मैं तेईस वर्ष
आंखों के बंटे में
गोल देखता इतनालगता दिल के करीब ..
फरेब न समझ
असल समझ
असल समझ
इतनी कम उम्र में
दुनिया समेटना
मूर्ख आकाश में
समझ से हल्का
दिल माँगता कुछ न
देने को बैठा समय
और समय ।
मैं गया था और लौट आया सकुशल बगैर किसी शारीरिक क्षति और धार्मिक ठेस के घनी बस्ती की संकरी गलियों की नालियों में कहीं खून का एक कतरा न दिखा ...
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