तुम्हे समय नही मिलता ?
मुझे भी नही मिलता !
ये सोचकर बोलूं
कि मैं तुमसे मिलूं
हुँह !
नही मिलना
मिलकर प्रीत के मीठे कीड़े
रेंगते हैं दिमाग में
रहा बचा की उलझन
गुम होती है
न मिलने में !
मुझे भी नही मिलता !
ये सोचकर बोलूं
कि मैं तुमसे मिलूं
हुँह !
नही मिलना
मिलकर प्रीत के मीठे कीड़े
रेंगते हैं दिमाग में
रहा बचा की उलझन
गुम होती है
न मिलने में !
तुम्हारी छांव की ठंढक
तुम्हारी साँस का जलना
तुम्हारी याद के डैनों में
दराजें उम्र की होना
नज़र से देख भर लेना
कहानी बाल से लिखना
तुम्हारी जिद्द का वो कोना
वफ़ा -ए- हिज़्र में रोना
बने किस चीज़ के तुम
भरा कैसा रसायन
धरा की नाक के नीचे
फले फूले तन मन ।
सुनो !
मैंने कहा
मुक्त कर दो मुझे
तुम बिना कुछ कहे चल दीं
मेरी उंगलियों में अपनी उंगलियां
पहनाए , घूमे अनजान रास्तों पर ।
संवाद के सारे तार टूटे रहे
पैरों की थकान जाती रही
रात भर सूखे पत्ते
आवाज़ करते रहे कहीं दूर
हमारे कदमों के नीचे
सुबह मैं नही मिला
अपने बिस्तर पर
कोई निशान नही पाए
अपनी उंगलियों में
रास्ते के सारे सूखे पत्ते
फिर से जा चिपके
अपनी टहनियों से।
आज का दिन बड़ा ही अशुभ रहा। रास्ता दोबारा तय करने से उभाऊ और नीरस हो जाता है। यूँ तो दोबारा आधा रास्ता ही तय करना पड़ा। पर आधा रास्ता पूरा करना सा लगा। सुबह सुबह वहाँ सब को काम समझाया। एक ठीहे से दूसरे ठीहे के लिए निकलने पर तमाम सारी तैयारी करनी पड़ती हैं। काम की अधिकता के कारण जाना कई बार टालता रहा। हालांकि जाना इतना जरूरी भी नही था। फिर भी घने कोहरे को भेदता निकल पड़ा। हर बार की तरह जरूरत से ज्यादा सामान मेरे कंधे पर लदा था। मेरा बैग दूसरे ठीये से भेजी गई लंबी चौड़ी घर गिरहस्ति की लिस्ट के अनुसार भरा था ।
तुम्हारी किताब का अक्षर
प्रेम में भीगा हुआ
तर बतर आंखों में
तैरता मासूम मुलायम
ख़्वाब हो जाता बादल
आकाश में उड़ता
पैर पसारे एक साँझ
जा बैठता है
रोओं के पास
पढ़ने की तीव्र ललक
पीछे खींचती पढ़ने से
मन व्याकुल छटपटाता
भागता अक्षरों के पीछे
मायनों की तलाश में
उल्टे सीधे रास्तों का डर जाता
सींचता लम्हों को
बहने की प्रेरक कहानियों में
जीवन की पहली किताब
पहला अक्षर
नई किताब का नशा
चढ़ता सिर जाकर ।
उड़ने दो , उड़ने दो बच्चों को उड़ने दो ... गर नाक अटक जाए तो भी तो उड़ने दो .. जिस ऊर्जा का संचार प्रवाह हो उद्दंड उसको भी उड़ने दो कह...