#लोकरंग #traindiary
खेतों की सोंधी मिट्टी से उपजे शमशुद्दीन की रस भरी आवाज़ में सुनिये
"चला घुमा दे ऐ गोरी जीला कुशीनगर में"
शमशुद्दीन कुशीनगर के खड्डा मील के निवासी हैं। वह 30 साल के हैं। यूँ तो वह मात्र कक्षा 8 तक ही पढ़ पाए। पर जीवन में माता पिता के प्रेम, आदर्श जीवन, लोगों से सौहार्द और मोहब्बत का सलीका उन्होंने सरल ग्रामीण जीवनशैली से सीखा। ट्रेन की छोटी सी यात्रा के दौरान उनकी एक टिप्पड़ी "पुराने गानों में रस होता है" ने उनके संगीत प्रेम को हमारे सामने ज़ाहिर कर दिया। वो अपने गाने खुद ही लिखते हैं और उनको संगीत और आवाज़ भी खुद ही देते हैं। अपनी आवाज़ के साथ अपने हांथों का इस्तेमाल ताल देने में करते हैं। वो कभी अपने पैरों को तो कभी अक्सर जनरल बोगी में दिखने वाले छोटे प्लास्टिक के ड्रम को तबले की तरह इस्तेमाल करते हैं। वो याद करके बताते हैं, कि एक बार उन्होंने भोजपुरी गायन की दुनिया में काफी नाम कमा चुके गुड्डू रंगीला को एक गाना दिया था। जिससे उनको 35000 की आमदनी हुई थी। वो अपने गांव में खेती करते हैं और गायन लेखन से थोड़ा बहुत कमा पाते हैं। एक कलाकार की कला को दिल से सुना जाना, सहेजा जाना ही उसकी कला का असल सम्मान है। वही हमने भी किया। लीजिये सुनिये शमशुद्दीन को।
* शमशुद्दीन जैसे तमाम कलाकार अपनी कला में अश्लीलता, फुहड़पन के रंगीन चटखारे नही भरते। वो अपनी कला को जीते हैं, और सृजन में खोए रहते हैं।
* यदि आपको पसंद आये शमशुद्दीन का फन तो उन्हें खुद ही संपर्क कर सकते हैं - 89-68-308720
इस गाने में उनका साथ दे रहे हैं, Ashfaq Khan जो कि अपने हांथों को साज़ बना लेते हैं।
खेतों की सोंधी मिट्टी से उपजे शमशुद्दीन की रस भरी आवाज़ में सुनिये
"चला घुमा दे ऐ गोरी जीला कुशीनगर में"
शमशुद्दीन कुशीनगर के खड्डा मील के निवासी हैं। वह 30 साल के हैं। यूँ तो वह मात्र कक्षा 8 तक ही पढ़ पाए। पर जीवन में माता पिता के प्रेम, आदर्श जीवन, लोगों से सौहार्द और मोहब्बत का सलीका उन्होंने सरल ग्रामीण जीवनशैली से सीखा। ट्रेन की छोटी सी यात्रा के दौरान उनकी एक टिप्पड़ी "पुराने गानों में रस होता है" ने उनके संगीत प्रेम को हमारे सामने ज़ाहिर कर दिया। वो अपने गाने खुद ही लिखते हैं और उनको संगीत और आवाज़ भी खुद ही देते हैं। अपनी आवाज़ के साथ अपने हांथों का इस्तेमाल ताल देने में करते हैं। वो कभी अपने पैरों को तो कभी अक्सर जनरल बोगी में दिखने वाले छोटे प्लास्टिक के ड्रम को तबले की तरह इस्तेमाल करते हैं। वो याद करके बताते हैं, कि एक बार उन्होंने भोजपुरी गायन की दुनिया में काफी नाम कमा चुके गुड्डू रंगीला को एक गाना दिया था। जिससे उनको 35000 की आमदनी हुई थी। वो अपने गांव में खेती करते हैं और गायन लेखन से थोड़ा बहुत कमा पाते हैं। एक कलाकार की कला को दिल से सुना जाना, सहेजा जाना ही उसकी कला का असल सम्मान है। वही हमने भी किया। लीजिये सुनिये शमशुद्दीन को।
* शमशुद्दीन जैसे तमाम कलाकार अपनी कला में अश्लीलता, फुहड़पन के रंगीन चटखारे नही भरते। वो अपनी कला को जीते हैं, और सृजन में खोए रहते हैं।
* यदि आपको पसंद आये शमशुद्दीन का फन तो उन्हें खुद ही संपर्क कर सकते हैं - 89-68-308720
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