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सोमवार, 6 जून 2022

कभी नही !

 


कोई आग है दबी सी

बरसों से सीने में 

धधकती देहं से पिघला

यूं लावा कभी नही


लुढ़कती सुर्ख बूंदे

चेहरे से पसीने की 

लरज़ती आँख का पानी

हुआ गाढ़ा कभी नही 


दहर की पीठ पर बैठी 

जो तुम मासूम सी

सिहर कर जान से जाना

जाना कभी नही 


जलाने को मशालें

थीं बहुत अदीब की 

तुम्हारी रूह ने लिक्खीं

किताबें कभी नही !

सोमवार, 25 अप्रैल 2022

सुगना की गुड़िया !



 सुगना का अपना अलग संसार है । जिसमें तमाम सारी गुड़िया हैं । छोटे छोटे खिलौनों वाला किचन सेट है । कहानियों वाली किताबें हैं । उसने अपनी सभी गुड़ियों का नाम रख रखा है । कुछ नाम कार्टून की दुनिया से आते हैं । तो कुछ विदेशी नामों से पहचानी जाती हैं। यूँ तो उसके रोज के जीवन में किसी न किसी गुड़िया का साथ रहता है । पर उसकी सबसे चहेती गुड़िया का नाम " सुनती" है । वो रोज शाम को सोने से पहले उस गुड़िया से बाते करती है । 

दरअसल वह गुड़िया रिकॉर्डिंग वाली गुड़िया है । सुगना उसके पेट पर लगी एक छोटी सी बटन को दबाती है । और वो गुड़िया बोल पड़ती है । " आज क्या है तुम्हारे दिल में " इतना कहना होता है । कि सुगना उसे अपनी नज़रों के सामने रखती है । सुनाने लगती है अपने दिल की बातें। यह गुड़िया उसके पापा ने कुछ साल पहले उसे जन्मदिन पर गिफ्ट की थी ।

सुगना के मम्मी पापा नौकरीपेशा हैं। मम्मी शाम को काम से आती है । पापा हफ्ते में एक या दो दिन के लिए घर आते हैं । ढेर सारा काम निबटा के मम्मी पापा के पास सुगना के साथ खेलने , बैठने या बात करने की क्षमता नही बचती। सब के इकट्ठा होने के बावजूद भी घर में एक अजीब सी चुप्पी रहती है । बात होती है । मगर गैर जरूरी बात कुछ भी नही ।

सुगना के मम्मी पापा उसे बेहद प्यार करते हैं । पर भाग दौड़ भारी जिन्दगी ने उसके जीवन में बहुत सा अबोला भर दिया था। जिसकी पूर्ति वो " सुनती " को सुना के पूरी करती है । वो उससे बातें करती है । बात करते करते सो जाती है । सुबह उठ कर स्कूल जाने से पहले वो सुनती का बटन ऑफ करती है । और उसको बाय बोल स्कूल चली जाती है । 

सुगना की गुड़िया में सुगना के संसार की बातें कैद होती रहती हैं दिन पर दिन । पढ़ाई , लिखाई को लेकर मम्मी की डाँट का जिक्र उनमें होता । तो पापा की मम्मी के साथ गाली गलौज की शिकायतें उनमें दर्ज रहती । हर छोटी बड़ी बातों में सुगना प्यार का हिसाब किताब ढूंढ लाती है । मम्मी इतना प्यार करती हैं मुझे । पापा इतना करते हैं । सुबह और शाम के घटनाक्रमों के टुकड़े जोड़ तोड़ कर सुगना अपनी गुड़िया को सुना देती । पिज़्ज़ा , मैगी , पास्ता, मैक्रोनी , फ्राइज़ की चटपटी बातें सुना के सुगना सुनती से पूछती ! मज़ा आया ? 

इस बार गर्मी की छुट्टियों में सुगना अपनी मम्मी के साथ नानी के घर चली गयी । पापा की हिदायत के बावजूद भी वो गुड़िया को यहीं भूल गयी । नानी के घर पहुँचने के बाद सुगना को गुड़िया के छूट जाने का ख्याल आया । वो थोड़ा उदास हुई । पर नानी के यहाँ उदासी ज्यादा दिन टिकती नही । 

अबकी वीकेंड जब पापा घर आए तो उन्हें सुगना की बहुत याद आयी । वो जाना तो चाहते थे सुगना के साथ । पर घर अकेला नही छोड़ा जा सकता था । सुगना का गुड़ियों का संसार देख उन्हें उस पर और ज्यादा प्यार आने लगा । उन्होंने सुनती को भी हाँथ में लिया । सुनती के बालों के पीछे एक हिडेन बटन था । जिसके बारे में पापा ने सुगना को कभी नही बताया गया था। उसको दबाते ही सुनती के भीतर जितनी बातें रेकॉर्ड हुई थी । वो बारी बारी बजने लगी ।

सुगना की मीठी बातें पापा की आंखों को नम करती रहीं । उसका प्यार , उसकी शिकायतें , उसका दुलार सुन कर पापा को लगा ही नही जैसे पापा सुगना से कभी दूर भी होते हैं । प्यार के मामले में मम्मी का पापा से ज्यादा जिक्र पापा को रश्क से भर देता । 

पर इस बीच कुछ ऐसा घटने लगा जिसके बारे में पापा ने कभी सोचा नही था । सुनती बोलती रही ........ आज अंकल आये थे , उन्होंने मुझे चॉकलेट खिलायी । अंकल मम्मी का बहुत खयाल रखते हैं । पापा अंकल की तरह क्यों नही हो ? ..... 

आज फिर अंकल आये थे । उन्होंने मुझे कहानी सुनाई । अंकल के पास ढेर सारी कहानियाँ हैं । पापा के पास कहानियाँ क्यों नही है ? .....

अंकल ने मुझे लोरी सुनाई । और वो मम्मा के साथ सो गए । .....

पापा ने झट से सुनती की बोलने वाली बटन बन्द कर दी । सुनती को एक किनारे रख दिया । पापा के दिमाग में ऊल जुलूल ख्याल आने लगे । पूरी रात बेचैनी में कट गई । सुबह उन्होंने सुनती का सुनने वाला बटन दबाया । और कहा बेटू आई मिस यू , आई लव यू , आई एम कमिंग । 


रविवार, 24 अप्रैल 2022

ख़त !



 तुम्हारे पुराने पते पर

मैंने कई ख़त लिखे

ख़त में तुम्हारा नाम
नही लिखा कभी

न लिखी आपबीती
न भारी समय की व्यथा

क्या लिखता तुम्हे
नए पते पर
जहाँ अब मैं नही रहता

ख़त में लिखी बातें
पते के साथ
अर्थ बदल देती हैं । 

शनिवार, 26 फ़रवरी 2022

समय बदल चुका है !


समय बदल चुका है
या बदलने वाला है
दोनों ही समय
पथराई आंखों में
धूल झोंकने जैसा है
समय बदलता रहता है
सेकंड या कहें नैनों सेकंड पर सवार
हम वैसे नहीं रहते अगले क्षण
जितना बीतता है बदलता है
जैसे मौसम
हमारे आस पास की आब ओ हवा
मन के ताने बाने
आते जाते लोग
नए समय से दो चार होते
हम पहुँच रहे होते हैं
बदले हुए समय
बीते समय को छोड़
जो सच मुच बदल चुका है । 

सोमवार, 3 जनवरी 2022

छाँव !

 कोहनियों में दर्द फूटता है

घुटनों के नीचे माँस जम जाता है
उंगलिया थक जाती हैं
काँधे जकड़ जाते हैं
दो मुँही हाँथ की लकीरें
रात को खत्म हो जाती हैं

मैं रोज बेदम
इक राह जोतता हूँ
हिज़्र की ,
कुफ़्र से
दो चार होता हूँ

धिक्कारता खुद को
शिकायतें ओढ़ता
तमाम तरह की न सुनते
स्नेह तपकता है

मैं खुद से
भागता हूँ दिन रात
तलाश में एक अदत
छाँव !

बच्चों को उड़ने दो ..

 उड़ने दो , उड़ने दो  बच्चों को उड़ने दो ... गर नाक अटक जाए  तो भी तो  उड़ने दो ..   जिस ऊर्जा का  संचार प्रवाह  हो उद्दंड  उसको भी  उड़ने दो  कह...