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मंगलवार, 28 जुलाई 2026

औरतें !

 तीन माएं खो चुका हूँ . मेरी अम्मा , बड़ी अम्मा , मेरी दूसरी माँ . तीनों के घर बेतरतीब चल  रहे हैं . सब परेशान हैं . उस बात से जिस बात को कभी भी तरजीह नहीं दी गयी . औरत ! 

हां औरत ! 

या यूँ कहें औरतें .... ! 

अम्मा बहुत दयालु थी . वो इसी को भूखा नहीं सोने देती थी . घर के बच्चे , दादा जी , पापा को , काम को आये लेबरों को , किसानों को खाना जरुर देती थी . वो अन्नपूर्णा थी . घर का लें दें सब उन्ही के हांथों . वो जब बैठीहोती थी . तब वो एक राजा की रानी की तरह बैठती थी . 


बड़ी अम्मा ! एक दम शहद सी . उनकी भाषा , सा को श कहना और हमेशा शिष्टाचार के नितांत हिलोरें पैदा करना . मास्टरनी ! अकेले जीप से विद्यालय के कार्यों से दौड़ती , भागती अपने बच्चों को एक आदमी से बचाती रहती थी . सरकारी नौकरी का पूरा का पूरा मान रखना . अम्मा की भाषा बोली स्वयं में एक शिक्षक थी . 


मेरी माँ के बाद दूसरी माँ ....

क्या गजब का स्टैमिना था उनमें . सुबह से लेकर शाम तक काम काम और काम .... ! उसकी जुबान पर हमेशा दुवाएं रहती थी . हाय मोरा बेटा , हाय मोरी बिटिया .... मा को कई साड़ी भाषाएँ  आती थी . पंजाबी , मराठी , गुजराती . हिंदी , अंग्रेजी सीख रही थी वो .  दुनिया भर की ख़ुशी का भार जैसे उनके ही कन्धों पर था . 


तीनों माओं के जाने के बाद सब के घर तितर बितर हुए पड़े हैं . 

माओं के जाने का सिलसिला ऐसा चला . दो अस्पतालों की नाकामी में चली गयी . एक अपने आप ही छोड़ गयी एक भरा पूरा परिवार . दूरी की डोरी बहुत मजबूत नहीं होती . 

अम्मा ने आखरी के कुछ महीनों में वो दर्द देखा है . जिसे देख के तीमारदार घबरा जाए . मैं भी बना था चौबीस घंटे के इए तीमारदार . अम्मा के यहाँ से नली , वहां से नली , पूरा शरीर फूला हुआ . आँखें भिछी हुयी . अम्मा अम्मा कहने पर दीप्तमान होकर फिर बुत जाती . डॉक्टर कहते और चौबीस घंटे , और चौबीस घंटे ... ! कभी साँसे चला दिखाते तो कभी आँखें ! लाखों रुपये का मीटर चल रहा . एक महीने वेंतिलाटर पर . हमारी आधुनिक क्रान्ति के  उपकरणों ने एक महीने माँ को ज़िंदा रखा . 


बड़ी अम्मा के डायपर घर के पिछवाड़े पेड़ों में टंगा जब जब मैंने देखा . मुझे हैरानी होती रही . हमारी कॉलोनी के सामने एक बड़े से तालाब में मैंने कई एडल्ट डायपर कुत्तों को नोचते देखा है . वो दोनों दृश्य वीभत्स दृश्य हैं . कैसे कोई माँ बाप अपने माँ को इस तरह  से समाज में प्रतिष्ठित कर सकता है ? 




या मैं पागल हो जाऊं .... !

आज फिर सुबह हुयी बीती रात के बाद . आज फिर सूरज निकला अँधेरी रात के बाद . घड़ी अपनी गति से आगे बढ़ रही है . घडी के साथ साथ सुबह बीत रही है . कुछ देर बाद दोपहर होने को है . और फिर शाम . फिर रात . ऐसा लगता है सोने और जागने के बीच जिन्दगी बीत रही है . यूँ ही बीतते रहने के साथ रहते हुए अब  ऊब सी हो चली है . इस ऊब से निपटने के लिए कभी टी वी का सहारा लेता हूँ , कभी रेडियो का . 
   वैसे मोबाइल तो हमेशा साथ रहता है , धड़कन की तरह . हाँ , मोबाइल अब हमारी जिन्दगी की धड़कन है . मोबाइल न हो तो ऐसा लगता है जैसे किसी ने साँसें छीन ली हों . इसलिए वह हमेशा साथ रहता है . सुख , दुःख , उत्सव हर समय कभी ऊपर वाली बायीं जेब में  तो कभी हाँथ में तो कभी पेंट के जेब में .
    बड़ा सा घर है . घर में सब हैं . जो एक घर में होते हैं . सारी सुविधायें हैं जो एक घर में होनी चाहिए भी सुलभ हैं  . एक काम करने की जगह है . जहां एक दर्जन लोग काम करते हैं . हम सभी के घरवालों को मिला कर करीब आधा सैकड़ा लोग तो उस काम की जगह के होने से चल रहे हैं . 
   यह सब होता चला आ रहा है एक दशक से ऊपर के समय से . इस चलने को क्या जिन्दगी कहा जा सकता है ! कहते तो सुनता अपने इर्द गिर्द अभी लोगों कि हाँ यही जिन्दगी है . अगर यही जिन्दगी है . तो यह भरती क्यूँ नहीं है भीतर को . हमेशा खाली खाली सा महसूस हुआ करता है . इतने संसाधन , इतने लोगों से घिरे  होने के बाद भी यह खालीपन अजीब सा महसूस कराता रहता है . लम्बे समय से इस अजीब से महसूसने से छुटकारा पाने के लिए क्या विकल्प हो सकते हैं ? 

बिक गयीं संवेदनाएं ....

 बिक गयीं संवेदनाएं ....


बिक गयीं संवेदनाएं 

थक गया है जोश रे 

क्या करें हम फिर से आके 

ये बताओ होश में 

क्या करें हम फिर से आके 

ये बताओ होश में ....



सोमवार, 24 नवंबर 2025

कौन हो तुम ....



कौन हो तुम 

जो समय की खिड़की से

झांक कर ओझल हो जाती हो 

तुम्हारे जाने के बाद 

तुम्हारे ताज़ा निशान 

भीनी खुशबू और 

गुम हो जाने वाला पता 

महसूस तो होता है 

पर तुम्हारा सामना करने की

राह नहीं मिलती 

तुम्हारे होने न होने के बीच

का फासला हमेशा धुंधला

ही क्यों होता है ?


कौन हो तुम 

जो ठहरना भूल गई हो 

हवा से बातें करतीं 

पंख फड़फड़ाती उड़ती

उन्मुक्त आकाश में 

पहाड़ी सर्द हवाओं पर सवार 

ऊंघते जीवन को 


झंकृत कर जाती हो ! 



रविवार, 2 नवंबर 2025

राह कटे संताप से !

फिर झुंझलाकर मैने पूछा

अपनी खाली जेब से 

क्या मौज कटेगी जीवन की

झूठ और फरेब से 

जेब ने बोला चुप कर चुरूए

भला हुआ कब ऐब से 


फिर खिसिया कर मैने पूछा

अपने भारी पेट से 

क्या भार घटेगा पेट का

रुखी सूखी खाए के 

पेट ने बोला चुप कर लुबरा 

भार घटे ना अघाये से


फिर तन्ना कर मैने पूछा

अपने आत्म विवेक से 

क्या राह कटेगी जीवन की

संघर्षों की थाप से 

विवेक ने बोला चुप कर पगले

राह कटे संताप से !



बच्चों को उड़ने दो ..

 उड़ने दो , उड़ने दो  बच्चों को उड़ने दो ... गर नाक अटक जाए  तो भी तो  उड़ने दो ..   जिस ऊर्जा का  संचार प्रवाह  हो उद्दंड  उसको भी  उड़ने दो  कह...