। मुझे लगता था। कि वो चीखने को अपना हथियार बना लेता था। तेज़ तेज़ रोएगा तो तुम्हे मामता लगेगी। तुम रुक जाओगी। उसके रोने से अडोस पड़ोस के लोग टोक देते थे तुम्हे। तुम उन्हें डराती कि वो हट जाएँ। पर उनका मान रख लेती।
वो शैतान था। जिद्दी था। माँ मैं तुम्हे आज बता रहा हूँ। कि मैं बहुत गब्बर था। उसको छेड़ता। जब वो चिढ़ता तो मुझे उसे चिढ़ाने में ज्यादा मज़ा आती। तुम उसी की गलतियाँ सुन कर मुझे माफ़ कर देती। उसकी मार के बाद मेरी मार के चांसेस बढ़ जाते थे।
तुम्हे याद है ? तुम्हारी मार खाने को मैं तैयार रहता था। मैं अपने कमरे में दुबक के बैठा सुनता था तुम्हारा हल्ला। मुझे लगता अब मेरी बारी....अब मेरी बारी। तुमने जब जब मुझे मारा। मैं पीठ कर के खड़ा हो जाता । आँखें भींच के पीठ को सख्त कर लेता। मैं पहले से गिनती बढ़ा के बैठ जाता। तुम हमेशा उस गिनती से पीछे रहती।
तुमसे कम मार खाने या बचने के लिए मेरे पास चुप से बड़ा कोई हथियार नही था। तुम्हारे सामने बोलना तुम्हे पसंद नही था।
कई घण्टों बाद जब मैं अपने कमरे में होता। उस दीवाल पर लगे पोस्टर को देखता । खूब हरे पेड़ की टहनी पर घोसले को पालती चिड़िया। दाना लाती। मछली की तरह मुँह फैलाए बच्चों के मुँह में दाने डालती। पोस्टर के सबसे ऊपर के दाहिने कोने पर सफेद अक्षरों में लिखा होता।" नेचर इज़ द बेस्ट मदर " । मैं उस कमरे में ओढ़नी के भीतर सुबकता।
माँ तुमने वो पोस्टर कभी नही देखे ? मेरे कमरे में झाड़ू लगाते वक़्त । मेरे लिए सुबह की चाय लाते वक़्त। या दिवाली , होली की सफाई करते वक़्त।
तुम बहुत रोत्तड़ हो। मैंने तुम्हारे आँसू बहुत जल्दी छलकते देखे हैं।
तुम अक्सर पापा से लड़ते वक़्त रोती थीं। कभी कभी मैं स्कूल से आता। रसोईं में तुम्हारे आंखों में आँसू देखता। तुम आँटा गूंथते हुए रोती दिखती। शाम को सीरियल के वक़्त तो तुम्हारी आंखें किसी छण डबडबा आती। फिल्मों को देखते वक़्त। नॉवेल पढ़ते वक्त तुम रोती दिखती।
तुम्हे बच्चे बहुत पसन्द हैं ना ? पर शैतानी करने वाले बच्चे पसंद नही हैं तुम्हे। या तुम पापा का गुस्सा उतारती हैं हम पर। उनके तुमसे किये गए सारे सवाल आज भी वैसे ही हैं। तुम अभी भी जवाब देकर रोने लगती हो।
पर अब तुम किसी को मारती नही। शायद हम में से किसी ने कभी तुम्हारा हाँथ पकड़ लिया होगा। तुम्हें आँख दिखाई होगी। या तुम्हे लगा होगा कि बच्चे बड़े हो गए हैं। पर तुम अपना गुस्सा कैसे उतारती हो ? कभी मेरी तुम्हारी बात हो तो बताना।
तुम्हारा प्यारा !
रविवार, 25 मार्च 2018
आप बहुत अच्छा काम कर रहे हो, कमाल का डायरेक्शन है, और विषय वस्तुओं का चुनाव भी। अक्सर कुछ ऐसा दिख जाता है, जिससे दिन बन जाये। कभी कल्पना में भी नहीं सोचा था, ऐसा काम देखने को मिलेगा। कभी कभी सोचता हूँ, कि हिन्दी कविता, हिन्दी स्टूडियो की शुरुआत किन हालातों में हुई होगी। जिसने एक इन्सान के अन्दर इतनी ऊर्जा दे दी, हिम्मत दे दी। वो रुक नही रहा, थक नही रहा, विचलित नही हो रहा है। वैसे मैं इस सफर में क-से-कविता के माध्यम से आपके साथ मात्र दो सालों से जुड़ा हूँ। उससे पहले का सफर कैसा रहा होगा, केवल अंदाज़ा ही लगा सकता हूँ। मैं वाकई इक्छुक हूँ यह जानने में। इतने सारे लोग, इतनी तरह के लोग, इतने तरह के काम...सब स्थापित होते हुए। क्या कारण है ? इस यात्रा से जुड़ा व्यक्ति अपने आप को झोंक देने की हद तक दीवानों की तरह काम करता है। मुस्कुराते हुए, मैराथन के बैटन की तरह यात्रा में दौड़ने लगता है। दूर दराज, बिना व्यक्तिगत जान पहचान, बिना मिले, सैकड़ों लोग एक जैसा ही सपना देख रहे होते हैं। क्या ही लालच होगा ? साहित्य,कला, प्रेम के सिवा। पर कहीं कुछ दरक रहा है, उसकी आवाज़ यहाँ एक इकाई तक पहुँचती है। आप सब की मेहनत, समय, स्नेह, काम के प्रति लगाव, प्रतिफल हम सब को बांधे रखता है। प्रेरणा देता है। उत्साहित करता है। हिन्दी स्टूडियो, हिन्दी कविता, क से कविता सब एक ही तो हैं...हम ।
क से कविता- लखनऊ
रचनाकार के नाम एक पाठक का ख़त !
ओ मेरे प्रिय रचनाकार,
मेरे भीतर तुम्हारे शब्दों की स्वर लहरियाँ बजती हैं। उनके हाव भाव, उन शब्दों की स्पष्ट आवाज़े गूँजती हैं कानों में मेरे । उन्हें जज़्ब कर के , अगली रचना के इंतज़ार में बैठता हूँ। वो रचनाएं जो मुझसे संवाद करती हैं, मैं उन शब्दों के भीतर की कशिश महसूस कर सकता हूँ। पढ़ी जा चुकी रचना और आने वाली रचना के बीच का समय उन्ही पढ़ी जा चुकी रचना के रंग में रहता है।
नई रचना अवाक कर देती है नए रंग लाकर । बेहद संतुलन बना के चलना पड़ता है, इन ऊँचें नीचे टेढ़े मेढ़े रास्तों पर चलते वक़्त। न जाने कौन सा हवा का झोंका उड़ा दे उदासियों की परतों को। इतनी उम्मीदें जगती हैं इन शब्दों से, इतनी ऊर्जा मिलती है कि मन कहता है प्रेम से खूबसूरत तो दुनिया की कोई शै, है ही नही। मैं उन पंक्तियों के आखीर को जरूर देखता हूँ, उनमें लिखा होता है "प्रेम में खिलना"। उन पंक्तियों को लेकर मैं भागता हूँ नई नई जगहों पर।
विस्तार के संकुचन से आहत सभ्यताएं मिलती हैं। जिये के निशान नही मिलते। कोई कुछ भी महसूस नही कर पा रहा है। जिस धरती के गुरुत्वाकर्षण से उनमें भार की अनुभूति जगी होगी, जिस आसमान से उन्हें छत का आभास हुआ होगा, जिस पानी, हवा, प्रकृति के स्पर्श से जीवन के संकेत मिले होंगे...वो सब उनके जीवन में अब नही दिखते। मैं तुम्हारे शब्दों की जैविक खाद डाल देता हूँ उनकी जड़ों में, फिर भागता हूँ अपने ठीये पर । एक नई रचना, एक नया राग, प्रेम में बुझी हुई कहानी, टूटते हुए तारों के रूमान से भरी आकाशगंगा भर देती है मुझे प्रेम के संसार से। मुझे तुम्हारे शब्द मुक्त करते हैं, बंधनों से, दुनियावी झंझावातों से, जमा पुंजियों से, भविष्य के खतरों से।
"प्रेम में खिलना" का अर्थ क्या सही पढ़ पाया हूँ मैं ? या प्रेम का लिखा जाना अभी बाकी है ?
एक पाठक
गुरुवार, 7 सितंबर 2017
तुम शहर हो न वर्षों से। तुम्हारे पास वो सब है जो एक शहर के पास होता है। पक्की सड़कें, पक्के घर, बिजली पानी, स्टेडियम, स्टेशन, अस्पताल, कोर्ट कचहरी, प्रधान डाकघर, जेल, राजकीय विद्यालय और वो तमाम सुविधाएं जो किसी शहर को शहर होने के लिये जरूरी होती हैं, हैं तुम्हारे पास। फिर भी एक शहर की स्वायत्तता का अभाव तुम्हारे पास हमेशा से रहा। तुम शहर की तरह नही बल्कि व्यक्तित्व बन कर विचरते रहे प्रदेश के अन्य शहरों के बीच। व्यक्तित्व के आभामंडल ने हमेशा से तुम्हारी स्वायत्तता का हनन किया । तुमने जो मांगा, वो तुम्हारी झोली में डाला जाता रहा । तुमको मांग और आपूर्ति के बीच संघर्ष की कमी कभी खली ही नही। तुम्हारे इतिहास के संघर्ष दर्ज हैं सरकारी अभिलेखों में और स्वन्त्रता संग्राम सेनानियों के दिल में। फिर भी तुम आजादी के बाद से गुलाम होते गए। गुलामी की जड़ें इतनी गहरी उतरती गयीं तुम्हारे भीतर, कि तुम्हे वो नियति लगने लगी।
तुम्हे आज़ाद भारत का गुलाम शहर कहना बिल्कुल भी नही भायेगा। तुम धधकते हो अंदर ही अंदर, सिसकते हो भीतर बाहर। तुम्हारी सारी बेचैनी भाप होकर एक डिब्बी में कैद हो जाती है। वो जिन्ह बनकर लहराती, उड़ती हुई पूछती है "बोलो क्या चाहिए" तुम बोल बैठते हो हुज़ूर जो भी मांगा आपने दिया। तुम्हे कभी महसूस नही हुआ कि जो दिया गया वही तुमने लिया। तुम्हारी हद बंदी है, आज भी। तुम्हारे भीतर खौफ रहता है, एक ऐसी ताकत का, जिसका कोई नाम नही, स्वरूप नही , अस्तित्व नही। वो ताकत तुम्हारे भीतर का डर है। तुम्हे फुसफुसाहट की आदत हो गयी है। तुम्हारी दर्द भरी धीमी आवाज़ को एम्पलीफायर में डाल कर उत्सव की आवाज़ बना दिया जाता है। दूर से वापस आती उसकी प्रतिध्वनि में तुम अपने खौफ को भुलाने की कोशिश करते हो। तुम एक शांति प्रिय आदर्श हँसते खेलते शहर हो जाते हो।
तुम्हारी सहन शक्ति को सलाम करने का मन करता है। तुम्हारी हरियाली को बाँझ कर दिया गया, तुम्हारे तालाब पाट दिए गए, तुम्हारी जमीने हड़प ली गईं, तुम्हारी नदियों, नहरों को सुखा दिया गया। तुम्हारी शिक्षा व्यवस्था को नंगा कर दिया गया, तुम्हारी दशकों की मेहनत से बने स्वायत्त, स्वतंत्र, आर्थिक समृद्ध होने के संसाधनों को खत्म कर दिया गया। तुम सब सहन करते रहे सिसक सिसक कर।
तुम्हारा एक गुण इन सब दुखों पर भारी पड़ता है। वो है तुम्हारी राजनीति में रुचि। तुम्हारी राजनैतिक महत्वाकांक्षा का कोई सानी नही है। तुमने कई कीर्तिमान स्थापित किये हैं, कई तोड़े हैं। तुम्हे सरकारों के पक्ष विपक्ष के केंद्र में रहने का हुनर मालूम है। उस केंद्र के घूमते चक्कों की गरारियों से सटी तुम्हारी क्षेत्रीय सरकार, सरकारी तंत्र , मीडिया रेशम के कच्चे धागे काता करती है। तुम और तुमहारे आम लोग टूटते जुड़ते रहते हैं इन धागों की तरह। तुम इस तिलिस्म को तोड़ पाओगी कि नही ? तुम्हारे आस पास के शहरों में, जनपदों में ऐसे ही कुछ मिलते झूलते गुण दोष होंगे। पर भीतर की ऊब, छटपटाहट, बेचैनी को तुमसे बेहतर कौन जानता होगा मेरी हरदोई ?
तुम्हारा शुभचिंतक
प्रभात
अपने शहर के नाम एक ख़त, जो कभी अपना नही लगा !
सोमवार, 24 जुलाई 2017
तुम दुनिया भर के सर्वश्रेष्ठ गायकों में से एक हो। ये देश भी सर्वश्रेष्ठ है, सर्वश्रेष्ठ होने में। दुनिया भर के सर्वश्रेष्ठों ने यहां आकर सर्वश्रेष्ठ होने का सुख लिया है। तुमने भी कहा कि यहां के लोग कूलेस्ट हैं। इतनी गर्मी में कूलेस्ट तो पश्चिम में भी शायद संभव न हो। यहां संगीत का बहुत महत्व है, पैदा होने से लेकर उठावनी तक यहां तरह तरह के गीत संगीत प्रचलित हैं। भारत देश विश्व गुरु होने की कगार पर है, फ्यूज़न यहां की भीड़ को खूब भाता है। तुम बेहद कम उम्र के हो, नौजवान देश को तुम्हारे तरह के लोगों की सख्त जरूरत है। तुम बार बार आते रहना यहां कभी उत्तर प्रदेश में, कभी बिहार में, कभी कश्मीर में, कभी नार्थ ईस्ट में। योग, अध्यात्म, संस्कृति, कला, भाषा, खाना, पहनावा, भूगोल इस देश को एकजुट रखने में फेल हो रहे हैं। तुम्हारे तड़कते भड़कते संगीत से यहां कि युवा धड़कनों को शायद कोई बिना भटकाव की दिशा मिले। ये देश दुनिया के लिए गरीब है पर हमारा दिल बहुत अमीर है। हम हर तकलीफ को नई तकलीफ से कम कर लेते हैं। हम तकलीफ से निकल कर किसी नए तरह के सर्वश्रेष्ठ संगीत में खो जाना चाहते हैं। तुम्हारे लिए तेज़ी से बढ़ती क्रेज़ी युवाओं की धड़कनों से मुझे यकीन हो चला है, कि तुम ही इस युवा देश की जरूरत हो। तुम्हे हम सर्वश्रेष्ठ बनाये रखेंगे ये हमारा दावा है। फिर आना जस्टिन !
प्रभात सिंह
ओ भीड़ जब तुम इतना भयभीत रहती हो हर समय, तो तुम्हारे भीतर किसी व्यक्ति को पीट पीट कर मार डालने की हिम्मत कहां से आती है ? कैसे तुम्हारा गुस्सा बेकाबू हो जाता है किसी व्यक्ति विशेष से, किसी घटना से कि उग्र जानलेवा जानवर की तरह टूट पड़ती हो उस पर। कैसे निकाल पाती हो समय अपने व्यस्ततम समय से, सड़क पर न्याय देने का। तुम्हारी खीज तुमको वहशी बना देती है। तुम लाखों करोड़ों की तादात में होते हुए भी डरती हो असुरक्षित महसूस करती हो, तुम्हारे इस डर और असुरक्षा की भावना को भुनाया जाता है।
ओ भीड़ तुम्हे सिर्फ घर और काम करने वाली जगह तक सीमित रहना चाहिए आंख कान नाक बंद करके, तुम्हारा परिवार तुम्हारी ताकत है और वही कमज़ोरी, उतनी ही तुम्हारी जरूरत। तुम कम से कम में जीते आये हो, और उतने में जीने की आदत है। ज्यादा की चाह, उसे हांसिल करने और उसे भोगने की तुम्हे हांकने वालों की है। कोई एक ही क्षेत्र में ताकतवर है भीड़ से ज्यादा। वो एक एक मिलकर तुम्हारा इस्तेमाल करते हैं, तुमको डर के साये में रखने के लिए। तुम डरे रहते हो सरकार से , समाज से, अपने ईश्वर से, खुद अपने ही परिवार से। दीर्घकालिक डर...डर और डर की कुंठा से तुम बेकाबू हो जाते हो, और बनते हो हथियार उन्ही का जो तुम्हे डराना चाहते हैं। तुम्हारे डर से वो भी डर जाते हैं जो इनसे आज़ाद होना चाहते हैं।
प्रभात
बच्चों को उड़ने दो ..
उड़ने दो , उड़ने दो बच्चों को उड़ने दो ... गर नाक अटक जाए तो भी तो उड़ने दो .. जिस ऊर्जा का संचार प्रवाह हो उद्दंड उसको भी उड़ने दो कह...
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फिर झुंझलाकर मैने पूछा अपनी खाली जेब से क्या मौज कटेगी जीवन की झूठ और फरेब से जेब ने बोला चुप कर चुरूए भला हुआ कब ऐब से फिर खिसिया कर मैन...
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कौन हो तुम जो समय की खिड़की से झांक कर ओझल हो जाती हो तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारे ताज़ा निशान भीनी खुशबू और गुम हो जाने वाला पता महस...
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लौट आता हूं मैं अक्सर उन जगहों से लौटकर सफलता जहां कदम चूमती है दम भरकर शून्य से थोड़ा आगे जहां से पतन हावी होने लगता है मन पर दौड़ता हूं ...






