पूछते क्यों नही
आकाश का पानी
कहाँ गया सारा
धरा की प्यास
बुझी नही
क्यों अब तक ?
कब तलक
झुकी घटाएं
नाट्य रूपांतरण
करती रहेंगी
मेरी प्यास पर
रोना आता है मुझे
मुझे मेरी तरह
निबाह लो !
मैं गया था और लौट आया सकुशल बगैर किसी शारीरिक क्षति और धार्मिक ठेस के घनी बस्ती की संकरी गलियों की नालियों में कहीं खून का एक कतरा न दिखा ...
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