कुल पेज दृश्य

रविवार, 28 सितंबर 2025

कोई है जो इन दिनों...

 


कोई है जो इन दिनों 

तितलियों के भेष में 

उड़ाती रंग पंखों से


कोई है जो इन दिनों

बारिशों के देश में

भिगाती अंग फाहों से


कोई है जो इन दिनों 

ख्वाहिशों के शेष में 

सताती संग यादों से 


कोई है जो इन दिनों 

कैसिनो के कैश में

जिताती चाल चालों से


कोई है जो इन दिनों

रोमियों के देश में

जगाती रात आंखों से


कोई नहीं है इन दिनों

पत्थरों के ठेस में 

भुला दी बात बातों से ।

मंगलवार, 16 सितंबर 2025

बारिश का वो दिन !


याद है तुम्हे ? 

बारिश का वो दिन !

पहाड़ की किसी सड़क पर 

बस स्टैंड हमें आश्रय देकर 

बचा रहा था , भीगने से 

हम भीगते तो क्या हो जाता 

ये हमें नहीं पता था 

बस स्टैंड को पता था 


शाम से रात होने को आई थी 

सड़क पर केवल बारिश झर रही थी 

तुम चिपक कर बैठी थी मुझसे 

सर टिका लिया था कंधे पर 

दो हाँथ लिपटे थे जैसे कोई बरसाती बेल 

अन्धेरा ढक चुका था हमें 

फरवरी की रात ताप बनकर 

चढ़ रही थी हम दोनों पर 

हमें इन्तजार था 

पर किसका , हमें नहीं पता था 


पहली बार तुम्हारे उंहू उंहू पर 

गुस्सा नहीं आ रहा था मुझे 

मेरे बार बार सिगरेट पीने

की तलब पर तुम चुप थी 


आधी रात तक हम हार चुके थे 

बारिश की जिद के सामने 

पर हमारी जिद का क्या 

न जाने देने की जिद 


हम दोनों हठी निकल चुके थे 

बारिश में भीगते , ठिठुरते 

उस ढलान वाले रास्ते पर 

ठहर जाने को किसी ठीहे पर 

पर हम ठहरे नहीं कहीं 

पार कर गए एक दूसरे को 


इससे पहले कई शामें 

कई बारिशें , कई यात्राएँ 

हमने साथ की थीं 

फोन पर घन्टों बतियाते 

कई बार कई बसें छोड़ी थी 

बस स्टैंड पर तुमने 

कई बार मैंने 

कि अगली बस से क्या पता 

हम में से कोई 

हमसफ़र हो लेता 

एक लम्बी यात्रा पर .  







 


शुक्रवार, 5 सितंबर 2025

मैं चुप होना चाहता हूँ .



आवाज़ देता हूँ 

तो कोई आवाज़ आती नहीं 

पलट कर मेरे पास 


आवाज़ ढूंढती  है मुझे 

और मेरे कानों को 

मैं छिपता फिरता 

भागता जा पहुचता हूँ 

कोलाहल में कहीं . 

सुनना नहीं चाहता 

अब और सबकी 

आवाजें 


बंद होने को है 

मेरी सुनवाई भी 

मैंने सुना नहीं खुद को 

या दुःख को एक दशक से 

अब चुप हो जाओ सब 

मैं  चुप होना चाहता हूँ . 

शुक्रवार, 29 अगस्त 2025

वह आयेगा !



ब्रह्ममुहूर्त से बज उठता है 

कामनाओं के उद्घोष का पंचमुखी शंख 

उसकी आकुल आत्मा के प्रतीक्षारत आंगन में 


दीपक जलता है 

ज्यों जलती हो आस किसी के आने की 


भीगे उलझे केश नहीं सुलझाती

अपनी वेणी में नहीं गूँथती वह

जंगली फ्योंली के पीले तिलिस्मी पुष्प 


मस्तक पर 

सौभाग्य वाला लाल कुमकुम नहीं सजाती 


काजल नहीं आँजती

अपने सूने मगर विस्मय से भरे नेत्रों में 

कि कहीं भर आएं तो कपोल श्यामवर्णी न हों


उसका मुख

एक लाज के माधुर्य को छोड़ 

दूसरी किसी लाली का स्पर्श नहीं जानता


नहीं लगाती सुगंधि

वस्त्रों, ग्रीवा और कानों के पीछे;

जोगियों की बैरागी वृत्ति वह जानती है


ढीले बाँधती है 

कंचुकी के सब बन्धन

कि इतनी निकटता पर भी

श्वास आ जा सके सुगमता से


आभूषणों को देखती है 

विरक्ति से 

कि व्यर्थ ही व्यवधान होगा, 

चित्त की खिन्नता सन्यासियों का पुराना रोग ठहरा 


वह जानती है

जिस जोगी संग लगी है लौ

ज़रा अनाड़ी है सांसारिक जतनों और उपक्रमों में


वह आएगा 

अपने गौरव की सीढ़ियां चढ़कर

पाप पुण्य की व्युत्पत्ति में उलझाएगा


इच्छाओं को कहेगा मोह का अपभ्रंश भर 

प्रेम को निरर्थक कहेगा

देह को माटी बताएगा


भोजन पाएगा

और उसकी धोती से हाथ पोंछे बिना

अपना इकतारा उठा, चला जाएगा ...


साभार : सपना भट्ट

गुरुवार, 21 अगस्त 2025

समझ कर बात आंखों की...



समझ कर बात आंखों की 
मैं तुमसे दूर जाती हूं 

सुबक कर शाम यादों की
मैं तुमको भूल जाती हूं 

समझ कर बात आंखों की ... 

जमीं का यूं फिसलना
और ठहर जाना कहीं पर 
खुदी का यूं संभलना
और मचल जाना कहीं पर 

धधक कर राख सांसों की
मैं खुद को ही जलाती हूं

समझ कर बात आंखों की 
मैं तुमको भूल जाती हूं । 




बच्चों को उड़ने दो ..

 उड़ने दो , उड़ने दो  बच्चों को उड़ने दो ... गर नाक अटक जाए  तो भी तो  उड़ने दो ..   जिस ऊर्जा का  संचार प्रवाह  हो उद्दंड  उसको भी  उड़ने दो  कह...