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रविवार, 16 अगस्त 2026

बच्चों को उड़ने दो ..


 उड़ने दो , उड़ने दो 

बच्चों को उड़ने दो ...

गर नाक अटक जाए 

तो भी तो 

उड़ने दो ..  


जिस ऊर्जा का 

संचार प्रवाह 

हो उद्दंड 

उसको भी 

उड़ने दो 


कहने को क्या 

ले जाएगा 

जब राह भटक के 

सही गलत का 

फैसला खुद कर पायेगा 

तब लौटेगा 

न लौटे तो भी 

उड़ने दो उड़ने 

बच्चों को .....


80 50 का हेरा फेरा 

लोभ लोक का लेखा जोखा 

कंधनी बांधे बेड़ा पार 

न पहुचे उस पार 

फिर भी उड़ने दो 

बच्चों को उड़ने दो ..


बच्चों सा होना

बच्चों में खोना 

कठिन है 

उनकी ऐसी सोच 

वैसी सोच कैसी भी 

साझा न करने पाए 

तो बच्चों को 

बोलने दो !


बुधवार, 5 अगस्त 2026

बैटरियां !

 


ये बैटरियों  ने आज कल नाक में दम कर के रखा हुआ है . पिछले कुछ सालों से ऐसा लगता है जैसे बतेरियाँ ही बदलवा रहा हूँ . 

कभी धंधे की , कभी घर की , कभी गाँव घर की .  तो कभी कार की , कभी स्कूटी की , तो कभी  बाइक की  .

समझ में ही नहीं आता इन बैटरियों ने कब जीवन में इतनी निर्भरता भर दी है . पैसे खर्च करो . फिर पानी चेक करो . फिर इनवर्टर और बैटरी का मधुर सम्बन्ध बना रहे . यह भी ध्यान में रखना पड़ता है . किसी एक की नहीं बनी तो दुसरे को ले डूबेगी . 

बचपन में बैटरी तो केवल टोर्च में होती थी और रेडियो में . यहाँ तक हमारे गाँव में टोर्च का नाम ही बैटरी पड़ गया था . टोर्च खोजते तो बैटरी बोलते . रेडियो के सेल या बैटरी . 

फिर आया ज़माना घडी का सेल , टी वि रिमोट का सेल , फिर बाद में एयर कंडीशन के रिमोट का सेल . 

अब इस नए जमाने ने सब कुछ बैटरी पर निर्भर करवा दिया . मानों लाईट का वैकल्पिक श्रोत यही बचा है . वह भी किसी न किसी ऊर्जा पर निर्धारित . मतलब ऊर्जा का श्रोत बनाए रखने के लिए आप को फुल ड्यूटी लगेगी . 


इनवर्टर बैटरी , सोलर बैटरी , लिथियम बैटरी , तेज़ाब बैटरी ! 

साल में 12 इनवर्टर बैटरी 2 सोलर  बड़े बैटरी , 2 कार की बैटरी , एक स्कूटी की और एक बाइक की बैटरी का ख्याल रखना पड़ता है . उफ्फ्फ बैटरी ! 


हमेशा अंदेशा सा लगा रहता है . कि कब बैट्री बोल जाए . बतेरियां लेते समय 3 साल की गारंटी , 5 साल की गारंटी और दो साल की गारंटी . 

कभी कभी मन करता है सभी बैट्री को एक साथ बदलवाने भेज दूँ  . सभी की तारीख एक समय . लेकिन डर लगता है इनकी तारेखीं निश्चित नहीं होती . 

बस बतेरी का पानी सुलभ रखो . और जब कभी गड़बड़ करे . तो रास्ते हैं . एक बैटरी को खोल के जुम्मन मियाँ के यहाँ ले जाओ . और उसे चार्गिंग पर लगवाओ कम से कम आठ घंटे . बैटरी उठी तो ठीक , वरना डेड . दुसरा सबसे सहज और खर्चीला . फोन करो , कंप्लेंट करो . और इंतज़ार करो . उनकी कृपा होगी तो घर बैठे वरना बैटरी सर्विस सेंटर दौड़ो . 


इन बैटरियों में तेज़ाब दौड़ता है . अत्यंत जलनशील पदार्थ . सफ़ेद को पीला कर दे और कपडे लट्टे , लोहा और चमड़ी को जला दे . 


जहां रख दो वहाँ की फर्श , दीवाल खाने लगती है . 

बहुत बार सोचता हूँ . क्या सच में जो बड़े अमीर लोग होते होंगे . वो अपनी बतेरी का ख्याल रख पाते होंगे ? वो देखभाल करते होंगे या उनके नौकर ! 


पता नहीं बैटरी इतनी भारी क्यों होती है . गाँवों में मैंने देखा है बरसात में , सर्दियों में , गर्मियिओं में ग्रामीणों को बतेरियाँ अपने दुपहिया वाहन पर ढोते हुए . 

ऐसा लगता है बहुत बड़ा कारोबार है बैटरी . 


सरकार की इतनी बड़ी बड़ी इमारतें , बड़े बड़े प्रोजेक्ट्स , अधिकारियों , मान्न्नियों के घरों की बैटरियां कैसी होती होंगी ? 


इतना तेज़ाब आता कहाँ से होगा ? 

ये वो वाला तेज़ाब नहीं होता , जो हम टॉयलेट क्लीनर के नाम से लेते हैं . मुझे याद है शहर की एक गली , जहां तेज़ाब मिलता था . पक्का वाला तेज़ाब . पर इधर कुछ सालों से खुले आम बिकना बंद हो गया है .

 मेरे यहाँ एक टॉयलेट साफ़ करने वाली महिला आती थी . जिनका नाम था कांति ! 

वो बहुत तेज तर्रार महिला थी . एक दम तूफ़ान के साथ आती , काम करती और गायब हो जाती . जब वो जाती थी तब बाथरूम एक दम चमाचम . कई घनते मछार और मक्खी बाथरूम में आते नहीं थे . क्यों की वो तेज़ाब से बाथरूम साफ़ करती थी . हार्पिक , साबुन के विकल्प के बाद भी वो तेज़ाब इस्तेमाल ज्कारती थी . 

हमेशा उनको देख कर लगता था की वो शराब का सेवन करती होंगी  उनके कठिन काम को शायद शराब की जरुरत हो .... . 

एक बार मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि वो शराब नहीं पीती. उनके चेहरे पर तेज़ाब का भभका स्किन को जला देता है . 


अभी कुछ दिन से वो कैंसर से जूझ रही हैं . उन्ही के स्थान पर नयी सफैकर्मी अब हार्पिक का इस्तेमाल कर रही हैं . 

कांति तेज़ाब से खेलती थी . ऐसे ही बैटरी बनाने वाले , सुधारने वाले , पुरानी बैटरी का लें दें करने वालों की क्या दशा होगी . राम ही जाने ! 


मुझे तो अपनी ही चिंता खायी जाती है  . 


इस सावन तो गजब ही हो गया . एक साथ घर की , दो कार की , दो दुपहिया की बैट्री मात्र 15 दिन के अंदर अचानक से डेड हो गयी .  एक पांच साल पहले , एक 3 साल पहले और एक 2 साल से कुछ कम पहले खरीदी गयी थी . उनमें खरीदने की तारीखें नहीं थी . मैन्युफैक्चरिंग से पता चलता है . 


एक अचानक खुश दिन आप के चक्कों की बतेरियाँ डेड हो गयी . जिस गाड़ी को स्टार्ट कर रहे हो , वो हो नहीं रही .  असंभव ! 

बारी बारी बैटरी , कार मैकेनिक को रिक्शा से कभी तो कभी बन चुकी बतेरी वाले वाहन पर ढोते रहते . 

मैंने कई बतेरी वालों से बात की . उन्होंने कहा की आजकल बहुत ज्यादा कंप्लेंट आ रही हैं . 


ये बत्तेरियां भी काफी नाच नाचती हैं . पता नहीं इनपर नाचने के लिए मैं तैयार था . 







मंगलवार, 4 अगस्त 2026

बुद्ध की नमी !



कितनी शांत है यहाँ 

बुद्ध की शरण में 

लताएँ ! 

बेझिझक लिपटने की 

आज़ादी के आनंद 

में सराबोर 

पैरों से होते हुए 

नाभि , वक्ष स्थल 

फिर गले पड़ते  , 

दुशाला बन जाती हैं  


उम्हे बढना है 

बुद्ध को ध्यान में बैठे रहना है 


मानसून की नमी 

में कुछ तो ख़ास है 

लताएँ बेधड़क बढती हैं 

तेज़ी से सभी वनस्पतियों से आगे 

चढ़ जाना चाहती हैं 

कहीं भी , कितनी भी ऊँचाई में 


जीवन के निर्जन समय में 

अपने तत्व को सुरक्षित रखना 

बारिश के पहले बोसे से 

फूट पढ़ना 

उन्हें कितना अच्छा आता है 


भरोसा ऐसा ही तो होता है 

शांत , ध्यान में बैठना 


सावन के हरे और 

बुद्ध के ध्यान की गहराइयों 

में डूब के लताएँ 

खिल उठती हैं 


वर्षों से बुत बने बुद्ध 

अब संसार से अलोप हो रहे हैं 


होटलों , स्पा सेण्टर  , ओयो में 

या कहीं अपने  काल के 

अवशेषों स्तूपों में 

विराजमान हैं 


बुद्ध की नमी 

अपना सावन तालश रही है .....


मंगलवार, 28 जुलाई 2026

सिगरेट !

सड़क किनारे

सड़क किनारे माचिस के खोखो पर
सिगरेट फूँकती आकण्ठ
तनाव की नज़र
कौन सी फ़िल्म देखती होगी ?

न जी गयी कई कहानियाँ
फेफड़ों से धुआँ उगलती

मुँह
साधारण से दिखने
हर कश में बदल जाती होंगी
जितनी गहरी कश

उतनी गहरी ख़्याल की बुनावट

मंत्री की सुरक्षा काफिले का
पहला व्यक्ति बेस्ट ट्रैफिक मैनेजमेंट का
अवार्ड नही लिए होता।

मैं जब वहां होता हूं ।

मैं जब वहां होता हूं । यहां नहीं होता। मैं जब यहां होता हूं , वहां  नहीं होता हूं। सच ! मैं न वहां रहता हूं , ना यहां रहता हूं। मैं ! असल में मैं  हूं ही नहीं । मैंने छोड़ा था बहुत पहले खुद को ठीक उसी जगह। जहां पर मैं था। मैं वहां से घूम घूम के आता रहता हूं , लगभग हर मौसम में। पर "मैं ", मुझे महसूस क्यों नहीं होता । ये "मैं" पहले मैं और तुम हुआ । फिर हम हुआ। फिर हमारे ।
       भागते भागते "हमारे " थकने लगा। हमारे का बोझ बढ़ता रहा। हमारे लोग। हमारी जमीन। हमारा पैसा। हमारा दर्द। हमारे की पीठ पर सवार "मैं " डरने लगा। मैं हूं कौन यार ? डर....?
       भक्क ! मैं बीज हूं। उगा ... बढ़ा... पेड़ हुआ... फिर पंछी हो गया। उड़ गया ! उड़ के जा बैठा दूसरे पेड़ पर। मैं उड़ने में पारंगत तेज़ उड़ने लगा। 

चौकीदार

 आज मैंने फिर एक चौकीदार रखा । इससे पहले भी रखा था। पर वो न जाने क्यों चला गया। उसे जाना था , इस लिए वो चला ही गया। उसने ज्यादा दिन काम नहीं किया था। बुज़ुर्ग सा था। कहीं ऊंची जगह से चोरी , कामचोरी के आरोप में भगा दिया गया था। उसके तुरंत बाद वो मेरे पास आया । मैंने उसे रख लिया।  किस्सागोई उसपर खूब जचती थी। लंबी चौड़ी हांकना।  उसकी सीटी की लम्बी आवाज़ उसकी बीड़ी से बड़ी होती  और वह लाठी जमीन पर ऊंची आवाज़ में बजाता । 

    अजीब सी कहानी थी उसकी। अधेड़ उम्र से बुढ़ापे के बीच में शादी। और फिर एक बच्चा अपना। दो उसकी  पत्नी के  पहले से थे। उसकी पत्नी झारखंड के किसी आदिवासी इलाके से थी। कभी किसी जगह शराब के ठेके पर सेल्समैन थी। मैं चौकीदार को मेरे यहां चौकीदारी करने से  पहले से जानता था। उसकी बातों में कई बार आया। कई बार लगा कि उससे कह दूं कि जाओ भाई। तुम्हारे हिस्से का संघर्ष झेलना फिलहाल मेरे बस की बात नहीं। नहीं कह पाया कुछ भी उससे। उसकी पत्नी मुझे अक्सर फोन कर के कहती कि उनका ख्याल रखना। उसके बदले में वो मुझे झारखंड की कोई पारंपरिक मिठाई खिलाने की बात कहती। फिर फोन रखते वक़्त कह ही देती। " भाई जी , बच्चे हैं, खाना बनाना पड़ता है और जानवर देखने पड़ते हैं। इसलिए वहां आना संभव नहीं " और ये तो बिल्कुल बेकार आदमी है। बस इसका ख्याल रखना। जितना कमावत है सब बहाए देत है। पर हम से प्यार बहुत करता है। जहां वो पहले काम करता था वहां उसके साथ काम करने वाले कम उम्र के लड़के उसकी पत्नी को फोन कर के परेशान किया करते थे। खैर उसको जाना था । वो चला गया। 

 वो कुल जमा 7 रातों में 3 ही दिन जाग पाया। बाकी 3 दिन सोया । एक छुट्टी भी । उसके बावजूद 500 रुपए मांगने की हिम्मत उसने की । उसने बताया कि उसकी पत्नी की तबियत खराब है।  जब वो छुट्टी से लौट कर आया। उसने बताया कि जन्माष्टमी में उसने झांकी सजाई थी। रात भर जागरण हुआ। पूरे गांव को प्रसाद बटा। उसने वो सारे पैसे उसमें खर्च हो गए। वो उसका आखरी दिन था ।


  साल पहले जब मैं यहां आया था। मुझे बताया जाता कि यहां बहुत चोरियां होती है। चोरियां का कारण जानने में किसी को दिलचस्पी नहीं रहती। पर मुझे थी . क्यों कि चोरियां वहां होती हैं जहाँ कोई रहता नहीं है या रहते हुए भी लोग निष्क्रिय रहते हैं . 

मैं आश्चर्य से सोचता। "कस्बे के मुहाने पर एक ऐसी जगह जहां दस बीस घर फौजियों के। क्षेत्रीय विधायक के कार्यालय की गश्त सुना है बड़ी तगड़ी होती है। फिर भी इतनी शातिर चोरियां। कभी कभी दबंगई के साथ चोरियां। " 

        मेरे घरवाले मुझसे पूछते हैं कि मैं जागता क्यूं हूं। जागे न तो चोरी हो जाएगी । मुझे आज तक कोई आदमी चोरी होते नहीं दिखा। और न ही आस पास के लोग उठते दिखे . 

ये नया चौकीदार , चौकीदार नहीं लगता है .  



ये दुनिया !


कभी छोड़ देते ये बच्चों की दुनिया 

कभी पूछ लेते मांओं की दुनिया

कभी हम जमीन पर आकर तो देखें

हजारों पिटारों में सहती यह दुनिया

मेरा काम है मैं लड़ूंगा यूं हीं

सितारे जमीन पर ना आते कभी... 

मेरा साथ दोगे तो पहलू में दुनिया


पुकारो तो मुंह फेर लेती ये दुनिया

न कहती न बुनती न सुनती ये दुनिया

अजीब ओ गरीब अह्मकाना ये दुनिया

ये दुनिया नहीं आशियाना है दुनिया ! 




लिखना जरुरी है !

 लिखना जरुरी है . क्यों की लिखे को मिटाया जा सकता है . लिखने के पहले , लिखने वाली बात पर सतर्कता से ध्यान लगाया जाता है . ध्यान लगाने से भीतर की दुनिया की सैर की जा सकती है . सैर से न दर्ज हुयी कहानियां हलचल पैदा करती है . निकलने को बाहर आतुर होती हैं . न जाने उन कहानियों से किनका भला होगा ? फिर भी लिखना जरुरी है क्यों की लिखने से मन शांत होता है . 

मैं जब लिखने को पहचानने की कोशिश करता हूँ . तो मुझे अधिकतर लोग लिखते  हुए दिखाई देते हैं . थाने का मुंशी तहरीर लिख रहा होता है . डॉक्टर पर्चे लिख रहा होता है . मां हिसाब लिख रही होती है . साहित्य लिखने वाले कवितायेँ लिख रहे हैं , कहानियां लिख रहे होते हैं . पन्ने दर पन्ने लिखा जा रहा है . पन्नों की चिंता किसे है ! पन्ना ख़त्म होते ही दूसरा पन्ना इस्तेमाल आता है . उसके ठीक पहले का पन्ना उम्र काट रहा होता है . फिर भी लिखना जरुरी है . क्यों की लिखने से मन के पन्ने खाली होते हैं . खाली मन पर कोई सुखद याद लिखी जा सकती है . 

मैं अपने आस पास हर शख्स से लिखने की आदत में विस्तार की सलाह देता हूँ .   

मैं रह गया !

 

मैं कहने की चाह में 

कहता कहता रह गया 

चाहत, चिता, चित्त 

ढोते ढोते रह गया  


रात जागी दिन जगाया 

सोता सोता रह गया 

बे - बात , बित्ता बात 

सुनते सुनते रो गया !


औरतें !

 तीन माएं खो चुका हूँ . मेरी अम्मा , बड़ी अम्मा , मेरी दूसरी माँ . तीनों के घर बेतरतीब चल  रहे हैं . सब परेशान हैं . उस बात से जिस बात को कभी भी तरजीह नहीं दी गयी . औरत ! 

हां औरत ! 

या यूँ कहें औरतें .... ! 

अम्मा बहुत दयालु थी . वो इसी को भूखा नहीं सोने देती थी . घर के बच्चे , दादा जी , पापा को , काम को आये लेबरों को , किसानों को खाना जरुर देती थी . वो अन्नपूर्णा थी . घर का लें दें सब उन्ही के हांथों . वो जब बैठीहोती थी . तब वो एक राजा की रानी की तरह बैठती थी . 


बड़ी अम्मा ! एक दम शहद सी . उनकी भाषा , सा को श कहना और हमेशा शिष्टाचार के नितांत हिलोरें पैदा करना . मास्टरनी ! अकेले जीप से विद्यालय के कार्यों से दौड़ती , भागती अपने बच्चों को एक आदमी से बचाती रहती थी . सरकारी नौकरी का पूरा का पूरा मान रखना . अम्मा की भाषा बोली स्वयं में एक शिक्षक थी . 


मेरी माँ के बाद दूसरी माँ ....

क्या गजब का स्टैमिना था उनमें . सुबह से लेकर शाम तक काम काम और काम .... ! उसकी जुबान पर हमेशा दुवाएं रहती थी . हाय मोरा बेटा , हाय मोरी बिटिया .... मा को कई साड़ी भाषाएँ  आती थी . पंजाबी , मराठी , गुजराती . हिंदी , अंग्रेजी सीख रही थी वो .  दुनिया भर की ख़ुशी का भार जैसे उनके ही कन्धों पर था . 


तीनों माओं के जाने के बाद सब के घर तितर बितर हुए पड़े हैं . 

माओं के जाने का सिलसिला ऐसा चला . दो अस्पतालों की नाकामी में चली गयी . एक अपने आप ही छोड़ गयी एक भरा पूरा परिवार . दूरी की डोरी बहुत मजबूत नहीं होती . 

अम्मा ने आखरी के कुछ महीनों में वो दर्द देखा है . जिसे देख के तीमारदार घबरा जाए . मैं भी बना था चौबीस घंटे के इए तीमारदार . अम्मा के यहाँ से नली , वहां से नली , पूरा शरीर फूला हुआ . आँखें भिछी हुयी . अम्मा अम्मा कहने पर दीप्तमान होकर फिर बुत जाती . डॉक्टर कहते और चौबीस घंटे , और चौबीस घंटे ... ! कभी साँसे चला दिखाते तो कभी आँखें ! लाखों रुपये का मीटर चल रहा . एक महीने वेंतिलाटर पर . हमारी आधुनिक क्रान्ति के  उपकरणों ने एक महीने माँ को ज़िंदा रखा . 


बड़ी अम्मा के डायपर घर के पिछवाड़े पेड़ों में टंगा जब जब मैंने देखा . मुझे हैरानी होती रही . हमारी कॉलोनी के सामने एक बड़े से तालाब में मैंने कई एडल्ट डायपर कुत्तों को नोचते देखा है . वो दोनों दृश्य वीभत्स दृश्य हैं . कैसे कोई माँ बाप अपने माँ को इस तरह  से समाज में प्रतिष्ठित कर सकता है ? 




या मैं पागल हो जाऊं .... !

आज फिर सुबह हुयी बीती रात के बाद . आज फिर सूरज निकला अँधेरी रात के बाद . घड़ी अपनी गति से आगे बढ़ रही है . घडी के साथ साथ सुबह बीत रही है . कुछ देर बाद दोपहर होने को है . और फिर शाम . फिर रात . ऐसा लगता है सोने और जागने के बीच जिन्दगी बीत रही है . यूँ ही बीतते रहने के साथ रहते हुए अब  ऊब सी हो चली है . इस ऊब से निपटने के लिए कभी टी वी का सहारा लेता हूँ , कभी रेडियो का . 
   वैसे मोबाइल तो हमेशा साथ रहता है , धड़कन की तरह . हाँ , मोबाइल अब हमारी जिन्दगी की धड़कन है . मोबाइल न हो तो ऐसा लगता है जैसे किसी ने साँसें छीन ली हों . इसलिए वह हमेशा साथ रहता है . सुख , दुःख , उत्सव हर समय कभी ऊपर वाली बायीं जेब में  तो कभी हाँथ में तो कभी पेंट के जेब में .
    बड़ा सा घर है . घर में सब हैं . जो एक घर में होते हैं . सारी सुविधायें हैं जो एक घर में होनी चाहिए भी सुलभ हैं  . एक काम करने की जगह है . जहां एक दर्जन लोग काम करते हैं . हम सभी के घरवालों को मिला कर करीब आधा सैकड़ा लोग तो उस काम की जगह के होने से चल रहे हैं . 
   यह सब होता चला आ रहा है एक दशक से ऊपर के समय से . इस चलने को क्या जिन्दगी कहा जा सकता है ! कहते तो सुनता अपने इर्द गिर्द अभी लोगों कि हाँ यही जिन्दगी है . अगर यही जिन्दगी है . तो यह भरती क्यूँ नहीं है भीतर को . हमेशा खाली खाली सा महसूस हुआ करता है . इतने संसाधन , इतने लोगों से घिरे  होने के बाद भी यह खालीपन अजीब सा महसूस कराता रहता है . लम्बे समय से इस अजीब से महसूसने से छुटकारा पाने के लिए क्या विकल्प हो सकते हैं ? 

बिक गयीं संवेदनाएं ....

 बिक गयीं संवेदनाएं ....


बिक गयीं संवेदनाएं 

थक गया है जोश रे 

क्या करें हम फिर से आके 

ये बताओ होश में 

क्या करें हम फिर से आके 

ये बताओ होश में ....



सोमवार, 24 नवंबर 2025

कौन हो तुम ....



कौन हो तुम 

जो समय की खिड़की से

झांक कर ओझल हो जाती हो 

तुम्हारे जाने के बाद 

तुम्हारे ताज़ा निशान 

भीनी खुशबू और 

गुम हो जाने वाला पता 

महसूस तो होता है 

पर तुम्हारा सामना करने की

राह नहीं मिलती 

तुम्हारे होने न होने के बीच

का फासला हमेशा धुंधला

ही क्यों होता है ?


कौन हो तुम 

जो ठहरना भूल गई हो 

हवा से बातें करतीं 

पंख फड़फड़ाती उड़ती

उन्मुक्त आकाश में 

पहाड़ी सर्द हवाओं पर सवार 

ऊंघते जीवन को 


झंकृत कर जाती हो ! 



रविवार, 2 नवंबर 2025

राह कटे संताप से !

फिर झुंझलाकर मैने पूछा

अपनी खाली जेब से 

क्या मौज कटेगी जीवन की

झूठ और फरेब से 

जेब ने बोला चुप कर चुरूए

भला हुआ कब ऐब से 


फिर खिसिया कर मैने पूछा

अपने भारी पेट से 

क्या भार घटेगा पेट का

रुखी सूखी खाए के 

पेट ने बोला चुप कर लुबरा 

भार घटे ना अघाये से


फिर तन्ना कर मैने पूछा

अपने आत्म विवेक से 

क्या राह कटेगी जीवन की

संघर्षों की थाप से 

विवेक ने बोला चुप कर पगले

राह कटे संताप से !



मंगलवार, 28 अक्टूबर 2025

प्रिय पहाड़ , शायद तुम्हे छोड़ने आऊँ !

प्रिय पहाड़ ! 

तुम आ ही गए , यहाँ . मैदान में , खेतों में . तुम्हारी खुनकी करीब एक हफ्ते पहले महसूस हुयी थी . सुबह अपने खेतों की तरफ गया . तो देखा धान की पतवारों पर ओस की बूंदें झूम रही थी . मैंने ऊँगली लगाई और वो ओस मेरे ऊँगली के पोर पर उतर आई . खेतों में जलाई जाने वाली पराली आसमान के नीचे जमने लगी . दादा की झोपडी हलकी धुंध में दिख नहीं रही थी . दद्दू के ट्यूब वेल से पानी के साथ हलकी भाप सी दिखने लगी . दिन तेजी से ढलने लगे . शामें शांत होने लगीं . सामने वाले बाबा की झोपडी से पत्तों के जलने की चरचराहट सुनाई देती है साफ साफ़ . 
    बीच में दो दिन बड़ी गर्मी रही . लगा कि इस बार भी दिसंबर में ही आओगे . बस अपना तौर  दिखा के चले गए . गर्मी , उमस , काले बादल , 24 घन्टे  रिमझिम झड़ी के बाद तुम तो बौरा गए ! स्वेटर , कम्बल और लिहाफ निकालने तक का समय नहीं दिया . दिन भर हम सब ठिठुरते रहे . लोहे की बाल्टी में रखा रात का पानी जैसे बर्फ हो गया हो . नहाने के लिए एक मग्घा पानी काफी लगा . 
    हमारे कर्मचारी , आड़ ढूँढने लगे . अभी कुछ दिन पहले ही उन्होंने मुझसे पूछा था . कैसा रहेगा मौसम अगला . मैंने कहा था पहाड़ आयेंगे ऊँचें ऊँचें . शायद हिमालय भी . अबकी ठण्ड रिकॉर्ड तोड़ेगी . बारिश के पहाड़ गिरे इस बारिश . तो ठंढ का भी पहाड़ आएगा यहाँ चल के . 
    मैं कई सालों से पहाड़ नहीं जा पाया . कई चट्टानें दरकिन हैं , कई बादल फटे हैं . फिर भी लाखों की संख्या में लोग पागलों की तरह तुम्हारी ओर खिचे चले आते हैं . सूना है उनके स्वागत में तुम्हारे कुबढ़ पर पांच सितारा व्यवस्थाएं रहती हैं . 
    खैर छोडो , बाकी बातें फिर कभी ....
तुम आये शीत लहर के रूप में . पीठ पर जली चमड़ी की पपड़ी अब उकत जायेगी . बिजली का बोझ कुछ कम हो जाएगा . बदन में चुस्ती फुर्ती बनी रहेगी . तुम्हे तो याद होगा कितनी बार मैंने तुम्हारे कन्धों पर पैदल यात्राएँ की हैं . तुम तो हवा में उड़ कर आये हो . जब से मैंने पहाड़ जाना छोड़ दिया है . वहां से कोई न्योता भी नहीं आता . उतरती सर्दी हो सकता है मैंने तुम्हे छोड़ने आऊँ ! 


बोलो सब नेतन की जय !

पास में न है फूटी कौड़ी 

मांगे झारा वोट 

बातन के बतासा फोड़े 

ढीली करें लंगोट 

राजनीति का चढ़ा के पारा

मजा करें विस्फोट


नेता जी जब सुर्रा छोड़ें

पांव पड़े सब छोट 

बड़े बडन संग फोटू मढ़ावें

पर्दा में सब खोट 

बाप मतारी , बच्चा घरैतिन

पीसें घरमा होंठ


बदली हवा राजनीति की

तब नेता बनिगे बोट 

बना सिंहासन बढ़ा कारवां

परि गई लूट घसोट 

चर चर पहिया करें सवारी 

भक्तन पर सब चोट

नेता पहुंचे राजमहल मा

जनता ढूंढे रोट 


नेता नहीं, अब ब्रम्ह देव हैं

स्वीकार करें सब नोट

शादी बियाह औ काम काज

बे काजन को कोट

गुरगन संग दरबार चलावें 

फरियादिन की खोट

देख दायरा बढ़त कलेजा

दांव परे हर गोट

 

लाल गुलाबी गाल बजावें

खद्दर पहिने मोट 

जिन्दन पर हाय हाय 

मुर्दन पर सोंट 

पांच साल की करनी धरनी 

पल मां जाएं घोंट

सेल्फी रील और मीडिया

वायरल होय लहालोट ...


बोलो सब नेतन की जय !

तुम कह दो तो मन मीत बनूँ !



मन पहले भी था पार प्रिये 

मन आज भी है चीत्कार प्रिये 

तुम कह दो तो संसार तजूं 

तुम कह दो तो मझधार चुनूं 


मन आज का न जंजाल प्रिये

मन भीतर बाहर सवाल  प्रिये 

तुम कह दो तो रस मोह पियूं 

तुम कह दो तो बस टोह धरुं 


मन धीर तुम्हारे धीश प्रिये 

मन व्याकुल चंचल शीश प्रिये 

तुम कह दो तो परवान चढूं 

तुम कह दो तो पतवार बनूँ 


मन बना बनाया राग प्रिये 

मन सावन ,भादंव, फाग प्रिये 

तुम कह दो तो कोई गीत बनूँ 

तुम कह दो तो मन मीत बनूँ ! 


मन पहले भी था पार प्रिये 

मन आज भी है चीत्कार प्रिये ! 

सोमवार, 27 अक्टूबर 2025

आधा चुप आधा बुत !



काम का भूखा हूँ

पैसों से सूखा हूँ 

आधा चुप आधा बुत

घूमता फिरता हूँ मैं


बाज़ार में बेंचता अपना 

माल और हुनर 

इनसानियत की आड़ में 

बहुत कुछ दे आता उधार 

आधी बचत , आधी खपत 

से जिन्दगी जी रहा हूँ मैं 


खुश रहता हूँ मगर 

कभी कभी अकेले में 

दहाड़े मार हंसता भी हूँ 

कार के जमाने में बाइक पर 

झूमता , गीत गाता 

रो पड़ता हूँ मैं 


बाज़ार इतना चालू हो गया है 

अब कि उधार लिखा नहीं जाता 

व्यवहार लिखा जाता है 

रिश्तों में , नातों में 

बातों के ताने बाने में 

ठहरने की कोशिश में 

और गिर जाता हूँ मैं 


उठता गिरता संभालता 

पालता हूँ बीस का पेट 

पालना महंगा नहीं होता 

महंगी होती है उधारी 

मांगी नहीं जाती, बरती नहीं जाती 

बरतने की साध में 

सिर्फ 6 महीने जीने

की बात करता हूँ मैं 


बोलना और

अपने बोलने को सुनना 

की आदतों से घिरा 

आधा चुप आधा बुत 

बन जाता हूँ मैं !


 


शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2025

आओ पेट्रोल टंकी !


आओ  पेट्रोल टंकी !


बड़े बड़े चक्के जो घूमें 

बड़ी बड़ी मशीने घूमें 

घूमें सब बाज़ार 

आओ  

पेट्रोल टंकी .... 

आओ पेट्रोल टंकी ! 


तेल भरें हम दिन और रात 

कहने को होती बरसात 

टंकी कहती छोडो यार 

आओ 

पेट्रोल टंकी ! 

आओ पेट्रोल टंकी ! 


मोबिल, डीज़ल और पेट्रोल 

ग्रीस , यूरिया फुल कण्ट्रोल 

कूलैंट मारे ठंढी हिलौर 

आओ 

पेट्रोल टंकी

आओ पेट्रोल टंकी ! 


जय जवान है जय किसान 

तेल नहीं ये भारत की शान  

ये है भारत पेट्रोलियम 

आओ

पेट्रोल टंकी 

आओ पेट्रोल टंकी !  



रविवार, 28 सितंबर 2025

कोई है जो इन दिनों...

 


कोई है जो इन दिनों 

तितलियों के भेष में 

उड़ाती रंग पंखों से


कोई है जो इन दिनों

बारिशों के देश में

भिगाती अंग फाहों से


कोई है जो इन दिनों 

ख्वाहिशों के शेष में 

सताती संग यादों से 


कोई है जो इन दिनों 

कैसिनो के कैश में

जिताती चाल चालों से


कोई है जो इन दिनों

रोमियों के देश में

जगाती रात आंखों से


कोई नहीं है इन दिनों

पत्थरों के ठेस में 

भुला दी बात बातों से ।

बच्चों को उड़ने दो ..

 उड़ने दो , उड़ने दो  बच्चों को उड़ने दो ... गर नाक अटक जाए  तो भी तो  उड़ने दो ..   जिस ऊर्जा का  संचार प्रवाह  हो उद्दंड  उसको भी  उड़ने दो  कह...