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शनिवार, 3 मार्च 2018


बहुत बड़े बड़े किले हैं ऊँचे ऊँचे,
शब्दों की तेज आँधियाँ कुछ नही कर पातीं,
किले की कीलें जंग खा गई हैं,
पत्थर सख्त होने का ढोंग रचता है,
दरवाजों की लकड़ियाँ उम्र की फिक्र में
उम्र दराज़ हो रहीं हैं।
इन किलों के मालिकों के चेहरों पर
अपने टिके रहने की गिल्ट नहीं होती ?
या इन शब्दों के बुने आड़े तिरछे जालों में कोई दम नहीं ?





शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

आर. जे. बी. के सदके एक और शहादत !

आर.जे.बी. नाम से शायद आप परिचित नही होंगे। पर प्रभु श्री राम की जन्म भूमि अजोध्या में तैनाती पर आए सिपाही के ज़ुबान पर यह नाम जिंदगी भर के लिए टँक जाता है। आर.जे.बी का मतलब राम जन्म भूमि। प्रभु श्री राम अपने ही जन्म स्थल पर न्यायिक हिरासत में हैं। इस हिरासत में केवल वो ही नही हैं, उनके हज़ारों प्रिय भक्त भी हैं जो उनके दर्शन को व्याकुल रहते हैं, और वो भी जो इस हिरासत की तामील कराने में ड्यूटी पर मुस्तैदी से तैनात रहते हैं। आर.जे.बी के एक रक्षक जो कि खुद कैद में रहता है, उसने अपने आप को मुक्त कर लिया। आज उसने प्रभु श्री राम के परम भक्त हनुमान के राजदरबार में आत्म हत्या कर ली। उसने एक तरफ अपनी जान देकर आंतरिक पुलिसिया उत्पीड़न का प्रतिरोध दर्ज करवाया, तो दूसरी तरफ आर.जे.बी की मजबूरियों को उजागर किया। बहुत सी शहादत बेआवाज़ होती हैं। उसकी शहादत को शायद ही कोई सलाम करे।
       एक युवा सिपाही की देंह हनुमान गढ़ी के ठीक पीछे किराए के कमरे में लटकी पाई गई।उसके साथ काम करने वाले पुलिस विभाग के ही सिपाहियों ने बताया कि वो पिछले कुछ दिनों से अवसाद में चल रहा था। वो हापुड़ के गढ़मुक्तेश्वर का रहने वाला था। हाल ही में उसकी तबियत ख़राब हुई, अस्पताल में 2 दिन भर्ती रहा, और फिर ड्यूटी पर सुबह 9 से 5। कुछ ने बताया कि पिछले डेढ़ महीने से आर.जे.बी की सभी छुट्टियाँ रद्द कर दी गईं। आज उसके 19 नंबर के कमरे के बाहर पुलिस मोहकमे का तांता लगा रहा। वहाँ आने वाले हर पुलिस वाले के पास कहने के लिए बहुत कुछ था, वो चीखना चाहते थे, चिल्लाना चाहते थे। पर वो उस मुक्त होने से बुरे अंजाम से ख़ौफ़ज़दा थे। पत्रकारों को देख कर उनके कान में फुसफुसा देते कि सर खबर में सच कह दीजियेगा। सुबह के अखबारों में जरूर लिख दीजियेगा कि उसने लगातार ड्यूटी और छुट्टी न मिलने से आत्महत्या कर ली। मौके पर मौजूद सिपाही और बड़े अफसरों के बीच की कड़ी फोन पर जी सर जी सर कहते रहे। बीच बीच में कहते "सर वो घर से दूर था". जाहिर सी बात है, मामला पुलिस विभाग के आंतरिक कमियों का था। सहेज कर हर काम करना था। पर सब ठीक हो जाएगा।
          आर.जे.बी में वो खज़ाना गड़ा है, जिसकी रक्षा के लिए इस देश के नागरिकों का लाखों रुपये रोज़ खर्च होता है। आर.जे.बी वो महत्वपूर्ण जगह है, जहाँ देश दुनिया की नजरें गड़ी रहती हैं। आर.जे.बी वो रण है जिसपर मीडिया वालों के सट्टे लगते हैं। आर.जे.बी वो इतिहास है, जिसे भविष्य बनाया जाता रहेगा। आर.जे.बी इस देश के करोड़ों लोगों की पेट की भूख है। आर.जे.बी को वजूद में रखने के लिए हम हज़ारों शहादतें बर्दाश्त कर सकते हैं। आर.जे.बी की शहादतें अपनी अपनी किस्म की हैं। आर.जे.बी को अपने पाले में कर लेने वाली शहादत, आर.जे.बी को महफूज़ रखने की शहादत, आर.जे.बी की राजनीति में जीवन खपा देने वाली शहादत, आर.जे.बी की रौ में सत्ता की शहादत। पता नही कितनी तरीके की शहादत आर.जे.बी के सदके के लिए तैयार हैं। आर.जे.बी वैकुण्ठ धाम है।

बुधवार, 6 दिसंबर 2017


अपना ईश !

जब समाज सोख लेता है सारे रंग
रह जाता, गेरुआ धवल अशेष
मन, तन के पार इच्छाएं
ढूँढ लाती हैं अपना ईश !


गुरुवार, 30 नवंबर 2017


ओ संता देख तो चिट्ठी आयी है !

"ओ संता देख तो... पुजारी जी चिट्ठी लाएं हैं, देख तो जरा कौन डेरा से चिट्ठी आयी है ? तीन दिनन से रोज चिट्ठी आये रही है "
    ये वो जगह है, जहाँ चिट्ठियाँ याद के सन्दूक से निकले काले नीले अक्षरों से भरी नहीं होती। यहाँ चिट्ठियाँ भूख का निवाला बन के आती हैं। चिट्ठी जिस दिन आएगी, उसमें किसी शाम या दोपहर का भरपेट भोज होगा। ये राम की नगरी अजोध्या का वो हिस्सा है, सीता माँ कभी विधवा के रूप में नज़र आएंगी, कभी किसी जंगल में फेंकी हुई 2 महीने की दुधमुंही बच्ची के रूप में तो कभी भरे पूरे घर से वनवास काटने वाली हिम्मत के रूप में। ये माईं- बाड़ा है। यहाँ वो माएँ हैं...जिन्होंने अपने इर्द गिर्द किसी पुरुष प्रधान समाज की दासी बनने से इनकार किया है।
     उन्हें दो चीजों का इंतज़ार रहता है, एक चिट्ठी का और दूसरा अपने भगवान के पास हमेशा हमेशा के लिए जाने का। बाकी उनके पास ढ़ेरों काम हैं, इतना काम कि उन्हें अपनी सुध नही रहती। पर उन्हें उनके हिस्से का वैराग्य हाँसिल नही, जितना एक पुरुष के हिस्से आता है। उनके हिस्से के वैराग्य का दान धर्म भी "चेलाही" के नाम से आता है। कभी चेलाही तो कभी चिट्ठी।

#माईंबाड़ा - 1
#राम_जू_की_अजोध्या

शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

क्यों कि कलाकार कभी हार नही मानता !

इधर अत्यधिक काम के चलते फिल्में देखना बन्द सा हो गया है। महीनों से कोई फ़िल्म नही देखी, न कमर्शियल न आर्ट । पर हाँ पिछले एक महीने से एक फ़िल्म वाले के वेटिंग रूम या उसके बाहर कुल जमा 15-20 इंतज़ार के जरूर खर्च किए। इन इंतज़ार के घण्टों से मेरे भीतर के दम्भी पत्रकार ने इंतज़ार करना सीख लिया। और भी बहुत कुछ सीखा, पर वो साझा करना नही, सहेज के रखना चाहता हूँ ।
      कुछ दिनों पहले लखनऊ में फ़िल्म फेस्टिवल हुआ, 22 से गोआ में अंतराष्ट्रीय स्तर का फ़िल्म फेस्टिवल होने वाला है। न जाने कितने लोगों की मेहनत, पैसा, दिल दाँव पर लगता है। कोई दर्शकों के प्यार, कोई अवार्ड तो कोई कम से कम फ़िल्म के ऐसे अवसरों पर चयनित होने की ख़्वाहिश रखता है। पैसे कमाना तो इस इंडस्ट्री में दूर की कौड़ी है। जब पद्मावती जैसे बड़े बैनर की फिल्मों का हश्र सामने है तो छोटे - मोटे कलाकार कहाँ टिक पाएंगे। पर कलाकार कभी हार नही मानता। सृजन की धुन जगह नही देखती, पुरुस्कार नही देखती। सत्येंद्र करीब 15 साल से संघर्ष कर रहे हैं। उनका संघर्ष उनके भीतर की गंभीरता, अनुभव और हौसलों के पहाड़ से मापी जा सकती है। जीवन में कई चढ़ाव उतार की गणित में उतार का योग ज्यादा रहा। फिर भी अयोध्या जैसी छोटी सी जगह में रह कर उन्होंने वो काम किया जिसके बारे में सोचना इस क्षेत्र के पुरोधाओं की शायद बस की बात नहीं।
     अयोध्या की एक संकरी गली में इनका खुद का स्टूडियो है। स्टूडियो में इनहाउस शूटिंग के लिए सेट तैयार रहते हैं। प्रोडक्शन, डायरेक्शन, स्टार कास्टिंग, एडिटिंग, डबिंग, लोकेशन, प्रोमोशन और ऐक्टिंग समेत न जाने क्या क्या वो खुद ही कर लेते हैं। न कोई हंगामा, न कोई शो बिज़। बस काम काम और काम। उनकी ऐक्शन फ़िल्म " यू पी पुलिस रुद्र " इसी महीने के अंत में रिलीज़ होने को है। इस फ़िल्म का ट्रेलर देखने का आज अवसर मिला। यकीन ही नही हुआ कि इस फ़िल्म में एक गंभीर, रस्टी सा दिखने वाला लड़का बतौर लीड काम कर रहा है। फ़िल्म की लोकेशन में अयोध्या को ढूंढ पाना मुश्किल सा लगा। कम संसाधनों में एक्शन की बारीकियों को जस्टिफाय करने का प्रयास किया गया है। ट्रेलर से ऐसा प्रतीत होता है, जहाँ जहाँ फ़िल्म ने सत्येंद्र के समय और उसकी कार्य क्षमता के सीमा को लांघा है, वहाँ उसके ही जैसे किसी और सहयोगी के न होने की कमी महसूस हुई।

    फ़िल्म के सफल असफल होने की कहानी उसके रिलीज़ होने के बाद की है। अयोध्या फ़ैज़ाबाद जैसी जगह पर जहाँ शूटिंग, फ़िल्म मेकिंग, वीडियो कैमरा का मतलब  शादी विवाह, मुण्डन, बर्थ डे पार्टी की कैसेट तैयार करना हो। ट्राइपॉड को खूंटे की तरह एक जगह गाड़ के प्रवचन को रिकार्ड करना हो या छोटी छोटी क्लिप बना चोरी किये हुए भजनों से भक्ति अयोध्या का महिमा मण्डन किया जाता हो। वहाँ अपनी क्षमता से कहीं अधिक तन मन धन लगाकर किसी फ़िल्म को अंजाम तक पहुँचा देना बड़ी बात है। वो अपनी इस फ़िल्म के लिए न ही कोई अवार्ड का ख्वाब देखते हैं न ही कोई फ़िल्म नीति के तहत सरकारी इमदाद की। वो चाहते हैं कि उनकी इस फ़िल्म पर यू पी का ठप्पा लगा हो और दर्शकों की खट्टी मीठी प्रतिक्रियाएं। हालांकि इस फ़िल्म के रिलीज़ के बाद सत्येंद्र ने मुम्बई में काम करने का मन बना लिया है। वो यहाँ से हार के नही जा रहे हैं, वो अयोध्या, उत्तर प्रदेश  को जीत के मुम्बई को जीतने के लिए जा रहे हैं। हालांकि वो, राम की अयोध्या को प्रभु श्री राम की अर्धांगिनी द्वारा दिए श्राप को दोहराना नही भूलते, जिसमें अयोध्या में कुछ भी भली भांति सम्पन्न न होना था।

#राम_जू_की_अजोध्या

बच्चों को उड़ने दो ..

 उड़ने दो , उड़ने दो  बच्चों को उड़ने दो ... गर नाक अटक जाए  तो भी तो  उड़ने दो ..   जिस ऊर्जा का  संचार प्रवाह  हो उद्दंड  उसको भी  उड़ने दो  कह...