कुल पेज दृश्य

मंगलवार, 23 अक्टूबर 2018

हम्म !

जब से तुम
मर गयी हो,
तबसे
मैं तुम्हें जीने लगा हूँ

तुम वाकई
मर गई हो न ?
फिर, मैं ज़िन्दा कैसे !

बच्चा बड़ा हो गया है !

घर की मजबूत दीवारों में
बच्चे की ऊर्जा ने
थका दिया, छका दिया
कई बड़े बड़े लोगों को

वो दिन भर सुनता है
चीखती हुई आवाज़ें
किसी भी दिशा से, किसी भी समय
डराने वाली, धमकाने वाली,
 शिकायत करने वाली

हाँ, डराने वाली आवाज़ें
"बाबा आ जाएगा"
गन्दी बातें सीखते हो
शान्त बैठो
गब्बर हो रहे हो
सुनते नही हो

उनके कान कोमल हैं
कहानी सुनने
संगीत सुनने
को होते हैं उनके कान

दिन भर मासूम बच्चे के साथ
साजिशें होती हैं
उसे पुलिस तक का डर दिखाया जाता है
घर में बच्चा अकेला रहता है
कुछ बड़े मोबाइल हैं, दो बड़ी टी वी हैं
एक अख़बार
सिर्फ  एक आराम दायक कुर्सी

बड़े डरते हैं छिपकली से
बच्चा कॉकरोच से डरता है।




ट्रेसपासिंग !

पुलिस बहुत मारती है
दीवारें फाँद
कूदते चोरों को देख

चुराते हुए देखा गया उन्हें आज
छिपती,समय से तेज़
भूत भविष्य का आधा आधा हिस्सा
देखती नजरों को
पकड़ लिया गया
रंगे हाँथ

पुलिस भावनाओं में
इतना रूखापन क्यों होता है ?
वो उस चोरी पर
हाहाकार
मचा देती है
रौंदना चाहती हैं
अपने बूटों से

एक चोर को !

रोटी चोर,
चिल्लर चोर
छोटे छोटे सुख बटोरने वाले
बेहद अभाव में पले बढ़े बच्चे !

बहुत मारते हैं वो
थाने की ओट में
लोहे के इंजन वाले मोटे पटे से
दोनों की चमड़ी
मोटी होती जाती

रोज सुबह चाय की दुकान के पास
पुलिस, ट्रकों के ड्राइवर केबिन को
जोर से हिलाती है
उनसे कुछ चिल्लर झरते हैं
राह चलते लोग देखते हैं
मुस्कुरा के आगे बढ़ जाते हैं

पुलिस से मुस्कुराया नही जाता
उनके व्यस्ततम जीवन में
प्रेम का समय नही
एक छूटे हुए जीवन की याद में
एक काम में गुजारते
ठूँठ हो जाते हैं

नमी
खत्म हो जाती है
दो तरह की आवाज़ों में
मौन, हिंसक होता जाता है

थाने में पुलिस की मार
से उपजी टीस
हदों की दीवारें फाँदते
बड़ी होती हैं

आज फिर
कोरे कागज़ पर
सफेद झूठ से माफी लिखवाई गयी
लॉक अप में एक साथ
सच झूठ बन्द किए गए

थानों की दीवारें बहुत मोटी
और सख्त होती हैं
आवाज़ें दीवारें फाँद जाती हैं।



आठ बजे !

भीतर के बच्चे ने
शाम होते ही कुलाँचे भरना
शुरू कर दिया

शाम के साथ साथ
उसकी आँखों का डर जाता रहा
 खेल खेल में
अपने भीतर की आग को
दबाता है
आग कई बार दावानल
होने से रह जाती  है

शाम और गाढ़ी और गाढ़ी
शाम की शराब के शीशे से
ट्यूबलाइट की रोशनी
बादामी हो जाती है

रोज़ शाम को
बच्चा बाल्यावस्था से
युवा तो कभी प्रौढ़
तो महिला होता है

भीतर
काली स्क्रीन पर रंगारंग कार्यक्रम
सच बोलूँ तो
18 घण्टे
चलता है ।




स्टूडियो !

स्टूडियो में प्रोपर्टी नई नही हैं
बहुत कुछ तीन पाँवों या एक वाला
लुढ़कता रहता है इधर से उधर
ईंधन की राख की पुती दीवारों
के बीच सफ़ेद बल्ब
टेबल के बेहद करीब लटका हुआ है

ऑडिशन में आए किरदार
घर से उस किरदार में आएं हैं
रास्ते भर उनके सामने
हज़ारों लोगों के बीच
किरदार लांघते चले आते हैं

पिछली शूट की लोकेशन
दीवार से उतरी नही है
हर नई कहानी के
निशान दीवारों पर मिलते हैं

किसी और किरदार
की याद को देखते देखते कलाकार
गपशप में सीरियल/ऐडवर्टीज़मेंट/फ़िल्म
में झगड़ता है

बच्चों को उड़ने दो ..

 उड़ने दो , उड़ने दो  बच्चों को उड़ने दो ... गर नाक अटक जाए  तो भी तो  उड़ने दो ..   जिस ऊर्जा का  संचार प्रवाह  हो उद्दंड  उसको भी  उड़ने दो  कह...