कुल पेज दृश्य

रविवार, 16 मार्च 2025

एअर फोर्स की होली


याद बहुत आती है मुझको

एयर फोर्स की अपनी होली

धूम मचाने जहां निकलती

 बिंदास बैचलर्स की टोली

याद बहुत आती है मुझको

एयर फोर्स की अपनी होली


मिश्रा भाभी का मीठी गुजिया से

मुंह मीठा करवाना

दही बड़े जो बड़े बड़े थे

गुप्ता जी के घर पर

हक जमाकर प्लेट उठाकर

झट से चट कर जाना

यादव सर का दुध का शर्बत

कहकर भांग पिलाना

इसी खुमारी में रेड्डी का

सी ओ संग भंगडा पाना

राव गारू की इडली चटनी

चौबे का लिट्टी चोखा

मलिक और राठी के घर पर

हर बार मिला जो धोखा

दिखा पकौड़े, डंडे कोड़े

मुहब्बत भरे खिलाना

पिल्लै सर का लिटिल लिटिल

कहकर हमें पिलाना

अहमद और जैकब का हैप्पी

होली कहकर गले लगाना

गुलाल लगाकर रफीक का

मेरे बदले ड्यूटी जाना

भूला कहां मैं शेखावत का

वो रजपूती बाणा

 बिना सुर के सांझ ढले तक

उसका राजस्थानी गाना


लगा एक कैंप नहीं

एक परिवार हैं हम

संग संग जीने का 

आधार हैं हम

एक इकाई, पड़ी दिखाई

भले संस्कृति रही 

सबकी अलग अलग

अलग अलग रही सबकी बोली

याद बहुत आती है मुझको

एयर फोर्स की अपनी होली

धूम मचाने जहां निकलती

बिंदास बैचलर्स की टोली.


वायु सेना की यादें,,,,,,,



प्रताप सिंह 

रि. वायु सैनिक 

भारतीय वायु सेना 

बुधवार, 5 मार्च 2025

चौधरी की दुनिया

 प्लॉट : 

भयंकर आर्थिक मंदी, बेरोजगारी और सामाजिक ताने बाने में उथल पुथल के चलते शहर का हैप्पीनेस इंडेक्स लगातार गिरता चला जा रहा है । 

पर कानपुर से लखनऊ आए एक अजीबो गरीब परिवार की आमद से लखनऊ का डालीगंज लहलहा उठता है । नौकरी , काम धंधे में कोई खास हासिल न होने के बावजूद भी चौधरी मेवालाल का परिवार खुशहाल जीवन जीने की कला जानता है । परिवार से ताल्लुक रखने वाले  लोगों के संसाधनों , सेवाओं का भरपूर लाभ लेकर बदले में खुशहाली का लॉलीपॉप थमा देना ही इस परिवार की उपलब्धि है । खिलखिलाहट और हंसी ठिठोली के भंवर में फंसे हुए लोग कुछ न कुछ पूजाने के बाद भी इस परिवार के प्रति कृतज्ञ रहते हैं । क्यों की खुशियां अनमोल होती हैं ....


कैरक्टर :

पिता : चौधरी मेवालाल

उम्र : 55 वर्ष

कानपुर से एक परिवार लखनऊ के डालीगंज में ट्रांसफर लेकर आता है । घर के मुखिया यानी चौधरी मेवालाल 55 साल के हैं । चौधरी मेवालाल काफी रंगीन मिजाज के हैं ।   उनका मानना है । जिंदगी कैसी भी हो पर हुलिया एक दम टीम टाम होना चाहिए । 

आंखों पर काला चश्मा , ऊपर से नीचे तक रंगीन परिधान , नए नए तरह के जूते चप्पल और रंग बिरंगे रुमाल उनकी शान में चार चांद लगाते हैं । कपड़े सस्ते होने चाहिए लेकिन वैरायटी खूब होनी चाहिए । ऐसा उनका मानना है । इसलिए हर हफ्ते उनके गेट अप में भारी बदलाव देखने को मिलता है । 

कभी स्पोर्ट्सवेयर , कभी फॉर्मल तो कभी कैजुअल आउटलुक में उनके साथ आए दिन कैजुअलिटी होती रहती है । 

उनके रहन सहन से उनके घरवालों और मोहल्ले वालों को हमेशा आपत्ति रहती है । आपत्तियों से उन्हें ऊर्जा मिलती है । 

बड़ा बेटा : शंकर लाल उर्फ सैंकी 

उम्र : 30 वर्ष

30 बसंत देख चुके बड़े बेटे सैंकी के सपने उनके पिता चौधरी मेवालाल से भी बड़े हैं । हर सुबह कुछ कर गुजरने की चाह रखने वाले सैंकी शाम आते आते ठंडे पड़ जाते हैं । नौकरी के नाम पर उन्होंने कई कॉल सेंटरों की खाक छान रखी है । इसलिए फ्रैंकनेस और स्टाइल दोनों से भरपूर हैं । आशिक मिजाज़ सैंकी के पास नए नवेले आइडिया की भरमार रहती है । तड़ से दोस्ती भड़ से जुगाड उन्हें परिवार का लाडला बनाए रखता है । 


छोटा बेटा : राधे लाल उर्फ रॉकी

उम्र:  24 वर्ष 

चौधरी मेवालाल के छोटे बेटे 24 वर्षीय रॉकी ट्रैवल एजेंट हैं । घर बैठे वो लोगों को देश दुनिया की सैर कराते हैं । उनकी किस्मत उनके काम का साथ कभी कभी दे पाती है । महीने के उनके खर्चे आमदनी से हर बार ऊपर शूट कर जाते हैं । इसलिए घर में रखे वॉलेट , हैंड बैग और पेंट की पॉकेट्स अक्सर साफ हो जाती हैं । इन हांथ की सफाई की घटनाओं में अधिकतर सैंकी को शक के घेरे में कैद कर लिया जाता है । 


सबसे छोटी बेटी : स्वाति उर्फ स्वीटी 

उम्र : 19 वर्ष 

मेवालाल की सबसे छोटी फूल सी बेटी स्वीटी Gen Z की पैदाइश हैं । 19 साल की उम्र में उनके खर्चे और नखरे उठाने के लिए कई नौकरीपेशा नव युवक आतुर रहते हैं । पिंक कलर की उनकी स्कूटी उनके पंख हैं । उनका फ्रेंड सर्कल उनके परिवार से बढ़ कर है । उनका सपना है एयर होस्टेस बनना । 


पत्नी : मनोरमा उर्फ मनु

उम्र : 50 वर्ष

मेवालाल जी की पत्नी होम मेकर के साथ साथ एम एल एम यानी मल्टी लेवल मार्केटिंग कंपनी में एमरल्ड प्लैनर हैं । उनके बिजनेस के तीन लेग्स उनके परिवार के सदस्यों के नाम से रजिस्टर्ड हैं । पिछले दस साल से वो घर के कामों से खाली समय में बिजनेस प्लान समझाती हैं । और डील क्रैक होने पर अपलाइन और डाउनलाइन की पार्टी करती हैं ।

हमेशा कंट्रास्ट आउटलाइन के साथ सुर्ख लाल , कभी चॉकलेटी लिपस्टिक के साथ अन्य मेकअप के सामान उनके चेहरे की चढ़ती उम्र छुपा ले जाती है । 

बेडौल शरीर पर नए जमाने के परिधान और अंग्रेजी की खिल्ली उड़ाती भाषा में बिजनेस प्रोडक्ट्स और बिजनेस की पिचिंग 

लोगों को गुदगुदाती है । 



एपिसोड 1. 

स्वागत है श्रीमान ...


8- 10 घरों की दौलत राम रेजिडेंसी के आस पास घनी बस्ती है । रेजिडेंसी के तीन गेट हैं । जिनके बाहर अक्सर बस्ती के कूड़े का ढेर जमा रहता है । रेजिडेंसी के पास थोक और फुटकर बाजार है। डालीगंज का मुख्य बाजार मंगल यानी साप्ताहिक बंदी को छोड़ खरीदारों से पटा रहता है।  

सोसायटी के भीतर और बाहर एकदम उलट माहौल रहता है । सोसाइटी के भीतर एक छोटा सा पार्क है । 

आज की सुबह दौलत राम रेजिडेंसी के लिए कुछ खास है । रेजिडेंट सोसाइटी के सभी गेट पर चूना पड़ा हुआ है । गेट पर वेलकम नोट के साथ हंसते हुए मेवालाल एंड फैमिली की बड़ी सी तस्वीर लटक रही है । वेलकम नोट पर लिखा है 

" करो जश्न की तैयारी 

आ रहे हैं सुविधाधारी " 

नगर निगम के सफाई कर्मचारी फुल ड्रेस में सोसाइटी की साफ सफाई में जुटे हुए हैं । जैसे कोई वी वी आई पी की विजिट हो । 

ढोल नगाड़े की आवाज सोसायटी में जैसे ही फूटती है । दौलत राम रेजिडेंसी के लोग छत से झांकने लगते हैं । तभी ढोल बाजे लेकर खुली जीप सोसायटी के बाहर हॉर्न बजाती है । सोसाइटी का चौकीदार गेट खोलता है । जीप के पीछे फूलों से सजी डी सी एम ट्रक है । और उसके पीछे एक कार भी ।

इस शानदार इंट्री से सोसायटी के लोग हक्का बक्का हुए जा रहे हैं । लोग आलीशान बंगलों की बालकनी से नाइट गाउन में सोसाइटी की बदली हवा को गौर से रहे हैं । 

सभी गाड़ियां सोसायटी के अंदर प्रवेश करती हैं । ढोल की  आवाज और ऊंची और थाप और तेज होने लगती है । 

काफिले की आखिरी वाली गाड़ी (कार ) से चौधरी मेवालाल और उनका परिवार उतरता है । चौधरी मेवालाल जगह पर ही खड़े होकर पूरी सोसायटी को गर्दन घुमाते हुए देखते हैं । 

नगर निगम के सफाई कर्मचारी नमस्ते बाबू जी कहते हुए मेवालाल के पास आते हैं । " बाबू जी ठेकेदार साहेब ने आप के आने की सूचना पहले ही दे दी थी । उनका सख्त आदेश था कि बड़े बाबू के स्वागत में सोसाइटी का चप्पा चप्पा साफ होना चाहिए । हम सब सुबह 4 बजे से लगे हैं । कैसी लगी सफाई व्यवस्था ? 

बहुत बढ़िया ! चौधरी साहब ने काला चश्मा उतारते हुए सफाई कर्मचारी से कहा । और जीप में बज रहे ढोल वालों को ढोल बंद करने का इशारा किया । सोसायटी की छतों पर और दरवाजों पर लोग बाहर निकल के इस स्वागत को देख रहे थे । और आपस में बातचीत करते हुए मुस्कुरा रहे हैं। 

अरे सुनो ! इधर आओ सब लोग । सारे सफाई कर्मचारी चौधरी साहब के पास आ जाते हैं । ठेकेदार ने सामान उतरवाने की भी बात बताई होगी तुम लोगों को । चौधरी ने बड़े रुतबे से कहा । 

जो साहब बताई थी । आप चिंता ना करें । आप लोग पार्क में आराम से बैठिए । हम सब लोग सामान उतरवा लेंगे । बस साहब ! हम लोग सुबह 3 बजे से लगे हैं । पेट में कुछ भी गया नहीं है । बस थोड़ा बहुत नाश्ते पानी का खर्चा पानी दे दीजिए । दो घंटे में सब सामान उतरवा देंगे हम सब । 

हां हां क्यों नहीं । चिंता मत करो चौधरी साहब किसी का हक नहीं मारते । चौधरी साहब की पत्नी सामने आकर सभी को आश्वासन देती हैं । 

चौधरी साहब का बड़ा बेटा सैंकी छोटे भाई के साथ सामने घर का दरवाजा खोलता है । सफाई कर्मचारी डीसीएम का डाला खोल कर खड़े हो जाते हैं । 

साहब कुछ नेग वगैरह न्योछावर कर देयो , फिर काम शुरू  किन जाए । 

हा हा हा ! चौधरी साहब ठहाके लगा कर हंसते हुए सफाई कर्मचारी के कंधे पर हांथ रखते हैं । और कहते हैं तुम लोग कर्म करो फल की चिंता मत करो । और हां ज़रा सम्भाल के उतारना । काफी कीमती और नाजुक चीजें भी हैं । कुछ टूट फूट हुई तो ठेकेदार को ही भरना पड़ेगा । 

यह कहते हुए चौधरी साहब पत्नी का हांथ पकड़ के घर की तरफ बढ़ चले । उनकी छोटी बेटी भी पीछे पीछे साथ हो ली । 

सफाई कर्मचारी पीठ पीछे बुरा भला बकते हुए सामान उतारते रहे । 

पुराना फ्रिज , पुराना वाशिंग मशीन , पुरानी ड्रेसिंग टेबल , पुरानी डायनिंग टेबल , दो स्टडी टेबल ,  तीन तख्त , पुराना स्कूटर और कई किचेन के नए पुराने सामान गठरियों में भरे हुए डी सी एम में लद कर आया है । चौधरी परिवार की एक एक चीज के उतरने और घर के मुख्य दरवाजे से अंदर जाते सामान पर चौधरी परिवार की पैनी नजर स्कैन करती रही।  


दो तीन घंटे की मशक्कत के बाद सारा सामान उतार लिया गया । घर के भीतर छोटे से लॉन में सारा सामान लगा कर  सारे कर्मचारी हांथ झाड़ते हुए चौधरी साहब से मुखातिब होते हैं । 

जी बाबूजी  ! उतर गया सब सामान । अब थोड़ा खर्चा पानी दे दीजिए । 

चौधरी साहब अपनी पत्नी से ...

अरे सुनती हो ... जरा इन लोगों का मुंह मीठा करवाओ । बड़ी मेहनत की है इन लोगों ने । 

चौधरी साहेब की पत्नी कानपुर मशहूर ठग्गू के लड्डू लेकर आती हैं । और सारे कर्मचारियों को एक एक कर के खिलाती हैं । चौधरी साहब की बिटिया जग से कर्मचारियों के चुल्लू में पानी भर भर पिलाती हैं । 

चौधरी साहेब दोनों लड़के डालीगंज बाजार से पुड़ी कचौड़ी और दही जलेबी का नाश्ता सब के सामने दोने में पत्तल में परोस के धर देते हैं । 

चौधरी साहब का पूरा परिवार कर्मचारियों के साथ नाश्ता करता है । 

तभी ढोल भांगड़े वाले भी घर के भीतर आते हैं।  और खाने पीने के उस दौर पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं ...

अरे साहेब हम लोगों को भूल गए क्या ! सुबह से हम सब भी ढोल बजा रहे हैं आप के स्वागत में । और आप हम लोगों को छोड़ कर यहां नाश्ता कर रहे हैं । 

चौधरी साहब : 

आप लोगों को कैसे भूल सकते हैं । हमने सोचा कि पहले इन लोगों को विदा कर फिर आप लोगों की खातिरदारी करते । खैर ! चौधरी साहब अपने बेटों से और नाश्ता लगाने की ओर इशारा करते हैं । 


चौधरी साहब बारी बारी से सभी का नाम पूछते हैं । और लखऊ की अब ओ हवा की खोज खबर करते हैं । 



शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2025

मैं गिद्ध हो चला हूं ...

 


पिछले 3 महीने में 4 प्रियजनों की आकस्मिक मृत्यु देख चुका हूं । आज जब किसी एक और प्रियजन के अंतिम संस्कार में मेहदी घाट पहुंचा । तो सन्न रह गया । सैकड़ों की संख्या में छोटे छोटे टीले दिखे । टीले 4 फुट से 6 फुट के । उनपर भगवा अथवा सफेद कपड़े ढके हुए । कुछ के उड़ के न जाने कहां गए । 

एक तरफ गंगा की धार को छूते आधा दर्जन अंतिम संस्कार की सराओं के झुंड थे । दूसरी तरफ कुछ फर्लांग गंगा की रेती की सफेद चादर पर सैकड़ों टीले , आकाश को निहार रहे थे । 

धूं धूं होते अपने प्रियजन की पीड़ा को पार करते इन टीलों के पास गया । और रिवर बेड पर मात्र दो फुट गहरे नीचे 3 फुट ऊंचे नए टीलों को बनते देखा । पूछा ! दफनाना , कब्र जैसे शब्दों का कोई अस्तित्व नहीं है हमारे धर्म में । फिर ऐसा क्यों । 

सफाई कर्मचारी से लेकर कुछ के परिजनों ने बताया । कि समाधि तब दी जाती है । जब कोई व्यक्ति अविवाहित मृत्यु को प्राप्त हुआ हो । हे ईश्वर .... यानी कि जो टीले हैं , वो बच्चों के हैं , किशोरों के हैं और सिर्फ अविवाहितों के हैं । मेरा शरीर उच्च ताप से जलने लगा । हृदय गति रुकने सी लगी । 

मैं उनकी समाधि के अस्तित्व में होने से अधिक उनकी संख्या से विचलित हो रहा था । मैं अपने प्रियजन की अंत्येष्टि क्रिया को बीच में छोड़ के वहां से निकल आया । 

मानसपटल पर छोटे छोटे टीले अबोध कोमल और ऊर्जा से भरे चेहरों की शक्ल लेने लगे जो मेरे आस पास हैं ।

अखबारों के पन्नों में , सड़कों पर , अस्पतालों में , घाटों पर  , विद्युत शवदाह गृहों पर मृत्यु मृत्यु और मृत्यु ! 

क्या कोई सांख्यिकीय बढ़ती मृत्यु दर पर नजर बनाए हुए या नहीं ! जन्म दर के सापेक्ष मृत्यु दर का संतुलन कहीं बिगड़ तो नहीं रहा ? 

ये मृत्यु की आकाश गंगा पंगु एवं लाचार स्वास्थ्य व्यवस्था के कारण है या किसी प्रकार की अराजकता मौन साधे जन समूह को लील रही है ! मुझे नहीं पता । किसी को पता है या नहीं , ये भी नहीं मालूम । 

आए दिन अपने आप पास नए अस्पतालों को पनपते देखता हूं । उनके बिल बोर्ड पर जुखाम से लेकर कैंसर तक के इलाज को शर्तिया ठीक करने का दावा गौर से पढ़ता हूं । स्वास्थ्य सेवाओं में आधुनिक मशीनों और जीवन रक्षक दवाओं से सुसज्जित सरकारी प्राथमिक , सामूहिक , मल्टीस्पेशलिटी अस्पतालों के किस्से सुनता हूं । बड़े बड़े ब्रांड वाले अस्पतालों के लंबे चौड़े विज्ञापनों को गौर से देखता हूं । 

फिर भी इन सब दावों से इतर साधारण सी बीमारी को असाध्य होता देखता हूं । बड़ी बीमारियों और आकस्मिक दुर्घटनाओं में लाखों रुपए खर्च होने के किस्से भी सुनता हूं । इनक्यूबेटर से वेंटिलेटर तक के सफर को केवल तीमारदार ही समझ सकता है । 

खैर ! अपने प्रियजनों , निकटवर्ती और मेरे जैसे शक्ल और सूरत वाले लोगों की अकाल मृत्यु को देखते देखते मुझे लगता है , मैं गिद्ध हो चला हूं । 

 ये सब फर्जी के सवाल हैं । इन सवालों के उठने की प्रक्रिया को निश्चक्रिय करने के लिए एक पोस्ट लिख रहा हूं । 

मुझे गर्व है । मैं एक उत्सव प्रधान देश का नागरिक हूं । जहां हर फसल के बाद , हर मौसम में एक उत्सव है । उत्सव के बाद उत्सव है।  

अंजान मृत देह को प्रणाम कर आगे की ओर बढ़ जाने और जान पहचान की मृत देह की अंत्येष्टि में  शामिल होने की आदत विकसित करनी होगी । 


तस्वीर आज दोपहर दिनांक 28/2/2025 की हैं ।

सोमवार, 24 फ़रवरी 2025

मुट्ठी भर तारे ...



तुम जहां कहीं भी

हो आसमान में

लौट सके तो

लौटना

तोड़ लाना तारे

मुट्ठी भर कुछ

मेरे लिए


रोज रात आसमान में

नजरें गड़ाए 

ढूंढता हूं तुमको

अनगिनत तारों और

एक चंद्रमा के अलावा

कुछ नहीं देख पाता


यहां को छोड़ गए लोग

बताए जाते हैं 

जाते हैं वहां आसमान में !

गुरुवार, 9 जनवरी 2025

जाती हुई मां ...



प्रिय मां ,

 मां तीसरा दिन है आज तुम्हे गए हुए । तीन दिन से तुम्हारी आत्मा को शांति देने के लिए न जाने कितने प्रयत्न कर लिए हमने । पर तुम्हारी याद अचानक से सहमा देती है । तुम्हारे बच्चों के आंखों में आंसू कभी भी छलक जाते हैं । फफक फफक कर पापा रो पड़ते हैं ।

तुम्हारी , घर के रोम रोम में हलचल रहती है । एक तुम्ही तो नहीं हो घर में । दीदी हैं , भईया हैं , पापा हैं और जीजा जी , चाचा जी ताऊ जी । सब तो हैं । जैसे सब मिले थे कुछ साल पहले बिटिया की शादी में।  तुम नहीं हो बस । बाकी सब हैं न । ऊंची इमारत में तुम्हारा घर । कितनी लंबी चढ़ाई को दर्शाता है । तुम्हारे न रहने के बाद तुम्हे पता है मां ! कितने लोग तुम्हे देखने आए ? तुम्हारी बातें कर कर के रोते हैं । 

ऊंची इमारत में तुम्हारे छोटे से घर की साफ सफाई , रख रखाई देखते ही बनती है । तुम जहां जहां रह कर आईं । तुमने अपनी साफ सफाई से सबको चौंकाया है । पूजा पाठ , शादी विवाह , कर्म कांड , लेन देन व्यवहार । सब तुम्हारा चौकस । तुम किसी का उधार नहीं रखती । तुम्हारी रोजमर्रा की चिंता में तुम्हारे बच्चों की तरक्की की दुवाएं होती थी । तुम्हारा क्रिकेट प्रेम , तुम्हारा देश विदेश की खबरों पर नजर और उनके प्रति चिंताएं।  तुम्हारी सोसायटी के लोगों के दुख सुख में शरीक होना या फिर मेहमानों और मान्यों की खातिरदारी में कोई कोर कसर । 

तुम्हारे सफेद चेहरे पर चटख रंग तुम्हारे सौंदर्य को और निखारते थे । मातृत्व के वात्सल्य में तुम्हारी आंखों से छलक आते आंसू हम सब पर भारी पड़ती है । 

तुम सदैव घर की रीढ़ की हड्डी रही।  दीदी की शादी , भईया की शादी , दीदी के बच्चे , भैय्या के बच्चे और फिर मेरी भी । तुम्हारी झोली में कुछ बचे न बचे । जरूरत से पहले दे देती । हमारे सभी फैसलों पर सही गलत की मोहर लगाने से पहले तुमने हमारे करियर के बारे में सोचा । पुरुष प्रधान समाज में महिलाएं आसानी से , कहां कुछ बड़ा सोच सकती हैं भला । 

ये तुम्हारी जीवटता ही है । जो हम सबको संबल देती है । तुम्हारे किस्से आज पूरे घर में बिखरे पड़े हैं । बस तुम नहीं हो ! हो सकता था तुम्हे इतनी तारीफ बर्दाश्त नहीं होती । बाद बिटिया , भईया , दीदी , भाई साहब तुम्हारे जीवन में कोई और संबोधन नहीं सुना तुम्हारे मुंह से । 

बहुत पहले से शायद तुम्हारे दिल और दिमाग में कभी यह बात नहीं रही होगी । कि तुम्हारे बच्चे ऊंचाइयों को छुएंगे । या तुम्हारी इच्छाशक्ति रही होगी । उन्हें उस काबिल बनाना । तुम्हारी देह के न रहने की खबर देने में सबको खासा तकलीफ हो रही थी । 

पर खबर कहां रुकती है । जैसे तुम नहीं रुकती थी कभी , न थकती थीं । सुदूर देश से तुम्हारी लाडली खबर पाते ही दौड़ पड़ी वापस । तुम्हारा बेटा जंगलों से लौट आया बीच रास्ते से । तुम्हारी बेटी पहाड़ों को छोड़ चली आई तुम्हारे पास । 

24 घंटों में तुम्हारे चाहने वाले तुम्हारे अंतिम दर्शन को व्याकुल हो उठे । सभी बाधाओं को धता बता के तुम्हारे पास सब आ बैठे । पर तुम अपने शरीर को छोड़ उड़ चली जहां तुम वर्षों से जाना चाहती थीं । 

आज चौथा दिन है तुम्हे गए हुए । तुम्हारे कर्म कांड की प्रक्रिया लगातार चल रही है । अंत्येष्टि क्रिया , अस्थि विसर्जन , शुद्धिकरण , हवन - ब्रह्म भोज , पिंड दान सब हो चुके हैं । आज चौथे दिन घर के चूल्हे में हल्दी पड़ी है । कल भी हवन , सामूहिक भोजन होगा । संभतः परसों से सब अपने अपने घरौंदों को वापस जाने लगेंगे । इस बार तुम सबसे ज्यादा जाओगी सबके साथ । 

तुम्हारी याद और तुम्हारी मीठी वाणी हम सबको उदास करती रहेगी । 

मैने तुम्हारे साथ कम , मगर क्वालिटी टाइम गुजारा है । मुझे तुम्हारे रहते तुम से केवल एक ही शिकायत थी । तुम्हारा धर्म और आस्था में डूबे रहना । शायद यही बात तुम्हारे जीवन के एकांत को तृप्त करती थी । उस ब्राह्मण की हर बात का अक्षरशः पालन करती थी।  जो तुम्हे हर संभावनाओं के पहले कोई न कोई धार्मिक अनुष्ठान करने को प्रेरित करता था।  

तुम्हे पता है ? जब से तुम गई हो ! मैं चाहता हूं तुम्हारी हंसते हुए चेहरे को जिऊं। वो सब काम कर के जिनसे तुम प्रसन्न हुआ करती थीं। मगर ऐसा संभव कहां । तुम्हारे पथ प्रदर्शक ब्राह्मण की एक एक बात का अक्षरशः पालन हम सभी कर रहे हैं । चार दिन से घर के मंदिर के कपाट बंद हैं । जहां तुम सुबह शाम घंटों गुजार दिया करती थीं।  बालकनी में रखे तुलसी , केले के पौधे में जल नहीं दिया गया । तुम्हारी खींची हुई तस्वीर के प्रिंट को मैं चार दिन से देखना चाहता हूं । पर वो अखबार में लिपटी हुई कल का इंतजार कर रही है । 

कल होगा । तुम्हारी तस्वीर रखी जाएगी किसी कुर्सी या मेज पर । फूल माला की न्योछावर होगी । अफसोस , दुख , संताप प्रकट होगा । भोज होगा । हवन होगा । हम सब में , जिसने जिसने तुम्हारे मृत शरीर को छुआ था या देखा था ।  वो सब पूर्ण रूप से शुद्ध हो जाएंगे । घर फिर से शुद्ध हो जाएगा । और मंदिर के कपाट खुल जाएंगे । और तुम ?


तुम्हारा ...



बच्चों को उड़ने दो ..

 उड़ने दो , उड़ने दो  बच्चों को उड़ने दो ... गर नाक अटक जाए  तो भी तो  उड़ने दो ..   जिस ऊर्जा का  संचार प्रवाह  हो उद्दंड  उसको भी  उड़ने दो  कह...