ऊभ की दूब
सूखती हरी होती
दूब खर पतवार है
कहीं भी कभी भी
सलीके, समय तो गमलों में खिलते हैं
सूखते नहीं, मर जाते हैं
सूखती हरी होती
दूब खर पतवार है
कहीं भी कभी भी
सलीके, समय तो गमलों में खिलते हैं
सूखते नहीं, मर जाते हैं
उड़ने दो , उड़ने दो बच्चों को उड़ने दो ... गर नाक अटक जाए तो भी तो उड़ने दो .. जिस ऊर्जा का संचार प्रवाह हो उद्दंड उसको भी उड़ने दो कह...
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