तुम्हे समय नही मिलता ?
मुझे भी नही मिलता !
ये सोचकर बोलूं
कि मैं तुमसे मिलूं
हुँह !
नही मिलना
मिलकर प्रीत के मीठे कीड़े
रेंगते हैं दिमाग में
रहा बचा की उलझन
गुम होती है
न मिलने में !
कौन हो तुम जो समय की खिड़की से झांक कर ओझल हो जाती हो तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारे ताज़ा निशान भीनी खुशबू और गुम हो जाने वाला पता महस...
3 टिप्पणियां:
अरे!
गज़ब
सुंदर। आपको बधाई और शुभकामनाएँ।
मिलकर प्रीत के मीठे कीड़े
रेंगते हैं दिमाग में...
बहुत खूब..
प्रणाम आपको
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