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सोमवार, 24 जुलाई 2017

ऐ शहर ये तुमको हुआ क्या है ?
५ जून २०१७ 

एक और रात नींद को सिरे से ख़ारिज़ करने के लिए आमादा थी। भीषण गर्मी से भट्ठी हुए कमरे में तंदूरी नाइट का खौफ सर पर आग के शोलों की तरह धधक रहा था। खुद से लंबे झगड़े के बाद खाली शाम हाँथ आयी चिल और मस्त रहने की सलाह ने बियर शॉप की राह दिखा दी। दो अदत चिल्ड बियर शरीर और रूम टेम्परेचर को दो घंटे ट्यून करती रही। घूंट घूंट रात बामुश्किल आधा सफर ही तय कर पाई। ख़्वामखां जौं के पानी से उम्मीद लगाई...आधी रात न नींद थी, न बेवक़्त किसी पुकार कि गुंजाइश और न ही नशा। अचानक जेहन में रमज़ान के वक़्त पुराने शहर के रौशन चौक चौराहे याद आये। पुराने शहर ने कई बार पहले भी नींद से छूटे अकेलेपन को भरा है। सोसाइटी के गार्ड की नींद तोड़ने का गिल्ट लिये निकल भागा अपने शहर में दूसरे शहर की ओर। रास्ते भर सड़कें खाली, जाने और आने वाली सड़कों के बीच डिवाइडर पर कतार में सोती सैकड़ों बेधड़क नींद। पुराने लखनऊ की गलियां सोई पड़ी थी। चौराहे पर इक्का दुक्का चाय की दुकान।
राम जाने रमज़ान के वक़्त कभी जश्न में डूबे शहर को अब हुआ क्या है ? अमीनाबाद, चौक, ठाकुरगंज दुकानों के ग्लो साइन बोर्ड चमक रहे थे। सहरी के वक़्त की तैयारियों में बाज़ार गुलज़ार नही था। अवैध बूचड़खाने, कुछ एक किस्म के गोश्त पर पाबंदी के सरकारी फरमान के पर्चे सड़कों, गलियों और चौराहों की हवाओं में चिपके हुए थे। शायद इससे ज्यादा कोई पाबंदी नही लगाई गई। फिर भी एक अजीब सा खौफ है। चौराहों पर पुलिस की जीप के मत्थे पर कई तरह की रंगीन रोशनी आंख टिकने नही दे रही थी।
खामोश पुराने लखनऊ में रूमी दरवाज़ा बुलंद खड़ा किसी याद में डूबा हुआ था। रूमी, इक्के वाले कि शक्ल में सोए हुए थे अपने इक्के (तांगा) पर दरवाज़े के ही पास। सहरी के वक़्त की अज़ान के ऐलान के बाद पुराना शहर निकल पड़ा इबादतगाह की ओर। चिड़ियों की चहचहाट भोर की अगुवानी में पेड़ों को झींके दे रही थी। गाड़ी के दो पहियों में रात लिपटती हुई जा पहुंची नए शहर के लोहिया पार्क में। जहां जॉगिंग ट्रैक पर बेखौफ कदम ताल स्वस्थ हवा को महसूस कर रहे थे। बिना सोकर जागे ही आदतन मोबाइल खोल लिया, दूर कहीं दूसरे देश के शहर लंदन में आतंकी हमले की खबर ने स्तब्ध कर दिया। मोबाइल बंद कर, पार्क में एक झूले की झींक और ठंढी हवा के झोंके ने कुछ देर बहलाये रखा। दो किशोर कूद के झूलते हुए झूले पर सवार हो गए मेरे दाएं बाएं। मोबाइल गेम में खो गए वो दोनों। मेरे पैर जमीन से टिके झूले को झूंक देते रहे।
लवर्स ऑफ फ्लेवर
14 जून २०१७ 
(एक बेहतरीन रोमांटिक ऐड शॉर्ट फ़िल्म )
हरे भरे खेतों से बेहतरीन अनाज की परख, माँ के हाँथ की रेसिपी का अनुभव और लज़ीज़ खाने से दिल में उतरने का हुनर टीआरएस (देव) बखूबी जानता है । लंदन में बीते आठ सालों में जमा खर्च लम्हों के साथ खट्टे हो चुके प्रेम की टीस ढो रही अनुषा से देव कुछ ही मुलाकातों में फिर से प्रेम का फ्लेवर बो देता है। 
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पार्ट -1
अनुषा की माँ के घर में बची खुची तूर दाल का जल जाना, देव का अचानक मसूर दाल के साथ घर में दस्तक देना.... देव का अनुषा को काम वाली समझना , और अनुषा का देव को नमक वाला पानी पिलाना...इस प्यारी दोनों को नजदीक लाती चुहल के साथ देव का बेझिझक बेधड़क रसोईं पर कब्जा कर लेना, अनजान लोगों की पहली मुलाकात, तड़के वाली मसूर दाल से दो प्याज़ा हो चली।
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पार्ट -2
अनुषा से अनु होने तक की कई मुलाकातों का सफर, माँ के न रहने से और तेज़ होना चाहता है। एक रोज़ गरजते बादलों के साथ खुली खिड़की पर अनु की आंखों से माँ की याद बरसने लगती है। इस बार वो रसोई के लिए रवा लाता है। देव और अनुषा की हथेलियां मुट्ठी भर भुने गर्म रवे को लड्डू का आकार देने लगती हैं। दोनों की लिपटती हथेलियां उन्हें दूर किसी दूसरे संसार में ले जाएं उससे पहले देव लड्डू पर किशमिश रख कर उस यात्रा को तोड़ता है, उसे हरे भरे खेत में सीने से लगा अपने होने का भरोसा दिलाता है।
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पार्ट -3
देव दो सरप्राइज़ के साथ याद में खोई अनुषा की खामोशी को तोड़ता है। पहला अनुषा के बालों को उसके मनपसंद फूल जैस्मीन के गजरे से सजा देता है। दूसरा रसोईं के लिए इस बार उसके पास बढ़िया छोले होते हैं। अनुषा की चना मसाला की ख्वाहिश पर दोनों जैसे ही रसोईं की तरफ बढ़ते हैं, गरम मसाले का खाली डिब्बा दोनों की मुलाकातों और अनकही जज़्बातों के सिलसिले को तोड़ने वाला था। देव झट से गरम मसाला लेने बाज़ार की ओर जाता है, जब वापस लौटता है तो अपने ही समकक्ष किसी अन्य आदमी को अनुषा के इंतज़ार में खड़ा पाता है। देव मसाले को उस आदमी के हाँथ में पकड़ा कर दूर खड़ा आड़ से देखता रहता है। अनुषा सजी संवरी देव के लिए उस अजनबी आदमी से लिपट जाती है। अनुषा के हाँथ से बना चना मसाला खुशबू देव की ही दे रहा था। वो भागती है देव के पीछे पर देव निकल जाता है किसी अनाज की तलाश में। अनुषा और उसके हाँथ टिफिन में चना मसाले की खुशबू कैद किये इंतज़ार में जड़ हो जाते हैं ।
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टी आर एस(देव) की भूमिका में Manav Kaul
अनुषा की भूमिका में Anupriya Goenka
जून 17 

जब शहर के शहर पहाड़ों की ओर दौड़े चले जा रहे हों, तो क्यों न शहर में ही मिट्टी के टीले को पहाड़, घने शहर के बीच ठहरी नदी के किनारे को किसी घाटी के बीच कल कल बहती नदी, घिरती घटाओं को भरे बादल, कुछ जंगली पेड़ों को चीड़ देवदार, घुमावदार पगडंडियों को घूमते पहाड़ी रास्ते और तेज़ धूल भरी आंधी को बर्फीली हवाएं मान लिया जाए। मान लिया जाए कि ये सब वहीं से आ रहा है, जहां हम जाना चाहते हैं। हां वहां मैं तब जाना चाहूंगा जब वहां कोई नही जाएगा। जैसे अभी यहां कोई नही है।
गुड़िया
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धक धक करती
खेली जा चुकी "गुड़िया"
सड़क पर
राहगीरों से पूछती
तुमने मुझे
दफनाया क्यों नहीं ?

तस्वीर - रमज़ान की मस्ज़िद के पास बुद्ध बाज़ार की व्यस्त सड़क पर सुन्न कर देने वाले सवाल की।
29 jun २०१७ 

सुनो भीड़,
तुम वही हो न, जो एक गोली, एक चाकू, एक लाठी, एक नोटिस, एक थानेदार, एक नेता, एक सरकारी बाबू, एक धर्म रक्षक से डरते हो और उनके इशारों पर नाचते हो। तुम वही हो न, जो घरों में महीनों गंदे पानी की सप्लाई पर कुछ नही बोलती। तुम वही हो न जो दिन दहाड़े सड़क पर तमंचा लहराते हुए बदमाश को देख कर खिसक लेती है। तुम वही हो न जो किसी गर्ल्स कॉलेज के सामने लड़कियों को स्कैन करती आंखों पर चुटकियां लिया करती हो। तुम वही हो जो घंटों लंबी कतार में इंतज़ार करती देखती है किसी रसूख वाले को कतार के नियम तोड़ते। तुम वही हो न जो सड़क पर मर रहे इंसान, जानवर को देखती हो दया और करुणा के भाव से और च च च...बेचारा कहकर किस्से बना देती हो। तुम वही हो न जो घंटों हज़ारों लाखों की संख्या में हाँथ जोड़े, आंख बंद किये मंद मंद झूमती हो आध्यात्मिक पांडालों में। तुम वही हो न , जो अपना सम्पूर्ण जीवन परिवार के कुछ लोगों की देख रेख, उनकी परवरिश, उनकी आर्थिक सामाजिक सुरक्षा, उनकी ऐशो आराम में झोंक देती हो। तुम वही हो न, जो किसी अपने के अंतिम संस्कार में अधिक से अधिक संख्या में पहुंचती हो और उनके परिवार को ढांढस बंधाती हो। तुम वही हो जो सपनों की खेती देखने जाती हो रैलियों में, तुम वही हो जो धार्मिक स्थलों पर जाती हो अपने बिगड़े को सुधारने के लिए।
ओ भीड़ जब तुम इतना भयभीत रहती हो हर समय, तो तुम्हारे भीतर किसी व्यक्ति को पीट पीट कर मार डालने की हिम्मत कहां से आती है ? कैसे तुम्हारा गुस्सा बेकाबू हो जाता है किसी व्यक्ति विशेष से, किसी घटना से कि उग्र जानलेवा जानवर की तरह टूट पड़ती हो उस पर। कैसे निकाल पाती हो समय अपने व्यस्ततम समय से, सड़क पर न्याय देने का। तुम्हारी खीज तुमको वहशी बना देती है। तुम लाखों करोड़ों की तादात में होते हुए भी डरती हो असुरक्षित महसूस करती हो, तुम्हारे इस डर और असुरक्षा की भावना को भुनाया जाता है।
ओ भीड़ तुम्हे सिर्फ घर और काम करने वाली जगह तक सीमित रहना चाहिए आंख कान नाक बंद करके, तुम्हारा परिवार तुम्हारी ताकत है और वही कमज़ोरी, उतनी ही तुम्हारी जरूरत। तुम कम से कम में जीते आये हो, और उतने में जीने की आदत है। ज्यादा की चाह, उसे हांसिल करने और उसे भोगने की तुम्हे हांकने वालों की है। कोई एक ही क्षेत्र में ताकतवर है भीड़ से ज्यादा। वो एक एक मिलकर तुम्हारा इस्तेमाल करते हैं, तुमको डर के साये में रखने के लिए। तुम डरे रहते हो सरकार से , समाज से, अपने ईश्वर से, खुद अपने ही परिवार से। दीर्घकालिक डर...डर और डर की कुंठा से तुम बेकाबू हो जाते हो, और बनते हो हथियार उन्ही का जो तुम्हे डराना चाहते हैं। तुम्हारे डर से वो भी डर जाते हैं जो इनसे आज़ाद होना चाहते हैं।
भीड़ से छिटका हुआ शुभचिंतक
प्रभात

बच्चों को उड़ने दो ..

 उड़ने दो , उड़ने दो  बच्चों को उड़ने दो ... गर नाक अटक जाए  तो भी तो  उड़ने दो ..   जिस ऊर्जा का  संचार प्रवाह  हो उद्दंड  उसको भी  उड़ने दो  कह...