मैं जब वहां होता हूं । यहां नहीं होता। मैं जब यहां होता हूं , वहां नहीं होता हूं। सच ! मैं न वहां रहता हूं , ना यहां रहता हूं। मैं ! असल में मैं हूं ही नहीं । मैंने छोड़ा था बहुत पहले खुद को ठीक उसी जगह। जहां पर मैं था। मैं वहां से घूम घूम के आता रहता हूं , लगभग हर मौसम में। पर "मैं ", मुझे महसूस क्यों नहीं होता । ये "मैं" पहले मैं और तुम हुआ । फिर हम हुआ। फिर हमारे ।
भागते भागते "हमारे " थकने लगा। हमारे का बोझ बढ़ता रहा। हमारे लोग। हमारी जमीन। हमारा पैसा। हमारा दर्द। हमारे की पीठ पर सवार "मैं " डरने लगा। मैं हूं कौन यार ? डर....?
भक्क ! मैं बीज हूं। उगा ... बढ़ा... पेड़ हुआ... फिर पंछी हो गया। उड़ गया ! उड़ के जा बैठा दूसरे पेड़ पर। मैं उड़ने में पारंगत तेज़ उड़ने लगा।
भागते भागते "हमारे " थकने लगा। हमारे का बोझ बढ़ता रहा। हमारे लोग। हमारी जमीन। हमारा पैसा। हमारा दर्द। हमारे की पीठ पर सवार "मैं " डरने लगा। मैं हूं कौन यार ? डर....?
भक्क ! मैं बीज हूं। उगा ... बढ़ा... पेड़ हुआ... फिर पंछी हो गया। उड़ गया ! उड़ के जा बैठा दूसरे पेड़ पर। मैं उड़ने में पारंगत तेज़ उड़ने लगा।
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