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रविवार, 13 अगस्त 2017


अहसासों के खारे समंदर में इंसानियत
यह बच्चा 6 दिन का है मात्र, जन्म देते वक्त माँ चल बसी। ये बच्चा यूँ पान की दुकान पर फटी आंखों से किसी कमी को न खोज रहा होता। आज इसकी माँ होती तो अपने सीने से चिपकाए घूमती, लाड़ करती दूध पिलाती। माँ के सामने बच्चा चला जाता तो भी चिपकाए घूमती कई दिनों तक। बच्चे को पान वाले ने रख लिया है। कहता है कि ज़ू में भेजते तो बड़े बंदर इसे परेशान करते। इसलिए उसने रख लिया, यहां बच्चे को बांधने की जरूरत नही पड़ी। वो शांत है बहुत। माओं वाले बच्चों जैसा उद्दंड, चुलबुला नही है। वो मान लेगा उस पान वाले को अपनी माँ। पान वाला दुकान के पास किसी को सिगरेट सुलगाने नही देता, इस नन्हे बच्चे की वजह से। ये इंसानियत के अहसासात इंसानियत से भरोसा उठने नही देते। दूध मुहे बच्चे के सामने माँ का चला जाना...धीरे धीरे घाव भर जाते होंगे बढ़ते वक़्त। पर माँ के सामने बच्चे का चला जाना...?

शनिवार, 12 अगस्त 2017

गोरखपुर के अस्पताल में आक्सीजन की कमी के चलते 60 बच्चों की मौत पर खुद और अपनी बिरादरी से सवाल

पत्रकार क्यों बचे जवाबदेही से ?

गोरखपुर की घटना के बाद सरकार कटघरे में है, प्रशासनिक व्यवस्था कटघरे में है, व्यवसायी कटघरे में है और पत्रकार ? चौथा खंभा...? दैनिक अखबार, इलेक्ट्रॉनिक चैनेल, न्यूज़ पोर्टल, सैकड़ों की संख्या में पत्रकार को इस काण्ड में अपनी विफलता दिखती है कहीं ? सी एच सी, पी एच सी से लेकर जिला अस्पताल  - मेडिकल कालेज के गेट, कैंटीन या दफ्तरों पर यह भीड़ झुंड में रहती है। क्राइम के बाद अस्पताल सबसे महत्वपूर्ण बीट मानी जाती है। फिर इतनी पारखी नज़रों से ये चूक कैसे ?...क्यों नही घटना से पहले खामियों की खबरों से हाहाकार मच गया, क्यों इतनी बड़ी खबर स्थानीय संस्करणों के पहले पन्ने पर बैनर की तरह घटना से पहले नही चमकी ? क्यों नही किसी खबर की कॉपी में इतनी धार थी कि शासन प्रशासन मजबूर हो जाता उस खामी को दूर करने पर।
       प्रदेश के मुख्यमंत्री का गोरखपुर अस्पताल दौरा केवल सरकार और जिला व अस्पताल प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण नही था, पत्रकारों के लिए भी उतना ही था। उतनी ही जिम्मेदारी, उतनी ही लापरवाही, उतनी ही फिरी आंखें पत्रकारों की भी है, जो दिन के कम से कम 4 घंटे अस्पताल में बिताता है। सरकार, अधिकारी, कर्मचारियों, ठेकेदारों की बदली होती है, पर बीट का रिपोर्टर सालों साल वहीं रहता है, बढ़ता भी है तो उसकी नज़र और पैनी होती है। पर पत्रकार कहीं न कहीं समझौता करता है, कुंद हो जाता है।
        अस्पताल की हर सुविधा पर उसका हक़ आम जनता से पहले बन जाता है। अस्पताल की ठेकेदारी में उसका हिस्सा किसी न किसी रूप में मिल ही जाता है। बीट का रिपोर्टर अस्पताल की रग रग से वाकिफ होता है। क्यों नही वरिष्ठ/तेज़ तर्रार/तोपची/कलम उखाड़ पत्रकारों में से किसी एक कि आँखों में यह कमी किरकिरी नही बनी ?...हम बतौर पत्रकार इस जिम्मेदारी से बच नही सकते। हम हर घटना के बाद सरकार, प्रशासन, जनता को आइना दिखाते हैं और उस आईने के पीछे रह कर बाइज़्ज़त बरी हो जाते हैं। हमें ऐसी घटनाओं के बाद कुछ महत्वपूर्ण छूट जाने की ग्लानि तक नही होती। क्यों नही ऐसा महसूस होता कि हाँ उस जगह पर था पर ये खामी नही सूंघ पाया, ऐसा कुछ लिख नही पाया।
           क्यों कि हम उसी सिस्टम के पहिये हो जाते हैं, सिस्टम की खामियों से उपजे संकट के बाद उसी सिस्टम के प्यादों को फांसी पर चढ़ा देने की बात करते हैं। "खबर का असर" का असर दूसरे दिन के प्रकाशन में दिखता है, बेअसर खबर का कोई जिक्र नही होता। हमारी खबरें सिस्टम की तरह बासी हो चुकी हैं, अपनी धार खो चुकी हैं। हम उतने ही लापरवाह हैं, गैर जिम्मेदार हैं जितना सरकार और प्रशासन।

तस्वीर: सांकेतिक (साभार गूगल से)

बुधवार, 9 अगस्त 2017


                                "मियां जान"

पिछली बकरीद "सबा करीम" का जिक्र हुआ था। इस बकरीद "मियां जान" की बारी है। मियां जान बेहद रौबीले हैं। कद काठी लंबी गठीला है। इन्हें मालूम है इस बकरीद अल्लाह की नज़र में ज़िबह होना है। पर तुर्रे में कोई कमी नही है। इनका हुनर और बेलौसपन इन्हें अन्य से अलग पहचान देता है। दो पैरों पर चलने के शौकीन हैं ये शौक को इन्होंने आदत में शुमार कर लिया है, दीवार पर चढ़ने की कोशिशें हमेशा नाकाम रहती हैं हालांकि मुसलसल कोशिशें जारी रहती हैं।
      इनके रहबर दो खसी ख़रीद के लाये थे। इनके नयन नक्श, अदाएं और फुर्ती अल्लाह को बेहद पसंद आएगी। लिहाज़ा ज़िबह की कतार में अव्वल का मुक़ाम मियां जान को हांसिल होगा। मियां जान को क़त्ल की तारीख मालूम है, इसलिए वो ज़िहादी हो गए हैं। जिहाद के मायने होंगे किताबों में, ज़हनों में अलग अलग। क़त्ल की तारीख मुकर्रर हो पर जीने की छटपटाहट, जियाला पन कई लोगों की ज़ुबान की लज़्ज़त बढ़ा दे। इससे बड़ा ज़िहाद और क्या होगा भला। मियां जान अपनी खूबसूरती के चलते रहबर की चौखट पार कर मोहल्ले की आंखों का सुरमा हो गए
हैं। अल्लाह को भी खूबसूरती पसंद आती है। मियां जान की आंखों में खौफ नही है, जी भर जी न पाने का मलाल नही है। ज़िन्दगी छोटी ही सही जीने के सलीके से बनती बिगड़ती है। मियां जान को दोबारा देख पाना आंखों में खारा समंदर भर लेना है। दुआ है मियां जान ज़ुबान की लज़्ज़त भर ही न रह जाएं ज़िन्दगी के सबक बन जाएं।

तस्वीर : इठलाती मियां जान की एक सेल्फी

सोमवार, 7 अगस्त 2017


खलीफाओं का बिरहा

पन्ना लाल ख़लीफ़ा एक हाँथ में गमछा और दूसरे हाँथ में माइक पकड़े पहले लंबी तान लगाते हैं। फिर मंच के नीचे बैठे रमेश ख़लीफ़ा, मुन्नी लाल ख़लीफ़ा से बिरहा गाने की इज़ाज़त लेते हैं। अपने सहयोगी नगाड़े पर तैयार बाबा की सहमति से शुरू हो जाते हैं बिरहा गाने। पन्ना लाल ख़लीफ़ा दिन में चाट बताशे का खोमचा लगाते हैं और अक्सर शाम को बिरहा के मंच के बेताज बादशाह हो जाते हैं। वो बिरहा की विशेष धुन में गांधी- गोडसे, नेहरू-इंदिरा, शंकर पार्वती, पाकिस्तान - चाइना की चालाकियां, युद्ध के दृश्य, कुरान, गीता, बाइबल, समेत तमाम किस्सों को सुनाते हैं। कुछ तथ्यों के आधार पर कुछ अपनी गढ़ी हुई कहानियों पर। बीच बीच में गमछे को झटकते हुए, सामने कुर्सियों पर बैठे दर्शकों की आंख में आंख डाल के बैठते हैं और खड़े होते हैं जिससे कहानी का रोमांच बना रहे, और वो अपनी इसी अदा के लिए पहचाने जाते हैं । बिरहा गाते वक़्त आनंदित दर्शकों के इनाम का सिलसिला जारी रहता है।


    ....और नक्कारा बजता है
इस मंच पर सबसे महत्वपूर्ण होता है नगाड़ा वादक। जिसे नक्कारा भी कहते हैं। नक्कारे पर बाबा का जोश दर्शकों और ख़लीफ़ा की आंखों में ,थिरकन में साफ दिखता है। बगैर नक्कारा इस परंपरागत बिरहा का गायन संभव नही। बाबा बिरहा के तोड़ के बीच में सिगरेट जला लेते हैं, कभी एक घूंट में ठंढी चाय पी डालते हैं, तो कभी हीटर की आंच में सूखते नगाड़े को बदल लेते हैं, पर गायन की लय टूटने नही देते। बाबा के मुंह में भांग चढ़ी पान की गिलौरी उनके जोश को ठंढा नही होने देती। कड़..कड़..कड़..कड़म..कड़म..कड़..कड़..कड़ की झन्नाटेदार ताल और गायक की त्योरियों का तालमेल इतना जबरदस्त होता है, कि आये हुए इनाम का हक बिना मांगे दूसरे के पास चला जाता है। नक्कारे वाले कि सेवा सत्कार में एक दो लोग स्वेक्षा से लगे रहते हैं।

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लोक संगीत की तमाम विधाओं में बिरहा अपनी खास पहचान रखता है। पर इस दम तोड़ती बेहद पुरानी लोक कला को ज़िंदा रखने के लिए पुराने कलाकार अपनी दम पर इन्हें जिंदा रखे हुए हैं। ताज़्ज़ुब की बात है कि शहर लखनऊ में यह कला इन कलाकारों की वजह से सांस ले रही है। शहर के बीचो बीच निशातगंज में अक्सर बिरहा की महफिलें सजती हैं। लोगों में अभी भी इस लुप्त होती लोक कला के लिए प्यार है, उत्साह है और चाह है। खस्ताहाल जिंदगी की थकावट भरी शामों में बिरहा की शामें उनको तरो ताज़ा कर देती हैं।

      ....महफ़िल जो ख़त्म होने पर हिसाब न मांगे
बिरहा की महफ़िल सजने से पहले बाकायदा हाँथ से लिखे हुए पर्चे जगह जगह चाय, पान की दुकानों पर लगाये जाते हैं। नगाड़ा, दो या तीन तख्त, माइक/साउंड सिस्टम, एक हीटर (नगाड़े को गर्म करने के लिए) हैलोजन, रात की चाय का इंतज़ाम...बस....शाम की महफ़िल बिरहा के खलीफाओं के लिए तैयार। पुराने सुप्रसिद्ध बिरहा गायकों को ख़लीफ़ा कहा जाता है। ख़लीफ़ा मंच से एक दूसरे को मुंह तोड़ जवाब देते हैं, यहाँ तक गालियां भी गा सकते हैं। पर मंच के नीचे महफ़िल के बाद बेहिसाब इज़्ज़त देते हैं। खलीफाओं के अलग अलग घराने होते हैं, ये घराने अन्य जनपदों के भी हो सकते हैं और मोहल्लों के भी। ख़लीफ़ा की जीत और उसका रुतबा उसके दूसरे खलीफाओं को दिए गए करारे जवाब और देर तक मंच पर डटे रहने पर होता है। जिसका जितना करारा जवाब वो उतना बड़ा ख़लीफ़ा। जुगलबंदी में एक ख़लीफ़ा को जवाब देने में 2 घंटे तक लग सकते हैं। जो ज्यादा बेहतर तरीके से मंच लूट ले वो खलीफाओं का ख़लीफ़ा होता है। उनके अपने नियम हैं, कायदे हैं। न हिन्दू न मुसलमान। ख़लीफ़ा सिर्फ ख़लीफ़ा होता है बिरहा का। न चाट वाला, न मजदूर, न रिक्शा वाला, न मिस्त्री, न मिट्टी के बर्तन बनाने वाला।


गुरुवार, 3 अगस्त 2017


मैं मिट्टी हूँ

मैं मिट्टी हूँ
ताकती आसमान
तुम ऊंची इमारत हो डर के, असुरक्षित से

मिलने आओगे एक रोज़
पहले की तरह बेफिक्र
पर कुछ अलग रंग में, कठोर, टूटे से

मुझसे लिपट जाओगे
बारिश धुल देगी
मेरे गुमान, तुम्हारे डर

हम बह जाएंगे
रिक्त को भरने।

तस्वीर : गोमती किनारे

बच्चों को उड़ने दो ..

 उड़ने दो , उड़ने दो  बच्चों को उड़ने दो ... गर नाक अटक जाए  तो भी तो  उड़ने दो ..   जिस ऊर्जा का  संचार प्रवाह  हो उद्दंड  उसको भी  उड़ने दो  कह...