हफ़्तों, महीनों , सालों को
लगाना शुरू किया
शीशे की अलमारी में
किताबों को कब का
खाली कर दिया
घड़ी की सुईंयों से
बीत चुके की
चुगली न करने की हिदायत
रवायतन दे दी
ग्रहों की दशाओं से
माँगना अब छोड़ दिया
भीतर उफनाई नदी से
ढेर सारा वक़्त ले
दुबक कर बैठा हूँ
प्रिय भारत पेट्रोलियम ,
मैं अक्सर तुम्हारी शालीनता की चर्चा अपने कर्मचारियों से किया करता हूं । मैने तुम्हारी शालीनता का बहुत गहनता से अनुभव किया है । तुम्हारा नीला पीला रंग मेरी जुबान से उतरता ही नही । तुम्हारे रंगों से मैने कई बदरंग वस्तुओं , लोगों की सूरत बदलते देखा है । देखो ना ! तुम्हारे पुराने विज्ञापनों में दिखने वाला गधा ज्यादा बोझा उठाने और तेज कदम के बाद भी खुश नज़र आता है ।
मैं बचपन में जब भी अपने गांव आता । तुम्हारी तेल की धार को देखता । तुम्हारी तारीफें मैने उन बुजुर्ग किसानों से सुनी हैं। जो अंत्योदय पर जीवन यापन करते थे । कम पूंजी में जब वो अपने इंजन से ज्यादा माइलेज निकलता देखते थे । तो वो कहते थे । आप का तेल बहुत अच्छा है । कोई बच्चा किसी दूर गांव से आता । साइकिल से 20 लीटर की कैन उतारता । और कहता दद्दा कहते हैं कि वही टंकी से तेल लाओ ।
मैं उस समय उन्हे समझाता था कि। कि ये हमारा तेल नही । भारत पेट्रोलियम का तेल है । हमको जैसा मिलता है । वैसा हम दे देते हैं। अच्छा लगता है । जब कोई अपने जेब खर्च का सही मोल पाता है । तुम्हारे सफेद तेल का लोहा माना जाता है । तुम्हारा तेल जब पंजाबियों के ट्रक में जाता है । तो उनकी रोज़ी का ख्याल बढ़ जाता है । मैने कई पंजाबियों को कहते सुना । तेल तो पड़ेगा तो भारत का । कितना सहज लगता हैं न ! तुम्हारा नाम लेना । भारत !
बीच में जब तुम्हारी बोली लगने को आई। तो मुझे कुछ असहज लग रहा था । पता नही चल रहा था । तुम्हारा कौन सा रंग होने वाला है । तुम्हारी शालीनता कहीं प्रतिस्पर्धा में अराजक बाज़ार न हो जाए । मैं अक्सर लोगों को जाते हुए लोगों के बारे में कहते सुना है । कि अच्छे लोगों को भगवान जल्दी बुला लेता है । तुम सबसे सुन्दर दिखते थे। तुम्हारे तेल ने मुनाफे के कीर्तिमान गढ़े थे । सरकार तुम्हारे परफॉर्मेंस को देख कर लट्टू हो गई । कौन न चाहता तुम्हारे तेल पर दौड़ना । लाखों करोड़ों चक्कों की टंकियों में , किसानों के खेत खैलियानों के पानी में , आम आदमी की दैनिक जरूरतों में मैने तुम्हारी मोहब्बत देखी है ।
सदी की सबसे बड़ी त्रासदी कोरोना का हाल तुमसे छिपा नहीं है । दुनिया भर में ऊंच नीच , उथल पुथल । मुझे याद है वो ढलती शाम । एक किसान अपने पत्नी के जेवर लाया था । गिरवी रख कर , कुछ तेल उधार चाहता था । मैं ऊपर छत पर था । छत के ठीक नीचे तुम्हारे नाम का लोगो बना था । उस किसान ने खुली अंजुरी में जेवर उठा के कुछ मांगा था। उसकी मांग पूरी हुई । वो आज भी छलक कर वो दिन याद करता है ।
मैने कई बार सोचा कि तुम्हारी तारीफों को कैद कर लूं । फिर लगा कि तारीफें कैद नही होती । देश आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा है । तुम्हारे तेल से डूबते देश के हवाई जहाज उड़ रहे हैं । तुम्हारी हरित ऊर्जा स्याह दिनों में मन को तसल्ली देती है । तुम्हारे साथ आजादी का महोत्सव मनाना अच्छा लग रहा है ।
तुम्हारा
जय किसान !
उन्होंने सफेद कपड़े पहने हुए थे
ज ब कोई बीज पड़ा होगा
नमी ने सहेजा होगा
बहुत बाद
बड़ी देर
ठहर कर
इक बूंद
टप्प से
गिरी राख पर
बादल के दल
उमड़ घुमड़
धरते पांव
ठहर ठहर
मन मीत
की बात
कहे न कहे
मन प्रीत
से ज्योति
जलाए पड़े ।
..... भद्द गर्मी में शीतल सुबह भी होती ही है । भले ही वह तनिक देर के लिए ही हो । गर्मी और लॉन्ग ड्राइव के बीच झूलते झूलते अब मैने मन बना लिया था । कि बेटे के साथ कहीं किसी अनजान रास्ते पर निकला जाएगा । सुबह से शाम तक मैने यहां अपने सारे काम निबटा लिए थे । जिससे की कुछ दिन व्यवधान न पड़े । देर शाम घर पहुंचा । मैंने अपने इस लॉन्ग ड्राइव के प्लान के बारे में बेटे और उसकी मां को छोड़ सब को बता दिया था । बेटे की दादी यानी मेरी मां ने प्लान सुनते ही हामी भर दी । वो उत्साह से बोलीं जाओ जाओ । अच्छे से घूम के आना । पर बेटे के बाबा यानी मेरे पापा को इस अतरंगी प्लान के बारे में कोई खास रुचि नहीं आई । हां उनका तर्क था जहां जाओ वो रास्ता नया होना चाहिए ।
अगली सुबह हमें निकलना था । मैं बेटा और उसकी मां । बेटे का छोटू सा हांथी के मुंह नुमा प्यारा सा पिट्ठू बैग तैयार था । मेरा गोपनीय प्लान था । कि हम यहां से कार से सुबह 4 या 5 बजे तक निकल लेंगे । हमारे शहर से कुल चार तरफ को रास्ते जाते हैं । इसमें से तीन रास्तों पर अक्सर जाना होता था । पर एक रास्ते पर हम एक या दो बार गए होंगे । चूंकि हमने इस यात्रा को नाम दिया था लॉन्ग ड्राइव । इसलिए हमारा लक्ष्य लगभग 200 किलोमीटर की राइड थी । और वहीं कहीं कुछ घूमने के लिए । पर सिर्फ मेरे तक रहने में इस बात के जोखिम बड़े थे । बच्चे के लिए तो कोई बात नही । लेकिन उनकी मां कोई सरप्राईज ज्यादा पसंद नही है ।
अब उन्हीं की गाड़ी से इस यात्रा को अंजाम देना था । लिहाजा उनको विश्वास में लेना जरूरी था । ठीक एक शाम पहले मैंने हल्की फुल्की बात में जगह के नाम को छोड़ कर बाकी सब पत्नी से साझा किया
।उनकी तरफ से लखनऊ का पलड़ा भारी था । उनके तर्क कुछ इस प्रकार थे । वो जगह पास है । इतनी गर्मी में कहीं किसी की तबियत खराब हो गई तो ... और फिर हमारे पास वहां रुकने की एक जगह भी है । बेटा कह रहा था भुलभुलैया फिल्म देखने को । वो छूट जायेगी तो वो आफत कर देगा । इसलिए लखनऊ जाएंगे । मॉल घूमेंगे , फिल्म देखेंगे अच्छा खाना खायेंगे । और घर में पड़े रहेंगे ।
हा हा हा हा हा । मैं मन ही मन खूब हंसा । बहुत देर तक सोचता रहा । कि ये प्लान तो मेरे प्लान से बिल्कुल अलग है । न इसमें कुछ नयापन है । न ही रोमांच । फिर भी उनके प्लान को यूं ही खारिज़ करना मुनासिब नहीं समझा । अब यह मामला बेटे के साथ भी साझा करना पड़ा । उसको भी जगह का नाम बताए बगैर जगह की खासियत और यात्रा के बारे में बताया । और मां और मेरे मतों के भेद के बारे में भी बताया । उसने सिक्के से टॉस करने की सलाह दे दी । हमने टॉस किया उसमें मां जीत गई । मुझे और बेटे को अभी भी यह निर्णय अजीब सा लग रहा था । मैंने रात में ही सुबह तक इस निर्णय को पलटने के बारे में सोच रखा था । पैकिंग दोनों जगहों की संभावनाओं के हिसाब से हो गई थी ।
सुबह हम सब तैयार हो कर गाड़ी में सवार हो गए । घर से विदा लेने वाले और विदाई देने वाले दोनों पार्टियों को इस यात्रा के रुख के विषय में पक्का पक्का नहीं पता था । मैं, बच्चे और अपने मन की दिशा को फॉलो कर रहा था । गाड़ी की स्टियरिंग उसी नए रास्ते की ओर घूम चुकी थी । पापा हम लोग नए रास्ते पर जा रहे हैं न ? ... मैं कुछ उत्तर दे पाता ।
मां ने जवाब दे दिया । " हां बेटा अब तुम्हारे पापा हम लोगों को एडवेंचर कराएंगे इतनी गर्मी में । मुझे लग ही रहा था । कि ऐसा कुछ होने वाला है । मुझे इसी लिए कहीं जवास नही आती इनके साथ । बेटे के चेहरे पर कौतुक के भाव थे । पर मां के माथे पर बल पड़े हुए थे । माहौल की खुश्की देख कर मैंने यू टर्न ही लेना उचित समझा । बस फिर क्या था । फिर से हम उसी पुराने जाने पहचाने रास्ते पर चल पड़े । मैडम ने सबसे पहले संगीत का रुख रेडियो से हटा कर फोन के मीडिया पर कर दिया। फिर लगीं नेट पर अच्छा मॉल अच्छा मल्टीप्लेक्स खोजने । बेटा थोड़ी देर के बाद पीछे वाली सीट पर पड़ के सो गया । अब सबसे पहले हमारा लक्ष्य था । लखनऊ पहुंच के सुबह सुबह मैटनी शो में फिल्म भुलभुलैया देखना । मैंने एक बार फिर खुद को सरेंडर कर दिया था ।
हम सुबह समय से मल्टीप्लेक्स पहुंच चुके थे । पार्किंग के चक्कर में इधर से उधर घूमते रहे . इसी वजह से फिल्म के लिए भी लेट हो रहे थे .
फिल्म शुरू हो चुकी थी । फिल्म में इंटरवल के पहले ही मैं सोने लगा था । बेटे के दिल में भुलभुलैया की दहशत घर करने लगी थी । वह रह रह कर डरने लगा था । पहले 45 मिनट में उसने कह ही दिया । कि बहुत डरावनी फिल्म है । पापा हम लोग इंटरवल के बाद बाहर निकल लेंगे । इससे अच्छा मॉल ही घूम लेंगे । बच्चे के दूसरी तरफ बैठी मां ने इस बात बच्चे को कई बार डांट भी लगाई । कि घर में इस फिल्म के लिए तड़प रहे थे । और यहां डर लग रहा है । तुम यह समझ लोग अगर यह फिल्म उतर जाती तो फिर देखने को न मिलती । बकौल मैडम यह फिल्म एक बेहतरीन हॉरर कॉमेडी है । मुझे न ही उसमें कौमेडी नजर आई और न ही हॉरर महसूस हुआ । इस पूरी फिल्म को मैने ऊंघते हुए देखी , बच्चे ने डरते हुए और उनकी मां ने डांटते हुए। हम तीनों ने किसी तरह से फिल्म खत्म की ।
अब हम लोग फीनिक्स मॉल के सबसे ऊपर वाले माले पर फूड कोर्ट में आ गए थे । कुछ छिटपुट नोकझोंक के साथ हम सबने लंच किया
। मेरे दिमाग में बच्चे के दिमाग पर उस फिल्म का असर चल रहा था । मुझे लग ही रहा था । कि यह अब नही तो तब फटेगा ही । मॉल के ग्राउंड फ्लोर पर बच्चों के लिए कुछ एक्टिविटी करवाई जा रही थी । जिसमें ड्राइंग , बॉक्सिंग और साइंस के कुछ खेल खिलाए जा रहे थे । हम एक्टिविटी वाली जगह आ गए थे । मैडम ने इस दौरान कुछ और दुकानों को खंगालने का फैसला लिया । मैंने बच्चे का एक्टिविटी में रजिस्ट्रेशन करवा दिया । उससे कहा कि तुम ड्राइंग करो और बाकी खेल खेलो । मैं कुछ देर में आता हूं । मैं छुप छुप के बच्चे को दूर से देखता रहा । वो कुछ असहज लग रहा था । काफी देर तक वह ड्राइंग पेपर हाथ में लिए बैठा रहा । फिर उसने कुछ रंग भरने शुरू किए। लेकिन उन रंगों में वो बात नही थी । जो वो आम तौर पर भरता है । आम तौर पर आम दिनों में उसका रुझान आर्ट और क्राफ्ट पर खूब रहता है । पर फिर भी वो आज कुछ नही कर पा रहा था। मैं बीच बीच में उसका हौसला बढ़ा जाता । और छिप छिप उसे देखता रहता । उसने कुछ आकृतियां गढ़नी शुरू की थीं। अन्य बच्चे पूरी तल्लीनता से अपने कार्य में व्यस्त थे ।
मैंने चुपके से तस्वीर खींचने को अपना फोन निकाला । तो स्क्रीन पर अनजान नंबर की कई मिस कॉल देखी। मैंने वापस कॉल की तो पता चला कोई मैडम आप को फोन मिला रही थी । उनका फोन खो गया है । शायद वो कहीं ढूंढ रही हों या आप के पास आ रही हों । ठीक उसी समय देखा मैडम मेरी तरफ दौड़ी चली आ रही हैं । चेहरे के रंग फीके पड़ गए थे । कांपती हुई आवाज में उन्होंने बताया कि उनका फोन कहीं खो गया है या किसी ने उठा लिया है । हमने फोन सबसे पहले बच्चे के एक्टिविटी वाली जगह से ढूंढना शुरू किया । एक्टिविटी रजिस्ट्री के दौरान मैडम ने आई डी निकालने के लिए यहां अपना बैग खोला था । हमारी इस खोज में बेटा भी साथ हो लिया ।
पहले हमने मॉल के अलग अलग फ्लोर पर जा कर देखा । फिर जहां जहां मैडम गई थी वहां के क्लोज सर्किट कैमरे की फुटेज खोजी । 5 घंटे की अथक खोज के बाद भी मैडम का फोन हमें नही मिला। मैडम को इस बात की गिल्ट महसूस हो रही थी । कि उनकी वजह से हमारी लॉन्ग ड्राइव चौपट हो रही है । पर बेटे और मेरे पास उनका साथ देने के अलावा कोई चारा नहीं था । हम लोगों की भूख उड़ी हुई थी । फोन के खोने का सदमा मैडम के चेहरे पर साफ साफ दिख रहा था । शाम पूरी तरह से ढल चुकी थी । बच्हम मॉल से निकल कर फिलहाल के घर जाने के लिए निकल पड़े थे । रास्ते में हमने फोन के सिम को ब्लॉक और नए सिम को लेने की कार्यवाही कर दी थी । हम लोग 15 किलोमीटर अपने रहवास की ओर निकल आए थे ।
मैडम का मोबाइल पहले बहुत देर स्विच ऑफ रहा । फिर उस पर घंटी जाने लगी । घर पहुंचने से पहले मैंने अपने फोन खोए हुए फोन पर एक मेसेज डाला। " भाई साहब फोन वापस कर दें , 5000 रुपए इनाम के तौर पर देंगे " इस मेसेज के करीब 20 मिनट बाद उसी फोन पर किसी ने कॉल उठा कर बात की । रात होने की बात कर उन्होंने सुबह बताए गए पते पर फोन लेने की बात कही । समय की सहमति के बाद 20 किलोमीटर दूर हमें तय जगह पर फोन दे दिया गया । मैंने उनके जेब में 5000 रुपए रख दिए । जिसको लेने से उन्होंने तनिक भी इंकार नहीं किया। उन्होंने बताया कि जब हम मॉल में थे । उसी समय मैडम का फोन कहीं पर पड़ा मिला । जिसको धोखे से इन सज्जन ने अपना समझ जेब में रख लिया था । घर आकर बच्चों ने बताया कि फोन उनका नही है । और उन्होंने फोन उठा के हमें इसकी जानकारी दे दी ।
हम सब इस घटना के बाद बहुत थक गए थे । मानसिक रूप से और शारीरिक रूप से भी । हम बाप बेटे केवल अफ़सोस करते रहे . कि यदि हमने यहाँ आने का फैसला न किया होता . तो शायद इतना सब नहीं होता .
कोई आग है दबी सी
बरसों से सीने में
धधकती देहं से पिघला
यूं लावा कभी नही
लुढ़कती सुर्ख बूंदे
चेहरे से पसीने की
लरज़ती आँख का पानी
हुआ गाढ़ा कभी नही
दहर की पीठ पर बैठी
जो तुम मासूम सी
सिहर कर जान से जाना
जाना कभी नही
जलाने को मशालें
थीं बहुत अदीब की
तुम्हारी रूह ने लिक्खीं
किताबें कभी नही !
सुगना का अपना अलग संसार है । जिसमें तमाम सारी गुड़िया हैं । छोटे छोटे खिलौनों वाला किचन सेट है । कहानियों वाली किताबें हैं । उसने अपनी सभी गुड़ियों का नाम रख रखा है । कुछ नाम कार्टून की दुनिया से आते हैं । तो कुछ विदेशी नामों से पहचानी जाती हैं। यूँ तो उसके रोज के जीवन में किसी न किसी गुड़िया का साथ रहता है । पर उसकी सबसे चहेती गुड़िया का नाम " सुनती" है । वो रोज शाम को सोने से पहले उस गुड़िया से बाते करती है ।
दरअसल वह गुड़िया रिकॉर्डिंग वाली गुड़िया है । सुगना उसके पेट पर लगी एक छोटी सी बटन को दबाती है । और वो गुड़िया बोल पड़ती है । " आज क्या है तुम्हारे दिल में " इतना कहना होता है । कि सुगना उसे अपनी नज़रों के सामने रखती है । सुनाने लगती है अपने दिल की बातें। यह गुड़िया उसके पापा ने कुछ साल पहले उसे जन्मदिन पर गिफ्ट की थी ।
सुगना के मम्मी पापा नौकरीपेशा हैं। मम्मी शाम को काम से आती है । पापा हफ्ते में एक या दो दिन के लिए घर आते हैं । ढेर सारा काम निबटा के मम्मी पापा के पास सुगना के साथ खेलने , बैठने या बात करने की क्षमता नही बचती। सब के इकट्ठा होने के बावजूद भी घर में एक अजीब सी चुप्पी रहती है । बात होती है । मगर गैर जरूरी बात कुछ भी नही ।
सुगना के मम्मी पापा उसे बेहद प्यार करते हैं । पर भाग दौड़ भारी जिन्दगी ने उसके जीवन में बहुत सा अबोला भर दिया था। जिसकी पूर्ति वो " सुनती " को सुना के पूरी करती है । वो उससे बातें करती है । बात करते करते सो जाती है । सुबह उठ कर स्कूल जाने से पहले वो सुनती का बटन ऑफ करती है । और उसको बाय बोल स्कूल चली जाती है ।
सुगना की गुड़िया में सुगना के संसार की बातें कैद होती रहती हैं दिन पर दिन । पढ़ाई , लिखाई को लेकर मम्मी की डाँट का जिक्र उनमें होता । तो पापा की मम्मी के साथ गाली गलौज की शिकायतें उनमें दर्ज रहती । हर छोटी बड़ी बातों में सुगना प्यार का हिसाब किताब ढूंढ लाती है । मम्मी इतना प्यार करती हैं मुझे । पापा इतना करते हैं । सुबह और शाम के घटनाक्रमों के टुकड़े जोड़ तोड़ कर सुगना अपनी गुड़िया को सुना देती । पिज़्ज़ा , मैगी , पास्ता, मैक्रोनी , फ्राइज़ की चटपटी बातें सुना के सुगना सुनती से पूछती ! मज़ा आया ?
इस बार गर्मी की छुट्टियों में सुगना अपनी मम्मी के साथ नानी के घर चली गयी । पापा की हिदायत के बावजूद भी वो गुड़िया को यहीं भूल गयी । नानी के घर पहुँचने के बाद सुगना को गुड़िया के छूट जाने का ख्याल आया । वो थोड़ा उदास हुई । पर नानी के यहाँ उदासी ज्यादा दिन टिकती नही ।
अबकी वीकेंड जब पापा घर आए तो उन्हें सुगना की बहुत याद आयी । वो जाना तो चाहते थे सुगना के साथ । पर घर अकेला नही छोड़ा जा सकता था । सुगना का गुड़ियों का संसार देख उन्हें उस पर और ज्यादा प्यार आने लगा । उन्होंने सुनती को भी हाँथ में लिया । सुनती के बालों के पीछे एक हिडेन बटन था । जिसके बारे में पापा ने सुगना को कभी नही बताया गया था। उसको दबाते ही सुनती के भीतर जितनी बातें रेकॉर्ड हुई थी । वो बारी बारी बजने लगी ।
सुगना की मीठी बातें पापा की आंखों को नम करती रहीं । उसका प्यार , उसकी शिकायतें , उसका दुलार सुन कर पापा को लगा ही नही जैसे पापा सुगना से कभी दूर भी होते हैं । प्यार के मामले में मम्मी का पापा से ज्यादा जिक्र पापा को रश्क से भर देता ।
पर इस बीच कुछ ऐसा घटने लगा जिसके बारे में पापा ने कभी सोचा नही था । सुनती बोलती रही ........ आज अंकल आये थे , उन्होंने मुझे चॉकलेट खिलायी । अंकल मम्मी का बहुत खयाल रखते हैं । पापा अंकल की तरह क्यों नही हो ? .....
आज फिर अंकल आये थे । उन्होंने मुझे कहानी सुनाई । अंकल के पास ढेर सारी कहानियाँ हैं । पापा के पास कहानियाँ क्यों नही है ? .....
अंकल ने मुझे लोरी सुनाई । और वो मम्मा के साथ सो गए । .....
पापा ने झट से सुनती की बोलने वाली बटन बन्द कर दी । सुनती को एक किनारे रख दिया । पापा के दिमाग में ऊल जुलूल ख्याल आने लगे । पूरी रात बेचैनी में कट गई । सुबह उन्होंने सुनती का सुनने वाला बटन दबाया । और कहा बेटू आई मिस यू , आई लव यू , आई एम कमिंग ।
तुम्हारे पुराने पते पर
मैंने कई ख़त लिखेकोहनियों में दर्द फूटता है
घुटनों के नीचे माँस जम जाता हैमैं गया था और लौट आया सकुशल बगैर किसी शारीरिक क्षति और धार्मिक ठेस के घनी बस्ती की संकरी गलियों की नालियों में कहीं खून का एक कतरा न दिखा ...