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शनिवार, 2 अगस्त 2025

मायाजाल ! कहानी



 प्रिय तुम ,

आज जिन्दगी के जिस मोड़ पर खड़ा हुआ मैं छटपटा  रहा हूँ .

 वहां से लौटने का कोई भी रास्ता नहीं  दिखाई देता . आगे बढ़ कर कुछ बड़ा कर पाने की हिम्मत भी नहीं बची है . सारी हिम्मत कहाँ चली गयी कुछ पता ही चलता है . शरीर से हष्ट पुष्ट  , मानसिक रूप से एकदम फिट . फिर भी जीवन गर्त में जाने को होता  है . हर समय घबराहट तारी रहती है जिस्म पर . 

घरवाले कहते हैं क्या कमी है ? सब कुछ तो है  जीवन में  ! हम सब भी  ठीक ठाक हैं इश्वर की दया से  . फिर भी तुम इतना हैरान परेशान रहते हो . यही कहते कहते नहीं थकते घर वाले . 

बंधनों से डर लगता है . किसी भी प्रकार का बंधन हो . परिवार , समाज और जीवन का अर्थशास्त्र भी बंधन हैं . जो इनमें डूबा वो डूबा चला गया . क्या कहीं डूबना ही तो बचना नहीं होता ? शायद सभी डूबे रहते हैं इसीलिए बचे रहते हैं . पर मैं तो डूबने से भी घबराता हूँ . घबराहट मेरी नसों में बहती है . यह घबराहट है खो जाने की . मैं  दिखा नहीं तो खो जाउंगा . खोने के डर से घबराहट होती है . 

 ऐसा लगता है जैसा सब कुछ छलावा है . प्रकृति का , जीवन का और जीने के लिए जुटाए जाने वाले सामानों  का भ्रम जाल घेरे हुए है . जो इन मायाजालों से मुक्त हो चुके हैं . क्या वे अपना जीवन सहजता के साथ जी पाते होंगे ! मुक्त होंगे वो सभी मायाजालों से ? पता नहीं . मुझे तो अपना मालूम हो सकता है . मेरा मुझसे ज्यादा कौन जान पायेगा भला . ऐसे दूसरों का दूसरों से ज्यादा मैं कैसे जान सकता हूँ . 

आसमान साफ़ होता है . बादलों के आने से गंदा नहीं होता . धरती साफ़ है . धरती पर उगने , उठने और गिरने वालों से धरती गन्दी नहीं होती . फिर मैं कैसे गंदा हो सकता हूँ . 

हाँ उसने गंदा ही तो कहा था मुझे ! क्या वाकई प्रेम गंदा होता है ? 


एक  मैं 


विवेक मूर्छित हो जाता है . पास की टेबल पर कुछ दवाइयां रखी हुयी हैं . कैलकुलेटर के नीचे , कई सारे कागजों के ढेर ऊपर एक छिट्ठी लिखी रखी है . चिट्ठी में डूबती नाव का कहीं कोई जिक्र नहीं होता है . खिड़की खुली हुयी है . पंखा चल रहा है . हाँथ में सिगरेट जल रही है . शाम ढल जाती है . बारिश बेज़ार हो जाती है . 


सुबह रिती कमरे का दरवाज़ा खटखटाती है . 

विवेक विवेक ... दरवाज़ा खोलो ! 

दो – तीन बार और खटखटाती है . पर कोई हरकत नहीं होती . वो पीछे खिड़की से झांकती है . 

विवेक बेसुध पडा है . 

वो पत्थर का टुकडा उठाती है . और खिड़की पर दे मारती है . 


विवेक ऐसे उठता है जैसे किसी ने उसके सर पर गैलनों पानी डाल दिया हो . 

दरवाज़ा खुलते ही रिती कमरे के अंदर प्रवेश करती है . 

छि .... ऐसे रहते हो आप  ? 

विवेक चुप रहता है और चुप चाप सोफे पर बैठ जाता है . 

रिती किचन  में खाने का टिफिन रख कर टेबल साफ़ करने लगती है . 

उसने मैरून कलर की साडी पहन रखी है . चूड़िया समेट रखी हैं . बाल की कुछ लट उसको और इरिटेट कर रही हैं . 

पूरे जीवन का कबाड़ा बना रखा है . ये भी कोई लाइफ है भला ! नशे में पड़े रहो . 


विवेक : नशें में कौन ? ये क्या बोले जा रही हो ? 

रिती : आप  और कौन ? 

विवेक : ए हेलो ! मैं नशे में नहीं था . कल दिन भर ज्यादा दौड़ना  भागना  हो गया था . शाम को वापसी में एक कडवी दवा पी ली . 

विवेक उठता है और टेबल पर से लेटर उठा लेता है . उसकी तह करके सोफे के साइड में फंसा देता है . 

टीवी ऑन करता है . और चैनेल बदलने लगता है . 

रिती सारी  साफ़ सफाई कर के सोफे के सामने कुर्सी पर बैठ जाती है . हाँ अब बोलो ! 

क्या हुआ ? क्यों इतना परेशान हो ? 


विवेक :  यार पता नहीं क्यों ! जीवन उदासी से भर गया है . इतनी उदासी , कि घबराहट होती है . हमेशा चुप रहने की कोशिश में और चिल्लाने लगता हूँ . बड़ा करने की कोशिश में छोटा गंवाता चला आ रहा हूँ . छोड़ तो दिया सब . और कितना छोडूँ भला . 

यहाँ रहता हूँ सबसे दूर . जिससे किसी को तकलीफ न हो  .कोई मेरे ऊपर तरस ना खाए . और मेरे भविष्य की सीख न दे . पर यहाँ हमारे आस पास अपना कोना नहीं होता . कोना मतलब कुछ अनैतिक ! आस पास के सारे लोग ऐसे जुड़े हुए हैं जैसे सभी रक्तवाहिनियाँ एक हों . पर रक्त किसी को देना न पड़े . 

रिती : आप  घर क्यों नहीं चले जाते हो कुछ दिन ? यहाँ बिना काम के क्यों पड़े रहते हो ? जब काम मिले तो आ जाया करो . मैं तो हूँ ही यहाँ . आप के  जैसे सनकी दोस्त को झेलने के लिए . जल्दी बोलो .... मेरे को घर जाना है . घर में घंटे भर का बोल कर आई थी . घंटे के बाद घर , घर के बाद ऑफिस , ऑफिस के बाद घर , घर में वो कमरा , कमरे में मैं , मेरा लैपटॉप , मेरा फोन और मेरी नींद .


विवेक : हाँ यार ! सही है . तुम्हारा सेट है सब . खाना लाने के लिए थैंक यू और रूम साफ़ करने के लिए भी . वरना ये पड़ा रहता अगले पड़ाव तक . बस अपसेट था कल रात . सोचा तुम्हे मेसेज डालूँ . मेसेज डाल के बेहोश हो गया . मुझे ही रास्ते निकालने पड़ेंगे खुद के साथ बैठ के . खुद से बातें कर के . और चिट्ठियाँ लिखते !  


रिती : चिट्ठियाँ ? वो किसे लिखते हो ?  रिती का चेहरा कोरा था . 

विवेक उठता है और सोफे के किनारे खुसी चिट्ठी  को निकालता है . और रिती के हाँथ में रख देता है . 

रिती चिट्ठी पढ़ती है . और उसे फोल्ड कर के टेबल पर रख देती है . 

ओके !

मैं चलती हूँ . और राजा बनारस जी हुलिया संभाल लीजिये अपना . वरना दुनिया शक करने लगेगी . 

रिती जाने से पहले मंदिर का प्रसाद  विवेक के हाँथ में परोस जाती है . 


विवेक प्रसाद  को पूजा वाली अलमारी में रख देता है . और टी वी का रिमोट नचाने लगता है . 

कुछ देर के बाद , मोबाइल उठाता है . और एक मेसेज रिती को भेजता है . 


Hi , Riti 

Well I thank you ! You have been a great support   . Thank you for holding me  . See you soon  . 


घडी की सुइयों पर  ऑफिस की छुट्टी की सवारी थी . अलसाया दिन फिर से उदासी में डूबने के लिए बेचैन है .  


विवेक नहा धोकर , खाना खाता है . खाने के बाद खाने के स्वाद होने की खबर रिती तक भेज के सो जाता है . गहरी नींद में वो बेसुध पडा हुआ है . जैसे किसी मरुस्थल में रास्ता ढूंढता पथिक थक के चूर हो जाता है . 

दुसरे दिन सुबह आँख खुलने पर , वो अपने पिता और उनके साथी को कमरे के भीतर पाता है . वो चौंक जाता है . वो कमरा अब पापा का घर हो गया था ! 

विवेक की आँखें गहरी लाल रंग में डूबी हुयी हैं . चेहरे पर दाढ़ी बढ़ी हुयी है . पूरा बॉडी पोस्चर ढीला ढाला . आँखों के नीचे डार्क सर्किल . 

विवेक : आप लोग अचानक कैसे आया गए यहाँ ,  क्या हुआ , सब ठीक तो है ? 


पिता ने नज़रे मिलाते हुए कहा कि  कल रात में यहाँ से फोन आया था . कि आप जल्द से जल्द आ जाइये . विवेक को कुछ हो गया है . हम सब उन्हें दिखाने ले जा रहे हैं . हम सब लोग घबरा गए थे . कि आखिर क्या हुआ अचानक . कुछ दिन पहले ही तुमसे बात हुयी थी . यहाँ आकर देखा तो कुछ और ही चल रहा था यहाँ. 


विवेक : पर हुआ क्या ? ये भी तो कोई बताएगा ? मुझे कुछ याद नहीं . मैं कुछ दिनों से अपने काम को लेकर परेशान था . इसलिए थोड़ा रेस्ट लिया घर पर . और आज आँख खुली तो आप लोग सामने हैं . 


पिता  ने सख्त अंदाज़ में विवेक से जल्द से जल्द कमरा छोड़ने की नसीहत दी . और उठ के चल दिए .दरवाज़े से वापस जाते समय वो पलटते हैं . और इशारों में खाने पीने के सामान को ख़त्म करने की बात कहते हैं . विवेक चुप चाप पैर छूता है . और पापा को विदा करता है . 

विवेक इस घटना से सन्न है . ये हो क्या रहा है उसके साथ . उसको कुछ समझ नहीं आ रहा है . उसे साफ़ साफ़ रिती के आने के पहले और जाने के बाद का कुछ याद नहीं . 

वो फिर से गहरी नींद में सोने चला जाता है . 

शाम को रिती फिर आती है . दरवाज़ा खुला देख अन्दर घुस आती है . और चुप चाप सोफे पर बैठ जाती है . विवेक सो रहा है बेड पर बेसुध . 

कुछ देर बाद विवेक की आँख खुलती है . अंगडाई और एक अजीब सी  चीख के साथ वो उठता है . रिती को सामने पाकर फिर चौंक जाता है . 

विवेक : अरे तुम यहाँ कब आ गयीं ? कितनी देर से बैठी हो , दरवाजा खुला था क्या ? 

रिती : आप के ड्रामे इतने चल रहे हैं कि बार बार आना पड़ रहा है . आप के घरवाले आये थे . मिलना हुआ उनसे ? 

विवेक : हाँ , थोड़ा सांस लेकर “ मैं खुद नहीं समझ पा रहा हूँ ये हो क्या रहा है ? “ पापा कह रहे थे ये रूम जल्द से जल्द छोड़ दो . वो कल आये थे , आज सुबह गए हैं . मुझे पता ही नहीं चला . 

तुम लोग मुझे कहीं दिखाने ले गए थे ? वो कह रहे थे यही से किसी ने फोन कर के उन्हें रात में इमरजेंसी में बुलाया था . किसने किया होगा फोन ! कहीं तुमने तो नहीं किया फोन ? 


रिती : आप के कमरे का मोहरा भले ही दूसरी तरफ खुलता हो , पर घर तो एक ही है . आप की सारी हरकतों की आवाज़े हमारे यहाँ सुनाई देती है .


विवेक : देखो ! तुम यहाँ आना बंद कर दो . दीवारों के भी कान कच्चे होते  हैं . मुझे तो हमेशा से ही लगता है कि तुम्हारी मम्मी को मुझ पर शक है . इसलिए मैंने आना जाना बंद कर दिया तुम्हारे यहां. मुझे मालूम है तुम्हे मेरी फिक्र रहती है . जब से मैं इस घर में आया हूँ . तब से तुम से अच्छी दोस्ती हो गयी है . लेकिन ये दोस्तियाँ यारियां , अय्याशियाँ समझी जाती हैं . वहीँ से गड़बड़ियां शुरू हो जाती हैं . 


मेरा इस घर में आने से पहले एक अफेयर था . जो कि अपनी अंतिम साँसे गिन रहा है . बस उसी संताप से भागता फिर रहा हूँ . पेड़ है , उखडा है तो जड़ ले जाएगा अपनी अपने साथ . जड़ जाने की तकलीफ किसे नहीं होती ? 


रिती : मुझे भी ऐसा ही कुछ लगता था . फिर भी कोई आस पास उदास हो तो अच्छा नहीं लगता . फिर वो अडोस पड़ोस में हो तो और भी नहीं लगता . 

ब आप आये थे पहली बार . आप के कमरे से तरह तरह के संगीत की धुनें सुनाई देती थी . कमरा अगरबत्ती की सुगंध से भरा रहता था . आप हमारे घर आते थे . रोज़ शाम की बैठ्कियां होती हंसी ठहाके . लगता ही नहीं था मकान मालिक किरायदार का अंतर . आप हमारे किचन में कई बार अच्छा खाना बनाके हम सब को आश्चर्यचकित कर चुके हैं .

 मामा  की बेटी भी आप से खूब हिल मिल गयी थी . अंकल अंकल कहती घूमती रहती थी . छोडिये ये सब ! आप अपना ख्याल रखिये . बुरे ख्याल दिल से , दिमाग से निकाल दीजिये .  मुझे भी अब यहाँ इस कमरे में आने से अजीब लगता है .  आप चले जाइए ये कमरा छोड़ के . 


रिती उठ कर चल देती है . विवेक उठता है और उसका हाँथ कलाई से पकड़ लेता है . कलाई के जोर से वो रिती को अपने ओर  मोड़ देता है . दोनों कुछ सेकंड गले मिलते हैं . और रिती कमरे से भाग जाती है . 

अच्छा सुनिए ! थैंक यू ... 

आरू को ठीक करने के लिए .  रिती कृतज्ञता के साथ कहती है . 

विवेक : अब मैं उस समय को याद नहीं करना चाहता . किसी तरह से वो बुरा समय टल गया . आरू की परेशानी मुझसे देखी  नहीं जा रही थी . उस दिन जब आरू दोपहर में स्कूल से आई . तो रिक्शा पर वो एकदम  अचेत थी . तुम्हारे घर वाले सब परेशान थे . पर किसी का ध्यान उसकी दवा इलाज पर नहीं जा रहा था . तुम्हारी मम्मी लौंग बाँध रही थी . भाई साहब सुबक रहे थे . भाभी बेहाल हुयी जा रही थी . 

तुम उससे लिपट लिपट कर रो रही थी . उसका शरीर ऐंठा जा रहा  था . जैसे किसी ने उसकी गर्दन कसके पकड़ राखी हो . और वो  उसे मा  ....

तुम्हारी मम्मी उस पूरे घटनाक्रम को लीड कर रही थी . मैं तो बाहरी था . दूर खडा खड़ा तमाशा देख रहा था . कभी हनुमान चालीसा पढ़ी जा रही थी . तो कभी लोबान सुलगाया जा रहा था . दो घंटे आरू तड़पती रही . तुम सब लोग उस पर भूत बलाय उतार रहे थे . कुल देवता की आरती उतार रहे थे . उससे ज्यादा सब धरती सर पर उठाये थे . 

बाल्टी में पानी , नीम की पत्तियां लौंग नीबू ,पता नहीं क्या क्या टोटके तुम लोग किये जा रहे थे . आरू की आवाज़ में भारीपन बढ़ता जा रहा था . तुम्हारी मम्मी आरू के बदहाल देह से पूछती ... छोड़ोगे  कि नहीं .... आरू मरदाना आवाज़ में कहती ... नहीं ... मैं इसे छोडूंगा नहीं . 

रिती : फिर आप  क्यों ढेर हो गए थे ? रिती ने बीच में विवेक की बात काट कर कहा . 

विवेक : मैं क्या करता . मुझे आरू की बदहवासी असहनीय हो रही थी . बेचारी 13 साल की बच्ची . बुखार से तप रही थी . आप सब लोग उसे घेरे हुए थे .  आँगन के किनारे खम्बे के पास खड़ा मैं , मन ही मन कह रहा था . कि जो कोई भी हो आरू पर . उस छोटी बच्ची को छोड़ मुझे परेशान करे . मैंने किसी को इस वाक्य से चैलेन्ज किया . मेरे आँखों के सामने अन्धेरा छाने लगा . मैं खम्बे के सहारे नीचे बैठता चला गया . और तुम लोगों को चुप कराते हुए चीखते हुए ...” छोड़ दो उसे , जो कोई भी हो मेरे से मिलो “ मुझे पक्का यकीन था मेरा कहा कोई अदृश्य शक्ति सुन रही हो या न . पर आरू तो जरुर सुन लेगी . मैंने ठीक वैसा ही किया . जैसे आरू के साथ होता हुआ उसे महसूस हो रहा था . तुम सब लोग मेरी तरफ बढ़ने लगे . आरू की ऐठन कम होने लगी .

मेरा यह प्रयास मुझे न जाने किस लोक में ले गया . तुम सब लोग आरू के साथ मुझे भी उस बाबा के दरबार में ले गए . जहां से मेरे घर पर कॉल किया गया था . 


मुझे याद आ रहा  है . उस बाबा के दरबार में सब कुछ काला काला था . दरवाज़ा काला , दीवारें काली , बाबा का भेष काला और धुएं से काले हुए कमरे में रखे साज ओ सामान . 


बाबा की ऊँची गद्दी के सामने 20 से 30 भक्त हाँथ जोड़े बैठे हुए दिखे . तुम्हारी माँ ने अर्जी लगवाई . बाबा की आँख और मेरी आँख एक दुसरे का पीछा कर रही थी . बाबा ने मेरी तरफ आँखें गड़ा के कहा “ ए तुम , खड़े हो जाओ . क्या चाहिए तुझे ? 

मैंने कहा कि बस यह बच्ची ठीक हो जाए . 

बाबा की आँखें मुझे और ज्यादा देखना नहीं चाह रही थी उस दरबार में . मेरी घूरती हुयी आँखें और बुलंद आवाज़ बाबा की आस्था की दुनिया पर लगातार चोट कर रही थी . बाबा ने तुम्हारी मम्मी को इलाज के नाम पर कुछ और टोटके बताये . मेरे लिए उन्होंने , मुझे उस घर से दूर रहने की हिदायत दी .  और हम सब वहां से वापस आ गए . 


आरू ठीक थी . उसका यह ठीक होना मुझे ठीक उसी समय लगने लगा . जब से मैं खम्बे से नीचे सरकने लगा . आरू की स्थित के सामने एक नयी प्रभावशाली स्थिति को क्रिएट करना और उसे यकीन दिलाना कि अब उसकी पीड़ा किसी दुसरे को ट्रांसफर हो रही है . यही मेरा उद्देश्य था . मैंने उसके ठीक होने को लगातार महसूस किया . 

क्या तुम लोगों ने कभी विचार किया कि आरू को क्या हुआ था ? 


रिती : नहीं ! वो तो एकदम नार्मल बिहेव  करती थी . हमेशा चुलबुली , इठलाती घर भर में फुदकती रहती थी . किसी की नज़र लग गयी होगो स्कूल में . 


विवेक : क्या रिती , तुम भी पढ़ी लिखी होकर इन सब बातों पर विशवास करती हो ? वो तुम लोगों के आँखों के सामने रोज़ रात को एक डरावना टी वी सीरियल देखती थी .  शायद उस सीरियल का कोई सीक्वेंस उसके दिमाग में बस गया हो . भयंकर गर्मी में दिन भर स्कूल के बाद कड़ी धुप में रिक्शा से घर आना बच्चों को परेशां कर सकता है . घर में पूजा पाठ भी सनक के हद तक नहीं होना चाहिए . 

ऊपर से तुम्हारी मम्मी का मुझपर शक करना . कि मेरी वजह से उनकी बेटी के जीवन में फ़िज़ूल की हलचल है . क्या तुम्हे भी ऐसा  लगता है ? 


रिती :  देखो ! मुझे आप की कंपनी अच्छी लगती  है . लेकिन जब मम्मी को अच्छा नहीं लगता . तब मुझे ये बात अखरती है . और मैं अपने आप को आप से  मिलने से रोकती हूँ . जब रोकती हूँ तो और मिलने की इच्छा होती है . बस यही है . मुझे लगता है . कि एक लड़की और लड़का अच्छे दोस्त हो सकते हैं . दोस्त से मिलने की क्रेविंग तो अलग ही होती है .  

आप यहाँ अकेले रहते हो . घर वालों से दूर . मैं यहाँ अपने मामा के यहाँ हूँ . इसलिए घर से दूर रहना कैसा होता है मुझे मालूम है . कभी कभी माँ आ जाती है तो थोड़ा बल मिलता है . वरना ऑफिस से घर , घर से ऑफिस . मेरी सैलरी से मामा के घर के खर्चे निपट जाते हैं . और मैं यहाँ रह कर नौकरी के साथ आगे की पढ़ाई और घर के कामों में सहयोग कर देती हूँ . 


रिती घडी की तरफ देखती है . अरे बाबा रे .. इतना समय हो गया आये हुए . आज तो पक्का मम्मी मुझे मार डालेगी . मैं चलती हूँ . बाय ! 

बाय ! कहकर विवेक रिती को विदा करता है . 

कुछ देर गहरी सोच में रहता है . फिर मोबाइल उठा के उसमें दुसरे शहर में नौकरी की तलाश करने लगता है .





शनिवार, 5 जुलाई 2025

"पहाड़ों की गोद में बसा एक दिल "

  


रानीखेत….रानीखेत से यूँही कुछ 20 किलोमीटर की दूरी पर एक गाँव है सौनी, वही सौनी जिसकी हर एक ईंट पर स्वर्गाश्रम बिनसर महादेव का आशीर्वाद है। 

जहाँ हवा में ठंडक और स्मृतियों में गर्माहट बसती है, इस गाँव ने देश को अच्छे इंजीनियर, डॉक्टर , सरकारी अधिकारी और शिक्षक दिए है। 

गाँव की शुरुआत की पहली इमारत ही शिक्षा का मंदिर है। एक सरकारी स्कूल जहाँ मेरी माँ ने अपने जीवन के कई साल सहायक अध्यापक के तौर पर दिए है। 

इसी प्राइमरी स्कूल के एक छोर पर है आँगन बाड़ी, वो जगह जहाँ पर मैंने लिखना सीखा, पहले बार पेंसिल यही पर उठाई थी मैंने, अब लिखने के लिए लेकिन लैपटॉप का इस्तेमाल करने लगी हूँ। स्कूल से कुछ आगे बढ़कर है एक चक्की , और एक घुमावदार मोड़, यहाँ से गुज़रने पर पड़ेगा पहला मकान, वही छत जिसके नीचे मैंने पहली बार आँखे खोली। 

उस घर के आँगन में, जहाँ कभी सूरज की किरणें और चाँद की चांदनी एक-दूसरे से होड़ लगाती थीं, अब दरारें उभर आई हैं। उन दरारों के बीच छुपा है एक लड़की का बचपन—वह लड़की, जो पहाड़ों को अपना घर समझती थी, जिसके कदमों ने इस आँगन की मिट्टी को पहली बार छुआ था, जिसके हँसी-खेल ने इस आँगन को जीवंत किया था, और जिसके आँसुओं ने इस मिट्टी को सींचा था। 

लेकिन आज वह लड़की, शहर की चकाचौंध में खो गई है, और वह आँगन, जो उसकी साँसों का हिसाब रखता था, अब उसे ढूँढे नहीं मिलता।मेरा जन्म पहाड़ों में हुआ, जहाँ सुबह की पहली किरण पेड़ों की पत्तियों को चूमती थी और शाम की आखिरी रोशनी चट्टानों पर ठहर जाती थी।

 मेरा घर वही था, जहाँ खिड़की से झाँकते ही बर्फ से ढके शिखर मुस्कुराते थे, और हवा में घुली थी देवदार की महक। आँगन में एक पुराना संतरे का पेड़ जिसके संतरों का हिसाब मैं अपनी उँगलियों पर रखती थी और मजाल किसी की जो संतरों को छू भी सके। मानो पहाड़ों ने मुझे अपनी मिट्टी से गढ़ा हो। इसी घर के आँगन में ही मैंने चौलाई की लकड़ी पकड़कर चलना सीखा। 

यही पर अपनी पहली पीली रंग की साइकिल चलाना सीखा। वो आँगन मेरे पचपन को जैसे समेटे बैठा है। आँगन मेरा अपना नहीं था, हमारे मकान मालिक जिनको मैं बाबू बुलाती थी उनका और उनकी पत्नी यानी मेरी ताईजी का था। लेकिन उस आँगन ने मुझे अपना ज़रूर बना लिया। बाबू ने चलना सिखाया, और ताईजी अपने साथ डलिया में रख कर खेतों में ले जाती। मिट्टी खाकर और गाय के गोठ में सोकर गुज़रा है मेरा बचपन । सौनी ने मुझे पाल कर बड़ा किया है और मैं इतनी मतलबी इसी गाँव को भूल गई। समय ने अपने पाँव पसारे।

 पहाड़ों की सादगी और संसाधनों की कमी ने मुझे पढ़ाई के लिए शहर की ओर धकेल दिया। पहले कॉलेज, फिर नौकरी की तलाश—शहर की चमक ने मुझे अपनी ओर खींच लिया। वह आँगन, जहाँ मैंने अपने पहले कदम रखे थे, धीरे-धीरे मेरी स्मृतियों में धुंधला होने लग गया। मेरी यादे इसी आँगन की मिट्टी में ही कहीं दफन हो गई ।शहर की ऊँची इमारतों और तेज़ रफ्तार जिंदगी ने मुझे बहुत कुछ दिया—एक नौकरी, एक नया ठिकाना, और शायद एक नया सपना। लेकिन उसने मुझसे मेरा आँगन छीन लिया। वह आंगन, जहाँ बाबू और ताईजी मुझे आज भी याद करते हैं । 

ताईजी तो इतनी भोली हैं की आज भी मेरी बचपन की तस्वीर देख रोने लगती है । मैं चाहकर भी उस आँगन को नहीं ढूँढ पाती अब। पर मैं जानती हूँ यहीं मेरा बचपन अब भी उन दरारों में साँस ले रहा है।कभी-कभी, जब रात गहरी होती है और शहर की रोशनी थम जाती है, मुझे लगता है कि हवा में देवदार की महक तैर रही है। आँखें बंद करती हूँ , और एक पल के लिए वह आँगन फिर से जीवंत हो उठता है।

 मैं आज भी उस आँगन को ढूँढ रहती हूँ, जहाँ मेरी साँसों का हिसाब है। लेकिन तब तक, वह आँगन सिर्फ़ एक सपना है, जो पहाड़ों की गोद में कहीं खो गया है।


साभार  " मानसी जोशी " 

शुक्रवार, 25 अप्रैल 2025

नागरिकता !


भारत का नागरिक होने के नाते

मैं और मेरी नागरिकता

मुझसे सवाल नहीं करती 


मैं हिन्द देश का नागरिक

हिंदू परिवार का हिंदुस्तान 

यूं ही नहीं बना


मेरे बाप दादाओं ने 

घोर तप , यज्ञ और मानताओं 

के बाद मुझे हांसिल किया 


खुशी का ठिकाना नहीं रहा

हिंदू कुल का वंश बढ़ाने

मैं , मां भारती में जन्मा 


पला बढ़ा संयुक्त परिवार

के मुक्त आंगन में 

और सयाना बना 

वीर सैनिकों के बीच 


एक युवा नागरिक

ऊर्जा से भरपूर 

लौटता है एक वरिष्ठ

नागरिक के वी. आर. एस.

के साथ 

अपनी जड़ों की ओर 


एक खिड़की 

एक दरवाज़े वाले 

दो कमरों का घर

घर में आजाद खयालों

के बंद दरवाजे 

मुझसे सवाल करने लगे


एक नागरिक को पता चलती है 

उसकी नागरिकता

जाति, धर्म , 

इतिहास और भूगोल 

की सीमाएं 


स्वजाति , स्वधर्म , स्वनागरिक

और स्व स्वभुगोल

के दायरे में नागरिक 

डूबता जाता है 


घर के मुक्त आंगन

से देश के मुक्तांगन

की उड़ी उड़ान 

यादों में जड़ होने 

लगती हैं 


 स्व

और स्वयं 

के घेरे में रचने बसने 

की नसीहतें कभी कभी

हिंसक होने लगती हैं 


भाषा की मर्यादाएं 

टूटने लगती हैं 

खाली बर्तन

टकराने लगते हैं 

सवालों के जवाब 

न दिए जाने में ही

समझी जाती है 

घर की भलाई 


नागरिक बदहवास 

छोड़ जाना चाहता है 

अपनी नागरिकता 

और उतार फेंकना चाहता है

अपनों का ढोंग 


तमाम भावनात्मक

बेड़ियों में उलझ 

आख़िर में वो 

स्वीकारता है 

नागरिकता 

कुनबे की 

वंशावली की 

और समाज की !



भेड़ों की भीड़ !

 


भीड़ में एक आदमी

गुम होता है 

जैसे भेड़ों में एक आदमी


आदम युग से

सीखता आया है आदमी

गुम होना

और भेड़ों को हांकना 


भेड़िया भेड़ के भेष में

भीड़ को रिझाता है 

उठा लाता है 

किसी एक भेड़ को 

दिखाने भेड़ियों के झुंड


सहमी भेड़ 

लाती है रोज 

एक और भेड़ को

भेंट में


भीड़ छटने लगती है 

भेड़िए के भेष में

भेड़ का चेहरा 

साफ होता जाता है !

शुक्रवार, 18 अप्रैल 2025

जब पिता मर जाते हैं !



बच्चे मर जाते हैं 

जब पिता मर जाते हैं 

और मर जाते हैं 

बच्चों के भीतर 

अनुत्तरित हजारों सवाल 


बच्चे मर कर

जी कर जब 

बनते हैं एक पिता

तो मारते हैं एक

पिता को वो भी 


पिता पुत्र के बीच

की खाई को सिर्फ

मौन पाट पाता है 

संवाद के 

अनगिनत बहाने

ढूंढ लेती है

पिघली बर्फ


दोनों तरसते हैं

तिल तिल

गले मिलने को 

नहीं मिलते विचार

फिर भी आदतें

मिलती हैं 


शीत युद्ध के

कुचक्र से 

क्षत विक्षत 

पिसते हैं 

पिता पुत्र 

के संबंध

लंबे अरसे तक 


सम्मान की सफेद 

चादर में लिपटे

जज़्बात छटपटाते हैं 

आत्मग्लानि के बोध

से ढह जाते हैं

आशाओं के किले

और छत्र छाया

का आभास टूट कर

बिखर जाता है 

तब पिता के साथ

पुत्र भी नहीं रहते । 

बच्चों को उड़ने दो ..

 उड़ने दो , उड़ने दो  बच्चों को उड़ने दो ... गर नाक अटक जाए  तो भी तो  उड़ने दो ..   जिस ऊर्जा का  संचार प्रवाह  हो उद्दंड  उसको भी  उड़ने दो  कह...