बहुत बाद
बड़ी देर
ठहर कर
इक बूंद
टप्प से
गिरी राख पर
बादल के दल
उमड़ घुमड़
धरते पांव
ठहर ठहर
मन मीत
की बात
कहे न कहे
मन प्रीत
से ज्योति
जलाए पड़े ।
कौन हो तुम जो समय की खिड़की से झांक कर ओझल हो जाती हो तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारे ताज़ा निशान भीनी खुशबू और गुम हो जाने वाला पता महस...
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें