ब्रह्ममुहूर्त से बज उठता है
कामनाओं के उद्घोष का पंचमुखी शंख
उसकी आकुल आत्मा के प्रतीक्षारत आंगन में
दीपक जलता है
ज्यों जलती हो आस किसी के आने की
भीगे उलझे केश नहीं सुलझाती
अपनी वेणी में नहीं गूँथती वह
जंगली फ्योंली के पीले तिलिस्मी पुष्प
मस्तक पर
सौभाग्य वाला लाल कुमकुम नहीं सजाती
काजल नहीं आँजती
अपने सूने मगर विस्मय से भरे नेत्रों में
कि कहीं भर आएं तो कपोल श्यामवर्णी न हों
उसका मुख
एक लाज के माधुर्य को छोड़
दूसरी किसी लाली का स्पर्श नहीं जानता
नहीं लगाती सुगंधि
वस्त्रों, ग्रीवा और कानों के पीछे;
जोगियों की बैरागी वृत्ति वह जानती है
ढीले बाँधती है
कंचुकी के सब बन्धन
कि इतनी निकटता पर भी
श्वास आ जा सके सुगमता से
आभूषणों को देखती है
विरक्ति से
कि व्यर्थ ही व्यवधान होगा,
चित्त की खिन्नता सन्यासियों का पुराना रोग ठहरा
वह जानती है
जिस जोगी संग लगी है लौ
ज़रा अनाड़ी है सांसारिक जतनों और उपक्रमों में
वह आएगा
अपने गौरव की सीढ़ियां चढ़कर
पाप पुण्य की व्युत्पत्ति में उलझाएगा
इच्छाओं को कहेगा मोह का अपभ्रंश भर
प्रेम को निरर्थक कहेगा
देह को माटी बताएगा
भोजन पाएगा
और उसकी धोती से हाथ पोंछे बिना
अपना इकतारा उठा, चला जाएगा ...
साभार : सपना भट्ट
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