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शुक्रवार, 25 अप्रैल 2025

भेड़ों की भीड़ !

 


भीड़ में एक आदमी

गुम होता है 

जैसे भेड़ों में एक आदमी


आदम युग से

सीखता आया है आदमी

गुम होना

और भेड़ों को हांकना 


भेड़िया भेड़ के भेष में

भीड़ को रिझाता है 

उठा लाता है 

किसी एक भेड़ को 

दिखाने भेड़ियों के झुंड


सहमी भेड़ 

लाती है रोज 

एक और भेड़ को

भेंट में


भीड़ छटने लगती है 

भेड़िए के भेष में

भेड़ का चेहरा 

साफ होता जाता है !

शुक्रवार, 18 अप्रैल 2025

जब पिता मर जाते हैं !



बच्चे मर जाते हैं 

जब पिता मर जाते हैं 

और मर जाते हैं 

बच्चों के भीतर 

अनुत्तरित हजारों सवाल 


बच्चे मर कर

जी कर जब 

बनते हैं एक पिता

तो मारते हैं एक

पिता को वो भी 


पिता पुत्र के बीच

की खाई को सिर्फ

मौन पाट पाता है 

संवाद के 

अनगिनत बहाने

ढूंढ लेती है

पिघली बर्फ


दोनों तरसते हैं

तिल तिल

गले मिलने को 

नहीं मिलते विचार

फिर भी आदतें

मिलती हैं 


शीत युद्ध के

कुचक्र से 

क्षत विक्षत 

पिसते हैं 

पिता पुत्र 

के संबंध

लंबे अरसे तक 


सम्मान की सफेद 

चादर में लिपटे

जज़्बात छटपटाते हैं 

आत्मग्लानि के बोध

से ढह जाते हैं

आशाओं के किले

और छत्र छाया

का आभास टूट कर

बिखर जाता है 

तब पिता के साथ

पुत्र भी नहीं रहते । 

बुधवार, 2 अप्रैल 2025

ईद मलीदा !



मैं गया था और 

लौट आया सकुशल

बगैर किसी

शारीरिक क्षति

और धार्मिक ठेस के 


घनी बस्ती की संकरी

गलियों की नालियों में

कहीं खून का एक कतरा

न दिखा मुझे 

छतों पर पत्थर 

कमरों में तलवारें

चापड़, बंदूकें 

छुरी और

बम - तोप का

नाम ओ निशाँ न मिला


सफेद जो गंदा होता है 

जल्द , आसानी से 

पहने हुए लोग 

गले मिलते दिखाई दिए 

किसी की छाती पर

गंदगी नहीं दिखी


असलम , हामिद , रेहान

कुछ नहीं लेते आए हैं

दशकों मुझसे 

मैं ही जाता हूं

साल दर साल 

उनके घर ईद पर 


जुबां पर 

मां - बहनों के हाथों बनाई

किमामी सेंवई , दही फुल्की

छोले , ज़र्दा 

खीर का स्वाद 

और मुस्कुराहट के साथ

" फिर आना " की ताक़ीद 

ने कभी ठगा नहीं मुझे


बचपन से देखता 

आया हूं उन्हें 

क्लास में , बस में

खेल के मैदान में 

टेलर की दुकान में 

जूते के कुटीर उद्योग में

केमेस्ट्री के प्रोफेसर के घर में


कौन हैं वो

कहां से आएं हैं

और क्यों हैं वो यहां

कभी सवाल नहीं उपजा

दिल और दिमाग में


सवाल अजनबियों से होते हैं

या दुश्मनों की आहट से

दूरियां नजदीकियां 

शिकवे शिकायतें

कहां नहीं होते

मिलते रहने से 

मिटते हैं सारे भ्रम


मिलने से खिलती हैं

आपसदारियां

पनपती है 

विभिन्न रंगों से सजी

दुनिया की समझदारियां ।

रविवार, 23 मार्च 2025

मैं लौट आता हूं अक्सर ...




लौट आता हूं मैं अक्सर 

उन जगहों से लौटकर

सफलता जहां कदम चूमती

है दम भरकर 


शून्य से थोड़ा आगे

जहां से पतन हावी

होने लगता है मन पर

दौड़ता हूं सफलता की ओर

फिनिशिंग प्वाइंट के ठीक पहले

ठिठककर रोक लेता हूं 

खुद को वहां भी 

ठहरकर , जाने देता हूं

जरूरतमंदों को पहले


नौकरी की लाइनों से

अस्पतालों की ओ पी डी से

राशन की दुकानों से

जनप्रतिनिधियों के दरबार से

प्रेमिकाओं के प्यार से 

मंदिरों में कतार से

लौटता हूं अक्सर 

जैसे लौटता हूं

शराब की दुकानों से 

बिना कुछ लिए


मालूम है मुझे

नहीं लौट पाऊंगा कभी

मृत्यु के द्वार से 

प्रस्थान बिंदु के पहले 

अनगिनत बार 

लौटना चाहता हूं 

लौट कर हर बार 

कुछ नया पाता हूं 

उस जगह 


रिक्त स्थान होते हैं 

सिर्फ भरने के लिए 

खुद को भरने से पहले

लौट आता हूं मैं अक्सर

लौटना मुझे अच्छा लगता है ।

मंगलवार, 18 मार्च 2025

किस्सा प्रेम का ...



 ठहर कर

एक पल

मादक वसंत

झरने सा 

झर झर 

बह गया

लहर कर

गाल ऊपर

बाल काले

मोहक छवि

को गढ़ गया

दुबक कर

आंख का

काजल

सुनहरे

मोतियों

में ढल गया

गुलाबी

नर्म होंठों पर

न जाने

कौन सा 

किस्सा

अधूरा रह गया


बच्चों को उड़ने दो ..

 उड़ने दो , उड़ने दो  बच्चों को उड़ने दो ... गर नाक अटक जाए  तो भी तो  उड़ने दो ..   जिस ऊर्जा का  संचार प्रवाह  हो उद्दंड  उसको भी  उड़ने दो  कह...