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शुक्रवार, 4 जुलाई 2014
मुक़द्दस "माह-ए-रमज़ान"
पंचतारा आरामगाहों से तौबा
मस्जिदों की मीनारों से
उठती हुयी
पांच वख्त की अज़ान
में लसा बसा
मुक़द्दस "माह-ए-रमज़ान"
खजूर ,पकौड़े,केले,
शीरमाल, कुलचे,नहारी,
बिरयानी,कोरमा
से होता हुआ
पाबंदियों की सख्त पहरेदारी
के बीच
जब पहुचता है
पाक चाँद की देहलीज़ पर
सारा जहां रोशन नज़र आता है
करोड़ों दुआओं के चरागों से
तू जहा कहीं भी है
ऐ परवर दिगार
इंतना सा करम करना
आज़ाद रखना पाबंदियों से
अपनी नेमतों को !
.......प्रभात सिंह
गुरुवार, 3 जुलाई 2014
पहाड़ी !
ये हसरतों के पहाड़ हैं
ये हसरतों के पहाड़ हैं,
मुकाबलों के पुआल हैं,
भरे हैं ये गुरूर से,
तृष्णागि के सुरूर में।
तू ज़र्रा है,
तू आदमी,
बना रहा हवा महल,
रेत के पहाड़ पर।
जो भरभरा के ढह गए
झरझरा के बह गए
तो सिसकियों के बीच में
आंसुओं के ताल हैं।
ये हसरतों के पहाड़ हैं,
मुकाबलों के पुआल हैं..... प्रभात सिंह
शनिवार, 26 अप्रैल 2014
बुधवार, 19 मार्च 2014
सवाल जीवन के मुखर होते अचानक
तेरे,मेरे, सभी के !
नस्तर से चुभते सवाल
मेरे रोम रोम को
दर्द कि असीमित श्रंखलाओं में
पिरोते हैं ,
निरुत्तर कराहता मैं
जुटाता हूँ साहस
दृढ़ता से उत्तर देने को
सब सवालों का,
पर सवालों का पैनापन
नहीं भेद पाता
मेरे धैर्य को
मालूम है
कोमल झूठ के तानों बानों का
बुनकर
मेरे ही अंदर
पनपता इंसान
घूमता है तुम सब कि
खुशियों के इर्द गिर्द
सवाल सवालों का नहीं यहाँ
सरोकारों का है
जीवन के अंतिम साँसों
के साथ
जब सरोकार जाते रहेंगे
जवाब रिक्त से भरे हुए
खुद ब खुद मिल जायेंगे …… प्रभात सिंह
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"चेतावनी - यह कहानी केवल वयस्क लोगों के लिए है । कहानी के कुछ प्रसंग एडल्ट की श्रेणी के हैं । कृपया बच्चे या किशोर इसे न पढ़ें । "...


