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सोमवार, 3 जनवरी 2022

छाँव !

 कोहनियों में दर्द फूटता है

घुटनों के नीचे माँस जम जाता है
उंगलिया थक जाती हैं
काँधे जकड़ जाते हैं
दो मुँही हाँथ की लकीरें
रात को खत्म हो जाती हैं

मैं रोज बेदम
इक राह जोतता हूँ
हिज़्र की ,
कुफ़्र से
दो चार होता हूँ

धिक्कारता खुद को
शिकायतें ओढ़ता
तमाम तरह की न सुनते
स्नेह तपकता है

मैं खुद से
भागता हूँ दिन रात
तलाश में एक अदत
छाँव !

रविवार, 12 दिसंबर 2021

"कुम्हलाए बच्चे"


 बच्चों की दुनिया बड़ी अजीब होती है। बड़ों से एकदम उलट दिखने वाली दुनिया में तमाम यातनाएं होती हैं। बच्चों और बड़ों की दुनिया में अघोषित शीत युद्ध चला करता है । अक्सर बड़े, बच्चों से भागते हैं और बच्चे बड़ों की संगत से डरते हैं। हमने अपने इर्द गिर्द ऐसा ही समाज बना रखा है । जहाँ हम बच्चों की भावनाओं से जाने अनजाने खिलवाड़ करते हैं ।

बच्चे की चाहत लिए एक परिवार कितने गर्व से बच्चों को इस धरती पर लाता है। फिर खेल खिलौनों की उम्र तक बच्चे प्यारे लगते हैं। धीरे धीरे बच्चों की दुनिया में हम बड़े अपनी धाक जमाने लगते हैं। और मासूम सा बचपन कुम्हलाने लगता है ।
कुछ दिनों पहले मैंने फैसला किया था। कि चलो कुछ दिन बड़ों की संगत छोड़ बच्चों की संगत देखी जाए। एक शाम मोहल्ले के बच्चों को घर पर शॉर्ट फिल्म दिखाने बुलाया। मोहल्ले के बच्चों के साथ ऐसा पहली बार होने वाला था। उन्हें बर्थडे पार्टी के निमंत्रण आते थे। पर शार्ट फ़िल्म देखने को पहली बार उन्हें बुलावा आया था। मैंने भी तुरत फुरत उनके अभिभावकों से शार्ट फ़िल्म दिखाने की इजाजत ले ली थी। जिससे बच्चों के भीतर कम से कम उस समय अपने माँ बाप का डर न सताता।
6 - 7 बच्चे आए। उनके लिए सत्यजीत रे की शार्ट फ़िल्म "टू" का प्रसारण घर की बड़ी टीवी पर किया गया। कमरे की लाइट्स ऑफ। पहले कुछ मिनट बच्चों को इस नए माहौल में एडजस्ट होने में लगा। फिर बच्चे फ़िल्म वाले दो बच्चों के संग हो लिए । यह फ़िल्म दो विपरीत परिस्थिति के बच्चों के गहरे संवाद पर आधारित है। फ़िल्म खत्म हुई । लाइट्स वापस जला दी गयी। बच्चों की प्रतिक्रिया प्रश्नवाचक थी। मुझे भी उन्हें सवालों के साथ छोड़ना था। सो छोड़ दिया।
बाद में मुझे उनके अभिभावकों से पता चला कि बच्चे उस फिल्म के दौरान बोर हो गए। लेकिन मेरे लिए वो बोरियत भी काफी लाभदायक लगी। कम से कम बच्चों ने पहली बार एक साथ मिल के कोई ढंग की फ़िल्म देखने का अनुभव किया। अगली बार उन्हें कोई फ़िल्म अच्छी भी लग सकती है । मेरे लिए बच्चों की संगत नया अनुभव था। मुझे बेहद पसंद आया।
दो दिन पहले एक विवाह समारोह में जाना हुआ। वर और वधु पक्ष अपने अपने पाले में तैयारियों में जुटे थे। सजी धजी पोशाकें । गले , उंगलियों और पैरों में सोने चाँदी के भारी भारी जेवरातों के साथ लोग उत्सव में तल्लीन थे। मैं फिर से बड़ों की दुनिया से निकल बच्चों की दुनिया में पहुच गया। वर एवं वधु पक्ष के बच्चे पाले की सीमाएं लाँघ कर साथ खेल रहे थे। उत्सव लॉन की मखमली घास पर बच्चे दौड़ लगाएं। खूब गुत्थिम गुत्था होता रहा। वो सभी बड़ों से दूर थे। इसलिए बेरोकटोक खूब खेले। मैं उन के खेल देखता रहा। वो कई बार गिरे , कपड़े झाड़े और फिर खेलने लगे। बीच बीच खाने पीने के स्टालों पर कुछ खा पी आते। खेलते खेलते बच्चों के चेहरे लाल पड़ चुके थे।
बड़े जहाँ भी खेलते बच्चों को देखते । आँख दिखाते। ऊंची आवाज में उन्हें अनहोनी का डर दिखाते। कई बार बच्चों ने बड़ों की चपत भी खायी। 
कुछ देर बाद फिर से सब सामान्य। उन सभी बच्चों में तीन बच्चों में जबरदस्त ऊर्जा थी। तीनों लगभग एक ही कद काठी के । वो शायद पहली बार मिल रहे थे। लेकिन उनके खेल के संयोजन और सामंजस्य को देख लग रहा था। जैसे वो साथ ही रहते हों। कुछ ही घंटों में वो तीनों बच्चे बड़ों की दुनिया में शैतानियों के लिए मशहूर हो गए । उनकी चर्चा होने लगी। मैं उनमें से एक बच्चे की माँ से मिला। उन्होंने मुझसे तड़ाक से सवाल किया। " मिले मेरे खूंखार बच्चे से" । मैंने भी मुस्कुरा के उनका खूंखार होना स्वीकार किया।
उन तीन बच्चों के खेल से सबसे ज्यादा बुजुर्ग आतंकित थे। वो दूर से बैठे बैठे इन बच्चों की गालियों से बलैयां ले रहे थे। बच्चे उन बुजुर्गों के पास गए तक नही। फिर भी उनकी त्योरियां इन बच्चों पर चढ़ी रही। वो उनकी चुगलियां बच्चों के माँ बाप से करते। माँ बाप बीच बीच तैश में आकर बच्चों को हाँक लगाते। यह देख कर बुजुर्गों को कुछ तसल्ली मिलती। मैं उन बुजुर्गों के पास थोड़ी देर बैठा। वे सभी अच्छे अच्छे सरकारी नौकरियों से रिटायर्ड सभ्य समाज के झंडाबरदार थे। उनमें से किसी एक ने कहा " ये तीनों बच्चे बड़े हरामी हैं " । दूसरे ने सुर मिलाते कहा " आज कल के बच्चे बर्बाद हो गए हैं" । तीसरे ने अभिभावकों पर लानत फेंकते हुए कहा " माँ बाप ने ही बच्चों को बिगाड़ रखा है" । हमारे जमाने में मजाल है बच्चे बड़ों की बात न मानते। मुझ से वहाँ ज्यादा देर बैठा न गया। उनकी बातों में हिन्सा थी , क्रोध था और बच्चों को मसल देने की घुड़की थी। मैं फिर बच्चों के बीच आ गया। उनके पास आकर काफी हल्का लग रहा था। एक छोटी सी बच्ची मेरे पास आती है। मुझसे हाँथ मिलाती है। मैं उसके साथ खेलने लगता हूँ।
कार्यक्रम खत्म हो चुका था। मुझे वो सारे बच्चे और उन बुजुर्गों की बातें रह रह कर याद आ रही थीं। आधे रास्ते मैंने अपनी गाड़ी एक ढ़ाबे पर रोक दी। दो तीन सिगरेट लगातार पीने की तलब लगी। मैं ढाबे के पास वाली पान की दुकान पर गया। लगभग उन्ही तीन बच्चों के हमउम्र दो बच्चे पान की दुकान पर मोबाइल में कुछ देख रहे थे। एक आदमी दुकान में सो रहा था। मैंने सिगरेट माँगी। बच्चों ने मोबाइल किनारे करते हुए पूछा कौन सी सिगरेट ! उनके कपड़े ग्रीस और मोबिल से सने थे। वे बहुत दुबले पतले मगर फुर्तीले दीख रहे थे। दोनों किसी ट्रक मेकैनिक के यहाँ सहायक का काम करते हैं। अभी पानवाले को राहत देने के लिए कुछ देर यहाँ बैठे हैं। मुझे बच्चों से सिगरेट लेने में अजीब सी हिचकिचाहट हो रही थी। एक बच्चे ने सिगरेट मेरी तरफ बढ़ाई। उसके नन्हे नन्हे काले हाँथ । हंथेली में पाना रिंच से धट्ठे पड़े हुए। हंथेली के ऊपर ताज़े जले के निशान थी। मैंने बच्चे से पूछा कैसे जल गए ?
उसने ट्रक के इंजन की तरफ हाँथ उठा के इशारा किया । वो मुस्कुरा दिए। फिर से मोबाइल में गुम हो गए । मेरा हृदय भर आया। मुझसे और वहाँ न रुका गया।
घर आते ही मेरे बच्चे ने दरवाज़े पर ही खबर दी। कि मम्मा बहुत गुस्से में है। वो तीन दिन से मुझे पढ़ा रही है। मैं लर्न करता हूँ और भूल जाता हूँ। मम्मा भूलने पर बहुत मारती है।
मैं हताश हो गया था। बच्चों की दुनिया में और रहने व उनकी संगत का फैसला तुरंत रद्द कर दिया। मेरे भीतर उनकी दुनिया के तनाव लेने का ताब नही बचा था। मैं हार चुका था। मगर बच्चे उस दुनिया से मुस्कुराते हुए निकल आते हैं। 

सोमवार, 29 नवंबर 2021

ढाँक लिया तुमने अपने सफेद आँचल से !

 


ना उम्मीदी के सूखे पन से धरती की नमी सूखने लगी थी। ये सूखना दर असल सूखना नहीं था, ये ख़त्म होना था। ख़त्म होना उसे महसूस हो रहा था लंबे समय से। लगातार ख़त्म होने के एहसास के साथ साथ एक बिंदु पर उम्मीद ने भी साथ छोड़ दिया। पिछली बार  प्रेम की पैदाइश के बाद धरती की कोख को आग के हवाले कर दिया गया था। वो अंदर ही अंदर सुलग रही थी। भीतर की आग और सूरज की बे रोक टोक तपिश सब कुछ भस्म कर देने को तड़प रही थी। गर्म सूखी हवा से परत दर परत मिट्टी उखड़ते हुए धूल बनकर आसमान को छू लेना चाहती थी। 

फेफड़ों में धूल और धुएं की परतें जैसे ही सांस के बीच आने लगी, हर तरफ अफरा तफरी मच गयी। लोगों का दम घुटने लगा। धरती के उस रौद्र रूप के काल से बचने के सारे प्रयास विफल होने लगे। जो कभी जीवन देती थी, उसने जीवन ले लेने का थोड़ा सा आभास कराया तो सारी समझ धरी की धरी रह गयी। ना समझी जब समझ का ताज़ पेहेन ले तब ना समझी से उपजी आपदा की आहट तक महसूस नहीं होती। 

      पर धरती तो धरती ही है। उसका निश्छल और अथाह प्रेम ही उसकी असीमित ताकत है। प्रेम में गहरे से गहरे घाव जज़्ब कर लेने की ताकत है। हर आघात उसकी ऊर्जा बन जाती है। इस सुबह जब कुछ नमी लिए कोहरे की सफ़ेद चादर छायी दिखी, तो लगा किसी प्रेम के आँचल ने फिर से ढाँक लिया हो। जीवन फिर से कौंधने लगा है। पर उस आँचल में संघर्ष की थकावट है। उस आँचल को प्रेम के बदले प्रेम की सख्त ज़रूरत है। जो उसकी पनपने की ऊर्जा भी है और सब कुछ तहस नहस कर देने की ताकत भी। उसके इस आँचल को सहेज लो, उसके प्रेम को सीने से लगा लो, उसे महसूस करो। वो धरा है, और प्रेम की धारा भी।

शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2021

झिल्ला !

 


तुम्हारे पास कित्ते झिल्ला हैं ? चार ! दुई हमरे तीर । दुई छुटकी तीर हैं। जोड़ो जोड़ो कित्ते झिल्ला ? उंगलियों के पोरों पर राबिया ने गिनती गिनना शुरू किया। एक ...दुई...तीन ....। तीन के बाद राबिया आंखें मटकाने लगी । सुब्बू बोला ! ए राबिया ...आंखें काहे मटकाए रही । दीदी जब पढ़ावत हैं तब्बो आंखें मत्कावट है। और अब्बो मटकाए रही । 8 झिल्ला भए । चार धन दो धन दो । भए 8 । 

विद्यालय के दरवाज़े अभी भी बन्द हैं । दीदी जी , गुरु जी , रसैयां अभी तक आधा घंटे विलंभ से हैं। ख़लीहर बच्चे आंखों में मोटा काजल लगाए विद्यालय पहुँचना शुरू कर दिए हैं। गाँव के किनारे प्राथमिक विद्यालय जसपुर का यह हाल रोज का है। जब तक विद्यालय नही खुलता है । बच्चे यूँ ही कुछ खेल कूद के टाइम पास करते हैं । 

बच्चों ने सबके जेब से कंचे झाड़े। आज उनकी सहेलियां भी कंचे (झिल्ला) खेलना चाहती हैं। हंथेली से उतनी जमीन की सफाई की । जितने में खेल खेला जाना था। उंगलियों से कुरेद कुरेद के चटनी वाली कटोरी के बराबर गड्ढा बनाया।  चार कदम दूर एक सीधी लाइन खींची । अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बो .... सबकी अपनी अपनी बारी तय कर ली गयी । 

विद्यालय के पास एक बड़ा सा इमली का पेड़ है । पेड़ के नीचे रहवासियों की बकरियाँ बँधी रहती हैं। कुछ एक गाय भैंस बाँध दी जाती हैं।  विद्यालय के आस पास के घरों का घूरा भी यहीं है। ऊपर से पानी कीचड़ । इसलिए बच्चों को खेलने की छांव वाली जगह कम ही बच पाती है। वो अपना किसी तरह से काम चलाते हैं। रोज़ सुबह उनका काफी समय खेल तय करने में , या खेल की तैयारी करने में व्यतीत हो जाता । 

खेल शुरू हो गया था। अपनी बारी में एक बच्चा सारे झिल्लों को गुपिया (गड्ढा ) के आस पास फेंकता । जो गुपिया में पिल गया वो झिल्ला उसका। जो नही पिले। उनमें से किसी एक पर निशाना साध के ट इं यां ( बड़ा कंचा या बंटा ) से झिल्ला चटकाना होता है । सो , बारी बारी से सारे बच्चे इस खेल को दोहरा रहे थे। 

उन बच्चों में राबिया सबसे मिर्री थी । आँखें बड़ी बड़ी । ऐसा लगता था । माँ की उंगलियों ने उनमें काजल भर भर के बड़ा कर दिया हो । वो बस्ता लादे लादे थक जाती थी। आज उसने नया खेल सीखने को बस्ता घूरे पर रख दिया। और झिल्ला का खेल सीखने में लग गयी। गुपिया , ट इं या , पिलना आदि शब्द खेल देख देख सीख लिए थे। लाइन के उस पार वो पहली बार खिलाड़ी के तौर पर आयी थी। झिल्ला फेंकने में दो झिल्ला गुपिया में पिल चुके थे। अब बंटे से जैसे ही उसने झिल्ला चटकाने को निशाना साधा । रेनू चिल्लाई .(जैसे कोई सैलाब उन बच्चों की ओर बढ़ता आ रहा हो ) .दीदी जी आय रही हैं...दीदी जी....

अचानक से खेल में अफरा तफरी मच गई। दीदी जी की कार उनसे पहले विद्यालय के गेट के सामने लग गयी। पड़ोस वाली सीट से गुरू जी तैश में उतरे । नालायक .... बत्तमीज़...अनपढ़...कहीं के । जरा सा इंतज़ार नही हो रहा था । तुम लोगों से । घूरे पर झिल्ला खेल रहे हो ।...गुरु जी का गुस्सा सातवें आसमान पर था।  सभी बच्चे बुत बन गए । जैसे किसी ने उनको स्टापू वाला खेल खिला दिया हो । अब खड़े क्या देख रहे हो ? चलो दरवाज़ा खोलो .! गुरू जी ने बच्चों को आंखें दिखाते कहा। 

बच्चों ने गुरु जी से चाबी लेकर दरवाज़ा खोला। दीदी जी ने विद्यालय प्रांगड़ में गाड़ी पार्क कर दी। बच्चों को पढ़ने की नसीहतें बड़बड़ाती हुई अपनी कुर्सी पर बैठ गयी। सभी बच्चे सहमे से अपनी जगह लेते हैं। गुरु जी ने कक्षा में हाजरी लगाई। पढ़ाना शुरू कर दिया। उन सारे बच्चों में राबिया बहुत असहज हो रही थी। गुरु जी ने उसकी बेचैनी को भाँप लिया था। क्या हुआ राबिया ? क्यों परेशान हो ! राबिया खड़ी हो कहती है । गुरु जी बस्ता हमारो घूरे पर रही गौ । 

गुरु जी का गुस्सा फिर से सातवें आसमान पर पहुँच गया। " बस्ते का होश नही है। वो घूरे पर छोड़ आए । वाह ! जाओ ...लेकर आओ । और बाहर खड़ी रहना मेरी कक्षा में । गुरुजी के लिए ये भूल एकदम क्षम्य नही थी । रह रह कर उन्हें ताव आ रहा था। उन्हें उनके बचपने में दादी की झिड़की याद आ गयी। वो गुस्से में कहा करती थी। "जाओ बस्ता घूरे पर चलाए आओ" ।

राबिया बस्ता लाकर कक्षा के बाहर खड़ी हो जाती है। गुरु जी ने झिल्ला खेलने वाले सभी बच्चों को बाहर खड़े रहने का फरमान सुना दिया। झिल्ला वाले सभी बच्चे कक्षा के बाहर लाइन से खड़े हो गए। 

सुब्बू ने राबिया की आंखें देख फिर कहा " अब काहे आंखें मटकाए रही हो ? और खेलो झिल्ला...जब खेलै नही आवत तब्बो खेल रही। भूल गयी बस्ता। हम सबका खड़ा करवा देहो ।

राबिया ने अपनी दोनों मुट्ठियाँ बन्द कर सुब्बू के सामने तान दी। बतावो कौन मुट्ठी माँ झिल्ला हैं ?

नोट : तस्वीर में मौजूद बच्चों का कहानी के किरदारों से कोई वास्ता नही है ।

सोमवार, 27 सितंबर 2021

गूगल !

 मैं तेईस वर्ष

आंखों के बंटे में

गोल देखता इतना
लगता दिल के करीब ..

फरेब न समझ
असल समझ

इतनी कम उम्र में
दुनिया समेटना
मूर्ख आकाश में
समझ से हल्का
दिल माँगता कुछ न
देने को बैठा समय
और समय । 

बच्चों को उड़ने दो ..

 उड़ने दो , उड़ने दो  बच्चों को उड़ने दो ... गर नाक अटक जाए  तो भी तो  उड़ने दो ..   जिस ऊर्जा का  संचार प्रवाह  हो उद्दंड  उसको भी  उड़ने दो  कह...