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शुक्रवार, 22 मई 2020

"पता नहीं" अब राज पथ है !


" सब कुछ तो कहा  जा चुका है हमारे बीच  . अब कहने सुनने को कुछ बचा नहीं ."  तुम्हारा यही जवाब मैं लिए लिए फिरता हूँ . पर यह जवाब मेरे लिए काफ़ी नहीं रहता  . बनिये की तरह जब मैं तुम्हारे इस जवाब को आने वाले समय के साथ तौलता हूँ . तो जीवन का हिसाब  किताब गड़बड़ाने लगता है . उम्मीद का जहाज डगमगाने लगता है . तुम्हारी ही कही हुयी कोई बात , मेरे लिए सबक का ककहरा बन जाती है . जीवन के सूक्ष्म तत्वों में फैलाव की असीम संभावना बन तुम मुझमें भर उठती हो .
         मैं खुद से बे - अदब  तौल  करने की  शिकायत करता हूँ . डांटता हूँ खुद को .. कई बार रूठ कर बैठ जाता हूँ खुद से. अंततः सोचता हूँ मेरा  रूठना तुम्हारे रूठने से कहीं कम है . यह रूठना मनाना चलता रहता है खुद से . जानता हूँ इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं , जो मुझे तुम तक ले जा सके . सारे रास्ते तुमने बन्द कर रखे हैं .  रास्तों का बन्द होना , मुझे मेरे भीतर के रास्तों के खुलने जैसा आभास कराता है .  सब कुछ तो कहा जा चूका है . सारे रास्ते तय हो चुके हैं . बाहर के .
         तब  तुम्हारी  गूढ़ जीवन सी भरी बातें मेरी समझ से परे थीं  . मैं अक्सर तुम्हारी बातों को हवा में उछालता . दूर छिटक के खड़ा हो जाता . तुम्हारी बातों को बारिशें बनते देखता . तुम उनके माध्यम से  प्रेम में डूबी हुयीं स्त्रियों की कहानियाँ कहतीं  . मैं हसंता , मुस्कुराता आगे बढ़ जाता . तुम अचंभित मुझे उस पल से बिना किसी भार के निकलते हुए देखती .
उफ्फ्फ !!!!!!!!!
तुम्हारे टूटने में कोई आवाज़ नहीं होती . बड़ी साहिस्तगी से तुम उसे गहरे जुड़ने से जोड़ देती . पर रूठना तो दिमाग की एक रासायनिक प्रतिक्रिया  है . तुम्हारे रूठने  से मैं डर जाता . छिप के  किसी किशोर प्रेमी की तरह रोते रोते रटता रहता . एक बार बात कर लो ! एक बार कॉल उठा लो  ! एक बार मेरे मेसेज का जवाब दे दो ! एक बार मिल लो ! कुछ भी न हो सके तो कम से कम एक बार मुझे एहसास दिला दो कि तुम हो मेरे लिए, मेरे साथ . तुम कहती आभासी दुनिया कोई दुनिया है क्या !
हुंह !!!!!  साथ ..... कैसा साथ ?
सच ! हमारे बीच अब फासला ही बचा है .
जैसे हमारे बचे हुए जीवन का फासला  !
बड़प्पन - लड़कपन का फासला !
हमारी आजादी का फासला !
हमारे एकांत का फासला !
हमारे फैलाव का फासला !
मुझे मालूम है . जिस रास्ते तुम्हे जाना नहीं, उन रास्तों का पता तुम अपने पास नहीं रखती . तुम्हारे जड़  अनुभवों से उपजे निष्कर्षों  ने तुम्हे कठोर  बना दिया . नमी अब तुम्हारा स्वार्थ है  . तुम्हारे  कहे को अनसुना करना तुम्हे बर्दाश्त नहीं . सब कुछ तो कहा  जा चुका है हमारे बीच  . अब कहने सुनने को कुछ बचा नहीं.
         फिर भी ,  मैंने  सुने जाने की जिद दिल - ओ - दिमाग में पाल ली है  . जिद फितूर नहीं होता शायद . धीरे धीरे सुने जाने की अर्जियां बेचारी होने लगती हैं . बेचारगी की लम्बी तानों के बीच एक स्वर " पता नहीं " का फूट पड़ता है  . स्वर के फूटते ही मैं खाली हो जाता हूँ . "पता नहीं" राज पथ हो जाता है  .
     मन करता है "पता नहीं" को सीने से लगाये चलता रहूँ जिन्दगी भर . ठौर मिले तो सुकून से छलक जाऊं . एक ऐसा सुकून जैसे नदी एक छोर पर आकर ख़त्म हो जाए . सिर्फ मेरे लिए . उसके बाद कोई सवाल न पूछा जाए . बहस की कोई गुंजाइश न रहे . मैं चुप , उस चुप पर उठने वाले सारे सवाल चुप .

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गुरुवार, 14 मई 2020

पलायन !














एक दिन जब मैं
चैन से सो रहा होऊंगा ...
पीछे छूटी सैकड़ों मील थकन 
पैदल चलने का दर्द नहीं रहेगा 
कर्ज की कोख में उपजे साधन 
समाधान हो जायेंगे 
परिवार के बोझ से 
काँधे हलके हो चुकेंगे 
दूर देश 
मैं सपनों की गठरी बांधे 
अपने बच्चों में 
तारे बाँट रहा होऊंगा !

एक दिन जब मैं 
चैन से सो रहा होऊंगा ...
खेतों में बालियाँ ठूंठ हो चुकेंगी 
घरों के चूल्हे बुत चुकेंगे
महामारी में मडैया चल निकलेंगी  
दुध मुहें बच्चे 
सूखे  स्तनों से चिपटे 
मुझ तक आ पहुचेंगे 
मैं गहरी नींद में लोरियां गुनते 
थपकियाँ देकर उन्हें सुला दूंगा 


एक दिन जब मैं 
चैन से सो रहा होऊंगा
जंग के बाद
जीत का जश्न होगा 
मजदूरों से खाली मकान होगा  
सरकारें मेरे नाम से 
राशन बाँट चुकी होंगी

एक दिन जब मैं 
चैन से सो रहा होउंगा 
सिर्फ सो रहा होऊंगा 
सिर्फ सो रहा होउंगा. 

तस्वीर : साभार गूगल

रविवार, 10 मई 2020

उदास मौसम की चिट्ठियां
















उदास मौसम की चिट्ठियां
बन्द  हैं लिफाफों में
पतों पर लिखा  " यहाँ सब ठीक ठाक है "
नाम की जगह "अपना ख्याल रखना " .


महामारी के संक्रमण काल में
संपर्क की मनाही है
दूरियां , वक़्त की मांग है 
बन्द कमरों का उदास मन
साइक्लोजिकल डिसआर्डर से बचता
रोज चिट्ठियां लिखता है .


एक अरसे से डाकखाने बन्द हैं
डाकिये , दवाखानों में व्यस्त हैं
लिफाफों से पत्र पेटियां भर चुकी हैं
लाचारी  के दौर  में
उदास मन
और क्या लिखता भला ?


जो लिख रहा है , वो बच रहा है
जो पढ़ पा रहा है,  वो बच रहा है
जो लिखना पढना नहीं जानते
वो मर रहे हैं .


उजाड़  मन
निकल चुके हैं
लम्बी, अंतहीन यात्राओं पर
पुलिसिया पूछताछ से छिदते
कालकोठरी में समय हारते
धरती पर रेंगते 
पहुचते हैं 
एक और
उदास मौसम में .


गुरुवार, 7 मई 2020

कच्ची सड़क


उस दिन हमारी कॉफ़ी एक दूसरे का साथ निभा नहीं पायी थी . सच ! मुझे रत्ती भर भी अंदाज़ा होता कि तुम्हे डार्क कॉफ़ी पसंद है , तो मैं कुछ कुछ वैसी ही ऑर्डर करता . मुलाकातों का सलीका मुझे कभी नहीं आया . मुलाक़ात  पहली हो या आखरी . फोन पर मैंने ही तुम्हे अच्छी कॉफ़ी पिलाने का यकीन दिलाया था . मेरे लिए अच्छी कॉफ़ी वही थी जो मुझे पसंद थी . तुम्हारी पसंद और ना पसंद की  मैंने कोई जगह रख नहीं छोड़ी थी . शायद यही कारण था कि मेरा अब  तक कोई हकीकी दोस्त नहीं था . 
       तुम्हारा मेरे शहर आना बड़ी बात थी मेरे लिए  . पहले की  तरह ऐन वक़्त पर मुलाक़ात टलने का डर जरूर था .  पर उस डर पर मैंने अपनी तरह से काबू पाना सीख लिया था. हर मुलाक़ात की मुकर्रर तारीख पर मैंने अलग अलग जगह कॉफ़ी पीना शुरू कर दिया . पिछली दो बार से बिना किसी मुलाक़ात का ख्याल लिए कॉफ़ी हाउस की कॉफ़ी पर दिल आ गया था . तब से वो मेरे लिए शहर की  सबसे अच्छी कॉफ़ी हो गयी . अच्छी कॉफ़ी के पीछे एक कारण और था . उस रास्ते ढेर सारे गुलमोहर, अमलताश के पेड़ . तुम्हारी तस्वीर में तुम्हारे बालों का रंग और दहकती सड़क के दोनों और गुलमोहर  के बिखरे फूलों के रंग मुझे एक से लगते . तुम्हे तुम्हारी तारीफ़ करना एकदम पसंद नहीं . इसलिए मैंने तुमसे कभी इस बात का जिक्र नहीं किया .
        हरे लिबास में,  तुम तय समय से कुछ देर बाद ऑटो से उतरी . मुस्कुराते हुए ऑटो वाले को शुक्रिया कहा . और दाखिल हुयीं कॉफ़ी हाउस में . मैं अभी भी सड़क के उस पार था. काश मैं तुम्हे इंतज़ार करते हुए देर तक देख पाता. मुझे वक़्त से पहले पहुंचना पसंद है . वक़्त से पहले पहुँच वक़्त को निहारना सुखकर होता है. कॉफ़ी हाउस के शीशे की  आड़ से मैंने देखा, तुम बैठी हुयी थी बुद्ध की तरह  इत्मीनान से . जैसे तुम्हे किसी की  तलाश नहीं, किसी का इंतजार नहीं . मैंने खुद को असहजता से सहजता की ओर जाने के लिए तैयार किया. तुम्हारे पीछे से आकर अचानक तुम्हारे सामने प्रकट हो गया. एक औपचारिक मुस्कराहट लिए "हेलो" से बातों का सिलसिला ठहरता, चलता चल निकला.  
         तुम्हारी गहरी , भारी बातों के सामने मेरा उठ्ल्लापन कहीं टिक नहीं रहा था . हालाँकि हमारा बेवजह मुस्कुराना सम पर था. मैंने दो बार सर्विस काउंटर की तरफ देख कर सुनिए सुनिए की पुकार लगाई . तुमने इशारों में मुझे काउंटर पर लगे  सेल्फ सर्विस का बोर्ड दिखाया . ओह ! मुझे वो बोर्ड दिखाई नहीं दिया . तुमने मुस्कुराते हुए मुझसे कहा " देखने के लिए नज़र चाहिए ".  टेबल पर पड़े  लम्बे चौड़े मेन्यू कार्ड को मैंने तुम्हारी तरफ सरकाया . फिर वापस अपनी ओर खींच लिया . "इट्स माई कॉल" कह कर मैंने जाकर ऑर्डर कर दिया . दो कोल्ड कॉफ़ी, दो वेज सैंडविच . 
       मेरे  पास कुछ भी महत्वपूर्ण बताने के लिए नहीं था. सिवाय उस कोल्ड कॉफ़ी की तारीफ के . तुम बार बार शीशे के उस पार सड़क पर रेंगते शहर को देखतीं तो  कभी मेरे कॉफ़ी और सैंडविच पर टूटने को . मेरी कॉफ़ी और सैंडविच के साथ हमारी बातें जल्द ही ख़त्म हो चुकी थीं . तुमने यह कहते हुए अपने  सैंडविच का बचा बड़ा सा हिस्सा  मेरी तरफ बढ़ा दिया, कि खाने पीने के सामान को वेस्ट नहीं करना चाहिए  . मैंने उसे पहली मुलाक़ात का सबक  समझ के खा लिया . तुम्हारी छोड़ी हुयी आधे से ज्यादा कोल्ड कॉफ़ी को मैं पी लेना चाहता था . मुझे डर था कि कहीं उस कॉफ़ी को जूठा कह कर मुझे रोक न दो. मेजबान और मेहमान के नए नियम गढ़ते हुए  तुमने सारा का सारा बिल भर दिया .  हमारे उस कॉफ़ी हाउस से निकलते वक़्त मैंने उस छूटी हुयी कॉफ़ी को पलट के देखा....और तुम्हे मुस्कुराते हुए सी ऑफ किया ... तुम बिना पलटे उस सड़क से ओझल हो गयीं . 
      उस पहली मुलाक़ात में बहुत कुछ छूट चूका था. पहली मुलाक़ात का रुमान छूट चूका था , वो गुलमोहर, अमलताश वाली सड़क छूट गयी थी. नदी का किनारा छूट गया था. बहुत ठहरी हुयी मुलाक़ात छूट गयी थी . तुम बिना किसी वादे के अपने शहर लौट चुकी थीं . मैंने तुमसे खिलखिला कर फोन पर पूछा .  हाउ वाज़ अवर डेट ? तुमने कहा . मैं डेट वेट नहीं जानती कैसी होती है, और क्या होती है . मैंने फिर पूछा  हाउ वाज़ कोल्ड  कॉफ़ी ? तुमने कहा तुम्हे ज्यादा दूध वाली कॉफ़ी पसंद नहीं.
      

मंगलवार, 5 मई 2020

सहन के उस पार !



रामी ने अब ठान लिया था कि वो गुल्टू को लेकर  घर वापस  कभी नहीं आएगी .  जिग्गा ने इस घर में रहना नरक कर दिया था . शराब के नशे में जिग्गा आदमी नहीं रह जाता . वो जानवर से भी बदतर व्यवहार करता . आये दिन मार पीट, बलात्कार, गाली गलौज और  बच्चे को जान से मार कर खुद मर जाने की धमकी रामी से सहन नहीं होती .
 जिग्गा की  वहशत उसकी पहली पत्नी ने सहन नहीं की . तो वो क्यों करे भला ! उसने खुद को आग लगा ली थी . कोर्ट कचहरी के डर से घरवालों ने उसे घर में ही दफना दिया था . रामी 5  सालों  से जिग्गा और उसके परिवार को  सहन  करती आ रही थी . पर अब नहीं ... अब और नहीं ....! रात में वो किसी समय गुल्टू को लेकर कहीं दूर चली जाएगी . 
     रामी.... रामी ! कहाँ मर गयी , दरवाज़ा खोल ! जिग्गा की लहराती हुयी, ऊँची , कर्कश आवाज़ सुन रामी सिहर जाती है . झट से वो आजादी के सपनों से भरी गठरी  को तख़्त के नीचे सरका देती है . अपने चेहरे से साहस और डर पोछते हुए दरवाज़ा खोलती है . शराब के नशे में धुत्त 6 फीट का जानवर,  रामी के कन्धों पर अपना धढ़ फेंक देता है . दांतों को किटकिटाते  हुए वो पूरी तरह से उसे छाप लेता है . रामी  उसको ठेल देने की भरपूर कोशिश करती   है.  पर  जिग्गा उसकी देंह पर हावी होता रहता है ... रामी की साँसे भारी होने लगती हैं .
      दोनों के बीच बढ़ते संघर्ष की आवाजें दीवारों को हिलाने लगती हैं . दहशत  से गुल्टू की नींद खुल जाती है और वो जोर जोर से मां को पुकारने लगता है . गुल्टू के चीखने की आवाज़ ने रामी के भीतर न जाने कहाँ की ताकत भर दी . एक पलटे हुए दांव में वो जिग्गा की छाती पर चढ़ जाती है . अपनी जांघों से जिग्गा की  पसलियों को रौंदते हुए थप्पड़ों की  बारिश करने लगती है  .  छटपटाहट की एक झूंक के बाद  जिग्गा सिथिल पड़ने लगता है . कमज़ोर पड़ता देख रामी दौड़ के गुल्टू को अपने गोद में उठाती है . और तख़्त के नीचे रखी गठरी  लेकर, नंगे पैर  तेज़ी से खुले दरवाज़े की  देहरी लांघ लेने को  भागती है....और तेज़ भागती है .... भागती रहती है... खुले आसमान के नीचे .... भोर  होने तक....! 
 

बच्चों को उड़ने दो ..

 उड़ने दो , उड़ने दो  बच्चों को उड़ने दो ... गर नाक अटक जाए  तो भी तो  उड़ने दो ..   जिस ऊर्जा का  संचार प्रवाह  हो उद्दंड  उसको भी  उड़ने दो  कह...