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शनिवार, 30 जून 2018
तीन आम
आम का बुख़ार कुछ इस तरह चढ़ा मियाँ गुमसुम बाज़ार से दो किलो आम ले आए। आम के मौसम में मियाँ के नथुने ख़ुशबू से रुँधे जा रहे थे। बत्तो रानी की जबरदस्त याद में मियाँ ने बागों में जा जा के बौर तक सूंघे थे। अब आम का मौसम आया तो वो अपनी तंगहाली को रोए ? बत्तों रानी का शहर आम की ख़ुशबू से बहुत दूर है।मियाँ ने सुन रखा था। प्रकृति दो बहुत दूर हुए दिलों को मिला देती है। मियाँ को एक ही ठेले पर दशहरी के विकृत रूप नज़र आए। मियाँ ने सब दो किलो में तौलवा दिए। कुल तीन बड़े आम। एक कुछ कुछ शंख के आकार का, एक गणेश के आकार का, एक दिल के आकार का। मियाँ की धड़कने तेज़ थीं। मियाँ ने उस शहर की ओर जाने वाली ट्रेन पकड़, शंखाकार आम को शगुन के तौर पर खा लिया। ट्रेन ने रफ़्तार पकड़ी। मियाँ ने आम वाले बैग को कसके अपने सीने में भीच लिया। बैग के ज़िप के छोटे छोटे छेदों से आम महकने के लिए अमादा हुआ जा रहा था।
मियाँ के ठीक सामने बैठी एक महिला को मायके में खाए आम की हिचकियाँ आ रही थी । और उसका पति चलती ट्रेन से आम के बागों को निहार रहा था। दोनों में बहुत देर से बात नही हुई थी। मियाँ की नज़र ने आम के खेल को पकड़ लिया था। मियाँ ने एक आम निकाल कर उन दोनों के नज़र कर दिया।
मियाँ तीसरे आम पर एकदम सख्त थे मन ही मन। आम की ख़ुशबू अब पूरे कूपे में फैल गयी । मलिहाबाद और आम के किस्से कहानियाँ होने लगे । मियाँ उस एक बचे हुए आम को हरगिज़ खर्च नही करना चाहते थे। पता नही क्यों मियाँ उदास होने लगे। मियाँ के सामने अपने घर से लेकर दूर तक के लोग की फिल्में घूमने लगीं। मियाँ जहाँ जा रहा है वो आख़री आम लेकर । वो शहर बहुत दूर लगने लगा। उसको डर लग रहा था। उस एक बचे हुए आम को पूरे कूपे में बाँटने का मन कर रहा था मियाँ का। मियाँ ने झट से उस आख़री आम को निकाल साइड अपर बर्थ पर बैठे युगल को दे दिया।
वो आख़री आम दिलाकार था। मियाँ ने आधे रास्ते में ही आम के आकारों को ख़त्म कर दिया । मियाँ गुमसुम अगले स्टेशन पर उतर गए। उन्हें यकीन है, वह ट्रेन, वे लोग उस ख़ुशबू और स्वाद को बत्तों रानी के शहर ले जाएँगे। उन आमों की गुठलियाँ पेड़ भी बन सकती हैं कहीं रास्ते में। एक उस शहर को जाते हुए, एक शहर से आते हुए।
रविवार, 25 मार्च 2018
प्रिय मनीष,
आप बहुत अच्छा काम कर रहे हो, कमाल का डायरेक्शन है, और विषय वस्तुओं का चुनाव भी। अक्सर कुछ ऐसा दिख जाता है, जिससे दिन बन जाये। कभी कल्पना में भी नहीं सोचा था, ऐसा काम देखने को मिलेगा। कभी कभी सोचता हूँ, कि हिन्दी कविता, हिन्दी स्टूडियो की शुरुआत किन हालातों में हुई होगी। जिसने एक इन्सान के अन्दर इतनी ऊर्जा दे दी, हिम्मत दे दी। वो रुक नही रहा, थक नही रहा, विचलित नही हो रहा है। वैसे मैं इस सफर में क-से-कविता के माध्यम से आपके साथ मात्र दो सालों से जुड़ा हूँ। उससे पहले का सफर कैसा रहा होगा, केवल अंदाज़ा ही लगा सकता हूँ। मैं वाकई इक्छुक हूँ यह जानने में। इतने सारे लोग, इतनी तरह के लोग, इतने तरह के काम...सब स्थापित होते हुए। क्या कारण है ? इस यात्रा से जुड़ा व्यक्ति अपने आप को झोंक देने की हद तक दीवानों की तरह काम करता है। मुस्कुराते हुए, मैराथन के बैटन की तरह यात्रा में दौड़ने लगता है। दूर दराज, बिना व्यक्तिगत जान पहचान, बिना मिले, सैकड़ों लोग एक जैसा ही सपना देख रहे होते हैं। क्या ही लालच होगा ? साहित्य,कला, प्रेम के सिवा। पर कहीं कुछ दरक रहा है, उसकी आवाज़ यहाँ एक इकाई तक पहुँचती है। आप सब की मेहनत, समय, स्नेह, काम के प्रति लगाव, प्रतिफल हम सब को बांधे रखता है। प्रेरणा देता है। उत्साहित करता है। हिन्दी स्टूडियो, हिन्दी कविता, क से कविता सब एक ही तो हैं...हम ।
क से कविता- लखनऊ
आप बहुत अच्छा काम कर रहे हो, कमाल का डायरेक्शन है, और विषय वस्तुओं का चुनाव भी। अक्सर कुछ ऐसा दिख जाता है, जिससे दिन बन जाये। कभी कल्पना में भी नहीं सोचा था, ऐसा काम देखने को मिलेगा। कभी कभी सोचता हूँ, कि हिन्दी कविता, हिन्दी स्टूडियो की शुरुआत किन हालातों में हुई होगी। जिसने एक इन्सान के अन्दर इतनी ऊर्जा दे दी, हिम्मत दे दी। वो रुक नही रहा, थक नही रहा, विचलित नही हो रहा है। वैसे मैं इस सफर में क-से-कविता के माध्यम से आपके साथ मात्र दो सालों से जुड़ा हूँ। उससे पहले का सफर कैसा रहा होगा, केवल अंदाज़ा ही लगा सकता हूँ। मैं वाकई इक्छुक हूँ यह जानने में। इतने सारे लोग, इतनी तरह के लोग, इतने तरह के काम...सब स्थापित होते हुए। क्या कारण है ? इस यात्रा से जुड़ा व्यक्ति अपने आप को झोंक देने की हद तक दीवानों की तरह काम करता है। मुस्कुराते हुए, मैराथन के बैटन की तरह यात्रा में दौड़ने लगता है। दूर दराज, बिना व्यक्तिगत जान पहचान, बिना मिले, सैकड़ों लोग एक जैसा ही सपना देख रहे होते हैं। क्या ही लालच होगा ? साहित्य,कला, प्रेम के सिवा। पर कहीं कुछ दरक रहा है, उसकी आवाज़ यहाँ एक इकाई तक पहुँचती है। आप सब की मेहनत, समय, स्नेह, काम के प्रति लगाव, प्रतिफल हम सब को बांधे रखता है। प्रेरणा देता है। उत्साहित करता है। हिन्दी स्टूडियो, हिन्दी कविता, क से कविता सब एक ही तो हैं...हम ।
क से कविता- लखनऊ
रचनाकार के नाम एक पाठक का ख़त !
ओ मेरे प्रिय रचनाकार,
मेरे भीतर तुम्हारे शब्दों की स्वर लहरियाँ बजती हैं। उनके हाव भाव, उन शब्दों की स्पष्ट आवाज़े गूँजती हैं कानों में मेरे । उन्हें जज़्ब कर के , अगली रचना के इंतज़ार में बैठता हूँ। वो रचनाएं जो मुझसे संवाद करती हैं, मैं उन शब्दों के भीतर की कशिश महसूस कर सकता हूँ। पढ़ी जा चुकी रचना और आने वाली रचना के बीच का समय उन्ही पढ़ी जा चुकी रचना के रंग में रहता है।
नई रचना अवाक कर देती है नए रंग लाकर । बेहद संतुलन बना के चलना पड़ता है, इन ऊँचें नीचे टेढ़े मेढ़े रास्तों पर चलते वक़्त। न जाने कौन सा हवा का झोंका उड़ा दे उदासियों की परतों को। इतनी उम्मीदें जगती हैं इन शब्दों से, इतनी ऊर्जा मिलती है कि मन कहता है प्रेम से खूबसूरत तो दुनिया की कोई शै, है ही नही। मैं उन पंक्तियों के आखीर को जरूर देखता हूँ, उनमें लिखा होता है "प्रेम में खिलना"। उन पंक्तियों को लेकर मैं भागता हूँ नई नई जगहों पर।
विस्तार के संकुचन से आहत सभ्यताएं मिलती हैं। जिये के निशान नही मिलते। कोई कुछ भी महसूस नही कर पा रहा है। जिस धरती के गुरुत्वाकर्षण से उनमें भार की अनुभूति जगी होगी, जिस आसमान से उन्हें छत का आभास हुआ होगा, जिस पानी, हवा, प्रकृति के स्पर्श से जीवन के संकेत मिले होंगे...वो सब उनके जीवन में अब नही दिखते। मैं तुम्हारे शब्दों की जैविक खाद डाल देता हूँ उनकी जड़ों में, फिर भागता हूँ अपने ठीये पर । एक नई रचना, एक नया राग, प्रेम में बुझी हुई कहानी, टूटते हुए तारों के रूमान से भरी आकाशगंगा भर देती है मुझे प्रेम के संसार से। मुझे तुम्हारे शब्द मुक्त करते हैं, बंधनों से, दुनियावी झंझावातों से, जमा पुंजियों से, भविष्य के खतरों से।
"प्रेम में खिलना" का अर्थ क्या सही पढ़ पाया हूँ मैं ? या प्रेम का लिखा जाना अभी बाकी है ?
एक पाठक
शुक्रवार, 23 मार्च 2018
क्या ये नाटक है ?
भीड़ तमाशा देख रहीचोर तमाशा देख रहे
फिर भी घण्टी बजती है
लुटने की, लुटवाने की !
नाटक है ? क्या ये नाटक है ?
भोम्पू भों भों भौंक रहे
सुनने वाले छौंक रहे
भजनदास जी कहते हैं
भजनू, भजना, भजनदास !
नाटक है ? क्या ये नाटक है ?
नाज़ुक नाज़ुक कहते कहते
पंजों में नाखून पहन कर
वो गीत राष्ट्र के गाते हैं
गाते नहीं..... ! गवाते हैं !
नाटक है ? क्या ये नाटक है ?
जन से खाली जन नायक
काली कुर्सी - काला खेल
सफल हुए तो, हरि गंगा
विफल हुए तो जनता फेल
नाटक है ? क्या ये नाटक है ?
घोर निराशा की बदरी में
पानी घट घट बढ़ता जाए
ऊसर की धरती कहती है
मिट ले तू, मैं भी मिट लूँ !
नाटक है ? क्या ये नाटक है ?
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कौन हो तुम जो समय की खिड़की से झांक कर ओझल हो जाती हो तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारे ताज़ा निशान भीनी खुशबू और गुम हो जाने वाला पता महस...
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"चेतावनी - यह कहानी केवल वयस्क लोगों के लिए है । कहानी के कुछ प्रसंग एडल्ट की श्रेणी के हैं । कृपया बच्चे या किशोर इसे न पढ़ें । "...