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गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

मैं अपित्र हूँ 


मत छुओ मुझे !
हो सके तो
मेरी परछाहीं से भी
नफरत करो
मैं अछूत हूँ
अपवित्र हूँ !
न जाने
किस धुन में
मैं तुम्हारे केंद्र से
छटक के दूर हो गया !
यहाँ सैकड़ों मील दूर
जब तुमको याद करके
आवाज देता हूँ
तो तुम्हारी नम आँखों में
रेगिस्तान की खरखरी
रेत दिखाई देती है !
मैं भटक गया हूँ
तुम्हारे विश्वास के हाइवे से
कोरे पन्नों पर लिखी
भविष्य की तदबीरों से !
उस राह पर घना पीपल का पेड़
और एक फूल
अब भी ताज़ा होंगे
यहाँ छल और विश्वासघात
के रेतीले बवंडर हैं
सूखी तपती रेत
शरीर की नमी को
सोख रही है !

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