चौबीस घण्टों में
कोई दस मिनट
कई कई बार
सेकण्ड की सुई
पर सवार
मैं देखता हूँ
संग सार के पार ।
कई घड़ियाँ
एकांत ढूँढती
लिपट जाती हैं
धुएँ से
बुनती आकृतियाँ
जोड़ती दीद के तार।
कोई सिरा
जीवन की अंतिम
कहानी कहने को
आतुर
समय से बैर करता
लिखता है
ऐतबार !
चौबीस घण्टों में
कोई दस मिनट
कई कई बार
सेकण्ड की सुई
पर सवार
मैं देखता हूँ
संग सार के पार ।
कई घड़ियाँ
एकांत ढूँढती
लिपट जाती हैं
धुएँ से
बुनती आकृतियाँ
जोड़ती दीद के तार।
कोई सिरा
जीवन की अंतिम
कहानी कहने को
आतुर
समय से बैर करता
लिखता है
ऐतबार !
मुझे भी नही मिलता !
ये सोचकर बोलूं
कि मैं तुमसे मिलूं
हुँह !
नही मिलना
मिलकर प्रीत के मीठे कीड़े
रेंगते हैं दिमाग में
रहा बचा की उलझन
गुम होती है
न मिलने में !
तुम्हारी छांव की ठंढक
तुम्हारी साँस का जलना
तुम्हारी याद के डैनों में
दराजें उम्र की होना
नज़र से देख भर लेना
कहानी बाल से लिखना
तुम्हारी जिद्द का वो कोना
वफ़ा -ए- हिज़्र में रोना
बने किस चीज़ के तुम
भरा कैसा रसायन
धरा की नाक के नीचे
फले फूले तन मन ।
सुनो !
मैंने कहा
मुक्त कर दो मुझे
तुम बिना कुछ कहे चल दीं
मेरी उंगलियों में अपनी उंगलियां
पहनाए , घूमे अनजान रास्तों पर ।
संवाद के सारे तार टूटे रहे
पैरों की थकान जाती रही
रात भर सूखे पत्ते
आवाज़ करते रहे कहीं दूर
हमारे कदमों के नीचे
सुबह मैं नही मिला
अपने बिस्तर पर
कोई निशान नही पाए
अपनी उंगलियों में
रास्ते के सारे सूखे पत्ते
फिर से जा चिपके
अपनी टहनियों से।
उड़ने दो , उड़ने दो बच्चों को उड़ने दो ... गर नाक अटक जाए तो भी तो उड़ने दो .. जिस ऊर्जा का संचार प्रवाह हो उद्दंड उसको भी उड़ने दो कह...