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सोमवार, 27 अक्टूबर 2025

आधा चुप आधा बुत !



काम का भूखा हूँ

पैसों से सूखा हूँ 

आधा चुप आधा बुत

घूमता फिरता हूँ मैं


बाज़ार में बेंचता अपना 

माल और हुनर 

इनसानियत की आड़ में 

बहुत कुछ दे आता उधार 

आधी बचत , आधी खपत 

से जिन्दगी जी रहा हूँ मैं 


खुश रहता हूँ मगर 

कभी कभी अकेले में 

दहाड़े मार हंसता भी हूँ 

कार के जमाने में बाइक पर 

झूमता , गीत गाता 

रो पड़ता हूँ मैं 


बाज़ार इतना चालू हो गया है 

अब कि उधार लिखा नहीं जाता 

व्यवहार लिखा जाता है 

रिश्तों में , नातों में 

बातों के ताने बाने में 

ठहरने की कोशिश में 

और गिर जाता हूँ मैं 


उठता गिरता संभालता 

पालता हूँ बीस का पेट 

पालना महंगा नहीं होता 

महंगी होती है उधारी 

मांगी नहीं जाती, बरती नहीं जाती 

बरतने की साध में 

सिर्फ 6 महीने जीने

की बात करता हूँ मैं 


बोलना और

अपने बोलने को सुनना 

की आदतों से घिरा 

आधा चुप आधा बुत 

बन जाता हूँ मैं !


 


शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2025

आओ पेट्रोल टंकी !


आओ  पेट्रोल टंकी !


बड़े बड़े चक्के जो घूमें 

बड़ी बड़ी मशीने घूमें 

घूमें सब बाज़ार 

आओ  

पेट्रोल टंकी .... 

आओ पेट्रोल टंकी ! 


तेल भरें हम दिन और रात 

कहने को होती बरसात 

टंकी कहती छोडो यार 

आओ 

पेट्रोल टंकी ! 

आओ पेट्रोल टंकी ! 


मोबिल, डीज़ल और पेट्रोल 

ग्रीस , यूरिया फुल कण्ट्रोल 

कूलैंट मारे ठंढी हिलौर 

आओ 

पेट्रोल टंकी

आओ पेट्रोल टंकी ! 


जय जवान है जय किसान 

तेल नहीं ये भारत की शान  

ये है भारत पेट्रोलियम 

आओ

पेट्रोल टंकी 

आओ पेट्रोल टंकी !  



रविवार, 28 सितंबर 2025

कोई है जो इन दिनों...

 


कोई है जो इन दिनों 

तितलियों के भेष में 

उड़ाती रंग पंखों से


कोई है जो इन दिनों

बारिशों के देश में

भिगाती अंग फाहों से


कोई है जो इन दिनों 

ख्वाहिशों के शेष में 

सताती संग यादों से 


कोई है जो इन दिनों 

कैसिनो के कैश में

जिताती चाल चालों से


कोई है जो इन दिनों

रोमियों के देश में

जगाती रात आंखों से


कोई नहीं है इन दिनों

पत्थरों के ठेस में 

भुला दी बात बातों से ।

मंगलवार, 16 सितंबर 2025

बारिश का वो दिन !


याद है तुम्हे ? 

बारिश का वो दिन !

पहाड़ की किसी सड़क पर 

बस स्टैंड हमें आश्रय देकर 

बचा रहा था , भीगने से 

हम भीगते तो क्या हो जाता 

ये हमें नहीं पता था 

बस स्टैंड को पता था 


शाम से रात होने को आई थी 

सड़क पर केवल बारिश झर रही थी 

तुम चिपक कर बैठी थी मुझसे 

सर टिका लिया था कंधे पर 

दो हाँथ लिपटे थे जैसे कोई बरसाती बेल 

अन्धेरा ढक चुका था हमें 

फरवरी की रात ताप बनकर 

चढ़ रही थी हम दोनों पर 

हमें इन्तजार था 

पर किसका , हमें नहीं पता था 


पहली बार तुम्हारे उंहू उंहू पर 

गुस्सा नहीं आ रहा था मुझे 

मेरे बार बार सिगरेट पीने

की तलब पर तुम चुप थी 


आधी रात तक हम हार चुके थे 

बारिश की जिद के सामने 

पर हमारी जिद का क्या 

न जाने देने की जिद 


हम दोनों हठी निकल चुके थे 

बारिश में भीगते , ठिठुरते 

उस ढलान वाले रास्ते पर 

ठहर जाने को किसी ठीहे पर 

पर हम ठहरे नहीं कहीं 

पार कर गए एक दूसरे को 


इससे पहले कई शामें 

कई बारिशें , कई यात्राएँ 

हमने साथ की थीं 

फोन पर घन्टों बतियाते 

कई बार कई बसें छोड़ी थी 

बस स्टैंड पर तुमने 

कई बार मैंने 

कि अगली बस से क्या पता 

हम में से कोई 

हमसफ़र हो लेता 

एक लम्बी यात्रा पर .  







 


शुक्रवार, 5 सितंबर 2025

मैं चुप होना चाहता हूँ .



आवाज़ देता हूँ 

तो कोई आवाज़ आती नहीं 

पलट कर मेरे पास 


आवाज़ ढूंढती  है मुझे 

और मेरे कानों को 

मैं छिपता फिरता 

भागता जा पहुचता हूँ 

कोलाहल में कहीं . 

सुनना नहीं चाहता 

अब और सबकी 

आवाजें 


बंद होने को है 

मेरी सुनवाई भी 

मैंने सुना नहीं खुद को 

या दुःख को एक दशक से 

अब चुप हो जाओ सब 

मैं  चुप होना चाहता हूँ . 

बच्चों को उड़ने दो ..

 उड़ने दो , उड़ने दो  बच्चों को उड़ने दो ... गर नाक अटक जाए  तो भी तो  उड़ने दो ..   जिस ऊर्जा का  संचार प्रवाह  हो उद्दंड  उसको भी  उड़ने दो  कह...