कुल पेज दृश्य
रविवार, 10 मई 2020
गुरुवार, 7 मई 2020
कच्ची सड़क
तुम्हारा मेरे शहर आना बड़ी बात थी मेरे लिए . पहले की तरह ऐन वक़्त पर मुलाक़ात टलने का डर जरूर था . पर उस डर पर मैंने अपनी तरह से काबू पाना सीख लिया था. हर मुलाक़ात की मुकर्रर तारीख पर मैंने अलग अलग जगह कॉफ़ी पीना शुरू कर दिया . पिछली दो बार से बिना किसी मुलाक़ात का ख्याल लिए कॉफ़ी हाउस की कॉफ़ी पर दिल आ गया था . तब से वो मेरे लिए शहर की सबसे अच्छी कॉफ़ी हो गयी . अच्छी कॉफ़ी के पीछे एक कारण और था . उस रास्ते ढेर सारे गुलमोहर, अमलताश के पेड़ . तुम्हारी तस्वीर में तुम्हारे बालों का रंग और दहकती सड़क के दोनों और गुलमोहर के बिखरे फूलों के रंग मुझे एक से लगते . तुम्हे तुम्हारी तारीफ़ करना एकदम पसंद नहीं . इसलिए मैंने तुमसे कभी इस बात का जिक्र नहीं किया .
हरे लिबास में, तुम तय समय से कुछ देर बाद ऑटो से उतरी . मुस्कुराते हुए ऑटो वाले को शुक्रिया कहा . और दाखिल हुयीं कॉफ़ी हाउस में . मैं अभी भी सड़क के उस पार था. काश मैं तुम्हे इंतज़ार करते हुए देर तक देख पाता. मुझे वक़्त से पहले पहुंचना पसंद है . वक़्त से पहले पहुँच वक़्त को निहारना सुखकर होता है. कॉफ़ी हाउस के शीशे की आड़ से मैंने देखा, तुम बैठी हुयी थी बुद्ध की तरह इत्मीनान से . जैसे तुम्हे किसी की तलाश नहीं, किसी का इंतजार नहीं . मैंने खुद को असहजता से सहजता की ओर जाने के लिए तैयार किया. तुम्हारे पीछे से आकर अचानक तुम्हारे सामने प्रकट हो गया. एक औपचारिक मुस्कराहट लिए "हेलो" से बातों का सिलसिला ठहरता, चलता चल निकला.
तुम्हारी गहरी , भारी बातों के सामने मेरा उठ्ल्लापन कहीं टिक नहीं रहा था . हालाँकि हमारा बेवजह मुस्कुराना सम पर था. मैंने दो बार सर्विस काउंटर की तरफ देख कर सुनिए सुनिए की पुकार लगाई . तुमने इशारों में मुझे काउंटर पर लगे सेल्फ सर्विस का बोर्ड दिखाया . ओह ! मुझे वो बोर्ड दिखाई नहीं दिया . तुमने मुस्कुराते हुए मुझसे कहा " देखने के लिए नज़र चाहिए ". टेबल पर पड़े लम्बे चौड़े मेन्यू कार्ड को मैंने तुम्हारी तरफ सरकाया . फिर वापस अपनी ओर खींच लिया . "इट्स माई कॉल" कह कर मैंने जाकर ऑर्डर कर दिया . दो कोल्ड कॉफ़ी, दो वेज सैंडविच .
मेरे पास कुछ भी महत्वपूर्ण बताने के लिए नहीं था. सिवाय उस कोल्ड कॉफ़ी की तारीफ के . तुम बार बार शीशे के उस पार सड़क पर रेंगते शहर को देखतीं तो कभी मेरे कॉफ़ी और सैंडविच पर टूटने को . मेरी कॉफ़ी और सैंडविच के साथ हमारी बातें जल्द ही ख़त्म हो चुकी थीं . तुमने यह कहते हुए अपने सैंडविच का बचा बड़ा सा हिस्सा मेरी तरफ बढ़ा दिया, कि खाने पीने के सामान को वेस्ट नहीं करना चाहिए . मैंने उसे पहली मुलाक़ात का सबक समझ के खा लिया . तुम्हारी छोड़ी हुयी आधे से ज्यादा कोल्ड कॉफ़ी को मैं पी लेना चाहता था . मुझे डर था कि कहीं उस कॉफ़ी को जूठा कह कर मुझे रोक न दो. मेजबान और मेहमान के नए नियम गढ़ते हुए तुमने सारा का सारा बिल भर दिया . हमारे उस कॉफ़ी हाउस से निकलते वक़्त मैंने उस छूटी हुयी कॉफ़ी को पलट के देखा....और तुम्हे मुस्कुराते हुए सी ऑफ किया ... तुम बिना पलटे उस सड़क से ओझल हो गयीं .
उस पहली मुलाक़ात में बहुत कुछ छूट चूका था. पहली मुलाक़ात का रुमान छूट चूका था , वो गुलमोहर, अमलताश वाली सड़क छूट गयी थी. नदी का किनारा छूट गया था. बहुत ठहरी हुयी मुलाक़ात छूट गयी थी . तुम बिना किसी वादे के अपने शहर लौट चुकी थीं . मैंने तुमसे खिलखिला कर फोन पर पूछा . हाउ वाज़ अवर डेट ? तुमने कहा . मैं डेट वेट नहीं जानती कैसी होती है, और क्या होती है . मैंने फिर पूछा हाउ वाज़ कोल्ड कॉफ़ी ? तुमने कहा तुम्हे ज्यादा दूध वाली कॉफ़ी पसंद नहीं.
मंगलवार, 5 मई 2020
सहन के उस पार !
रामी ने अब ठान लिया था कि वो गुल्टू को लेकर घर वापस कभी नहीं आएगी . जिग्गा ने इस घर में रहना नरक कर दिया था . शराब के नशे में जिग्गा आदमी नहीं रह जाता . वो जानवर से भी बदतर व्यवहार करता . आये दिन मार पीट, बलात्कार, गाली गलौज और बच्चे को जान से मार कर खुद मर जाने की धमकी रामी से सहन नहीं होती .
जिग्गा की वहशत उसकी पहली पत्नी ने सहन नहीं की . तो वो क्यों करे भला ! उसने खुद को आग लगा ली थी . कोर्ट कचहरी के डर से घरवालों ने उसे घर में ही दफना दिया था . रामी 5 सालों से जिग्गा और उसके परिवार को सहन करती आ रही थी . पर अब नहीं ... अब और नहीं ....! रात में वो किसी समय गुल्टू को लेकर कहीं दूर चली जाएगी .
रामी.... रामी ! कहाँ मर गयी , दरवाज़ा खोल ! जिग्गा की लहराती हुयी, ऊँची , कर्कश आवाज़ सुन रामी सिहर जाती है . झट से वो आजादी के सपनों से भरी गठरी को तख़्त के नीचे सरका देती है . अपने चेहरे से साहस और डर पोछते हुए दरवाज़ा खोलती है . शराब के नशे में धुत्त 6 फीट का जानवर, रामी के कन्धों पर अपना धढ़ फेंक देता है . दांतों को किटकिटाते हुए वो पूरी तरह से उसे छाप लेता है . रामी उसको ठेल देने की भरपूर कोशिश करती है. पर जिग्गा उसकी देंह पर हावी होता रहता है ... रामी की साँसे भारी होने लगती हैं .
दोनों के बीच बढ़ते संघर्ष की आवाजें दीवारों को हिलाने लगती हैं . दहशत से गुल्टू की नींद खुल जाती है और वो जोर जोर से मां को पुकारने लगता है . गुल्टू के चीखने की आवाज़ ने रामी के भीतर न जाने कहाँ की ताकत भर दी . एक पलटे हुए दांव में वो जिग्गा की छाती पर चढ़ जाती है . अपनी जांघों से जिग्गा की पसलियों को रौंदते हुए थप्पड़ों की बारिश करने लगती है . छटपटाहट की एक झूंक के बाद जिग्गा सिथिल पड़ने लगता है . कमज़ोर पड़ता देख रामी दौड़ के गुल्टू को अपने गोद में उठाती है . और तख़्त के नीचे रखी गठरी लेकर, नंगे पैर तेज़ी से खुले दरवाज़े की देहरी लांघ लेने को भागती है....और तेज़ भागती है .... भागती रहती है... खुले आसमान के नीचे .... भोर होने तक....!
शनिवार, 2 मई 2020
दूध
मां हमेशा दूध के लिए बहुत संवेदनशील रही . मसलन खुद से घंटों इंतज़ार कर के दूध लाना. उसको अपनी आँखों के सामने खौलाना . खौला कर उसको एकदम ठंढा करना. सुबह फ्रीज़ से निकले दूध की मोटी मलाई को निकाल कर एक अलग बर्तन में रख देना. फिर उस दूध को जरुरत के हिसाब से छोटे छोटे बर्तनों में बाँट के रख देना . हर दिन फ्रीज़ में कम से कम तीन से चार छोटे बड़े बर्तनों में दूध रहता ही रहता है. इस पूरी कसरत का नतीज़ा महीने भर घी के रूप में घर भर के खाने का स्वाद बढाता रहता है. उन्होंने न जाने क्यों दही को कभी ज्यादा तरजीह नहीं दी . दही को वो अधिकतर बाईपास कर जाती . कई बार फरमाइश पर एक आध बार कभी जमा दिया तो ठीक . वरना दही का जावन बाहर से ही लाना होता.
अपने, पापा और बच्चे का शाम का दूध , अक्सर खाने में रोटी के साथ मलाई और दाल , सब्जी रोटी के साथ घी का इंतजाम हमेशा रहता . दूध और घी के बीच मक्खन पर भी कभी कभी हाँथ साफ़ हो ही जाता है. माँ दूध का प्रबंधन इस तरह से करती है कि मैं व्यंग के तौर पर उन्हें दूध का वैज्ञानिक कह दिया करता हूँ . और चूल्हे पर चढ़े बड़े से पतीले में धीमी आंच पर पकते दूध को भाभा एटोमिक रिसर्च सेंटर की चिमनी की संज्ञा दे देता हूँ .
दर असल माँ का दूध के प्रति यह पजेसिवनेस मैंने बचपने से देखा है. मुझे दूध से बने सभी उत्पाद बेहद पसंद हैं . पर दूध की प्रोसेसिंग को मैं कभी भी संभाल नहीं पाया . बचपने में कभी कभी माँ दूध चूल्हे पर रख के सोने चली जाती . सोने से पहले गर्म होते दूध की निगरानी का जिम्मा मुझे सौंप जाती . उधर खेल में मैं अटक जाता इधर दूध उबल के बर्तन की दहलीज़ पार कर जाता. बस उस दिन हमारी बन आती . माँ का पारा दिन भर चढ़ा रहता . वो किसी न किसी बहाने से उसकी खीज हम पर निकाल ही देती . उसकी आँखें दिन भर बड़ी हुयी रहती . दूध की मलाई से कोई छेड़छाड़ वो झट से भांप लेती . माँ के हांथों की बनी खीर हमेशा गाढ़ी रही . उनकी खीर कभी भी अचानक नहीं बनी . और न ही बन सकती है . वो पिछले कुछ दिनों की बचत के बाद ड्योढ़े दूध को गाढा कर के बनाती. माँ के हांथों की खीर घंटे दो घंटे बाद थक्के ऐसी जमी होती.
हालाँकि अब वो औसतन 10 में से 4 बार दूध को उबलने से नहीं रोक पाती है . कभी टी वी सीरियल तो कभी अन्य काम में पड़ कर भूल जाती है . लम्बे अरसे से वो डायबिटिक है . माँ ने उसको अपने बच्चों और पति के लिए बखूबी सम्भाला. घर में बहू के आने के बाद भी दूध की चाबी उन्ही के हाँथ रहती है .
दूध और दूध से बने उत्पाद मुझे बेहद पसंद हैं , बचपन से ही . कच्चा दूध पीने का चस्का मेरी बड़ी मां ने बचपने में लगा दिया था . गाँव में बड़ी माँ जब भी दूध लगाती . मैं दूध की धार की आवाज़ सुन अपनी ग्लास ले आता . वो ग्लास में ही दूध दूह देती . ग्लास में खूब सारा झाग वाला दूध . ग्लास से दूध पीने के बाद लम्बी चौड़ी सफ़ेद मूंछ . अपने दुध्हड़ पने के सैकड़ों किस्से हैं . पर उनमें से सबसे यादगार ये है . 10 वीं क्लास कि बात रही होगी शायद , शहर में हमारा दूधिया " चौधरी " कई बार मुझे मजाक मजाक में दूध पीने का आमंत्रण देते रहे . मैं भी कह देता कि जिस दिन पिलाओगे , पछताओगे . एक दिन मैं खाली हाँथ पहुँच गया . चौधरी ने पूछा बर्तन ? मैंने कहा बर्तन कि जरुरत नहीं अंजुरी में पिला दो . बस वो बालटे से दूध नाते रहे और मैं अंजुरी से गट गट गट पीता रहा. उसके बाद गाहे बगाहे चौधरी का प्रेम उमड़ जाता. कभी कभी मुझे महसूस होता है कि माँ का दूध प्रेम शायद मेरी पसंदगी के कारण ही फलता फूलता रहा . उन्होंने कभी यह बात अपने मुंह से नहीं कही.
मेरे व्यक्तिगत अनुभव से दूध को संभालना बहुत पेचीदा काम है . पढ़ाई के बाद ज्यादातर जीवन अकेले ही बीतता गया . कभी दूध का भार किसी हेल्प ने रख लिया , तो कभी चाय बाहर से पीता रहा . जब कभी दूध पीने की शदीद इच्छा हुयी तो पैकेट वाला दूध लाकर कच्चा ही गटक लिया . एक तरह से देखा जाए तो दूध मेरे जैसे काहिल लोगों के लिए बहुत बड़ा सहारा बन सकता है. कभी दूध में रोटी , कभी दूध में ब्रेड , कभी दूध में जलेबी तो कभी दूध में चावल . लेकिन दूध के झंझावात ने खाने पीने की सहूलियत को हमेशा सुपरसीड किया. और मेरे अपने चूल्हे पर कम ही चढ़ा.
अब 2020 ने अच्छे अच्छों को छठी का दूध याद दिला दिया. इस वैश्विक महामारी ने सबकी दशा और दिशा को प्रभावित किया . मैं भी इससे अछूता नहीं रहा . कोरोना वायरस की पकड़ को कमज़ोर करने को पूरे देश में लॉक डाउन का सहारा लिया गया . इस बार फिर से मैं घर से दूर . एहतिआत के तौर पर थोडा बहुत राशन, गैस , कुछ लाई चने की पोटली का इंतजाम कर लिया था. चाय जो कि अब तक चाय पानी कि दूकान से पीता रहा . बंद हो गयी . इधर बीच एक कुत्ते से दोस्ती बढ़ गयी थी . एक पैकेट दूध का अपने लिए और एक छोटू पैकेट उसके लिए कुछ एक दिन से निरंतर ला रहा था . पुलिस के डंडों के डर से वो भी बंद हो गया . मेरे फ़ाज़िल दोस्त को मैंने दूध की बुरी लत लगा दी थी . दो दिन जैसे तैसे कटा . फिर लगा कि दूध ही पार लगाएगा . इत्तेफाक से सामने यादव जी के मकान में दूध का इंतजाम 50 रुपये में तय हुआ. आधा किलो मेरा , आधा किलो दोस्त का . पर दूध को न संभाल पाने का डर वैसे का वैसा ही .
शाम के 7 बजे दूध देने के वादे का इंतज़ार 6 बजे से ही होने लगा . एक किलो दूध लेने के लिए बिन ढक्कन वाला कमंडल लेकर पहली शाम माँ कि तरह तैयार होकर पंहुचा . चौधरी की तरह यादव जी का लड़का आधा लीटर का नाप लिए 1 लीटर दूध नाप दिया . कुछ फर्लांग की दूरी तय करते वक़्त किसी प्रकार की टोकाटाकी का अंदेशा बना रहा . ग्रामीण क्षेत्रों में यह बात प्रचलित है कि दूध को खुले बर्तन में नहीं लाना चाहिए , यदि खुला हो तो कम से कम लाल मिर्च का कतरा डाल के लाना चाहिए . पर वैसा कुछ हुआ नहीं . पहले दिन बड़े हौसले से उस कमंडल को पेट्रोमैक्स वाले चूल्हे पर चढ़ा दिया . घड़ी देख कर 20 मिनट तक दूध की निगरानी . पेट्रोमैक्स की आंच का भरोसा कम ही करना चाहिए . वो लाख सुधरवाने पर भी अपने आप घटती बढ़ सकती है . माँ की देखा देखी कभी लोहे की गोल चलनी वाली ढकनी लाया था .
सर्द मौसम में रात भर अच्छे से गर्म किया हुआ दूध ठंढाता रहा . सुबह जब आँख खुली तो दूध पर लगभग आधा इंच मोटी मलाई देख के मन गदगद हो गया . पूरा दिन दूध के इर्द गिर्द बीतता रहा . मैंने और मेरे दोस्त ने दूध की ऐसी मिठास और गाढ़ेपन को शायद पहली बार चखा. दही की वर्षों की चाह पूरी होने लगी . 10 रुपये के मोल लिए गए दही से जामन और फिर दिनों दिन दही जमाने का सिलसिला चल पड़ा . दही चावल दाल , दही चावल सब्जी , बूंदी रायता चावल , केला लस्सी . दूध दही - दही दूध .
दिन का ज्यादातर हिस्सा, झाड़ू बुहार, खाना बनाने , खाने के बर्तन धुलने , दूध के बर्तन धुलने, सुबह शाम की चाय बनाने , दूध लाने , दूध का प्रबंधन करने में गुजरने लगा . उधर दोस्त कुत्ते ने दूध दही का मज़ा चख कर कुछ और दोस्त बना लिए . चक्कर पे चक्कर में फंसते हुए एक समय लगने लगा " क्या यही लाइफ है , क्या यही प्यार है ? " मुझे माँ समेत दुनिया की हर औरत याद आने लगी जो इन कामों में फंस कर भी खुद को बचा लेती है . बच्चों को पाल लेती है , परिवार चला लेती है.
मार्च आखीर और अप्रैल का पहला सप्ताह का ठंढा होना हमारे दूध और हमारे खाने के लिए अच्छा रहा. अप्रैल की दूसरे सप्ताह गर्मी के बढ़ते पहली बार दूध को संभाल नहीं पाया और वह फट गया . दूध के फटने ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया . उस रोज चाय नहीं बनी , पर पनीर बना , पनीर भुजिया बनी. धुलने के लिए दो बर्तन और सूती कपडा बढ़ा , पहली बार पता चला कुत्तों को फटे दूध का पानी, खराब दूध भी खूब पसंद है....वो मुझसे ज्यादा दूध के शौक़ीन हैं . किसी ने बताया शुद्ध दूध के खराब होने कि संभावना ज्यादा रहती है , लिहाजा 1 लीटर दूध में पाव भर पानी मिलाना जरुरी होता है. दूध तो दूध ! बढती गर्मी के साथ उसका कई बार गर्म होना अनिवार्य हो जाता है. महीने भर के लॉक डाउन अंतराल में जरा सी चूक पर दूध कई बार उबला , पेट्रोमैक्स पर उबले दूध की मलाई परत दर परत जमती गयी , कुछ बार ख़राब हुआ . दही कुछ दिन अच्छा लगा ... वो और ज्यादा खट्टा होने लगा .
लॉक डाउन के 34 वें दिन सारे बैरियर तोड़ते हुए अल सुबह मैं घर की ओर भागा . उस सुबह मां चाय बना रही थी , दूध खौला रही थी , पत्नी झाड़ू लगा रही थी , पिता अखबार पढ़ रहे थे. शाम 7 बजे यादव जी की मेरे फोन पर मिस कॉल आयी . मैं निश्चिंत था अगले दो दिनों के लिए या कहें आज़ाद था. उन दो दिनों में माँ और पत्नी को रसोईं संभालते हुए देखा, घर संभालते हुए देखा. वापसी पर दूध आधा लीटर कर लिया . अभी भी पाव भर पानी मिला लेता हूँ . अच्छी खबर यह है कि लॉक डाउन तीन हफ़्तों के लिए और बढ़ गया है.
वो , कि अब जाता ही नहीं
इन दिनों सब गड्ड मड्ड हो रहा है . लाक डाउन की लम्बी अवधि ने सब कुछ उघाड़ के रख दिया है . वक़्त , लोग , रिश्ते , दोस्त , सरकार सब फ़िल्टर हो कर आ रहे हैं कहीं से . पुख्ता सूचना के अभाव में जो जितना उपलब्ध हो जाए वही बहुत लगता है . दो वक़्त की रोटी हमें नसीब हो रही है , इससे बढ़कर क्या चाहिए हमें ? इस एक सवाल में हजारों उत्तर खड़े हैं हमारे सामने . एक महामारी ने हमारे विकासशील मष्तिष्क को सबक सिखाने की ठान ली है . हमें घुटनों पर टिका दिया है . जिस सभ्यता को विकसित करने में सैकड़ों साल लगे . जिस जुड़ाव को विकसित करने और जरूरतों को पूरा करने के लिए हमने देश दुनिया की सीमायें लांघी , उसी पर एकदम से ब्रेक लेने की चुनौती चट्टान की तरह खड़ी है .
संक्रमण काल के तीन माह गुजर जाने के बाद भी दुनिया बचाव के प्रभावी साधन नहीं ढूंढ पायी . विकासशील और विकसित देशों के रूप में बटी दुनिया अपनी देश को सँभालने में अक्षम है तो वो दूसरों कि मदद क्यों करे और कैसे करे !सावधानी और पैनिक के बीच का फासला अब लगभग ख़त्म होता दिख रहा है . लाक डाउन की आड़ में हम सावधानी को आम लोगों तक पहुचाने में विफल हो रहे हैं . " जो जहाँ है वो वही रहे " योजना को हमने पहले ही ध्वस्त कर दिया . "वो " का डर अभी भी बरकरार है . डींगे हांकते हुए हमने "वो " की शक्ल कल्पनाशीलता और वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर ढूंढ ली. लक्षणों और काल खंड के आधार पर एक अच्छा सा नाम भी रख ही लिया, उसके अस्तित्व में आने के ठीक बाद . इतने दिनों तक " वो " नाम सुनते सुनते कान पाक गए हैं , अब वो नाम लेने में बहुत अटपटा लगता है .
हमारे पैर अनिश्चितताओं कि बेड़ियों में जकड़े हुए हैं . ये संकट नहीं त्रासदी है . हमारे जीवन पर पड़ने वाले असर का आंकलन करना बहुत मुश्किल है . जो हो रहा है उसे स्वीकार करते जाने के अलावा कोई चारा नहीं सूझता .
एक तरह से देखा जाए इस नए अनुभव में हम सब अपनी अपनी तरह से अभ्यस्त होते जा रहे हैं. बोरियत , अवसाद , खीज , एकाकीपन ने बीमारी की शक्ल ले रही है . शरीर की तकलीफ दिखती है दर्द होता है तो दवा भी हो ही जाती है. दिमाग में चलने वाली गतिविधियाँ केवल महसूस की जा सकती हैं . उनके महसूसने को कुछ देर के लिए टीवी , मोबाइल , किताब व अन्य संसाधनों से भरमाया जा सकता है . लेकिन वो हमारे व्यवहार में परिलक्षित हो रही हैं . दूरियों को नज़दीक से ठीक करने के भ्रम , पास के झंझावातों से दूरियां बढ़ने का डर . हावी है सब पर प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से .
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
बच्चों को उड़ने दो ..
उड़ने दो , उड़ने दो बच्चों को उड़ने दो ... गर नाक अटक जाए तो भी तो उड़ने दो .. जिस ऊर्जा का संचार प्रवाह हो उद्दंड उसको भी उड़ने दो कह...
-
फिर झुंझलाकर मैने पूछा अपनी खाली जेब से क्या मौज कटेगी जीवन की झूठ और फरेब से जेब ने बोला चुप कर चुरूए भला हुआ कब ऐब से फिर खिसिया कर मैन...
-
कौन हो तुम जो समय की खिड़की से झांक कर ओझल हो जाती हो तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारे ताज़ा निशान भीनी खुशबू और गुम हो जाने वाला पता महस...
-
"चेतावनी - यह कहानी केवल वयस्क लोगों के लिए है । कहानी के कुछ प्रसंग एडल्ट की श्रेणी के हैं । कृपया बच्चे या किशोर इसे न पढ़ें । "...


