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शनिवार, 2 मई 2020

दूध


मां हमेशा दूध के लिए बहुत संवेदनशील रही . मसलन खुद से घंटों इंतज़ार कर के दूध लाना. उसको अपनी आँखों के सामने खौलाना . खौला कर उसको एकदम ठंढा करना. सुबह फ्रीज़ से निकले दूध की मोटी मलाई को निकाल कर एक अलग बर्तन में रख देना. फिर उस दूध को जरुरत के हिसाब से छोटे छोटे बर्तनों में बाँट के रख देना .  हर दिन फ्रीज़ में कम से कम तीन से चार छोटे बड़े बर्तनों में दूध रहता ही रहता है. इस पूरी कसरत का नतीज़ा महीने भर घी के रूप में घर भर के खाने का स्वाद बढाता रहता है. उन्होंने न जाने क्यों दही को कभी ज्यादा तरजीह नहीं दी . दही को वो अधिकतर बाईपास कर जाती . कई बार फरमाइश पर एक आध बार कभी जमा दिया तो ठीक . वरना दही का जावन बाहर से ही लाना होता.
        अपने, पापा और बच्चे का शाम का दूध , अक्सर खाने में रोटी के साथ मलाई और दाल , सब्जी रोटी के साथ घी का इंतजाम हमेशा रहता  . दूध और घी के बीच मक्खन पर भी कभी कभी हाँथ साफ़ हो ही जाता है. माँ दूध का प्रबंधन इस तरह से करती है कि मैं व्यंग के तौर पर उन्हें दूध का वैज्ञानिक कह दिया करता हूँ . और चूल्हे पर चढ़े बड़े से पतीले में धीमी आंच पर पकते दूध को भाभा एटोमिक रिसर्च सेंटर की चिमनी की संज्ञा दे देता हूँ .
         दर  असल माँ का दूध के प्रति यह पजेसिवनेस मैंने बचपने से देखा है. मुझे दूध से बने सभी उत्पाद बेहद पसंद हैं . पर दूध की प्रोसेसिंग को मैं कभी भी संभाल नहीं पाया . बचपने में कभी कभी माँ दूध चूल्हे पर रख के सोने चली जाती . सोने से पहले गर्म होते दूध की निगरानी का जिम्मा मुझे सौंप जाती . उधर खेल में मैं अटक जाता इधर दूध उबल  के बर्तन की  दहलीज़ पार कर जाता. बस उस दिन हमारी बन आती . माँ का पारा दिन भर चढ़ा रहता . वो किसी न किसी बहाने से उसकी खीज हम पर निकाल ही  देती . उसकी आँखें दिन भर बड़ी हुयी रहती . दूध की मलाई से कोई छेड़छाड़ वो झट से भांप लेती . माँ के हांथों की बनी खीर हमेशा गाढ़ी रही . उनकी खीर कभी भी अचानक नहीं बनी . और न ही बन सकती है . वो पिछले कुछ दिनों की बचत के बाद  ड्योढ़े दूध को गाढा कर के बनाती. माँ के हांथों की  खीर घंटे दो घंटे बाद थक्के ऐसी जमी होती.
        हालाँकि अब वो औसतन 10 में से 4 बार दूध को उबलने से नहीं रोक पाती है . कभी टी वी सीरियल तो कभी अन्य काम में पड़ कर भूल जाती है . लम्बे अरसे से वो डायबिटिक है . माँ ने उसको अपने बच्चों और पति के लिए बखूबी सम्भाला. घर में बहू के आने के बाद भी दूध की  चाबी उन्ही के हाँथ रहती है .
        दूध और दूध से बने उत्पाद मुझे बेहद पसंद हैं , बचपन से ही . कच्चा दूध पीने का चस्का मेरी बड़ी मां ने बचपने में लगा दिया था . गाँव में बड़ी माँ जब भी दूध लगाती . मैं दूध की धार की आवाज़ सुन अपनी ग्लास ले आता . वो ग्लास में ही दूध दूह देती . ग्लास में खूब सारा झाग वाला दूध . ग्लास से दूध पीने  के बाद लम्बी चौड़ी सफ़ेद मूंछ . अपने दुध्हड़ पने के सैकड़ों किस्से हैं . पर उनमें से सबसे यादगार ये है . 10 वीं क्लास कि बात रही होगी शायद , शहर में हमारा दूधिया " चौधरी " कई बार मुझे मजाक मजाक में दूध पीने का आमंत्रण देते रहे . मैं भी कह देता कि जिस दिन पिलाओगे , पछताओगे . एक दिन मैं खाली हाँथ पहुँच गया . चौधरी ने पूछा बर्तन ? मैंने कहा बर्तन कि जरुरत नहीं अंजुरी में पिला दो . बस वो बालटे से दूध नाते रहे और मैं अंजुरी से गट गट गट पीता रहा. उसके बाद गाहे बगाहे चौधरी का प्रेम उमड़ जाता. कभी कभी मुझे महसूस होता है कि माँ का दूध प्रेम शायद मेरी पसंदगी के कारण ही फलता फूलता रहा . उन्होंने कभी यह बात अपने मुंह से नहीं कही.
         मेरे व्यक्तिगत अनुभव से दूध को संभालना बहुत पेचीदा काम है . पढ़ाई के बाद ज्यादातर जीवन अकेले ही बीतता गया . कभी दूध का भार किसी हेल्प ने रख लिया , तो कभी चाय बाहर से पीता रहा . जब कभी दूध पीने की  शदीद इच्छा हुयी तो पैकेट वाला दूध लाकर कच्चा ही गटक लिया . एक तरह से देखा जाए तो दूध मेरे जैसे काहिल लोगों के लिए बहुत बड़ा सहारा बन सकता है. कभी दूध में रोटी , कभी दूध में ब्रेड , कभी दूध में जलेबी तो कभी दूध में चावल . लेकिन दूध के झंझावात ने खाने पीने  की  सहूलियत को हमेशा सुपरसीड किया. और मेरे अपने चूल्हे पर कम ही चढ़ा.
       अब 2020 ने अच्छे अच्छों को छठी का दूध याद दिला दिया. इस वैश्विक महामारी ने सबकी दशा और दिशा को प्रभावित किया . मैं भी इससे अछूता नहीं रहा . कोरोना वायरस की पकड़ को कमज़ोर करने को पूरे देश में लॉक डाउन का सहारा लिया गया . इस बार फिर से मैं घर से दूर . एहतिआत के तौर पर थोडा बहुत राशन, गैस , कुछ लाई चने की  पोटली का इंतजाम कर लिया था. चाय जो कि अब तक चाय पानी कि दूकान से पीता रहा . बंद हो गयी . इधर बीच एक कुत्ते से दोस्ती बढ़ गयी थी . एक पैकेट दूध का अपने लिए और एक छोटू पैकेट उसके लिए कुछ एक दिन से निरंतर ला रहा था . पुलिस के डंडों के डर से वो भी बंद हो गया . मेरे फ़ाज़िल दोस्त को मैंने दूध की बुरी लत  लगा दी थी . दो दिन जैसे तैसे कटा . फिर लगा कि दूध ही पार लगाएगा . इत्तेफाक से सामने यादव जी के मकान में दूध का इंतजाम 50 रुपये में तय हुआ. आधा किलो मेरा , आधा किलो दोस्त का . पर दूध को न संभाल पाने का डर वैसे का वैसा ही .
        शाम के 7 बजे दूध देने के वादे का इंतज़ार 6 बजे से ही होने लगा . एक किलो दूध लेने के लिए बिन ढक्कन वाला कमंडल लेकर पहली शाम माँ कि तरह तैयार होकर पंहुचा . चौधरी की तरह यादव जी का लड़का आधा लीटर का नाप लिए 1 लीटर दूध नाप दिया . कुछ फर्लांग की  दूरी तय करते वक़्त किसी प्रकार की टोकाटाकी का अंदेशा बना रहा . ग्रामीण क्षेत्रों में यह बात प्रचलित है कि दूध को खुले बर्तन में नहीं लाना चाहिए , यदि खुला हो तो कम से कम लाल मिर्च का कतरा डाल के लाना चाहिए . पर वैसा कुछ हुआ नहीं . पहले दिन बड़े हौसले से उस कमंडल को पेट्रोमैक्स वाले चूल्हे पर चढ़ा दिया . घड़ी देख कर 20 मिनट तक दूध की निगरानी . पेट्रोमैक्स की आंच का भरोसा कम ही करना चाहिए . वो लाख सुधरवाने पर भी अपने आप घटती बढ़ सकती है . माँ की  देखा देखी कभी लोहे की  गोल चलनी वाली ढकनी लाया था .
        सर्द मौसम में रात भर अच्छे से गर्म किया हुआ दूध ठंढाता रहा . सुबह जब आँख खुली तो दूध पर लगभग आधा इंच मोटी मलाई देख के मन गदगद हो गया . पूरा दिन दूध के इर्द गिर्द बीतता रहा . मैंने और मेरे दोस्त ने दूध की ऐसी मिठास और गाढ़ेपन को  शायद पहली बार चखा.  दही की वर्षों की चाह पूरी होने लगी . 10 रुपये के मोल लिए गए दही से जामन और फिर दिनों दिन दही जमाने का सिलसिला चल पड़ा . दही चावल दाल , दही चावल सब्जी , बूंदी रायता चावल , केला लस्सी . दूध दही - दही दूध .
        दिन का ज्यादातर हिस्सा, झाड़ू बुहार, खाना बनाने , खाने के बर्तन धुलने , दूध के बर्तन धुलने,  सुबह शाम की  चाय बनाने , दूध लाने , दूध का प्रबंधन करने  में गुजरने लगा . उधर दोस्त कुत्ते ने दूध दही का मज़ा चख कर कुछ और दोस्त बना लिए . चक्कर पे चक्कर में फंसते हुए एक समय लगने लगा " क्या यही लाइफ है , क्या यही प्यार है ? " मुझे माँ समेत दुनिया की हर औरत याद आने लगी जो इन कामों में फंस कर भी खुद को बचा लेती है . बच्चों को पाल लेती है , परिवार चला लेती है.
          मार्च आखीर और अप्रैल का पहला सप्ताह का ठंढा होना हमारे दूध और हमारे खाने  के लिए अच्छा रहा. अप्रैल की दूसरे  सप्ताह गर्मी के बढ़ते पहली बार दूध को संभाल नहीं पाया और वह फट गया .  दूध  के फटने ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया . उस रोज चाय नहीं बनी , पर पनीर बना , पनीर भुजिया बनी. धुलने के लिए दो बर्तन और सूती कपडा बढ़ा  , पहली बार पता चला कुत्तों को फटे दूध का पानी, खराब दूध भी खूब पसंद है....वो मुझसे ज्यादा दूध के शौक़ीन हैं . किसी ने बताया शुद्ध दूध के खराब होने कि संभावना ज्यादा रहती है , लिहाजा 1 लीटर दूध में पाव भर पानी मिलाना जरुरी होता है. दूध तो दूध ! बढती गर्मी के साथ उसका कई बार गर्म होना अनिवार्य हो जाता है.  महीने भर के लॉक डाउन अंतराल में  जरा सी चूक पर दूध कई बार उबला , पेट्रोमैक्स पर उबले दूध की  मलाई परत दर परत जमती गयी , कुछ बार ख़राब हुआ . दही कुछ दिन अच्छा लगा ... वो और ज्यादा खट्टा होने लगा .
      लॉक डाउन  के 34  वें दिन  सारे बैरियर तोड़ते हुए अल सुबह मैं घर की ओर  भागा . उस सुबह मां चाय बना रही थी , दूध खौला रही थी , पत्नी झाड़ू लगा रही थी , पिता अखबार पढ़ रहे थे. शाम 7 बजे यादव जी की मेरे फोन पर मिस कॉल आयी .   मैं निश्चिंत था अगले दो दिनों के लिए या कहें आज़ाद था. उन दो दिनों में माँ और पत्नी को रसोईं संभालते हुए देखा, घर संभालते हुए देखा. वापसी पर दूध आधा लीटर कर लिया . अभी भी पाव भर पानी मिला लेता हूँ . अच्छी खबर यह है कि लॉक डाउन तीन हफ़्तों के लिए और बढ़ गया है.
       

वो , कि अब जाता ही नहीं


इन दिनों सब गड्ड मड्ड हो रहा है . लाक डाउन की लम्बी अवधि ने सब कुछ उघाड़ के रख दिया है . वक़्त , लोग , रिश्ते , दोस्त , सरकार सब फ़िल्टर हो कर आ रहे हैं कहीं से . पुख्ता सूचना के अभाव में जो जितना उपलब्ध हो जाए वही बहुत लगता है . दो वक़्त की रोटी हमें नसीब हो रही है , इससे बढ़कर क्या चाहिए हमें ? इस एक सवाल में हजारों उत्तर खड़े हैं हमारे  सामने . एक महामारी ने हमारे विकासशील मष्तिष्क को सबक सिखाने की  ठान ली है . हमें घुटनों पर टिका दिया है .  जिस सभ्यता को विकसित करने में सैकड़ों साल लगे . जिस जुड़ाव को विकसित करने और जरूरतों को पूरा करने के लिए हमने देश दुनिया की  सीमायें लांघी , उसी पर एकदम से ब्रेक लेने की  चुनौती चट्टान की  तरह खड़ी है .

           संक्रमण काल के तीन माह गुजर जाने के बाद भी दुनिया बचाव के प्रभावी साधन नहीं ढूंढ पायी . विकासशील और विकसित देशों के रूप में बटी दुनिया अपनी देश को सँभालने में अक्षम है तो वो दूसरों कि मदद क्यों करे और कैसे करे !
    सावधानी और पैनिक के बीच का फासला अब लगभग ख़त्म होता दिख रहा है . लाक डाउन की आड़ में हम सावधानी को आम लोगों तक पहुचाने में विफल हो रहे हैं . " जो जहाँ है वो वही रहे " योजना को हमने पहले ही ध्वस्त कर दिया  .  "वो " का डर अभी भी बरकरार है . डींगे हांकते हुए हमने "वो " की शक्ल कल्पनाशीलता और वैज्ञानिक तथ्यों  के आधार पर  ढूंढ ली. लक्षणों और काल खंड के आधार पर एक अच्छा सा नाम  भी रख ही लिया, उसके अस्तित्व में आने के ठीक बाद . इतने दिनों तक " वो " नाम सुनते सुनते कान पाक गए हैं , अब वो नाम लेने में बहुत अटपटा लगता है .
      हमारे पैर अनिश्चितताओं कि बेड़ियों में जकड़े हुए हैं . ये संकट नहीं त्रासदी है .  हमारे जीवन पर पड़ने वाले असर का आंकलन करना बहुत मुश्किल है . जो हो रहा है उसे स्वीकार करते जाने के अलावा कोई चारा नहीं सूझता .
      एक तरह से देखा जाए  इस नए अनुभव में हम सब अपनी अपनी तरह से अभ्यस्त होते जा रहे हैं. बोरियत , अवसाद , खीज , एकाकीपन ने बीमारी की शक्ल ले रही है  . शरीर की तकलीफ दिखती है दर्द होता है तो दवा भी हो ही जाती है.  दिमाग में चलने वाली गतिविधियाँ केवल महसूस की  जा सकती हैं . उनके महसूसने को कुछ देर के लिए टीवी , मोबाइल , किताब व अन्य संसाधनों से  भरमाया जा सकता है . लेकिन वो हमारे व्यवहार में परिलक्षित हो रही हैं . दूरियों को नज़दीक से ठीक करने के भ्रम , पास के झंझावातों से दूरियां बढ़ने का डर . हावी है सब पर प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से .
  

गुरुवार, 30 अप्रैल 2020

जो कविता स्मृति में नहीं वो कविता कहीं नहीं है : नरेश सक्सेना


" मेरी पसंद कि कविताएँ " कार्यक्रम  के तहत  वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना द्वारा अपने  पसंदीदा कवियों की  रचनाओं के पाठ पर एक रिपोर्ट

30 अप्रैल 2020 , दिन गुरूवार सायं 6 बजे लखनऊ से वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने कविता कारवां के फेसबुक पेज पर लाइव आकर अन्य कवियों की कई कविताओं के अंश पढ़े . बड़ी ही सादगी से उन्होंने कंठस्थ रचनाओं के अंश का पाठ करते समय कई बार दोहराया कि "जो कविता स्मृति में नहीं वो कविता कहीं नहीं हैं.  किताब से देखकर कविता पढने की  मेरी आदत है नहीं . जो कविताएँ मुझे अच्छी लगती हैं वो किसी न किसी तरह से मेरे दिल में उतर जाती हैं . हो सकता है मेरे द्वारा पढ़ी गयी कविता में पूरी पंक्तियाँ न हो पर उसका न्युक्लिअस या उसका मर्म मेरे भीतर उतरा है."
   जाहिर तौर पर यह बात उनके पाठ के दौरान हमेशा चरितार्थ होती रही, उनके पसदं के काव्यांश  , उनके रचनाकारों  और कविता के शिल्प पर बात करना ऑनलाइन श्रोताओं को खूब भाया. साथ ही साथ कविता के सौंदर्य को फिल्म , नाटक , संगीत , पेंटिंग और कला के साथ जोड़ना
       पहली कविता के रूप में नरेश जी ने  गीत चतुर्वेदी अनूदित  फ़ारसी के इरानी कवि  सबीर  हका  की कविता " शहतूत " सुनाई.  " क्‍या आपने कभी शहतूत देखा है / जहाँ गिरता है, उतनी ज़मीन पर/ उसके लाल रस का धब्‍बा पड़ जाता है। / गिरने से ज़्यादा पीड़ादायी कुछ नहीं। / मैंने कितने मज़दूरों को देखा है/ इमारतों से गिरते हुए, / गिरकर शहतूत बन जाते हुए। " उन्होंने शहतूत के रूपक के रूप में इस्तेमाल होने को सराहा. शहरों की  ऊँची ऊँची इमारतों में काम करते मजदूरों की पीड़ा स्मृति में बस जाती है.
    सुशील शुक्ल की  कविता "धूप"  : धूप निकलती है / धूप से आगे / धूप निकलती है / धूप को पकड़ो तो / कुछ हाथ नहीं आता / धूप में खोलो मुट्ठी / तो फिर, धूप निकलती है. इस कविता को उन्होंने आज के करोना काल से जोड़ते हुए कहा कि हमने प्रकृति को मुट्ठी में कैद करने की  कोशिश की, उसका परिणाम हमारे सामने है. प्रकृति को हमेशा आँचल पसार के लेना चाहिए.
     कविता के मर्म  के द्रष्टिकोण से उन्होंने कहा कि  कविता विवरण में नहीं होती . यह बात हम में से बहुत सारे लोगों को समझनी चाहिए. कविता में विवरण की  जरुरत अक्सर नहीं होती . उसे सूक्ष्म होना होता है. वो चार पंक्तियों में अपना काम कर देती है. कविता अपने शब्दों से ज्यादा कहती  है . अज्ञेय और  केदारनाथ सिंह के काव्यांशों के साथ उन्होंने कहा  जिसमें रूपक अच्छा होता है तो वो सहज रूप से हमारी स्मृति में चली आती हैं. सब कुछ भाषा से ही नहीं कहा जाता है. हमारे पास शब्द बाद में आते हैं अर्थ पहले आ जाते हैं. शब्दों को हम तलाश करते हैं कि कैसे कहें उस अर्थ को . भाषा शब्दों की  मोहताज नहीं होती बहुत बार वो बिम्बों से , ध्वनियों से अभिव्यक्त होती हैं. 
फिल्म मेकर आइसेस्टाईन के काम की  सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि जब हम किसी द्रश्य को  देखते हैं सिर्फ उस बिम्ब को नहीं देखते हर द्रश्य की अपनी आवाजें होती हैं, गंध होती है . इसी क्रम में उन्होंने  ऋत्विक घटक की फिल्मों का भी जिक्र किया.
विनोद कुमार शुक्ल की  कविता "एक भारी गोल पत्थर/ एक दुसरे भारी गोल पत्थर पर इस तरह से रखा है/ कि जैसे अभी अभी गिरने को है / और जो अभी अभी गिरने को है वो कबसे नहीं गिर रहा/ जो अभी अभी गिरने को है उसके नीचे एक चरवाहा आकर के खड़ा हो गया है . इस कविता  में जो गिरा नहीं  वो प्राचीन है " कविता में जो अभी अभी गिरने को है वो नया है. कविता में वो अभी अभी गिरने को कई बार  एक संज्ञा के रूप में इस्तेमाल किया गया है .  इसी प्रकार से उन्होंने रायपुर छत्तीसगढ़ से  अलोक श्रीवास्तव की  कविता  " एक फूल खिला" की पंक्तियाँ पढ़ी . अज्ञेय की  कविता " दुःख सबको मांजता है ".. को कम शब्दों में बहुत प्रभावशाली बताया . उन्होंने कहा शब्दों का प्रयोग बहुत सावधानी से करना चाहिए . हर बड़ा कवि शब्दों को लेकर बहुत सावधान रहता है.
राजेश जोशी की  कविता बर्बर सिर्फ बर्बर थे / उनके हाँथ में धर्म की  कोई ध्वजा नहीं थी / बर्बर सिर्फ बर्बर थे /भाषा का कोई छल उनके पास नहीं था / बर्बर सिर्फ बर्बर थे /दुःख और पश्चाताप जैसे शब्द भी नहीं थे उनके पास /बर्बर सिर्फ बर्बर थे . हम उन्हें युगों पीछे छोड़ आये हैं ..... नरेश जी ने बताया कि इस कविता में आखरी वाक्य एक पूरे युग की कहानी कह देता है.

पंजाबी कवि जगदीप सिद्धू :  उसने ख़ुदकुशी के बारे में सोचा / छत से कूद के मरने के बारे में सोचा /गाड़ी  से कुचल के मरने के बारे में सोचा /फिर सोचा डूब के मरा जाए /फांसी लगा के क्या मरना.....अंत में कवि मरने के सारे उपायों में तिनका तिनका जीवन ढूढ़ लेता है और मरने का फैसला स्थगित कर देता है.  कार्ड सैंडबर्ग की  कविता "घास का मैदान"  , असद जैदी की "पुश्तैनी तोप" के कथ्य कि गहनता पर उन्होंने प्रकाश डाला . 
मंगलेश डबराल की कविता :  शहर को देख कर मैं मुस्कुराया और कहा कि यहाँ कोई कैसे रह सकता है, जब वो उस शहर को देखने जाते हैं तो वो वही के हो कर रह जाते हैं....मंगलेश डबराल की कविताओं के बारे में उन्होंने कहा कि  उनकी कविताओं में आवाजें होती हैं . मंगलेश आवाजों के बारे में संवेदनशील हैं . आवाज़ों के बारे में हमें भी संवेदनशील होना चाहिए . 
      इस बात को और पुष्ट करते हुए उन्होंने फिल्म  "मेढ़े ढाका तारा" का जिक्र किया  जहाँ चीख एक लम्बे अलाप के रूप में निकलती है. रोगग्रस्त अपनी बहन के सामने, घर की  जिम्मेदारी न उठा पाने की टीस की  अभिव्यक्ति लम्बे अलाप से . कला के माध्यम से अभिव्यक्ति का एक और चित्रण पेश करते हुए नरेश जी ने  मशहूर पेंटिंग "पिघलती  हुयी घड़ियाँ" हवाला दिया. जैसे कि वो घड़ियाँ  मोम की तरह  विरूपित हो गयी हों ,उसमें घड़ियाँ अपने समय  को विरूपित होते दिखा रही हैं  . कोई भी विधा हो, हम उसका अतिक्रमण करते हैं कविता एक बहुत बड़ी विधा है. हम उनमें बिम्बों को लाते हैं, रूपक को लाते हैं, आवाजें लाते हैं, द्रश्यों को लाते हैं विचारों को लाते हैं, यह निबंध लिखने कि विधा नहीं है. 
मुक्तिबोध की  कविताओं के बारे में वो कहते हैं कि उनकी कविताओं के पीछे विज्ञान था, उनके पास विज्ञान का दर्शन था , मुक्तिबोध क्वांटम फिजिक्स की और जाते हैं उनके तमाम पहलुओं को अपनी रचनाओं में लिखते हैं. "ऋण एक राशि का वर्ग मूल"  , "एक पाँव रखता हूँ तो सौ राहें खुलती हैं और मैं उन सब से गुजर जाना चाहता हूँ . उनकी कविताओं के पीछे एक विज्ञान का तर्क तथ्य और दर्शन दीखता है ...उनकी रचनाओं में ब्रम्ह राक्षस से लेकर खगोलीय गतिविधिया और वैज्ञानिक दृष्टिकोण महसूस होती हैं , जो केवल कल्पना नहीं हैं , उनके भीतर उनकी गहरी समझ थी.
      नरेश जी साहित्य के पाठ्यक्रमों में कला की कमी को महसूस करते हैं , वो कहते हैं हमें सिर्फ साहित्य को ही पढाया जाता है. जिसमें  न नृत्य से रिश्ता होता है, न कला से और न ही संगीत से .  संगीत के बिना कविता कैसे हो सकती है ? गद्य में कविता होती है अच्छी कविता होती हैं . लेकिन ये कहना कि हमने लय को छोड़ दिया है तो यह समझ से परे है.  लय  को गृहण  कर के छोड़ना !  छोड़ना होता है . बिना गृहण किये छोड़ना छूट जाना होता है  . हम में से बहुत से लोग तो छूटे  हुए लोग हैं .
      कविताओं में तथ्यों के आधार पर सत्य रचा जाता है. अलग अलग काल खंड में अलग अलग लोगों द्वारा. जैसे कि कविता जीवन में  उजाला लाती  है .  संस्कृत के आचार्य कुंतक , अज्ञेय , प्रसाद की रचनाओं में उजाला का चित्रण दीखता है. 
 रविन्द्र नाथ ठाकुर की  बँगला कविता "काशेर बौने शुन्य नदी तीरे, एक्ला पथे के तूमि  जाओ धीरे, आँचल आड़े  प्रोदीप खानी ढेके " अर्थात कांस  के बन में सुनसान नदी के तट पर धैर्यवान स्त्री आँचल में दीप को ढांके  तुम कहाँ  जा रही हो ? मेरे घर में अन्धकार है ये दीपक मुझे दे दो . वो कहती है मैं इसे तुम्हे नहीं दूंगी इसे तो मैं दीपकों की  पंक्ति में रख दूंगी .... नरेश जी ने कुछ और पंक्तियों के सहारे रोशन करने के संवादों को याद किया.     वो कहते हैं कि कविता की  पहली पंक्ति जता  देती है कि उसकी आधार भूमि कैसी है . फिर  उसके ऊपर इमारत खड़ी  होती है , जमीन की भार  क्षमता होती है. इसलिए बिला वजह कविता को लम्बा नहीं होना चाहिए.  कवि पहली पंक्ति का आविष्कार  करता है .  कविता भाषा की कला है .यदि सबको लगता है कि भाषा आती है तो कविता भी आती है . यह  एक  भ्रम है कि अपने विचारों को लिख दीजिये तो कविता होगी ! अगर लम्बी लम्बी लाइनों में लिख दीजिये तो वो निबंध है ! अगर छोटी पंक्तियों में लिख दिया तो कविता है . ऐसा नहीं होता . हर कला में अनुशासन  के साथ नियम होते हैं . उनसे गुजरना होता है कवि को. उसका डिजाइन होता है और वो बनते बनते बनता है. शब्द गिरते नहीं है , एक बार लिख गए तो खड़े रहते हैं कागज़ पर . जब कोई पढता है तो उसके दिमाग वो इमारत गिर पड़ती है और फिर वो उसे नहीं पढता. 
     कविता की  संरचना में एक डिजाइन होता है . पहले छंद होता थे , अब कवितायेँ मुक्त हैं . पर यह मुश्किल जमीन है . बहुत मुश्किल.  उर्दू कविता में एक शेर की एक बंदिश होती है , वज़न होता है एक बहर होती है , रजीफ़ काफ़िया होता है वही अनुशासन होता है . हिंदी में हम उससे मुक्ति पा गए . हम  जब गद्य में कविता लिख रहे होते हैं तो समझिये एक बहुत मुश्किल जमीन पर आ गए हैं. यह आसन नहीं है. 
    धूमिल' अशोक बाजपेयी, सोमदत्त , मलय , विनोद कुमार शुक्ल की कविताओं को याद करते नरेश जी बताते हैं विनोद कुमार शुक्ल  बीस साल तक लिखते रहे किसी ने नोटिस नहीं लिया उनका .  मलय की दशकों पहले लिखी गयी कविताएँ आज भी प्रासंगिक हैं : "  दौड़ती हुयी सडक नदी में गिर पड़ी तो गति ने उसे हाँथ बढ़ा पार किया " , मेरी उँगलियों कि पोरों पर शंख है चक्र हैं और हथेलियों का समुद्र गरज रहा है ", सोमदत्त की  कविता : " मेरे हांथों में में फूलों की  डाली है और तुम्हारे हांथों में चावल की  थाली, मैं फूल चुनके उदास हूँ और तुम पत्थरों को चुन के सुखी " . 
        मंच को छोड़ देना हिंदी कविता के लिए  बहुत बुरा हुआ, पर जब जब बहुत गंभीर और अच्छी कविता मंच पर जाती है तो करोड़ों  कमाने वाले  मंच के कवि फीके पद जाते हैं. तुलसी , कबीर , रैदास जैसे कवियों कि रोटी कविता से नहीं चलती थी. सब कड़ी मेहनत से रोटी का इंतजाम करते थे . कविता कि यात्रा बहुत लम्बी होती है.
     इकबाल की मशहूर " सितारों से आगे जहां और भी है अभी इश्क के इम्तिहान और भी हैं ."  इकबाल की  कल्पना में  कविता अगर इश्क है तो इस इम्तिहान में फेल होने का धीरज भी  होना चाहिए . पहुचते  हैं वो बड़े धीरकज के साथ में . अच्छी कविता जब कोई सुनाएगा तो सुनी जाएगी.

कविता वही है जो आपकी स्मृति में है और जो कविता स्मृति में नहीं है वो कविता कहीं नहीं है. कविता जो  स्मरणीय नहीं होगी तो रमणीय नहीं होगी . रमणीय होने के लिए उसे हमारे भीतर गूंजना होगा. और जितनी कविता हमारे बीच बची रह जाए वही कविता है.

कविता कारवां के आयोजन होते रहने चाहिए :
वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना जी तीसरी बार कविता कारवां की यात्रा के साक्षी बने हैं . उन्हें यह प्रारूप बेहद पसंद आया . जहाँ अपनी पसंद के कवि की  बात हो , उनकी कविताओं का पाठ हो . वो पहली मर्तबे कुछ वर्ष पहले  लखनऊ में आयोजित बैठक में शामिल हुए थे. दूसरी बार देहरादून में और 4 वर्ष पूर्ण होने पर कविता कारवां के फेसबुक पेज पर लाइव . दो बार उन्हें बहुत कम समय के अंतराल में इस कार्यक्रम की सूचना मिली . बिना किसी तैयारी के बावजूद उन्होंने सहजता से अपनी स्मृतियों में सहेजी कविताओं का पाठ किया. तथा अन्य कवियों के परिप्रेक्ष्य में अपने अनुभव साझा किये. यह सादापन इस कार्यक्रम और उनका सौंदर्य है. कविता कारवां परिवार आशा करता है कि आगे भी वह इस कार्यक्रम का हिस्सा होंगे .

बुधवार, 29 अप्रैल 2020

तुम्हारा मरना !

मैंने तुम्हे कई बार
मरते देखा है
हर बार किसी नए रूप में
मरते देख जीवन जीने की
अब आदत हो चली है

निरुत्तर पुकारें
देंह की मिट्टी और
कोई नाम लेकर
मान लेता हूं तुम्हारा मरना

जानता हूं मरना
जीवन की सतत प्रक्रिया है
उस प्रक्रिया का हिस्सा
तुम्हारा मरना है

फिर भी महसूस नहीं होता
तुम्हारा मरना
तुम्हारे पीछे गूंजती सिसकियों से
रिक्त स्थान को भरते नहीं देखा
न ही स्मृतियों को देखा
दफ़न होते

कितनी गुंजाइश रख छोड़ी है
तुमने जीने और मरने के बीच
सीने से चिपकाए
बंदरों की तरह
मैंने खुद का मरना
बचाए रखा है ।

गुरुवार, 6 फ़रवरी 2020

सखी

मेघाबास : चलें ?
दिलरुबा : कहाँ !
मेघाबास : जहाँ मैं बताऊँ !
दिलरुबा : भक्क
मेघाबास : चलें ? ( गहरी सांस लेते हुए)
दिलरुबा : अरे कहाँ बाबा, पूछा तो !
मेघाबास : नमी देखी है कहीं ?
दिलरुबा :  ऊँ हूँ ! एक अरसे से सूखा पड़ा है मन , कभी बारिशें जो आयीं उन्हें सहेजने का कारण नही मिला कोई।
मेघाबास : चल ना !
दिलरुबा : मुझे नही जाना । (झुंझलाकर)
मेघाबास : गुस्सा क्यों करती है। वैसे तो बड़ी इठलाई घूमती थी। मटक मटक के हवा पर सवार जंगल, नदियाँ पार कर गुम हो जाती थी। कोई पुकार तुम्हे रोक नही पायी । अब क्यों बुझी बैठी है उकड़ू नदी के बीच, चट्टान पर।
दिलरुबा : देखो मुझे एकांत चाहिए । इसलिए बैठी हूँ यहां । शोरशराबे से दूर ।
मेघाबास : चलो तुम बैठो सुकून से और आँख भी बन्द कर लो। कान बन्द आँख बन्द !
दिलरुबा : बेहतर है !
मेघाबास : एक बात बोलूँ ( दिलरुबा के कान के पास जाकर )
दिलरुबा : हम्म !
मेघबास : मैं तुम्हारी आँख पर पट्टी बाँध ले जाना चाहती हूँ कहीं। तुम बस महसूसना मौसम को, गन्ध को, हवा के स्पर्श को, खुद को।
दिलरुबा : ठीक है।

मेघाबास : कितना अच्छा होता हम खुद को एक दूसरे से बदल पाते। या साझा करते ।

दिलरुबा : हम जो हैं, वही हम हैं।
मेघाबास : शांत रह, बिना बोले नही रहा जाता तुझसे।

मेघाबास बादलों सरीखे मजबूत कंधों पर दिलरुबा को लिए फिरती रही। धरती की ऊष्मा को भाँपती... दिलरुबा की आँखें झर झर झरती रही ओस की बूँदों की तरह।

बच्चों को उड़ने दो ..

 उड़ने दो , उड़ने दो  बच्चों को उड़ने दो ... गर नाक अटक जाए  तो भी तो  उड़ने दो ..   जिस ऊर्जा का  संचार प्रवाह  हो उद्दंड  उसको भी  उड़ने दो  कह...