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शुक्रवार, 16 मार्च 2018

ऊभ की दूब
सूखती हरी होती
दूब खर पतवार है
कहीं भी कभी भी
सलीके, समय तो गमलों में खिलते हैं
सूखते नहीं, मर जाते हैं 

शुक्रवार, 9 मार्च 2018


लखनऊ - बनारस का होली मिलन

होली के एक दिन पहले बनारस लखनऊ से मिलने आया ! बनारस बता के नही आया, कि लखनऊ से मिलने जा रहा हूँ। बताता तो शायद बनारस वहीं छूट जाता, और लखनऊ से मिलने शहर नही आ पाता। लखनऊ पहले अपनी अना में रहा, जैसे ही बनारस से मिला वो अना अमाँ में बदल गयी। बनारस और लखनऊ की मुलाकात का वक़्त और जगह मुकर्रर होने के बावजूद भी, बड़ा प्रश्न था...कि इस मुलाकात का कौन सा हिस्सा तमाशे से उकताए हुए दोनों शहरों को सुकून दे पाएगा।
    फन मॉल की रंगीनी, मिस्टर ब्राउन के दिल शेप वाली काफी को नज़रअंदाज़ करते हुए दोनों गोमती किनारे बैठ जाते हैं उस काली बदबू देती मृतप्राय गोमती किनारे । स्कूली बच्चे अबीर गुलाल का खेल खेल रहे थे। लखनऊ गहरी सोच में डूबते हुए दास्तान की गलियों में बनारस को ले जा रहा था । कभी शहर के बीचों बीच खिलखिलाती नदी, पीपे वाला हिलता डुलता पुल, लखनऊ हज़रत गंज से देर रात पैदल आता, पीपे वाले पुल पर खड़ा होकर उस नदी की उमंग को महसूस करता। 15 सालों में लखनऊ ने गोमती को मरते हुए देखा है। लंदन की थेम्स नदी की तर्ज़ पर बनने वाले गोमती रिवर फ्रंट की आहट से गोमती कभी मुस्कुराई होगी। लखनऊ की गोद में गोमती की किलकारियां भरने की उम्मीद जगी होगी। पर गोमती मर चुकी है कब की। गोमती का शव काला पड़ गया था। बनारस डबडबाई आंखों से लखनऊ के कंधे पर हाँथ रख सांत्वना देता है, ढांढस के पुल बाँधता है। अपने कोख में पल रही गंगा के कुछ दुख भरे किस्से सुनाता है।
        बनारस लखनऊ को कुछ और महसूस करना चाहता था। दोनों निकल पड़ते हैं पैदल एक अदत अच्छी चाय की तलाश में। 5 कालिदास मार्ग, माल एवेन्यू, हज़रत गंज, लालबाग...! शाम-ए-अवध में शायद चाय का चलन अब रहा ही नही हो, ऐसा लगता रहा। बनारस को उसकी संकरी गलियों में मिलने वाली 5 रुपये वाली बढ़िया चाय का लोभ छोड़ना ही पड़ा। बनारस को पुराने लखनऊ की तलब थी। बेगम हज़रत महल पार्क टैक्सी स्टैंड पर चौक चौक की आवाज़ उसे अपनी ओर आकर्षित कर रही थी। बनारस टैक्सी में ड्राइवर वाली सीट के पास बैठ के दाएं बाएं लखनऊ को देखना चाह रहा था। लखनऊ पीछे वाली सीट पर बैठता है। वो अब नए लखनऊ में रहता है, जहाँ से पुराने लखनऊ की दूरी बहुत ज़्यादा लगती है। पीछे वाली सीट पर एक परिवार लखनवी तलफ़्फ़ुज़ में किसी ब्याह के दस्तरख़्वान की बातें करता है। लखनऊ उनकी गोद में बैठी नन्ही बच्ची की आंखों में खो जाता है।
         200 रुपये में चिकेन के कुर्ते, 400 रुपये की जैकेट, 100 रुपये में दो शर्ट और कई तरह के सस्ते माल की आवाजों से चौक गुलज़ार था। सड़क किनारे दोनों पैदल पटरियां बेचनेवालों ख़रीदारों से भरी। बड़े बड़े चाय की केतलियों में मसाला कश्मीरी चाय, छोटे छोटे खाने पीने की दुकानों में शीरमाल, ख़मीरी, क़बाब, कलेजी, वेज क़बाब, हलवा पराठा, मलाई मक्खन, गर्म दूध ... ! बाज़ार में भीड़ थी, शोर था, सड़के जाम होती चलती। जब नए लखनऊ का दिन मानसिक शारीरिक थकन से परेशान देर शाम घर की तरफ रुख करता है। तब पुराना लखनऊ सड़कों पर निकल आता है।
          लखनऊ बनारस के हाँथ में हाँथ डाले लोगों से उन गलियों का पता पूछता है, जहाँ वो अपनी शामें गुजरता था। अगला पड़ाव अकबरी गेट है। चहकते चौक चौराहों से अंधेरी गलियों को पार करना लखनऊ की रवायत है। अकबरी गेट पास था। टुंडे के क़बाब, रहीम की निहारी कुलचा, मुबीन की बिरयानी...! जैसे खाना पीना, खिलाना रात की इबादत हो। लखनऊ और बनारस दोनों टाइम मशीन में बैठे सदियों की यात्रा में थे। यात्रा के हर पड़ाव में सलाहियत थी, सलीका था, साथ लेकर बढ़ने का हौसला था। भेद नही मिला किसी जगह। हिन्दू - मुसलमान, हिन्दी-उर्दू, मंदिर - मस्जिद, बड़े का गोश्त- मटन, साइकिल- कार..सब अपने अपने रास्ते मिलते झूलते टकराते। आधी रात बीत चुकी थी उन गलियों में। लखनऊ बनारस को इन्ही हल्के फुल्के लम्हों के साथ विदा करना चाहता था। जिससे बनारस में लखनऊ से फिर मिलने की तलब बनी रहे। दोनों टैक्सी में बैठ चारबाग की राह लेते हैं। रास्ते में नए पुराने समय के इश्तिहार नही लगे थे, अलग अलग नाम, मज़हब, फितरत के लोग भी नही थे। खाली सड़क पर टैक्सी तेज़ चल पा रही थी, फिर भी नए पुराने लखनऊ की दूरी दशकों की लगी। बनारस इस नए पुराने का लखनऊ संस्करण लेकर विदा लेता है। लखनऊ यादगार संग साथ और दशकों की यात्रा को एक दिन में जी कर अपने नए पन में गायब हो जाता है।

शनिवार, 3 मार्च 2018


बहुत बड़े बड़े किले हैं ऊँचे ऊँचे,
शब्दों की तेज आँधियाँ कुछ नही कर पातीं,
किले की कीलें जंग खा गई हैं,
पत्थर सख्त होने का ढोंग रचता है,
दरवाजों की लकड़ियाँ उम्र की फिक्र में
उम्र दराज़ हो रहीं हैं।
इन किलों के मालिकों के चेहरों पर
अपने टिके रहने की गिल्ट नहीं होती ?
या इन शब्दों के बुने आड़े तिरछे जालों में कोई दम नहीं ?





शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

आर. जे. बी. के सदके एक और शहादत !

आर.जे.बी. नाम से शायद आप परिचित नही होंगे। पर प्रभु श्री राम की जन्म भूमि अजोध्या में तैनाती पर आए सिपाही के ज़ुबान पर यह नाम जिंदगी भर के लिए टँक जाता है। आर.जे.बी का मतलब राम जन्म भूमि। प्रभु श्री राम अपने ही जन्म स्थल पर न्यायिक हिरासत में हैं। इस हिरासत में केवल वो ही नही हैं, उनके हज़ारों प्रिय भक्त भी हैं जो उनके दर्शन को व्याकुल रहते हैं, और वो भी जो इस हिरासत की तामील कराने में ड्यूटी पर मुस्तैदी से तैनात रहते हैं। आर.जे.बी के एक रक्षक जो कि खुद कैद में रहता है, उसने अपने आप को मुक्त कर लिया। आज उसने प्रभु श्री राम के परम भक्त हनुमान के राजदरबार में आत्म हत्या कर ली। उसने एक तरफ अपनी जान देकर आंतरिक पुलिसिया उत्पीड़न का प्रतिरोध दर्ज करवाया, तो दूसरी तरफ आर.जे.बी की मजबूरियों को उजागर किया। बहुत सी शहादत बेआवाज़ होती हैं। उसकी शहादत को शायद ही कोई सलाम करे।
       एक युवा सिपाही की देंह हनुमान गढ़ी के ठीक पीछे किराए के कमरे में लटकी पाई गई।उसके साथ काम करने वाले पुलिस विभाग के ही सिपाहियों ने बताया कि वो पिछले कुछ दिनों से अवसाद में चल रहा था। वो हापुड़ के गढ़मुक्तेश्वर का रहने वाला था। हाल ही में उसकी तबियत ख़राब हुई, अस्पताल में 2 दिन भर्ती रहा, और फिर ड्यूटी पर सुबह 9 से 5। कुछ ने बताया कि पिछले डेढ़ महीने से आर.जे.बी की सभी छुट्टियाँ रद्द कर दी गईं। आज उसके 19 नंबर के कमरे के बाहर पुलिस मोहकमे का तांता लगा रहा। वहाँ आने वाले हर पुलिस वाले के पास कहने के लिए बहुत कुछ था, वो चीखना चाहते थे, चिल्लाना चाहते थे। पर वो उस मुक्त होने से बुरे अंजाम से ख़ौफ़ज़दा थे। पत्रकारों को देख कर उनके कान में फुसफुसा देते कि सर खबर में सच कह दीजियेगा। सुबह के अखबारों में जरूर लिख दीजियेगा कि उसने लगातार ड्यूटी और छुट्टी न मिलने से आत्महत्या कर ली। मौके पर मौजूद सिपाही और बड़े अफसरों के बीच की कड़ी फोन पर जी सर जी सर कहते रहे। बीच बीच में कहते "सर वो घर से दूर था". जाहिर सी बात है, मामला पुलिस विभाग के आंतरिक कमियों का था। सहेज कर हर काम करना था। पर सब ठीक हो जाएगा।
          आर.जे.बी में वो खज़ाना गड़ा है, जिसकी रक्षा के लिए इस देश के नागरिकों का लाखों रुपये रोज़ खर्च होता है। आर.जे.बी वो महत्वपूर्ण जगह है, जहाँ देश दुनिया की नजरें गड़ी रहती हैं। आर.जे.बी वो रण है जिसपर मीडिया वालों के सट्टे लगते हैं। आर.जे.बी वो इतिहास है, जिसे भविष्य बनाया जाता रहेगा। आर.जे.बी इस देश के करोड़ों लोगों की पेट की भूख है। आर.जे.बी को वजूद में रखने के लिए हम हज़ारों शहादतें बर्दाश्त कर सकते हैं। आर.जे.बी की शहादतें अपनी अपनी किस्म की हैं। आर.जे.बी को अपने पाले में कर लेने वाली शहादत, आर.जे.बी को महफूज़ रखने की शहादत, आर.जे.बी की राजनीति में जीवन खपा देने वाली शहादत, आर.जे.बी की रौ में सत्ता की शहादत। पता नही कितनी तरीके की शहादत आर.जे.बी के सदके के लिए तैयार हैं। आर.जे.बी वैकुण्ठ धाम है।

बुधवार, 6 दिसंबर 2017


अपना ईश !

जब समाज सोख लेता है सारे रंग
रह जाता, गेरुआ धवल अशेष
मन, तन के पार इच्छाएं
ढूँढ लाती हैं अपना ईश !


बच्चों को उड़ने दो ..

 उड़ने दो , उड़ने दो  बच्चों को उड़ने दो ... गर नाक अटक जाए  तो भी तो  उड़ने दो ..   जिस ऊर्जा का  संचार प्रवाह  हो उद्दंड  उसको भी  उड़ने दो  कह...