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बुधवार, 24 जून 2015
बाज़ार में कुछ नयी सरकारी भर्तियाँ आने वाली हैं , दबे पाँव .... सूचना देने वाले ने कहा है कि किसी को कानों कान खबर नहीं होनी चाहिए, वरना हल्ला मच जायेगा. पिछले कई मामले हो-हल्ला के कारण खटाई में पड़ गए थे ..... एक काम करवाने वाले से संपर्क हुआ है, कहता है “ मामला पक्का है, ज्यादा लोगों को मत बताना, केवल सगे सम्बन्धियों के लिए केस हाँथ में लेता हूँ”..... सुनो बेटा, फिर कह रहा हूँ ऐसे मौके बार बार नहीं आते, तुम बस फ़ार्म भर दो, बाकी का सब वो देख लेगा.......जी पापा....लेकिन पैसे ?..
मंगलवार, 12 मई 2015
अज्ञात !
एक तपती दोपहरी में खेत में काम कर बूढा किसान चिल्लाता है “अरे सुनो क्या कर रही हो वहाँ ?.... कुछ छड बाद वो खेत के दुसरे छोर की तरफ तेज़ी से भागता है, दुसरे छोर पर पहुच एकदम से खड़ा हो जाता है, तेज़ आंधी की तरह ट्रेन पटरी से गुजरती है, कुछ देर पहले मुहं से लेकर पाँव तक साडी से ढकी एक आकृति अचानक ट्रेन के साथ उसी वेग से उड़ने लगती है.. उस आकृति की हरी साडी मानो ट्रेन को बिना रुके दौड़ने को कह रही हो, किसान पत्थर हो जाता है, लेकिन उसकी आँखे, ह्रदय उस हरी साडी का दूर तक पीछाकरती हैं, अचानक वह पत्थर से मोम हो जाता है... फिर वह अपने घर की तरफ उसी रफ़्तार से दौड़ने लगता है, घर में चौके में बैठी अपनी सयानी बेटी से जा लिपटता है उसका शरीर काँप रहा है उसका खून पटरियों पर पड़ा सुख रहा है...और ह्रदय गति ट्रेन का पीछा कर रही है.... पड़ोस के ही किसी घर में भी मातम जैसा माहौल है....शाम को सूचना पाकर दरयाफ्त के लिए निकटवर्ती थाने की पुलिस गाँव में आती है, पुलिस को न ही किसी के गुमशुदा होने की और न ही किसी क्षति के सुबूत मिलते हैं... पुलिस वापस चली जाती है...देर शाम पास के ही सीमा रहित रेल फाटक पर बने केबिन में अज्ञात के ट्रेन के निचे आने का मेमो भरा जाता है....
एक तपती दोपहरी में खेत में काम कर बूढा किसान चिल्लाता है “अरे सुनो क्या कर रही हो वहाँ ?.... कुछ छड बाद वो खेत के दुसरे छोर की तरफ तेज़ी से भागता है, दुसरे छोर पर पहुच एकदम से खड़ा हो जाता है, तेज़ आंधी की तरह ट्रेन पटरी से गुजरती है, कुछ देर पहले मुहं से लेकर पाँव तक साडी से ढकी एक आकृति अचानक ट्रेन के साथ उसी वेग से उड़ने लगती है.. उस आकृति की हरी साडी मानो ट्रेन को बिना रुके दौड़ने को कह रही हो, किसान पत्थर हो जाता है, लेकिन उसकी आँखे, ह्रदय उस हरी साडी का दूर तक पीछाकरती हैं, अचानक वह पत्थर से मोम हो जाता है... फिर वह अपने घर की तरफ उसी रफ़्तार से दौड़ने लगता है, घर में चौके में बैठी अपनी सयानी बेटी से जा लिपटता है उसका शरीर काँप रहा है उसका खून पटरियों पर पड़ा सुख रहा है...और ह्रदय गति ट्रेन का पीछा कर रही है.... पड़ोस के ही किसी घर में भी मातम जैसा माहौल है....शाम को सूचना पाकर दरयाफ्त के लिए निकटवर्ती थाने की पुलिस गाँव में आती है, पुलिस को न ही किसी के गुमशुदा होने की और न ही किसी क्षति के सुबूत मिलते हैं... पुलिस वापस चली जाती है...देर शाम पास के ही सीमा रहित रेल फाटक पर बने केबिन में अज्ञात के ट्रेन के निचे आने का मेमो भरा जाता है....
रविवार, 12 अप्रैल 2015
खेत नहीं उम्मीदों के आसमान बोये थे
घर के चूल्हे से कुछ राख बचा कर
बच्चों की भूख के निवाले चुरा कर
छप्पर से टपकती ओस ओढ़ कर
सर्द सुबहों की कातिल बाहें मरोड़ कर
मैंने
खेत नहीं, उम्मीदों के आसमान बोये थे
बच्चों की भूख के निवाले चुरा कर
छप्पर से टपकती ओस ओढ़ कर
सर्द सुबहों की कातिल बाहें मरोड़ कर
मैंने
खेत नहीं, उम्मीदों के आसमान बोये थे
देह पर उम्र की सिलवटें गोद कर
पसीने की शक्ल में लहू निचोड़ कर
खोखली हड्डियों से पत्थरों को तोड़ कर
ख्वाहिशों को कहीं हाशिये पर छोड़ कर
मैंने
खेत नहीं, भरे पेट के इन्तेजाम बोये थे
पसीने की शक्ल में लहू निचोड़ कर
खोखली हड्डियों से पत्थरों को तोड़ कर
ख्वाहिशों को कहीं हाशिये पर छोड़ कर
मैंने
खेत नहीं, भरे पेट के इन्तेजाम बोये थे
बच्चों की अच्छी पढाई देख कर
बिटिया की मेहँदी की रचाई देख कर
पत्नी की बिमारी की पीड देख कर
परिवार की बेहतर भलाई देख कर
मैंने
खेत नहीं, जीवन से भरे सपने बोये थे
बिटिया की मेहँदी की रचाई देख कर
पत्नी की बिमारी की पीड देख कर
परिवार की बेहतर भलाई देख कर
मैंने
खेत नहीं, जीवन से भरे सपने बोये थे
बेमौसम मौसम का कहर देख कर
कच्ची फसल की टूटी कमर देख कर
मिटटी से मिलते लहू का मंजर देख कर
उम्मीदों के आसमान का बंजर देख कर
मैंने
खेत नहीं, आंसुओं के समंदर बोये थे
कच्ची फसल की टूटी कमर देख कर
मिटटी से मिलते लहू का मंजर देख कर
उम्मीदों के आसमान का बंजर देख कर
मैंने
खेत नहीं, आंसुओं के समंदर बोये थे
थमती साँसों पर मुआवजे के दाने देख कर
बिलखती दरों पर सफ़ेद पोशाक देख कर
सन्नाटों को चीरती रफ़्तार देख कर
गर्दनों से रस्सियों के निशान देख कर
मैंने
खेत नहीं, मौतों के बीज बोये थे
खेत नहीं उम्मीदों के आसमान बोये थे
बिलखती दरों पर सफ़ेद पोशाक देख कर
सन्नाटों को चीरती रफ़्तार देख कर
गर्दनों से रस्सियों के निशान देख कर
मैंने
खेत नहीं, मौतों के बीज बोये थे
खेत नहीं उम्मीदों के आसमान बोये थे
उत्तर भारत में बेमौसम बरसात से चौपट हुयी फसलों से आहत किसान का दर्द
गुरुवार, 9 अप्रैल 2015
मैं अपित्र हूँ
न
मत छुओ मुझे !
हो सके तो
मेरी परछाहीं से भी
नफरत करो
मैं अछूत हूँ
अपवित्र हूँ !
न जाने
किस धुन में
मैं तुम्हारे केंद्र से
छटक के दूर हो गया !
यहाँ सैकड़ों मील दूर
जब तुमको याद करके
आवाज देता हूँ
तो तुम्हारी नम आँखों में
रेगिस्तान की खरखरी
रेत दिखाई देती है !
मैं भटक गया हूँ
तुम्हारे विश्वास के हाइवे से
कोरे पन्नों पर लिखी
भविष्य की तदबीरों से !
उस राह पर घना पीपल का पेड़
और एक फूल
अब भी ताज़ा होंगे
यहाँ छल और विश्वासघात
के रेतीले बवंडर हैं
सूखी तपती रेत
शरीर की नमी को
सोख रही है !
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कौन हो तुम जो समय की खिड़की से झांक कर ओझल हो जाती हो तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारे ताज़ा निशान भीनी खुशबू और गुम हो जाने वाला पता महस...
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"चेतावनी - यह कहानी केवल वयस्क लोगों के लिए है । कहानी के कुछ प्रसंग एडल्ट की श्रेणी के हैं । कृपया बच्चे या किशोर इसे न पढ़ें । "...