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रविवार, 4 अगस्त 2024

मां ने पढ़ना छोड़ दिया !



पहले काव्य छोड़ा

फिर पद्य में कहना 


मां ने पढ़ना छोड़ दिया

काढ़ना भी छोड़ दिया


गमलों का शौक था उसे

और गमलों में फूलों का 

हर बार किसी फूल के खिलने पर

वो सबको दिखाती 

देखने वाले वाह करते 

और निकल जाते 


गमलों में रसोई से निकले

खनिजों , लवणों को 

वो इस्तेमाल कर लेती 

उसे महसूस होता 

खराब को कारगर करने

का सुख


बाहर के बंदरों से 

तंग आकर छोड़ दिया

उसने पौधों से बात करना 


अब मां टाइम से 

सबको चाय देती है 

खाना देती है 

गर्म पानी देती है 


अब वो दालें , सौंफ और अजवाइन

बीनती है 

खरबूजे के बीजे साल भर

फोड़ती है 


मां नही बताती कुछ भी 

किसके लिए भी नही 

मां अप

नी दुनिया का

हर राज छिपाए रखती है 



गुरुवार, 1 अगस्त 2024

सुनो !


पूछते क्यों नही 

आकाश का पानी

कहाँ गया सारा


धरा की प्यास

बुझी नही 

क्यों अब तक ?


कब तलक

झुकी घटाएं 

नाट्य रूपांतरण

करती रहेंगी 


मेरी प्यास पर 

रोना आता है मुझे

मुझे मेरी तरह 

निबाह लो !


शनिवार, 27 जुलाई 2024

प्रिय पहाड़ ,

 


प्रिय पहाड़ , 

                कैसे हो ? मैं यहां ठीक से हूं । आशा है तुम भी वहां लाख आपदाएं सहकर ठीक से होगे ! मैं जब तुम्हारे खूबसूरती पर कसीदें पढ़ने वाले लोगों की आंखों में भय देखता हूं । तो सोच में पड़ जाता हूं । तुम्हारी खबरें मुझे यहां मैदान में ही मिलती रहती है । अब सूचना और प्रसारण के युग में पहाड़ और नदियों के हाल न मिले । तो आश्चर्य तो होगा ही । 

तुम्हारे नदियों के ऊपर गिरने की सबसे ज्यादा खबरें होती हैं । तुम्हारे गिरने को लैंडस्लाइड कहते हैं शायद । टीवी पर , अखबारों में , सोशल मीडिया पर तुम्हारी तबाही की तस्वीरें खूब मार्मिक ढंग से बतलाई जाती हैं । तुम्हारे सर से ,  कांधों से उतर कर लाखों लोग मैदान पर रह रहे हैं । वो सब ऐसी ही बाते बताते हैं । 

कभी धरती के दो टुकड़ों के टकराने से बने पहाड़ों की छाती पर हम इंसान चढ़ गए हैं । कुदाल , फावड़ा तसला और अर्थ मूवर मशीन लेकर हम तुम्हारे कांधों पर सवार हो गए हैं । तुम्हारे आकार प्रकार के सामने हम इंसान चिटियों की तरह तुम्हारे श्रृंखलाओं पर दिन रात चलते रहते हैं । हमारे देव स्थान तुम्हारी चोटियों पर हैं । तुम्हारी चोटियों पर शायद इसलिए हों । कि हमें तुम्हारी खबर रहे । 

मूरख हैं हम सब । पहाड़ ! यार तुम समझते क्यों नहीं हो । तुम्हारे भीतर कितना धैर्य है ? तुम्हारी तथस्तता , तुम्हारा अटल खड़े रहना हमको अच्छा नहीं लगता है । हम चाहते हैं कि इस पृथ्वी की हर वस्तु हमारे काम आ जाए । हमारे लॉन में आकर सज जाए । जब नही सजती तो फिर प्रयोग करते हैं । तुम्हे पा लेने के । मुझे दया आती है । उन पर्वतारोहियों पर ।  इतनी कड़ी मेहनत कर के तुम्हारे शिखर को छू कर आने का हौंसला पहाड़ इतना बड़ा हो सकता है । 

लेकिन आस्था के नाम पर गांव शहर बसते । पहाड़ों पर बढ़ती आबादी , बढ़ते कंक्रीट के ढांचे तुम्हे नुकसान पहुंचा रहे हैं । मल, मूत्र प्लास्टिक कचड़ा , इलेक्ट्रॉनिक्स सब तुम्हारे जीवन धारा को अवरूद्ध कर रहे हैं । 

तुम्हारी देह को सांस लेने में दिक्कत हो रही होगी । 

तुम्हे याद है न ! जब मैं और तुम रात कहीं गुम हो गए थे । मैं पैदल चलता जा रहा था । तुम मुझे कहीं भी थकने नही दे रहे थे । पूरी रात मैं चला पैदल तुम्हारे साथ । और कोई इंसान नही था उस रात हमारे बीच । मैं केवल मौन चल रहा था । तुम्हारे ऊपर रहने वाले अनगिनत जीव जंतु जंगल की खूबसूरती को रात के अंधेरे में एंजॉय कर रहे थे । चांद कभी पेड़ो में छिपता तो कभी पहाड़ों में ।


पहाड़  तुम धरती का ही हिस्सा हो । मैं मानता हूं । पर ...

हमारे लोग तुम्हारे भीतर सीमेंट और लोहा भर दे रहे हैं । तुम्हारा प्राकृतिक आनंद जा रहा है । मुझे डर है । कहीं तुम सूख तो नही रहे हो । 

तुम्हारा सूखना , मतलब दरकना और दरकना मतलब तबाही । देखो ना ! तुम्हे मै डरा हुआ सा महसूस हो सकता हूं । मैं वाकई हूं । तुम्हारी फिक्र भी है मुझे । पर मैं क्या कर सकता हूं । मैं कोई सरकार नही । 

मैं कोई क्रांतिकारी नही , मैं कोई इतनी बड़ी ताकत नहीं जो तुम्हारे साथ हो रहे दुर्व्यवहार को मैं खत्म कर सकूं ।लेकिन हां ! वो लोग सब  मेरे जैसे ही हैं । 

मैं नहीं आया बहुत साल से तेरे पास । गुस्सा आता था मुझे । तुम्हारे ऊपर हो रहे अतिक्रमण और जोर जबरदस्ती को देख कर । कितने साल हो गए ! तुमसे मिले हुए । दस साल से शायद । अब तो सब और बदल गया होगा । कुछ नई हवाएं , घनघोर विकास की हवाएं चली हैं इधर । उनका तुम पर क्या असर पड़ रहा होगा । इस बात को तुम बताते भी नही ।

तुम मेरी तरह खत नही लिख सकते । अनपढ़ कहीं के ! बुद्धू ! लोग ठीक ही कहते हैं जो बड़ा होता है उसका दिमाग पैरों में आ जाता है । 

मैं तुम्हारी जगह होता । तो एक बार में करवट बदलता । बस सब झील झांझर जमीन में या नदियों में । किसी नुकसान का ठेका न लिया होता । 

मेरे साहसी पहाड़ , अपना ख्याल रखो । रख पाओ जैसे रख पाओ । हमारी चिंताएं करनी छोड़ो ।

हम तो चीटियां हैं । अपना काम करते रहते हैं । हमारे पास हेलीकॉप्टर है , हमारे पास बारूद है । हमारे पास रॉकेट है परमाणु है । वैसे हमारी तादात इतनी है कि 8 से 10 हजार लोग एकसाथ न रहे । तो कोई फर्क नहीं । हम जब किसी हादसे से बच जाते हैं । तो हमें लगता है । हम खुदा हो गए हैं । सोचता हूं इस खत के तुरंत बाद या थोड़े समय के बाद । मैं आ पाऊं तुमसे मिलने ! मुझे स्वीकार तो करोगे ना । मैं दबे पांव आऊंगा तुम्हारे पास । तुम्हारी ओट में कहीं शरण पाऊंगा । और कुछ दिन गुजारूंगा तुम्हारे साथ , बिना तुम्हे सताए । 

मैं तुम्हारे शिखरों पर विराजमान देवताओं से तुम्हारी रक्षा का आवाहन करता हूं । तुम्हारे शिखाओ पर शोभायमान समस्त देवियों से प्रार्थना करता हूं । कि तुम्हे हमारे प्रकोप से बचाए । 

प्रिय पहाड़ , अपनी नदियों को संभाल के रखना । मैं आता हूं जल्द तुम से मिलने।  


तुम्हारा 

मैं !


गुरुवार, 25 जुलाई 2024

आवारगी बेईमान !


एक दम निपट खाली 

आवारगी अपना चेहरा

बना लेती है सोंठ

की तरह 


आवारगी मोल लेती है 

अपना , अपनों के 

तीष्ण बाणों से 

सवालों से घिरी रहती 

पता पा लेने वालों से 

पता पूछती है 

गुमशुदा लोगों से 


विदा का खेल है

आना जाना और गुम 

रास्तों को भूलना 

बिना कोई ठेस पहुंचाए

निकलना कोई धोखा नही 


आवारगी धाम है मेरा

आवारा सड़कों पर 

निगाह ढूंढती है आवारा 

जंगली का ताज लिए 

घूमता हूं भटक जाने तक


काम से निकले काम 

की राह भटक जाना

गुण है शायद 

आवारगी का


घर में चावल , चीनी

लाने भेजा जाता है 

भटक कर झील की

राह आंखों में तैरते

सपने सुकून से देखता हूं 


रोज रोज भटकने का

मन करता जरूर है 

पर जाऊं कहां 

कितनी दूर , कितने समय को 

जाऊं , छूट जाए दिनचर्या

का भाव , बह जाएं

छूट जाने के दुःख 


सब कुछ हासिल करने

की ज़िद और आरामतलबी 

कभी न कभी छीन लेती है 

गतिशीलता के गुणधर्म को 


उम्र पर चढ़ती झाइयां 

राशन से निकलती नही


अटक जाते हैं हम

एक मकान , एक परिवार

एक जिंदगी 

के फेर में

देहरी के उस पार

भटकती दुनिया दिखती है ।



शुक्रवार, 19 जुलाई 2024

.....क्रमशः फिर वही चंडीगढ़ !

 


आधी रात बीत चुकी है । फिल्म के कंप्लीट करने का डेडलाइन मुंह बाए खड़ा है । बॉस काम को समय से पूरा करने की तसल्ली , अपने बॉस को दे रहे हैं । मैं जहां हूं , वहां से बहुत दूर हूं । दूरी होने की वजह से काम की चिंता तो दिन रात हावी है । पर काम की चाल लगभग शून्य पर अटक गई है । फिल्म का एडिटर दिल्ली में है । जो कहीं फूल टाइम जॉब करता है । फिल्म के डायरेक्टर साहब मुंबई में हैं । वो किसी जरूरी काम से हैं वहां । हमारे क्लाइंट दिल्ली और चंडीगढ़ में हैं । उनके पास हमारे जैसे कई लोग हैं देखने सुनने को । उनको काम चाहिए । हमारी व्यस्तताओं की कहानी नही । 

  पिछले कुछ दिनों से मैने हिंदी की 20 फिल्मों के लिए करेक्शन कई जगह , कई बार लिखे । डायरेक्टर साहेब की नसीहतों के नक्श ए कदम पर मैं चले जा रहा था । मेरे पास लैपटॉप या कंप्यूटर नही है । लिहाजा सारे काम फोन पर ही होते हैं । फोन पर स्क्रिप्ट लिखना । फोन पर कंटेंट रिव्यू करना , मिसिंग को ढूंढना फोन पर । बीस फिल्मों के कंटेंट को कई बार डाउनलोड करना , उनके साथ खेलना बहुत मुश्किल हो जाता है । और उबाऊ भी ।

  एडिटर जब जब करेक्शन की लिस्ट देखता है । तो भड़क जाता है । फिल्मों की एडिटिंग , कलर ग्रेडिंग , रिव्यू और अपीयरेंस को परखने के लिए हर बार आउटपुट निकाल कर लो रेज फाइल ग्रुप में डालना । प्रोजेक्ट को खोलने बंद करने में लगभग आधा घंटे का समय लग जाता है । ऊपर से इतनी बाधाएं । चंडीगढ़ चैप्टर का पहला फेज खत्म होने के बाद उसने चैन की सांस ली थी । कि अब वो इत्मीनान से शादी कर पाएगा । की भी । 

     पर कुछ ही महीने के भीतर इस प्रोजेक्ट का दूसरा फेज चालू हो गया । बड़े ही मायूसी भरे शब्दों में एडिटर साहब ने बातों ही बातों में बताया कि उन्हें इस काम के लिए कुछ भी नही मिला है । उन्हें मांगना अच्छा नहीं लगता । हमारी टीम में अधिकतर लोग ऐसे ही थे । जिन्हे मांगना अच्छा नहीं लगता । 

   पहली नजर में काम की पेचीदगी समझ नही आई । फिल्में अपने खांचों में फिट थी । बस थोड़ा नया अपडेट करना था । पर क्लाइंट को चाहिए था सब कुछ नए कलेवर में । इस काम को पूरा करने के लिए । हमारी टीम ने सोचा था कि कुछ दिनों के लिए चंडीगढ़ जा कर कुछ सीन्स , इंटरव्यू और प्रोफाइल शूट किए जाएंगे । पर ऐसा संभव नहीं हो सका । समयाभाव या धनाभाव कुछ तो जरूर रहा होगा । मुझे रह रह कर अपने इधर कही जाने वाली कहावत " थूक में सतुआ सानना" रह रह कर याद आ रहा था । 

इस पूरे काम के पहले चरण में जो दुश्वारियां मैने झेली थी । उनका असर मेरे दिल ओ दिमाग में गहरा था । मुझे चंडीगढ़ के नाम से नफरत होने लगी । मैने यह बात सिवाय अपने डायरेक्टर के किसी से नहीं साझा की । काम की भसड़ का पैमाना बहुत जटिल होता जा रहा था । और उस समय बॉस से हर्जा खर्चा तक की बात न हो पाना । मेरे लिए जग हंसाई का सबब बन सकता था । लगातार 20 दिनों तक कुछ घंटे की नींद । और जबरदस्त तनाव , दबाव में काम । हमारे बॉस का मानना था । कि यह पूरा प्रोजेक्ट मेरे लिए फिल्म स्कूल है । यह सब मेरे लिए पहली बार हो रहा था । 

ऐसा भी नहीं था । कि मेरे द्वारा कोई इतिहास रचा जा रहा हो । 

कुछ न कुछ तो लगातार मन में कचोट रहा था । कम संसाधनों में काम को पूरा करना , गिरी से गिरी स्थिति में काम को करने का मोटिवेशन हमारे बॉस का शगल है । वो अक्सर भविष्य के दिवा स्वप्न दिखा कर वर्तमान को पार कर जाते । और उनकी नांव में हम सब भी । 


  

बच्चों को उड़ने दो ..

 उड़ने दो , उड़ने दो  बच्चों को उड़ने दो ... गर नाक अटक जाए  तो भी तो  उड़ने दो ..   जिस ऊर्जा का  संचार प्रवाह  हो उद्दंड  उसको भी  उड़ने दो  कह...