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गुरुवार, 4 जुलाई 2024

मैं कौन ?



दुख के संजीदा लम्हों में 

मैने दुखते हृदय बुहारे 

मेरी इन सांसों का कर्जा

जाने कौन उतारे 


मैं हूं 

मैं ही हूं 

मेरा सब कुछ 

मैं ही हूं 

मुझसे मुझमें पूछे कौन 

कौन डुबाए कौन उबारे ...


इस अवसर के उस अक्सर को

मोह दिया सब त्याग

मणि कर्णिका के घाटों का 

अब पानी कौन उतारे 


उतराता मैं इतराता

जानू ज्ञान गंगा के घाट 

बसी अजोध्या जी जू में

राह बिसूरे राम के ठाठ 

मुझसे मेरा ब्रम्ह भ्रमण 

नयना क्यों दुखियारे 


मैं हूं 

मैं की इति हूं

अतिरेक का दर्पण हूं 

मुझसे मेरा मैं मूर्छित कर 

मुझको दिखा दिया रे ....


बुधवार, 12 जून 2024

बधाई हो बल्ला !




बल्ला और उसका 8 लोगों का परिवार हमेशा हमेशा के लिए सो गया । बल्ला बधाई के पलों में लोगों के घर ढोलक बजाता था । कभी कभी गाय , भैंस बकरियों के गर्भधारण करवा करवाता था । कभी मल्लावां के आतताई बंदरों को मोहल्ले से भगाने के लिए लंगूर घुमाता था । 
उसकी पत्नी , बच्चे , बिटिया दामाद रोज की तरह बीती रात सड़क किनारे झोपड़े के बाहर सो रहे थे । तभी उसकी झोपड़ी के सामने सड़क पर ब्रेकर से लहराता हुआ बालू भरा ट्रक उनकी चारपाइयों पर फट पड़ता है । बल्ला और उसके परिवार के 8 लोग मौके पर ही दम तोड देते हैं । उसके परिवार की एक दुधमुही बच्ची बची है  केवल । 
सुबह सरकारी अस्पताल से लेकर घटना स्थल तक सैकड़ों की तादात में बल्ला की नट बिरादरी के लोग मातम मना रहे हैं । 
बल्ला की झोपड़ी के सामने गंगा की रेत के ढेर पर बल्ला का कुत्ता सुस्त बैठा है । 
बल्ला को जानने वाले लोग उसकी तारीफ में कसीदे पढ़ते हैं । बल्ला ने आम नागरिकों से ज्यादा बधाई ली हैं और दी हैं । 
बल्ला जैसे सैकड़ों बल्ला बिना जमीन जायदाद के सड़क किनारे डेरा डाले रहते हैं । वो यहां तीन पीढ़ियों से रह रहे हैं । सरकारें बनती हैं , बिगड़ती हैं ।  बल्ला की बिरादरी पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ता । 
उनके पास जमीनें नहीं हैं । इसलिए प्रधानमंत्री आवास भी नहीं हैं । और न ही अन्य बुनियादी सुविधाएं । 
 सड़क किसी के बाप की नही होती । इसलिए बल्ला की बिरादरी के लिए सड़क का किनारा सबसे सुरक्षित होता है । कोई रोक टोक नही । 
सड़क और यातायात व्यवस्था का तो क्या ही कहना । बरसात में मौरंग , बालू के ठेके बंद होने से पहले मौरंग बालू का स्टॉक किया जाता है ।जिससे कि बरसात में लोगों के घर बनना बंद न हों । 
ओवरलोडेड ट्रक को सारे नाकों से कुछ लेन देन कर के पास कर ही दिया जाता है। 
 बल्ला और उसका परिवार हमेशा के लिए सो गया । अब उसे घर न होने का कभी मलाल नहीं होगा ।
बल्ला के परिवार के लिए जनप्रतिनिधियों की शोक संवेदनाएं सोशियल मीडिया पर प्रेषित हो रही हैं । पुलिस हादसे की विवेचना कर रही है । जिले के आला अधिकारी सायरन बजा बजा के घटना स्थल पर आ रहे हैं ।

शुक्रवार, 7 जून 2024

वो जो खिड़की है न !

 


वो जो खिड़की है न 

फ्रेम है तुम्हारी सुबहों का 


बाहर से भीतर झांकती

रोशनी तुम्हारे कदमों को

चूमती हुई तुम्हारी आंखों

में चमक कर खुलती है 


एक कोमल सहज स्पर्श

बदन पर पसर जाता है 

खिड़की पर छापे सा 

बोगेनवेलिया तुम्हे निहारता है


2.

एक खिड़की जागती

अल सुबह मदमस्त झूमती

सिरहाने भोर की दस्तक देती

पसर जाती अलसाई देह पर


दुनिया की तीक्ष्ण , तेज़ 

हवाओं से कुम्हलाए मन को

साधती , सहलाती नेह से

भरती आंखों में नई उम्मीद


खुलती बंद होती 

कमरे की खिड़की 

मन की खिड़की 

से खुलती है 


खिड़की का खुलना

बंद होना दर असल 

मन का होना होता है !


गुरुवार, 15 फ़रवरी 2024

मैं आ रहा हूं ... #imamdasta

 


जो सिनेमा हमारे नज़दीक के थिएटर या ओ टी टी प्लेटफार्म पर पहुंचता है । वह हम दर्शकों को तश्तरी में परसा हुआ मिलता है । 150 से लेकर 600 रुपए के टिकट के साथ एक फिल्म हमारे सामने बड़े - छोटे परदे पर सजी होती है । पॉपकॉर्न के साथ फिल्म हमारे मानस पटल पर कुछ देर रहती है । और फिल्म के उतरते ही खत्म ! 

फिल्म कैसे लिखी गई , कैसे शूट हुई , कैसे पोस्ट प्रोडक्शन हुआ , कैसे डिस्ट्रीब्यूट हुई । इन सब का ब्योरा चल चित्र पर दे पाना संभव नहीं होता । फिल्म के शुरुआत और आखीर में जो नाम स्क्रीन के ऊपर की ओर स्क्रॉल होते नज़र आते हैं । वो आधे भर होते हैं । 

पूरी फिल्म को मूर्त रूप देने में कई गुमनाम लोग भी होते हैं । उनमें से आधे से ज्यादा लोग शायद फिल्म को देख भी न पाते हों । 

तश्तरी का पहला निवाला ऐसे लोगों के लिए होना चाहिए । पर अर्थ तंत्र पर घूमता सिनेमा स्याह सुफैद परदे पर ही दिखाता है । परदा जो टिकट से खुलता है । 

एक फीचर फिल्म आने को है । नाम है #imamdasta । 2 घण्टे 20 मिनट की फिल्म लखनऊ और देश के कई सिनेमा घरों  में गरज के साथ छींटे की तरह आने को तैयार है । 

फिल्म के राइटर ,  डायरेक्टर , प्रोड्यूसर  Rizwan Siddiqui कई रातों से सोए नही है । उनकी पहली डेब्यू फिल्म जो ठहरी । 

 फिल्म के कास्ट Saharsh Kumar Shukla Jay Amice Raju Pandey Rakesh Sharma Lal Mani  Ambrish Bobby आदि इत्यादि टकटकी लगाए फिल्म के आने की खुनकी महसूस कर रहे होंगे । 

बहुत सारे नाम हैं जो ऐसे समय पर याद नहीं आते । वो कहीं न कहीं कोई न कोई फिल्म बुन रहे होंगे ।

 मैं एक फिल्म देखना चाहता था करीब से । मैं शूटिंग के शुरू होने के पहले दिन से ही इस फिल्म के साथ जुड़ा हूं ।

 मैं मुंबई से उस लखनऊ में आया हूं । जो मुंबई हो जाना  चाहता है । मैं उत्तराखंड से मुंबई होते हुए लखनऊ आया हूं । मैं बिहार से मुंबई होते हुए लखनऊ आया हूं ।

 मेरा नाम पिंटू हो सकता है । मेरा नाम रज्जन हो सकता है ।

 मैंने देखा है इस फिल्म को बनते हुए । मैने सही है । लखनऊ के बीहड़ में 47 डिग्री तपिश । और झड़ी लगी बरसात से सुबकती पुरानी हवेली की चिपचिपाहट को मैने महसूस किया है । मैने देखा है तंगहाली में बिरयानी से कद्दू पूड़ी का सफर । मैने जिया है एक सख्त दौर चन्द दिनों में । जो कहीं नहीं दिखेगा सुनहरे परदे पर । 

मेरे लिए सिनेमा एक काम है । जरिया है रोजी रोटी का । दिन और रात , गोरी मेम , माचो सर का तिलिस्म पहले पहल सुनहला लगा था । स्त्री पुरुष की नजदीकियां मुझे अब हैरान नही करती । 

पर मैं देखना चाहता हूं । बगैर स्क्रिप्ट पढ़े , मैं महसूस करना चाहता हूं अपनी मेहनत को । महसूस करना चाहता हूं । जब सीन बन रहे थे । तो पीछे खड़ा था कुछ न कुछ काम कर रहा था । पानी ला रहा था । खाना दे रहा था । कुछ न कुछ सिल रहा था ।  बड़े बड़े भारी उपकरणों को दिन में कई बार इधर से उधर रख रहा था ।   प्रोड्यूसर , डायरेक्टर , डिस्ट्रीब्यूटर , प्रोडक्शन , सिनेमा हॉल के पहली तीन पंक्ति को छोड़ सारी पंक्तियों में में हूं । मुझे मालूम है ये फिल्मी दुनिया की हर चीज़ बहुत कीमती होती है । 

मैं आ रहा हूं । अपनी फिल्म देखने । जिसमें मेरा नाम नही होगा । नाम नही होने से एक दर्शक का दर्जा पाक साफ रहता है  । एक दिन की दिहाड़ी का हरजा मुझे अखर नही रहा है । मैं सिनेमा घर की सबसे आगे या सबसे पीछे वाली पंक्ति पर बैठा मिलूंगा । आप आ रहे हैं न ? मुझसे मिलने ?

शुक्रवार, 1 दिसंबर 2023

WOK !

 


हाय ! 

हेल्लो ! ( लड़के ने अभीवादन स्वीकारते हुए एक मुस्कान से बात खत्म करने की कोशिश की  ) 


लड़की ने सर झुका सिगरेट को कस के उंगलियों के बीच में दबाया। और कान में लगे इयर फोन्स को सुनने लगी । 

सामने के सोफे पर लड़का भी न जाने किस धुन पर पैर हिलाता रहा । 


धीरे धीरे शेयर इन कैफे में लड़कों की आमद बढ़ती रही । 

लड़की बिंदास कश पर कश लगाए उन नयन बंकुड़ो को इग्नोर करती रही । 

शेयर इन कैफे का नाम तो शेयर से ही पड़ा हो शायद । पर छोटे शहर के कैफे की क्षमता किसी लड़की को सोफे पर लड़कों की तरह सुट्टा मारते देखने की अभी नई पनपी थी । 

व्हेयर आर यू फ्रॉम ? लड़की ने सामने बैठे लड़के से पूछा । 

लड़के ने जवाब दिया । हेयर ओनली । 

दोनों एक दूसरे के सामने बैठे मूक अपने अपने आखरी कश तक चुप बैठे रहे । सिगरेट के खत्म होने के कुछ और सेकंड के बाद लड़का उठता है । और लड़की की उठती नजरों से तालमेल बिठा कर । इशारों में पूछता है !

लड़की एक उंगली उठा कर इशारा करके वन मोर की लिप्स रीडिंग करती है । 

लड़का बिना पूछे । अपने ब्रांड की सिगरेट ला कर लड़की की ओर बढ़ा देता है । और लाइटर से उसके होंठ में दब चुकी सिगरेट को जलाने झुक जाता है । उसकी जला कर । अपने सोफे में बैठ जाता है । 

कुछ एक कश के बाद दोनों के बीच बिना किसी आधार के संवाद शुरू हो जाता है।  

उस शाम की आखरी सिगरेट को खत्म होते होते । दोनों एक दूसरे का नाम , काम और कॉन्टैक्ट नंबर शेयर कर चुके थे । उन्हें याद रहा किस तरह कुछ लड़के कैसे घेर के तेज तेज बातें करने लगे थे । 


दोनों अपने अपने रास्ते घर को चल दिए थे । दूसरे दिन शाम को लगभग उतने ही समय दोनों फिर शेयर इन में होते हैं । दोनों की सिगरेटों के साथ लड़की कुछ कुछ गाली के साथ खुलती है । जैसे उसके भीतर से किसी ने तेज़ाब उड़ेल दिया हो । वो खुल के रोती रही उन दो सिगरेट के बीच । 

छोटे शहर के संस्कार उसे जीने नही दे रहे थे । और बड़े शहरों का ताप उसे बर्दास्त नही हो रहा था । 

उसे वाकई शेयर इन के लम्हे भावुक कर रहे थे । जैसे उस शहर में उसे कोई सुनने वाला ही न बचा हो पीछे। 

लड़का सतर्क रहता । वो पहले भी ऐसी कई जिंदगियों में प्रवेश कर चुका था । जहां से निकलने का रास्ता सिर्फ किसी एक के लिए होता है । दूसरा डूब ही जाता है । 

  दोनों के बीच संदेशों का आदान प्रदान चलता रहता है । लड़की मास कॉम की छात्रा है । और शहर की ऊट पतंग जिंदगी से आज़ीज़ आ कर इस तरफ रुख की थी ।और लड़का अधेड़ उम्र का शादी शुदा बच्चे वाला । इन तथ्यों को उजागर होने की गुंजाइश दोनों ने नही छोड़ी थी । दोनों के व्यक्तिगत जीवन में क्या चल रहा है । इन बातों से इतर लिखने लिखाने की बातें होती रही । 

    लड़की को लिखने की जरूरत लड़के को जरूर महसूस होती । वो बार बार लड़की से जीवन की पहेलियों को लिखने के लिए बोलता । एक दिन लड़की ने कुछ अंग्रेजी में लिख कर भेजा था । " वोक " । इस शब्द के अर्थ और उसके नीचे लिखी पंक्तियां लड़के के समझ से बाहर थी । लड़के को अंग्रेजी बहुत कम आती थी । पढ़ने की कई बार कोशिश की । पर उस लिखे का अर्क समझ आ गया था उसको । उसने कुछ आखरी पंक्तियों पर टिप्पणी कर जता दिया कि उसने पढ़ा है । 

लड़के को पढ़ना एक दम पसंद नही था । पढ़ने से चीजें गहरे उतरती हैं । और चोट करती हैं । पर लिखने से ? 


इस पढ़ने लिखने के चक्कर में दोनों बात करने के मौके तलाशते । कभी कभी सिगरेट या लड़की को भाषा में ड्रैग पर भी चर्चा होती । दोनों ने शेयर इन कैफे जाना छोड़ दिया था । 

लड़की की गाली से भरी बातें , सिगरेट का हक से सिगरेट पीना और दुनियादारी की परवाह न करना । लड़के को भाता था । लड़की को उसको उकसाने वाला चाहिए था । जो उसको उस ज़िंदगी से बाहर निकालने के लिए झकझोर दे।  


वो बताती थी । उसके घर वालों ने उसका निकलना बंद कर दिया है । और तमाम सारी बंदिशें थोप दी गई उसके ऊपर । लड़की के इर्द गिर्द पुरुषों का समाज ऐसे ही दिखता था । लड़कों के व्यवहार में लड़कियां अच्छी नहीं लगती । फिर भी वह बाहर निकलती है । जिमजाती है । और दिन प्रतिदिन प्रतिरोध जताती । 


क्रमशः ....

बच्चों को उड़ने दो ..

 उड़ने दो , उड़ने दो  बच्चों को उड़ने दो ... गर नाक अटक जाए  तो भी तो  उड़ने दो ..   जिस ऊर्जा का  संचार प्रवाह  हो उद्दंड  उसको भी  उड़ने दो  कह...