चौबीस घण्टों में
कोई दस मिनट
कई कई बार
सेकण्ड की सुई
पर सवार
मैं देखता हूँ
संग सार के पार ।
कई घड़ियाँ
एकांत ढूँढती
लिपट जाती हैं
धुएँ से
बुनती आकृतियाँ
जोड़ती दीद के तार।
कोई सिरा
जीवन की अंतिम
कहानी कहने को
आतुर
समय से बैर करता
लिखता है
ऐतबार !
उड़ने दो , उड़ने दो बच्चों को उड़ने दो ... गर नाक अटक जाए तो भी तो उड़ने दो .. जिस ऊर्जा का संचार प्रवाह हो उद्दंड उसको भी उड़ने दो कह...
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