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गुरुवार, 14 जनवरी 2021

माफीनामा

 अरे अरे अरे ......

तमीज से पेश आइये , आप मुझे धक्का क्यों दे रहे हैं ? मैं चल रहा हूँ ना 

... चल बे (गर्दन के पीछे कॉलर पकडे हुए सिपाही जैसे हांक रहे हों )

देखिये आप लोग समझ नहीं रहे हैं . मैंने उसे हाँथ तक नहीं लगाया . 

... चल ना . अभी निकलती है तेरी गर्मी . सब पता चल जायेगा किसने मारा, किसने नहीं मारा .

साहब यही है (रोते हुए , लंगड़ाते हुए एक रिक्शेवाला उनके पीच्चे चलता हुआ ) साहब इसी ने मुझे मारा है . गिरा गिरा के मारा .

रोहन को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है . वो अच्छा भला रोज़ कि तरह ट्रेन से उतरा और स्टैंड से अपनी बैक उठाने जा रहा था . कि अचानक दो सिपाहियों ने उसे दबोच लिया .ऊपर से वो रिक्शे वाला जिसे वह अक्सर अन्य रिक्शे वालों के साथ स्टैंड पर देखता था . कभी कभी गांजे और शराब की बैठकी लगते हुए .आज वह अजीब अजीब हरकतें कर रहा था . 

     सभी रेलवे चौकी पहुंचे . रोहन का हाँथ सिपहियोंन ने चौकी पहुचते छोड़ा . चौकी कोठरीनुमा तीन शेड से बनी कम चौड़ी , लम्बाई में ज्यादा दीख रही थी . दीवान जी काला चश्मा पहने , पान चब्लाते हुए फोन पर किसी की क्लास ले रहे थे . टेबल के नीच पान कि पीक मारते रोहन की तरफ देखते दीवान जी बोले ... " क्या हुआ , कहा रहते हो ? गरीब को मारोगे स्साले ....

   देखिये मैंने इसे नहीं मारा है . मैं इसके पास तक नहीं गया . मैं डेली अप डाउन करता हूँ . जैसे ही मैं ट्रेन से उतरा . स्टेशन के पोर्च से बाहर निकला . तो देखा एक आदमी किसी यात्री पर ऊँची आवाज़ में गालियाँ देकर बात कर रहा था . कुछ देर मैंने दूर से ही उस तमाशे को देखा फिर स्टैंड कि तरफ आगे बढ़ गया . न जाने कहाँ से और क्यों उस यात्री को छोड़ वो मेरे पीछे लग गया . 

  " अच्छा हजारों आदमी स्टेशन पर आ जा रहे हैं . इसने केवल तुम्ही को देखा . और तुम पर मार पीट का इलज़ाम लगाने लगा . वो रिक्शे वाला झूठ बोल रहा है क्या ? उसे क्या पड़ी झूठ बोलने की . क्या करते हो ? " दीवान ने रोहन से पूछा . 

सर मैं पत्रकार हूँ , रहने वाला सीतापुर का हूँ . लखनऊ अप डाउन करता हूँ रोज़ . यहाँ एक हिंदी दैनिक में काम करता हूँ . और सच कह रहा हूँ . मैंने इसे हाँथ तक नहीं लगाया . 

ओह तो आप पत्रकार हैं . ( दीवान ने त्योरियां चढाते हुए कहा ) तो पत्रकार हैं तो तोप हो गए हैं आप . किसी को भी राह चलते मार उठाओगे . अच्छी तरह से जानता हूँ . तुम जैसे लोगों को . गरीबों को सताने में तुम्हे मज़ा आता है . और पत्रकार होने का धौंस भी ज़माना है . मैंने कई पत्रकारों को लाइन पर ला दिया है . राम लाल इन पत्रकार महोदय को एक सादा कागज़ दो . सिपाही रामलाल ने सादा कागज़ और एक कलम रोहन के सामने टेबल पर रख दिया . 

इस पर एक माफीनामा लिख दो . कि तुमने जो भी कुछ किया वह आवेश में आ कर हुआ . आगे से ऐसा कभी नहीं होगा ...

लेकिन मैंने तो कुछ किया ही नहीं है . माफीनामा क्यों लिखूं . आप मुझे जाने दीजिये . मुझे काम के लिए लेट हो रहा है . कल गणतंत्र दिवस के अवसर पर ज्यादा काम है . यह देखिये मेरा पहचान पत्र ....

अब तुम मुझे क़ानून सिखाओगे . मुझे मेरा काम सिखाओगे . दाल दूंगा लॉकअप में सही हो जाओगे . माफीनामा लिख दो और चले जाओ . 

नहीं ... मैं माफीनामा नहीं लिख सकता . जो काम मैंने किया नहीं उसके लिए कैसा माफीनामा . 

सिपाही रामलाल रोहन के कान में फुसफुसाता है ... " लिख दीजिये माफीनामा . क्या जाता है . दीवान जी ऐसे नहीं छोड़ने वाले हैं .. पर रोहन को माफीनामा लिखना बिलकुल मंजूर नहीं हुआ . 

दीवान साहब को यह बात करेंट की तरह लगी . " आप अपना नाम पता , पिता का नाम और मोबाईल नंबर कागज़ पर लिख दो . रामलाल इससे इनका मोबाईल , पर्स , बेल्ट और सारा सामान जमा करवा लो . रोहन के मना करने के बावजूद रामलाल ने सारा सामान एक रुमाल में बाँध के चौकी की अलमारी में बन्द कर दिया . अब तुम्हे हवालात की सैर कराता हूँ ... दीवान साहब बोले ...

ठीक है जैसा आप उचित समझें ( रोहन निराश हो कर बोला ) . क्या मैं एक कॉल कर सकता हूँ घर ?

बड़ा आया कॉल कर सकता हूँ ... पहले एक करेगा फिर दूसरा करेगा . मैंने यहाँ कॉल सेंटर खुलवाया है . 

रामलाल ले जाओ पत्रकार साहब और इस रिक्शे वाले को . बन्द कर दो लॉकअप में . कुछ देर में अक्ल ठिकाने आ जाएगी . 

यह तो सरासर अन्याय है . आप मेरी बात सुन ही नहीं रहे हैं . बस एक पक्षीय कार्यवाई कर रहे हैं . यह अच्छा नहीं हो रहा है . आप चाहे तो स्टेशन का सी सी टी वी फुटेज देख लें . उससे पता चल जाएगा सच झूठ का .

  उसकी किसी बात का चौकी की दीवारों पर कोई असर नहीं हो रहा था . दो सिपाही दोनों रोहन को पकडे लॉकअप की तरफ ले जाते हैं . वह रिक्शे वाला खुद बा खुद लॉकअप की और बढ़ चला . दोनों को सीलन भरे अँधेरी कोठरी में बन्द कर दिया गया . लॉकअप जी आर पी थाने के गलियारे में पड़ता है . गलियारे के दूसरी तरफ बड़ी सी ऊँची मेज पड़ी है . मेज के उस पार बड़ी बड़ी कुर्सिया पड़ी हैं . कुर्सियों पर एक महिला कांस्टेबल , मुंशी और कुछ सिपाही बैठे हैं . 

रोहन सलाखें पकड़ महिला कांस्टेबल की तरफ देख कर बुलाता है ... सुनिए सुनिए ...

महिला कांस्टेबल ने रोहन को एक नज़र देखा फिर अपने काम में व्यस्त हो गयी . बारी बारी से सभी ने रोहन को लॉकअप के भीतर असहज मचलता हुआ देखा . रोहन थक हार के वहीँ रिक्शेवाले के पास जाकर बैठ जाता है . रिक्शेवाला साढ़े 6 फीट का लंबा चौड़ा . तन पर फटे , मैले और बदबूदार कपड़े . दाढ़ी बेतरतीब छाती तक बढ़ी हुयी . बाल औघड़ की तरह . होंठ मोटे मोटे एक दम काले . बड़ी बड़ी आँखों में लाल धागों में बंधी नशे की पोटलियाँ. 

" झूठा इल्जाम क्यों लगाया मुझ पर ? , फंसा दिया तुमने नाटक फैला कर . तुम लोग इतना नशा क्यों करते हो कि कुछ होश ही न रहे . घर वालों तक नहीं बता पाया .... क्या नाम है तुम्हारा ?  रोहन ने रिक्शेवाले से पूछा . 

सरजू 

कहाँ के रहने वाले हों ? 

सीतापुर 

सीतापुर में कहाँ से ?

सिन्धोली 

और घर में कौन कौन है ?. 

घर बाहर सब छोड़ के चले आये रहन दस साल की उम्र मां . ओकरे बाद यहीं दाना पानी चलि रहा है . 

रिक्शा कब से चला रहे हो ?

पांच साल से यहीं स्टेशन पर चलाये रहे हन , उससे पहले मजदूरी , उससे पहले खेती ....सब बेकि लिहिन ... फेर भागे का भा .

कितना कमा लेते हो दिन भर में ? 

दिन भर वही 300 से 400 ...

इतना कमा लेते हो फि?र भी तुम्हारी दशा इतनी ख़राब है . इतने मैले कि तुम्हारे हाँथ का कोई पानी भी न पिए . 

क्या करते हो पैसे का ? 

बस खाने पीने में सब चला जात है ... जो कुछ बचत है ... वो साहेब के भेंट चढ़ी जात है ...

लॉकअप में पहली बार आए हो ?

नाही जब तब नंबर लागि जात है ... जब साहेब (दीवान साहेब ) की नज़र टेढ़ी हुयी जात है ... धर लीन जात हन ... फिर वही जी हुजूरी , बेगार ....

कोई दूसरी जगह चले जाओ , पुलिस किसी की नहीं होती .

सरजू फिर जोर जोर से कराहने लगा . हाय .... अम्मा मरी गैएं ... बहुत पिरात है .... 

मतलब तुम्हारे कोई चोट नहीं लगी ... तुम्हे किसी ने नहीं मारा ? फिर तुम लंगडा क्यों रहे थे ?

बचपने में एक पाँव टूटी गवा रहे ...

अरे तो तुमने मुझे क्यों फंसाया ...... रोहन खीजते हुए ... 

हाय अम्मा .... मरि गएँ .... बहुत पिरात है ... मारि डारा .... गिराए गिराए मारा .....


चुप .... चुप ... बन्द करो यह  नाटक ...( रामलाल सिपाही ने लॉकअप के पास आकर उसे फटकारा और रोहन को सलाखों के पास बुलाया )

पत्रकार जी माफीनामा लिख दीजिये . साहेब छोड़ेंगे नहीं ऐसे ..

मैंने कहा मुझे नहीं देना माफीनामा . मुझे झूठा फंसाया गया है .... क्या चाहते हो तुम सब लोग ?... खुल के बताओ .. (रोहन का जवाब साफ़ था ) 

जैसी आप की मर्जी . कुछ रूपया पैसा का जुगाड़ हो तो बताईये . साहेब से बात की जाए . आज न छूटेंगे तो एक हफ्ते के लिए अन्दर ही रहेंगे . 26 जनवरी यानी गणतंत्र दिवस . पूरा सरकारी अमला और पुलिस महीनों तयारी करती  है इस दिन के लिए .... फिर आगे इतवार... सबकी खुमारी उतरने में टाइम लगता है .... 10000 रुपये की व्यवस्था कर लेयो . साहब के हाँथ पैसा पहुचते ही ढीले हो जायेंगे . .....( सिपाही की आवाज़ में दया का भाव साफ़ छलक  रहा था )


सरजू ... तुम कुछ क्यों नहीं बोलते कुछ ? सब तुम्हारा ही करा धरा है .... बताओ कि सब झूठ है .... (रोहन रिक्शे वाले के कंधे पर हाँथ रख के पूछता है )

साहब अब हामरे हाँथ में कुछ नहीं है . जोने कुछ है साहेब के हाँथ में है ...


4 घंटे बीत चुके थे . रोहन को लॉकअप में बन्द हुए . सरजू वहीँ लोट के खर्राटे लगाने लगा था ...

शाम होगी .... फिर रात होगी ... पूरी रात लॉकअप में ... इस बदबूदार रिक्शे वाले के साथ ....फिर पुलिस का क्या .... क्या पकड़ा दे हाँथ में ... चरस, गांजा , कट्टा , हथियार धर के चालन कर दे ...सब कुछ तो धरा लिया है ...कोई संपर्क नहीं हो पायेगा ...झूठ जब असरदार तरीके से बार बार कहा जाए तो वह क़ानून की नज़र में भी सच लगने लगता है ... उसके बाद धीरे धीरे समाज की नज़रों में ... फिर परिवार की नज़रों ....मैंने कितनी दलीलें दी .... क्या किसी को पकड़ना , लॉकअप में डालना इतना आसान होता है .... लॉकअप खुद में एक प्रताड़ना है ... ऊपर से अमानवीय व्यवहार ....( रोहन गहरी सोच में डूबा हुआ )

रामलाल सिपाही फिर आया " पत्रकार जी , क्या सोचा है ? जल्दी फैसला करो ... शाम होने को है साहब निकल जायेंगे चारबाग़ की रात सूंघने ...

ठीक है मैं लिखता हूँ माफीनामा ... पर पैसे वैसे नहीं दे पाउँगा . मेरे पास उतने पैसे नहीं होते .. (रोहन पूरी तरह से सरेंडर था ) 

अब आप साहेब से ही बात कर लीजियेगा . सिपाही बोला 

लॉकअप का दरवाज़ा खोला गया ....

चौकी पहुचते ही दीवान साहेब बोले ... क्यों पत्रकार साहेब ठंढे हो गए ? 

रोहन के में फिर से कागज़ कलम आ गया . 

हाँ .. तो लिखिए ( दीवान साहेब टेबल पर उचकते हुए बोले ) 


   मैं रोहन उम्र 25 वर्ष पुत्र श्री रामेन्द्र विक्रम सिंह निवासी कस्बा सिन्दोली जिला सीतापुर यहाँ स्थानीय अखबार में पत्रकार हूँ . रोज़ की तरह आज भी मैं अपने जनपद से यहाँ आया रहा था . ट्रेन से उतरते ही मेरी किसी बात को लेकर सरजू पुत्र स्वर्गीय अशर्फीलाल से कहा सुनी हो गयी . तैश में आकर हमारी हान्था पाई हो गयी . सरजू के कुछ छोटे आयीं . आपसी सहमती से 1000 रुपये सरजू को दवा इलाज वास्ते दे रहा हूँ . प्रार्थी कभी ऐसे काम नहीं करेगा . जो हुआ उसके लिए मैं माफ़ी माँगता हूँ .

नाम - पता , मोबाईल नंबर , पिता का नाम , एवं अन्य स्थानीय जान पहचान के व्यक्ति का पता व मोबाईल नंबर ....

रोहन के दस्तखत ......................... सरजू का अंगूठा ...

राम लाल ने रोहन का सारा सामान वापस कर दिया . रोहन वहां से निकलने लगा . 

रोहन वहाँ से निकलने लगा . 

तभी दीवान साहेब ने कहा " रामलाल इन्हें और कुछ नहीं बताया था . 

बताया था साहेब .... तो कह रहे थे .... इतने पैसे नहीं हैं ... 

चलिए कोई नहीं .... आप पत्रकार हैं तो छोड़े दे रहे हैं वरना आप की रेल बना देते .....

सुन बे सरजुआ ज्यादा नशाखोरी न किया कर . चल कूलर में पानी भर दे . पत्रकार जी से पैसे लेकर चाय समोसा नाश्ता बोल दे रतन सेठ के यहाँ . 

रोहन के भीतर अभी अभी एक कैदी रिहा हुआ था . उसमें यह अनुभव किसी से साझा करने का मन नहीं हो रहा था . और न ही ऑफिस या  फील्ड पर जाने का ही .  कोई खबर , रिपोर्ट लिखनी दूर की बात थी . रोहन ने वह शाम और रात स्टेशन पर ही गुजार दी . उसके भीतर गुस्सा नहीं था . बस हतास्षा थी , निराशा थी और अचम्भे का भाव था .  






बुधवार, 13 जनवरी 2021

जाना



शिवानी : तुम्हारी ट्रेन कितने बजे की  है ?

मनीष : क्यों ?

शिवानी : क्यों का क्या मतलब है . जाओ जल्दी यहाँ से

अच्छा , तुम मुझसे भागना चाहती हो .

शिवानी : हाँ 

मनीष : 9 बजे आएगी 

शिवानी : अब क्यों बोले  ? 

मनीष : यार मेरा भेजा मत खराब करो . शांति से चले जाने दो बस .

शिवानी : और मैं कहाँ जाऊं इस बच्चे को लेकर .

मनीष : क्या चिपका रहूँ मैं हमेशा तुमसे ? मेरा अपना काम है . काम नहीं करूँगा ... क्या .....

कुछ सेकण्ड खामोशी के बाद 

शिवानी : फिर कब आओगे ?

मनीष : जल्द ही .

शिवानी : कब ?

मनीष : मुझे नहीं पता . तुम हर बार जाने के समय कब आओगे .... कब आओगे ... की र्र्ट लगा देती हो . तीन महीने में एक बार फुर्सत मिलती है . यहाँ का सारा वक़्त तुम्हारे साथ ही गुजारता हूँ . फिर भी तुम्हारा पेट नहीं भरता .


शिवानी : तुम जल्दी जल्दी आ जाया करो . मैं नहीं पूछूंगी आने को . 

मनीष : ठीक है कोशिश करूँगा .

शिवानी : तुम मुझसे आँख में आँख दाल के बात क्यों नहीं करते . जरुर तुम्हारे भीतर मेरे लिए चाहत कम होती जा रही है . तीन साल में पांचवी बार आये हो . मैं तुम्हारे इंतज़ार में दिन गिना करती हूँ . यह बच्चा न होता . तो मैं भी आ जा सकती  तुम्हारे पास . 

मनीष : मैंने कहा था बच्चा करने को ? अब है सो बरतो ....

शिवानी : तुम्हे तो बस अपनी ही सूझती है .. मेरे पास तो तब आते हो . जब तुम्हारा मन करता है .. आये ऐयाशी की और चल दिए ..फिर अपनी दुनिया में मस्त . तुम्हारा परिवार , तुम्हारे लोग , तुम्हारा काम और मेरा क्या ??

तुम्हे पता भी है कि मैं यहाँ कैसे रहती हूँ . घर का काम . ऑफिस का काम . बच्चे की देख भाल ...

जब आते हो यहाँ कुछ भी व्यवस्था करके कैसे ब्व्ही तुमसे मिलने आ जाती हूँ . तुम्हारे साथ बिताये गए एक एक पल को मैं भरपूर जी लेना चाहती हूँ . पर तुम्हारी आँखों में रत्ती भर भी नमी नहीं पाती . तुम्हारी आँखें चुभती हैं . ये तुम ही समझते होगे .

मनीष : क्या बोले जा रही हो अंट संत जीवन में थोडा व्यवहारिक होना पड़ता है . अपने पैरों पर खड़ा होना पड़ता है . मैं हमेशा निश्चिंत रहता हूँ . कि तुम जहाँ कहीं भी होगी , ठीक ही होगी .मैं तुमसे मिलना चाहता हूँ . लेकिन इतनी दूर ..... यहाँ जल्दी जल्दी आना संभव नहीं हो पाता . अव्वल तो रिज़र्वेशन नहीं मिलता . रिज़र्वेशन मिलने के बाद सीट नहीं मिलती . फिर काम का बोझ . तुम्हे मालूम है कि मैं अपने काम से कितना प्यार करता हूँ . और हमारा रिश्ता आज का तो है नहीं . जीवन भर का है .

शिवानी : मैं कुछ नहीं जानती . आज तुम्हे जाने से पहले हर महीने आने का वादा कर के जाना पडेगा .

मनीष : तुम चाहती हो कि मैं तुमसे हर महीने कि फलाना तारीख को तुमसे मिलने आया करूँ ...झूठा वादा कर के तोड़ता रहूँ .. लेकिन मैं झूठ नहीं बोलता . खासतौर से तुम्हारे को लेकर . 

शिवानी : तुम यहाँ नहीं आ सकते . पर अपने घर तो हर हफ्ते चले जाया करते हो . वहां जाने का जैसे बहाना खोजा करते . मुझे समझ नहीं आता कोई आदमी दो लोगों से एक साथ प्रेम कैसे कर सकता है ..

मनीष : तुम बकवास कर रही हो . इसीलिए मुझे आने की इच्छा नहीं होती तुम्हारे पास . तुम्हारे पास आओ तो उत्साह से ... और जाओ दिल में कसक लेकर ...जाते वक्त तुम अपनी खरी खोटी से मुझे लाड देती हो . कभी भी हल्का महसूस कर के तुमने मुझे विदा नहीं किया .

शिवानी : आ गए न असलियत पर . तुम्हारी मेरे पास आने कि इच्छा ही नहीं होती . 

मनीष : यार बकवास न करो ... नाटक बना रही हो स्टेशन पर ....

अब नहीं आउंगा यहाँ . तुम्हारी बकवास सुनने नहीं आता हूँ इतनी दूर . तुम्हारी प्यार की इमरजेंसी हमेशा लगी रहती है . घर से बहाने कर के कितने जतन कर के मैं यहाँ आता हूँ . कभी चौदह पंद्रह घंटे की बस की यात्रा . कभी चालु डिब्बे की ठोकरें . ...

शिवानी : तुम्हे सलीके से आना नहीं आया तो मैं क्या करूँ ? आने की इच्छा हो तो हज़ार रास्ते खुल जाते हैं . रास्ते सरल हो जाते हैं . यात्रा सरल नहीं भी हुयी तो मिलने पर उसकी थकान चली जाती है .... मेरे साथ तो ऐसा ही होता है ... तुम थके के थके रह जाते हो तो तुम जानो ...

मनीष : हाँ , जैसा तुम समझो .... हार गया मैं तुमसे और तुम्हारे तर्कों से ..... बस थोड़ी देर और सह लो .... फिर मैं कभी नहीं आउंगा .  तुम रहना चैन से .... सुकून से..... 

शिवानी : ठीक है ...... मैं चाहती हूँ .... कि तुम चैन से रहो ........रखो अपना सामान .... मैं चली ....

मनीष : शिवानी ..... शिवानी ... कहाँ भागे जा रही हो रेल की पटरियों पर ? रुको ..... रुक जाओ शिवानी ..... अपने बच्चे के लिए रुक जाओ ..... शिवानी ... शिवानी ... शिवानी .... 

शिवानी दूसरी तीसरी रेलवे लाइन के बीच की चलती ट्रेनों में अलोप हो जाती है ...

शिवानी और ट्रेनें जा चुकी होती हैं ....

मनीष के कानों में अब बच्चे का रोना सुनाई देता है ...... 


शनिवार, 2 जनवरी 2021

चाहत !





विरक्ति की चाहत भर

भर दे तीक्ष्ण ज्वर

देंह पर काले निशान

नीले हो जाते

धमनियां रुक जाती

होंठ सी जाते ।


छूटते आस पास

विरह आलाप करते

रूठते एकाकी से 

बंधन जाप करते


रोम रोम कुंठित , कलुषित

भीतर के नाले

कल कल बहते

बाहर की ओर


जीवन को तरसते

हम भागते 

भागते भागते 

तोड़ देते डोर

साँसों की ।

गुरुवार, 24 दिसंबर 2020

थकना मना है !

 


मैं

अपने हांथों को तोड़ कर

पीठ दबाने लग जाता हूं

पंजों के ऊपर

मुड़ मुड़ के चूर 

हुए घुटनों के नीचे

जो एक टापू है

उसे निचोड़ता हूं

पैरों को हिलने नहीं देता

कमर से रेंगता बिस्तर पर

गूंथ देता हूं

पैरों को ।

दिन भर दौड़ते भागते

पैरों के निशान

रास्ते नहीं देखते

हाथों में भाव

काठ के हो जाते हैं

काम में देह को

थकना मना है।

सोमवार, 21 दिसंबर 2020

रिक्त आंगन !

शालू आज जब घर आई तो उसके सर पर गहरे जख्म के निशान थे। रोज़ वो समय से आती थी। पर आज कई घंटे बाद पहुचीं। दरवाज़े पर राह तकते भिन्ना को उसकी साइकिल सबसे पहले दिखी। साइकिल एकदम सधी हुई आ रही थी। शालू के पैर लड़खड़ा रहे थे। शरीर कांप रहा था। पर उसकी लक्कड़ कलाइयों ने साइकिल को मजबूती से थाम रखा था। दरवाज़े के ठीक पहले भिन्ना से बचती हुई वह साइकिल को यूं ही छोड़ भीतर के कमरे में जाकर लेट रहती है। अचेतावस्था में उसे किसी का कहा सुना सुनाई नही दे रहा था। वह सुन्न पड़ी थी बिस्तर पर । सखी रोए जा रही थी । शालू की छाती पर सवार सखी उसको झकजोर रही थी। कि वो उसे बताये उसे इतनी चोटें कैसे आयीं हैं। 

   " मेरा गला घूंट रहा है , कोई है जो मुझे मारे डाल रहा है " शालू की आवाज़ ने मानों एक क्षण में घर की नीवें हिला दीं। उसकी देंह में जबरदस्त ऐंठन से सब और घबरा गए। आनन फानन उसे मोटर साइकिल पर बिठा पास के अस्पताल ले जाया गया। प्राथमिक उपचार के बाद सामान्य बात कह कर डाक्टर ने सबको विदा किया। 

भिन्ना रास्ते भर सोचते आया कि उसकी 17 साल की बेटी इतनी बेसुध कभी नही रही। इधर गाँव में चोरी , डकैती और न जाने कौन कौन से ऐब आ गए हैं कहीं से। रंजिश में सब खून के प्यासे रहते हैं। भिन्ना के लिए रास्ता भारी होता जा रहा था। सखी बीच में ऐंठती बिटिया को लगातार भींचे जा रही थी। उसके सवाल शालू को सुनाई दे रहे थे यह कोई नहीं जानता। उबड़ खाबड़ पगडंडियों पर मोटसाइकिल के पहिए फिसल रहे थे। भिन्ना की लक्कड़ कलाई हैंडल को मजबूती से पकड़े थे। गाँव में घुसते ही " क्या हुआ " , कैसे हुआ ! की बौछारें पड़ने लगीं। भिन्ना को केवल भीतर का कमरा दिख रहा था। वह शालू को पलंग पर लिटा कर सखी से लोबान जलाने को कहता है। सर पर ठंढी पट्टी रखने , पैर सहलाने और प्रार्थना करने की सलाह देकर निकल लेता है। वो उस जगह पहुँचता है जहाँ शालू साइकिल समेत गिरी थी। उस जगह कुछ फूल , मटकी या अन्य टोटकों के सामान बिखरे पड़े थे। बस फिर क्या था , जैसे भिन्ना को कोई राह मिल गयी हो। सीधी सपाट। बस उसे सिर्फ लेकर दौड़ना है। जिसमें वो बहुत माहिर था। भिन्ना यह बात सखी के साथ जल्द से जल्द साझा करना चाहता है। घर के मोहरे से बहुत पहले उसे रोने , चीखने चिल्लाने की आवाज़ें आने लगीं। घर के भीतर लोबान का धुवाँ भरा हुआ था। शालू कोई और सी लग रही थी। जो शालू की दुश्मन थी। और सखी से एक जान को ले लेने या दे देने पर ऊँची आवाज़ में बहस चल रही थी। शालू की देंह रह रह कर सर्प की तरह ऐंठ रही थी। शालू सबके चेहरे भूल चुकी थी। वह लगातार अपने आस पास अजनबियों के होने पर ऐतराज कर रही थी। उन अजनबियों में केवल उसकी माँ थी और पिता थे। 

 भिन्ना का दिमाग काम करना बंद कर दिया था। लड़की बहुत पीड़ा में उसे महसूस हो रही थी। लेकिन घटनास्थल के दृश्य उसे दूसरी दिशा में धकेल रहे थे। उसके पास अपनी बच्ची को स्वस्थ करने के दो ही उपाय थे। एक पक्के रास्ते पर शहर का अस्पताल और दूसरा कच्चे रास्तों पर कोई तंत्र मंत्र का अड्डा । उसे बिटिया के दांत चबाते जबड़े और रह रह कर ऐंठी देंह पर तरस आ रहा था। उसकी बिटिया क्लास की टॉपर थी। चंचल , हंसमुख, चुलबुली घर आंगन में फुदकती चिड़िया। कॉलेज के सात से आठ घंटों के बाद भी उसमें देर रात माँ का हाँथ बंटाने में हिम्मत रहती। फिर अपनी पढ़ाई की आप ही जिम्मेदारी ! इस बड़ी बेटी के बाद ही भिन्ना के घर औलाद पैदा हुई थी। दो छोटी बहनों और छोटे भाई का लालन पोषण उसकी उम्र के साथ बढ़ा। 

 भिन्ना घर के अंदर बाहर कर रहा था। उसके पास इतने पैसे नही थे कि वो शहर के किसी अच्छे अस्पताल में दिखा सके। उसने धान के बोरे औने पौने बेच कर शहर के डॉक्टर को दिखाना उचित समझा। सखी उसके इस निर्णय से एक दम आश्वस्त थी। 

सुबह घुप्प कोहरे में भिन्ना की मोटरसाइकिल चल पड़ी। बड़े अस्पतालों के नखरे सहते उसके सखी और उनकी बिटिया के तीन दिन गुजर गए। एक कम्बल में अस्पताल के अहाते की रातें पता ही नहीं चली। कभी डॉक्टर की ढूंढ , कभी बेड का इंतज़ार , कभी दवाइयों की कतार में घड़ी की सुइयां मिट गयीं थीं। बिटिया के सर के जख्म भरने लगे थे। दौरे पहले से कुछ कम हुए थे।  मस्तिष्क , हृदय की जांचें सामान्य निकलीं।  फिर भी पांच हज़ार की दवा उन्हें सब कुछ ठीक होने की सांत्वना दे रही थी।

घर का बरामदा धान के बोरों से खाली हो चुका था। बाकी बच्चों को पहले ही मामा के यहां भेज दिया गया था। शालू ठहर गयी थी , सखी मुरझा गयी थी। गाँव का वह छोटा सा घर इससे बड़ा और खाली कभी नही हुआ था। चूल्हा बड़ी मुश्किल से जला। राख पर राख जमा होती रही। 

भिन्ना को अभी भी कुछ खटक रहा था। उसके दिमाग में घटना स्थल का दृश्या चस्पा हो गया था। गाँव गली में उसे जो जैसा बता देता करने लगता। उसकी मोटरसाइकिल और सखी कहीं जाने , दिखाने को तैयार रहती। आज वो गाँव से 70 किलोमीटर दूर आया था। पांच किलो रवा , 10 किलो चीनी , 10 किलो आँटा , 5 लीटर कड़वा तेल और मेवे वह मोटरसाइकिल में बांध के लाया था। दरबार में बिटिया के पहुँचते ही तख्त पर बैठा भीमकाय टीकाधारी झूमने लगता है। भिन्ना दंडवत हो जाता है। सखी काँधे पर हाँथ धर शालू को उस आदमी के नज़दीक ले जाती है। गुफा नुमा काले रंग से पुती उस खोह में सब को झुक के चलना पड़ता। उस आदमी ने शालू की पीठ पर हाँथ फेरा। और भिन्ना को भंडारा करने, नियम संयम रखने और खुद में सुधार करने की दलील दी। अंटी से 1001 की दक्षिणा ढीली करने के बाद उसे बताया गया कि 7 दिन में वह ठीक हो जाएगी। फिर भी भिन्ना और सखी का दिल न माने। नाते रिश्तेदारों ने जितने ठीये बताये थे। भिन्ना उन सभी जगहों पर अपनी बिटिया को ले गया। पर उसकी तबियत में कोई सुधार नहीं। 

  गाँव के एक किनारे बसे कुनबे में केवल भिन्ना ही अपने बच्चों को पढ़ा रहा था। शालू 11 वें में है। उससे छोटी आतू आठवें में पढ़ती है। बाबू पांचवें में पढ़ती है और सबसे छोटा बेटा दूसरी में है। बाप दादा से मिली जमीन का बड़ा सा हिस्सा महाजनी में चला गया। जो भी थोड़े बहुत खेत खुद के और बटाई के से जीवन कट रहा था। शालू पर आई इस बला ने घर की स्थिति डांवाडोल कर दी थी। शालू की तबियत पर उसका हज़ारों रुपया टूट चुका था। वो कर्जदार हो गया था। अब उसकी हिम्मत जवाब देने लगी थी। पूरा घर शालू की देख रेख में व्यस्त रहता। शालू के  मष्तिस्क के साथ साथ उसका शरीर भी सिथिल होने लगा था। 

    रात लगभग खत्म होने को थी। भिन्ना को आंगन के पास किसी के कदमों की आहट सुनाई दी। वो चुपके से उठा और आंगन की तरफ लपका। तब तक कोई मिट्टी की दीवाल फाँद के भाग निकला। पौ फटते ही भिन्ना ने ओस से गीली मिट्टी में कदमों के निशान का पीछा करना शुरू किया। लेकिन वो कुछ  ही दूरी पर ख़त्म हो गए। बड़े बड़े जूतों के निशान उसके दिमाग में जैसे छप गए हों। पूरा दिन वह गाँव घूमा लोगों के पैरों के निशान देखते देखते। गाँव के मध्य सरपंच का घर उससे न चाहते हुए भी छूटा रहा। ऊँची जात के लोगों के घरों में तांक झांक करना भी अपराध होता है। सवाल जवाब तो दूर की बात है। वह बिना किसी से इस घटना की चर्चा किए वापस आ गया। यहाँ तक इस बात का जिक्र उसने सखी से भी नही किया। लेकिन इस घटना को शालू की हालत से जोड़ के देखना भिन्ना को उचित नहीं लगा। इस रात भिन्ना चौकन्ना था। 

सुबह सुबह गाँव में हल्ला हो गया कि सरपंच के 22 साल के लड़के को पुलिस पूंछतांछ के लिए उठा ले गयी है। सरपंच के मोहल्ले में तीन साल की बच्ची के साथ बलात्कार और निर्मम हत्या के संदेह में।

बच्चों को उड़ने दो ..

 उड़ने दो , उड़ने दो  बच्चों को उड़ने दो ... गर नाक अटक जाए  तो भी तो  उड़ने दो ..   जिस ऊर्जा का  संचार प्रवाह  हो उद्दंड  उसको भी  उड़ने दो  कह...