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रविवार, 10 अगस्त 2025

बड़ा पार्क / कहानी

 


डिस्क्लेमर :- कहानी के सभी पात्र काल्पनिक हैं . जगह और समय भी काल्पनिक है . कहानी में किसी भी नाम और समाज का उपयोग , केवल वस्तुत्स्थिति को सामाजिक परिद्रश्य की नज़र से दिखाने का प्रयास भर है . यदि कहानी से मिलते जुलते किरदार आप को इतने प्रिय लगें कि आप खुद को कहानी के साथ कनेक्ट कर के देखने लगें . तो यह हमारा बेहतर प्रयास रहेगा .

धन्यवाद .

 

किसी भी बसावट का सबसे रोचक पहलू वहां का वातावरण होता है . वातावरण मतलब , साफ सुथरी सड़कें , साफ सुथरी नालियाँ , चमचमाती लाईट व्यवस्था और हरा भरा वातावरण . शहर की किसी सोसाइटी या कॉलोनी में यह सब सुविधाएं मिल जाएँ तो क्या ही कहने .  फिर लोग चाहे जैसे भी हों निभ ही जाता  है .

 मनोहर अपने घर की  बालकनी में बैठ के गहरी सोच में डूबा हुआ है . अपनी किस्मत के विषय में सोच सोच के मंद मंद मुस्कुरा रहा है . वह वाकई बहुत किस्मत वाला है . आज से 10 साल पहले उसकी आवास विकास में लाटरी खुली थी. शहर के सबसे पॉश क्षेत्र में 18 सौ स्क्वायर फीट के प्लाट की लाटरी .  लाटरी मतलब सट्टे वाली लाटरी नहीं . लाटरी सिस्टम से आवास विकास कॉलोनी में प्लाट पाने वाली लाटरी .

उसे याद है 500 लोगों से ज्यादा ने आवास विकास में प्लाट के लिए फॉर्म भरा था . उन सैकड़ों लोगों में ,  मात्र 50 लोगों को प्लाट आवंटित हुए थे . आवंटन तो लगभग 100 होने थे . लेकिन  बाकी के 50 आवास विकास के अधिकारी , कर्मचारियों ने या तो खुद , या अपने करीबियों के लिए संरक्षित कर लिए थे .

   मनोहर को इस  शहर में आये 20 वर्ष से ज्यादा हो गए हैं . 10 वर्ष उसने खूब मेहनत की . घर के सपने को पूरा करने के लिए पेट काट काट के धन संचय किया . और प्लाट खरीदा , घर बनवाया . 8 वर्षों से वो और उसका परिवार इस घर में रह रहे हैं . उसने अपनी हैसियत से ज्यादा खर्च कर के , लोन लेकर ये घर बनवाया था .  

उसका एक बेटा किराए के मकान में पैदा हुआ था . एक बेटी इसी घर में पैदा हुयी . इस घर में प्रवेश के साथ ही उसकी बेटी काव्या  पैदा हुयी थी . बेटा सनी 16 का है और बेटी 7 वर्ष की  है . पत्नी हाउस वाइफ है . पिता फ़ूड कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया से रिटायर हो चुके हैं . रिटायर होने के बाद से पिता अपनी सेहत के लिए बहुत सजग रहते हैं .

मनोहर की माँ अपनी सेहत से ज्यादा पूजा पाठ पर ध्यान देती है . सुबह 2 घंटा और शाम का दो घंटा उसका पूजा - पाठ में जाता है . कुल मिला के मनोहर का जीवन सामान्य रूप से ठीक ही चल रहा है . घर में सब स्वस्थ हैं . बच्चों की  पढाई लिखाई ठीक चल रही है . नौकरी भी ठीक ही चल रही है . पत्नी रमा से मनोहर की कम ही बनती है . मगर ठीक है , पति पत्नी में एक समय के बाद कम ही बनती है . जो इस कम बनने में भी अच्छे से निभा ले उसे सुखी ही कहा जाएगा .

आज सन्डे है . मनोहर अपनी बालकनी में झूले पर  बैठा आवास विकास के दिनों कि कहानी मन ही मन दोहरा रहा है . रमा मनोहर को आवाज़ देकर उस कहानी से बाहर निकालती है . “ आइये अन्दर ,  चाय नाश्ता कर लीजिये . आज आप को पार्क के उदघाटन में भी जाना है .  मम्मी पापा  , सनी और काव्या को भी ले जाइएगा , लगता है उद्घाटन की  तैयारियां पूरी हो चुकी हैं “

मनोहर झूले के झूंक को रोकता है . “ अच्छा भाई “ कहता हुआ उठता है . कमरे में जाकर सभी लोग डाइनिंग टेबल पर नाश्ता करते हैं . नाश्ता खत्म करके सनी और काव्या बालकनी से पार्क में हो रही हलचल को देखते रहते हैं . बाकी सब अपने अपने कमरों में चले जाते हैं . मनोहर और रमा एक कमरे में और मम्मी पापा एक कमरे में . सनी और काव्या एक कमरे में रहते हैं .  नीचे वाले पोर्शन में एक परिवार किराए पर रहता है .

 बच्चें और मम्मी पापा पार्क के उदघाटन के लिए उत्साहित  हैं . पर मनोहर को उसके सन्डे का , उदघाटन में व्यर्थ चले जाने का डर सता रहा  है . पत्नी रमा भी सब के चले जाने के बाद की शान्ति और आराम के लिए उत्साहित है .

 

कुछ देर के बाद , पार्क से अनाउंस मेंट  होती है .

“ आप सभी कालोनी वासियों को सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है . कि कुछ ही देर में हमारे बीच माननीय मंत्री जी पार्क का उदघाटन करने के लिए उपस्थित होने वाले हैं . आप सभी से अनुरोध है कि इस भव्य पार्क के उदघाटन अवसर पर आप सभी आयें और इस ऐतिहासिक पल का हिस्सा बने “

रमा ने पति , पिता और सनी को एक ही रंग का कुर्ता पायजामा पहनने की  सलाह दी . मम्मी को उसी रंग की साड़ी पहनने के लिए कहा . सभी ने ठीक वैसा ही किया . और घर के सामने पार्क के उदघाटन में शामिल होने पहुच गए .

 

पार्क के बीच - ओ - बीच एक भव्य पांडाल लगा हुआ है . पांडाल में एक भव्य स्टेज है जिसपर कुछ कुर्सियां पड़ी हुयी हैं . कुर्सियों की अग्रिम पंक्ति को माननीयों  के लिए छोड़ दिया गया है . पीछे वाली पंक्ति में कॉलोनी के वरिष्ठ और विशिष्ट जन विराजमान हैं . पीछे वाली पंक्ति में मनोहर के पिता भी बैठ जाते हैं .

मनोहर और बाकी सभी लोग  स्टेज के ठीक सामने नीचे पड़ी कुर्सियों पर बैठ जाते हैं  . मोहल्ले से लोग तैयार हो - हो कर आते जा रहे हैं और अपनी - अपनी सुविधानुसार बैठते जा रहे हैं . बच्चों के लिए कोई विशेष इंतजाम नहीं है . इसलिए बच्चे या तो अपने अविभावक या अपनी मंडली में बैठते जा रहे हैं . महिलाओं के लिए साइड की दो पंक्तियाँ आरक्षित हैं .  

पांडाल के भीतर गहमागहमी भीड़ के साथ ही बढती जा रही है . मंत्री जी के आने में अभी भी लगभग 20 मिनट की  देरी है . इसलिए सभा का टाइम पास करने के लिए किसी न किसी को स्टेज पर बोलने या कुछ मनोरंजक प्रस्तुति देने के लिए बारी बारी से आमंत्रित किया जा रहा है .

कॉलोनी में हर तरह के लोग हैं . खासतौर से पार्क के चारों तरफ घरों में सभी प्रकार के घर हैं . एल आई जी यानी लोअर इनकम ग्रुप , एम् आई जी यानी मीडियम इनकम ग्रुप और एच आई जी यानी हाई इनकम ग्रुप के घर चारों दिशाओं में स्थित हैं . इन सभी घरों के लिए एक चीज़ कॉमन  है वो है ‘पार्क ‘ . पार्क के आस पास एक चपरासी से लेकर बड़े अधिकारियों और कारोबारियों के भी घर हैं . ऊंच -  नीच कहाँ नहीं होती . पर पार्क  सार्वजनिक स्थल पर सरकारें , सभी के लिए एक समान व्यवहार करते हैं . और होना भी यही चाहिए . प्लांड रिहाइश का यही फायदा होता है .

 

स्टेज से फिर से अनाउंस होता है . आप सभी लोग स्टेज के बायीं तरफ रखे फूल मालाओं को अपने हाँथ में , मंत्री जी के स्वागत के लिए ले सकते हैं . कुछ ही क्षणों में मंत्री जी आने वाले हैं . आप लोगों से निवेदन है कि आप सभी लोग मंत्री जी का स्वागत माल्यार्पण कर या पुश्वर्षा कर कर सकते हैं .

पार्क के मुख्य द्वार पर एक शिलापट है , जिसका रिबन काट कर मंत्री जी उदघाटन करेंगे . उसके बाद मंत्री जी को स - सम्मान  स्टेज तक लाया जाएगा . आप में से कुछ लोग स्टेज पर आ कर मंत्री जी को धन्यवाद ज्ञापित  कर सकते हैं . उसके बाद मंत्री जी का उद्बोधन होगा , उसके बाद नगर पालिका अध्यक्ष श्री कांतिलाल जी का उद्बोधन होगा . फिर अंत में सूक्ष्म जलपान होगा . जलपान के बाद सभा का समापन होगा . आप सभी लोगों से सविनय निवेदन है , कि कृपया सभ्य आचरण का परिचय दें .

 

मंत्री जी का काफिला , मंत्री जी के जयघोष के साथ पार्क के मुख्य द्वार से प्रवेश करता है . पांडाल में उपस्थित विशिष्ट और वरिष्ट जन पहले से ही पार्क के मुख्य द्वार पर खड़े थे . पर मंत्री जी का काफिला सीधे अन्दर प्रवेश करता है . स्वगातोंमुख जन , तेज कदम  मंत्री जी की  कार की  तरफ बढ़ते हैं . पुष्प वर्षा और माल्यार्पण के बाद मंत्री जी को एक  युवा ठेकेदारों की टीम ,    शिलापट के पास तक ले जाती है  . रिबन कटता है .  मंत्री जी कृतज्ञता से पांडाल में बैठे  लोगों को नमस्कार करते हुए स्टेज पर चढ़ जाते हैं .

 

स्टेज की कमान मोहल्ले में रिटायर्ड आई. ए. एस. राधा मणि श्रीवास्तव के हाँथ में है .  इसलिए माइक भी उन्ही के हांथों का कहा मान रहा है . श्रीवास्तव जी मंच से कहते हैं .

 

“ भाइयों और बहनों , यह बड़े ही हर्ष की बात है , कि आज हमारे बीच प्रदेश के कैबिनेट मंत्री श्री स्वपन सेठ जी हमारे पार्क का उदघाटन करने यहाँ उपस्थित हैं . इस पार्क का अधिकतर कार्य मंत्री जी की विधायक  निधि से संभव हुआ है . उनके करकमलों से इस पार्क का उद्घाटन होना हम सब के लिए गर्व की  बात होनी चाहिए .

मुझे याद है ! कई बार इस पार्क के सुन्दरीकरण के प्रस्तावों को लेकर हम नगर पालिका गए . पर कभी फंड्स को लेकर कभी प्लानिंग को लेकर यह कार्य टलता रहा . एक बार हम सभी कॉलोनी वासियों के प्रतिनिधियों ने मंत्री जी से इस कार्य को आहूत करने के लिए निवेदन किया . मंत्री जी ने तुरंत स्वीकार किया . और बहुत कम समय में , हम को हमारा पार्क , अपनी सही दशा में प्राप्त हुआ .  मैं सभी कॉलोनी वासियों की तरफ से मंत्री जी का धन्यावाद करता हूँ . और उनसे निवेदन करता हूँ कि वो अपने श्री मुख से हम सब को अभिसिंचित  करें .  “

 

इस एक मिनट के संबोधन में मंत्री जी के चेहरे पर मद्धिम - मद्धिम  मुस्कान तैरती रहती है . वो कुर्ता संभालते हुए माइक के पास  आते हैं .

गौर वर्ण , काले बाल , आँखों पर काला चश्मा , दाहिने कलाई  में सोने की  ब्रेसलेट , और बड़ी - बड़ी विभिन्न धातुओं की बनी अंगूठियाँ उनके हांथों की  शोभा बढ़ा रहे हैं . मांग की रेखा से ठीक बाएं तरफ उनके 60 परसेंट बाल और दाहिने तरफ 40 परसेंट बाल तहे रखे हैं . माइक संभालते हुए वो पांडाल की  तरफ झुक कर नमस्कार करते हैं . और कहते हैं .

   “ भाईयों और बहनों ! आज मैं बता नहीं सकता कि मैं कितना  खुश हूँ . आप सभी की सेवा में इतना आनंद है , इसे मैं शब्दों में वर्णित नहीं कर पाउँगा . आप सभी लोग , शहर के चुनिन्दा लोगों में से एक हो .  यहाँ का कोई इंजिनियर हमारे शहर की सड़क बना रहा होगा .  देश के किसी कोने में कोई डॉक्टर होगा . यहाँ के बहुत साथी हमारे पार्टी के कार्यकर्ता भी हैं . मैं जब भी इस पार्क को देखता था . तो सोचता था कि यह पार्क पूरे आवास विकास का  सबसे बड़ा पार्क है . इसे इसकी भव्यता के लिए पहचान मिलनी चाहिए .

मुझे याद है कभी इस पार्क में आवारा पशुओं  का जमावड़ा रहता था . मैं देखता था यहाँ बरसात में पानी भर जाता था . अन्धेर नगरी में असुरक्षित पड़ा रहता था यह पार्क . मैंने अपनी निधि से 20 लाख आवंटित किये थे . पर हमारे यहाँ के युवा साथियों  के अनुरोध पर हमने 10 लाख का बजट और बढाया . आज देखिये  पार्क को . पार्क में बाउन्ड्री है , झूले लगे हुए हैं . पेड़ लगे हुए हैं कतार में . मोर्निंग रैंप बना है . और अब हाई मास्त लाईट लगीं हैं . 10 लाख के कम बजट में हमने 20 हाई मास्त लाइट्स की  व्यवस्था  करवाई .  

एक मुख्य गेट और 6 रेवोल्विंग गेट लगे हैं . अब आप सब , जब इस पार्क  में आते होंगे तो सुरक्षा के वावरण में खेलने कूदने , योग , मोर्निंग वाक् की इक्षा खुद ही मन में जाग्रत होती होगी .

 हमें अच्छे से ज्ञात है , कि क्षेत्र के नागरिकों की सुख सुविधाओं का ख्याल रखना हमारा कर्त्तव्य है . आप सभी को इस पार्क की बधाई हो .

मैं तो कहता हूँ बच्चों से भी , कि आप सभी अपना शारीरक स्वास्थय का ध्यान रखें . सुबह कसरत करें , दौड़े और खूब खेलें . जिससे कि , घर में पढ़ाई पर ध्यान अच्छे से दे पायें .

माताओं से आग्रह करता  हूँ , कि वो पार्क में खूब आयें . सुबह शाम बैठ कियां  लगाएं और टहले भी सुबह शाम . बुजुर्गों से मैं कहना चाहूँगा , कि आप सभी एक लाफ्टर क्लब बनाइये . खूब हंसा करिए ताली बजा - बजा के . स्वास्थय वर्धक है घूमना , टहलना , योगा करना .

श्रीवास्तव जी , मैं आप का भी आभार व्यक्त करता हूँ . कि आप ने इतनी प्यारी  जनता के साथ हमें कुछ देर बैठने का मौक़ा दिया . आप सब के सानिध्य से अविभूत हूँ . आशा करिए , मैं  इस पार्क में आता रहू , किसी न किसी बहाने से . मुझे अच्छा लगेगा  आप सब के बीच बैठ के . “

मंत्री जी ने ससम्मान माइक छोड़ दिया और अपनी कुर्सी पर आकर बैठ गए .

 

श्रीवास्तव जी के हाँथ में माइक आते ही , माइक दहाड़ने लगा  .  आप सभी लोग मंत्री जी को तालियाँ दीजिये . पांडाल तालियों की  गडगडाहट से गूँज उठा है .

 

मंत्री जी अपने गार्ड्स  के साथ, अपनी गाडी अक पहुचने तक ,  नीचे उतरने लगते हैं . बाकी सभी पांडाल के नीचे अपनी - अपनी जगह बैठ जाते हैं . मनोहर खडा होकर , मंत्री जी को आग्रह से आवाज़ देता है .

“ मंत्री जी , ज़रा एक मिनट निवेदन है . “ मंत्री जी मनोहर की  तरफ बढ़ते हैं .

“ मंत्री जी , आप ने बहुत अच्छा काम किया . इस पार्क के रेनोवेशन होने से आवास विकास कॉलोनी का सौन्दर्य बढ़ गया है . अब आप का काम पूरा . अब ये पार्क हमारे  हवाले है . हम इसकी जिम्मेदारी अच्छे से निभाएंगे . मंत्री जी आप से निवेदन है , कि यहाँ का अतिक्रमण हट जाए तो ... “

मंत्री जी ने मनोहर के कंधे के ऊपर हाँथ रख के कहा . अरे ! अतिक्रमण तो हमारे दिल में है . उसे खत्म करें या रखें ?  

आप सभी को धन्यवाद . मंत्री जी अपने काफिले के साथ निकल गए . मंत्री जी के साथ ही बाकी नगरपालिका  अध्यक्ष और बाकी लड़कों का भी काफिला धूल उडाता हुआ चला गया . कम समय होने के कारण नगर पालिका के अधिकारीयों को बोलने का मौक़ा नहीं मिला .

कुछ क्षणों के बाद ...

स्टेज से श्रीवास्तव जी ने पांडाल में से किसी को स्वेच्छा से कुछ बोलने का न्योता दिया .

पांडाल से तिवारी जी ने हाँथ खड़ा किया . तिवारी जी , स्टेज पर आकर बोलना शुरू किये .

“ दोस्तों आज का दिन बहुत ही विशेष है . यह पार्क हमारी मौलिक जरूरतों में से महत्वपूर्ण सुविधा है . पहले यह पार्क टहलने लायक भी नहीं था . अब देखिये , हमारे सामने बढ़िया पार्क है . अब हमारी सबकी जिम्मेदारी है कि इसे साफ सुथरा रखें . और खुद से ही पार्क की  लाईट को शाम - सुबह जला बुझा दें . आप सभी को पुनः  बधाई . इन बातों के साथ अपनी वाणी को विराम देता हूँ . जय हिन्द जय भारत . “

 

श्रीवास्तव जी ने फिर माइक से किसी और को , स्वेक्षा से संबोधन के लिए  बुलाया . कई लोगों ने पांडाल से हाँथ  उठाया . पर श्रीवास्तव जी ने ठाकुर साहब की ओर  इशारा कर के , उन्हें मंच पर बुलाया .

ठाकुर साहब कपकपाती आवाज़ में...

“ देखिये , अब आप सब लोग सभी शहरी नागरिक  हैं . आप लोगों से शहर के तौर तरीकों के बारे में क्या ही बात करना . आप सब से बस यही कहना चाहूँगा , इस सुन्दर से पार्क में साल में कम से कम 2 या 3 धार्मिक अनुष्ठान होने चाहिए . जिससे कि हमारे बच्चों में हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना का जागरण हो सके . हमारे जैसे बुजुर्गों के लिए साल -  छः महीने में एक अच्छा सा  अनुष्ठान हो जायेगा . और क्या रखा है जीवन में . भगवान् की भक्ति के अलावा  . “

मंत्री जी के बाद पंडाल में सबसे ज्यादा तालियां ठाकुर साहब के संबोधन में बजी .

 

श्रीवास्तव जी ने आखरी वक्ता के रूप में किसी एक को ,  स्टेज पर आने के लिए न्योता दिया .

 

इस बार मनोहर तैयार थे . पंडाल  में मनोहर और स्टेज पर श्रीवासव जी की आँखों में तालमेल बैठा . और दर्जन भर हाँथ उठाये लोगों के बीच से मनोहर का चयन हो गया .

मनोहर स्टेज की तरफ जाते हुए सोच विचार में थे , कि उने कहना क्या है स्टेज पर ...  

 

आखरी वक्ता का उद्बोधन सुन के पांडाल में बैठे लोगों के धैर्य की तंद्रा टूट गयी . और लोग बार-बार उठने के लिए बैठने की  मुद्राएँ बदलने लगे .  अब तक बच्चे भी ऊबने  लगे थे .

 

आप  सभी लोग कृपया धैर्य बनाए रखिये . बस 2 मिनट में अपनी बात खत्म कर दूंगा . मुझे याद है , कि हम सभी को अभी जलपान के लिए भी जाना है . कृपया आप शांत हो जाएँ .  बैठ जाएँ अपने- अपने स्थान पर .

दोस्तों ! मेरे लिए यह क्षण अत्यंत आत्मीय है . मैं गाँव से एक बेहद पिछड़े परिवार से आता हूँ .

जब मैं पहली बार अपने पिता के साथ शहर आया था . तब मैं शहर को देख कर बहुत खुश हुआ था . मुझे लगा कि जब कभी मैं बड़ा हो जाऊंगा . शहर में घर जरुर बनाउंगा . मुझे लगता है , हस सभी लोग किसी न किसी प्रकार से गाँव से जुड़े रहे हैं . शहर में आना हमारे लिए प्रमोशन की तरह है . जीवन स्तर में प्रमोशन की तरह .

मुझे अच्छा लग रहा है यह सुंदर पार्क देख के . हमारे बच्चे यहाँ खेलेंगे . सबसे बड़ी बात है यहाँ  सुरक्षा का एहसास है . हमें पता रहता है हमारा बच्चा पार्क में खेल रहा है . पार्क के आस पास साइकिल चला रहा है . हमारे बुजुर्ग माता पिता पार्क में हैं , सुरक्षित हैं .

मुझे तो लगता है . क्या सुन्दर दृश्य हो , जब इस पार्क में खूब सारे बच्चे खेलते हों . छोटे बच्चे सुबह शाम कोमल मौसम में पार्क में खेल रहे हों . पार्क के किनारे 300 मीटर मोर्निंग ट्रैक है . जिसमें बड़े बुजुर्ग टहलते हैं . बीच में बच्चों के लिए क्रिकेट नेट प्रैक्टिस करने की  सुवधा होनी चाहिए . या अन्य खेल कूद के छोटे छोटे प्रोग्राम होने चाहिए . मेरे कहने का मतलब है पार्क का समय यूँ ही खाली न जाया करे . हम सब को अपने - अपने हिस्से का पार्क मिल सके . अपने हिस्से के पार्क को हम सहेज के इस्तेमाल करने की  आदत डाल लें . धन्यवाद . आप सभी का और बच्चों ! आप सभी लोगों को खेल का मैदान बहुत शुभ हो .  “

 

इतना कहकर मनोहर स्टेज के नीचे अपने बच्चों के पास आ जाता है .  तालियाँ मद्धिम गति से थोड़ी सी बजीं . पर पिता ने मनोहर की  सराहना खूब खूब की .  “

उदघाटन सभा का समापन एक अच्छे से नास्ते के साथ पूरा हुआ .

 

मनोहर , बच्चे और माता पिता भी साथ अपने घर आ गए .  शाम होने को है .

 

डिनर करने के बाद मनोहर स परिवार सामने पार्क के बाहर की सड़क पर  टहल रहा है . और सोच रहा है .

पार्क की लाइट्स जल गयी हैं . देर शाम तक पांडाल भी  उखड गया . तो अचानक से पार्क बड़ा बड़ा लगने लगा . इस समय यह पार्क एक दम क्रिकेट स्टेडियम की तरह जगमगा रहा है .

आज पार्क में कार्यक्रम होने के बाद की गन्दगी  के कारण , पार्क के अन्दर कोई नहीं गया है . कल सभा के बाद पार्क से केवल पांडाल ही हटा . बाकी दोने , पत्तल , प्लास्टिक की ग्लास , गुलदस्तों की पन्नी और बचा - खुचा खाना सब जहाँ का तहां पड़ा रह गया . मंत्री जी के कार्यक्रम के बाद इस पार्क में सुबह तक गाय , कुत्ते और सांड का आधिपत्य कायम रहेगा  .

 

पर मनोहर को सुबह , सफाई वालों की  फ़ौज पर भरोसा है . वे जरुर से जरुर इस पार्क को चमका के रख देंगे . कूड़े का नाम ओ निशाँ न रह जाएगा .

 

पार्क के आस पास  का वातावरण खुशनुमा देख आज पूरे मोहल्ले के घर में सुख शान्ति है . सब के घरों में इस पार्क की चर्चा  जरुर हुयी होगी .

 

पार्क का एक संक्षिप्त वर्णन :

पार्क में लाइट होने से पूरा मोहल्ला चमक गया है . अब स्ट्रीट लाइट और पार्क की  लाइट मिलकर खूब चमकदार हो चुकी हैं .

पार्क के चारों तरफ बने घरों की शोभा बढ़ गयी है . पार्क के दो कोने में बच्चों के लिए दो दो झूले लगे हैं . एक एक टिक टोक लगा है . तो बाकी के दोनों कोनो पर एक एक फिसल पट्टी लगी है .  पार्क के भीतर एक साइड में छोटे बच्चों की हाईट  बढाने के लिए हैंगिंग वाला झुला लगा हुआ है .

पार्क की बाउंड्री लगभग साढ़े 4 फीट की है . पार्क के चारों  तरफ सड़क और उसके बाद नाली उसके बाद कतार में घर . इस पार्क के आस पास क्रिस्चियन को छोड़ बाकी सभी जाती बिरादरी के लोग रहते हैं .  हिन्दू , मुस्लिम , सिख कुछ कनवर्टेड इसाई भी रहते हैं .  हर जाती , हर वर्ग और हर तरह के लोग पार्क के आस पास रहते हैं .  पूरे शहर में इस पार्क की तरह कोई पार्क नहीं है . इसलिए यहाँ हर तरह के लोग पाए जाते हैं .

कोई लेखापाल है , तो कोई डॉक्टर , कोई बड़ा बाबू तो कोई किसान , कोई खाद्य विभाग में तो कोई वन विभाग में .  बहुमंजिला घरों में किराए पर लोग भी रहते हैं . जो कि बाहर के जनपदों से भी हैं .

दुसरे दिन , सुबह 5 बजे से ही लोग पार्क के भीतर मोर्निंग ट्रैक पर चहलकदमी करने लगे . कुछ लोग बेंच पर बैठे हैं . सोमवार होने के कारण  ज्यादा भीड़ नहीं है . लेकिन फिर भी पार्क में बड़े बुजुर्गों की आमद ठीक - ठाक होने लगी है .

 

पूरा मोहल्ला इस पार्क को बार बार निहार रहा है . कोई अपनी बालकनी से तो कोई सड़क पर टहल टहल कर . बच्चे बार- बार बाउंड्री से उचक- उचक के पार्क  को देख रहे हैं . आज जब पार्क एकदम साफ हो जायेगा .  तब अच्छा लगेगा यहाँ .  मंत्री जी का विकास  कार्य लहलहा के उठा है .

 

 दिन चढ़ने लगा है . पार्क की  सडांध बढती रही . तीसरे दिन जब मंत्री जी के सहयोगियों की थकान उतरी . तब जाकर साफ सफाई की कंप्लेंट की गयी . और तीसरे दिन पार्क की सफाई हुयी . आमतौर पर सार्वजानिक स्थल किसी के व्यक्तिगत जीवन को प्रभावित करते हैं तो उसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है . कौन सरकारी कामों के झंझावातों में सर खपाए . सरकारी है , तो होयेगा ही , कभी न कभी . इसलिए पार्क की गन्दगी उठने में इन दिन लग गए . पार्क के आस पास रह रहे लगभग सौ लोगों को इतना अर्क नहीं

पडा . कि वो इस ओर कोई ठोस कदम  उठा सकते . मनोहर रोज सुबह शाम पार्क टहलने जाता है . उसकी नज़र पार्क के सभी हिस्सों पर गड़ी रहती . वो अपने बच्चों को पार्क या कोई भी सार्वजानिक स्थल के उपयोग की ट्रेनिंग देता रहता है . मनोहर के हिसाब से हर नागरिक के भीतर  सिविक सेन्स जरुर होना चाहिए .

 

पार्क की दिनचर्या में अब बच्चों का खेलना , बुजुर्गों का टहलना , नौजवानों का जोगिंग करना आदि शामिल हो गया था . पार्क के भीतर घुसते ही ऐसा लगता है जैसे किसी खेल के मैदान में आ गए हों .

 

151 कुण्डीय यज्ञ

अभी 15 दिन भी नहीं हुए पार्क के उदघाटन के . पार्क में एक और कार्यक्रम के होने की तैयारियां शुरू हो गयीं .  151 कुण्डीय यज्ञ . यह कार्यक्रम हर वर्ष शहर के किसी सेठ द्वारा आवास विकास के इस मैदान में करवाया जाता आ रहा है . इस मैदान की भव्यता के कारण ही आयोजक हर वर्ष इस मैदान को कार्यक्रम के आयोजन के लिए चुनते आ रहे हैं .

 बड़े से मैदान में 60 बाई 100 का पंडाल . गाड़ियां खड़ी करने की पर्याप्त जगह .  यहाँ तक जूता चप्पल का स्टाल , भंडारा का स्टाल , पूजन सामग्री के स्टाल और गाड़ियों के पार्किंग की पर्याप्त जगह के बाद भी मैदान का काफी हिस्सा खाली छूट जाता था . क्यों कि मैदान में बाउंड्री नहीं हुआ करती थी .

पर इस बार पार्क में नयी नवेली बाउंड्री है . पार्क का मुख्य गेट जानबूझ कर छोटा रखवाया था . क्यों कि पहले मोहल्ले वाले पार्क के अंदर कोई वाहन न खडा कर सके .

 

इसलिए इस आयोजन के शुभारम्भ से  पहले , सबसे पहले पार्क का मुख्य गेट तुडवा दिया गया . जिससे की टेंट व अन्य आवश्यक सामानों को पार्क के भीतर तक लाया जा सके .

पार्क के बीच में एक भव्य पांडाल लग चुका है . दो ट्राली ईंट 151 हवन कुंड बनाने के लिए गिरवाये जा चुके हैं . रात दिन एक भव्य आयोजन की तैयारियां जोरो से चल रही हैं . पार्क में होने वाले दैनिक कार्यों में बाधा किसी को महसूस नहीं हो रही थी . पार्क के सेंटर में क्रिकेट की पिच पांडाल के नीचे दब गयी . बच्चों के झूलों के पास स्टाल्स लग गए . एक तरफ मोबाइल टॉयलेट लग गए . एक तरफ पार्किंग की व्यवस्था और एक तरफ भोजन प्रसाद के स्टाल्स लग रहे हैं . पार्क में बाहरी व्यवस्थापकों की आवाजाही बढ़ गयी है . इस महायज्ञ के आयोजन में कार्यकर्ता अंधाधुंध लगे पड़े हैं . पूरे पार्क पर आयोजकों का कब्जा है . उन्ही के कमांड हैं .

 

मनोहर को यह सब बड़ा अजीब लग रहा है . पर वो अकेले ही क्यों हस्तक्षेप करे . पूरे मोहल्ले में किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता . बल्कि इस आयोजन से सभी खुश हैं . इसलिए उसे भी खुश दिखना चाहिए . मनोहर आयोजन से परेशां नहीं है . पार्क पर एक सप्ताह के लिए कब्जा होना उसे परेशान कर रहा है .  पिछले तीन दिनों में इस महायज्ञ की तैयारियां पूरी हुयी . फिर से एक बार एक भव्य पांडाल और एक  मंच तैयार हुआ . पार्क , हरिद्वार से आये गेरुआ वस्त्रधारियों के नियंत्रण में है . पार्क चरों तरफ लाउडस्पीकर लगे हुए हैं . अब पार्क की घड़ी आयोजकों की घड़ी से तालमेल बिठा चुकी है .

महायज्ञ के उद्घाटन सत्र में फिर से मत्री जी मुख्य अतिथि के तौर पर पधारे हुए हैं . मोहल्ले के सभी वरिष्ट और विशिष्ट जन आयोजकों और गुरुजनों के साथ मंच पर विराजमान हैं . पांडाल मोहल्ले के शर्द्धालुओं और बाहर के श्रधालुवों से भर गया है . बच्चे कभी पांडाल के भीतर तो कभी बाहर बचे हुए मैदान में खूब उधम मचा रहे हैं . जैसे वो इस पूरे आयोजन को एक खेल समझ रहे हों .  इसलिए अधिकतर बच्चे बड़े बुजुर्गों के कोप के भागी बन रहे हैं .

 

पार्क की भव्यता ही इसके आकर्षण का केंद्र है . आवास विकास की इस योजना में एक बड़ा पार्क है .  और एक कृत्रिम तालाब भी है . जो कि कुछ घरों के पार पड़ता है . वहाँ बरसात का पानी जमा होता है . और पूरे मोहल्ले का  कूदा पड़ता है .  पूरी कॉलोनी में या दो लैंडमार्क मशहूर हैं .  पूरे आवास का लैंड मार्क है . बड़ा पार्क और पक्का तालाब .

 

पार्क में रोज सुबह 5 बजे से दोपहर 12  बजे तक और शाम 5 से रात्री 8 बजे तक कथा , यज्ञ , हवन और भोजन प्रसाद चलता रहता है . शुद्ध देशी घी का प्रसाद सभी की पसंद है . दिन भर हवन पूजन कर पूरा मोहल्ला भोजन प्रसाद ग्रहण करता है . बढ़ चढ़ कर . शाम को भोजन प्रसाद वाले काउंटर पर सब एक दुसरे के ऊपर चढ़ जाते हैं भोजन प्रसाद थाल लेकर . बच्चे सबसे ज्यादा संघर्ष करते हैं .  अपने पेट के साथ बेचारे शर्मीले माँ बाप के स्वाद और पेट के खातिर दिन भर आँखों की ज्वाला सहते हैं . अच्छा है न , भक्ति भी और खाने की शक्ति भी .

पूरे पांच दिन पार्क दिन रात महायज्ञ का महायोजन देखता रहा . और एक दिन महा भंडारे से खत्म हुआ .

मनोहर सुबह शाम अब भी तल्हता है . और देखता है आँखों से पार्क को बदलते हुए . अखबारों में पार्क में हुए आयोजन की लाइव कवरेज चलती रही . गायत्री मंत्र जाप  , भोजन प्रसाद , शुद्ध हवन युक्त वातावरण और संस्था के कोष की गुल्लक के साथ घर में सेटल हो रहे हैं .

मुख्य यजमान पहले और बाद में आयोजन करता भी बारी बारी से चले गए . टेंट उखड गया . कई दिन पार्क में हवन कुंड की इंटें और कच्ची मिटटी पार्क में ही पड़ी रही . पार्क का मुख्य गेट टूटा ही पडा रहा . और आयोजन आ कचरा फिर से कई दिन पडा रहा .

पाण्डेय जी , श्रीवास्तव जी , वर्मा जी , सरदार जी , ठाकुर जी और उन सब के परिवार इस महायोजन का कचरे को हंस कर स्वीकार करते जा रहे हैं . बच्चे भी कई दिन तक गन्दगी में खेलते रहे . खुले गेट का पार्क किस काम का .  हरियाली किसे अच्छी नहीं लगती ! मगर सब उस हरियाली को हड़प लेना चाहते हैं .

पार्क ने ठीक से सांस लेना शुरू हिया किया था कि इस महायोजन ने पार्क की सेहत बहुत दिनों तक खराब कर दी .

बच्चों की पिच बुरी तरह प्रभावित हो चुकी थी . उसमें गड्ढे हो गए थे . कई जगह भंडारे के खाने का कचरा सड़ता रहा . झूले झुंझलाए लोगों के द्वारा झूले गए . टूट गए . कार्यक्रम खत्म होते ही , मोहल्ले के लोगों ने पार्क के भीतर फिर से गाड़ियां पार्क करना शुरू कर दी . 20 दिन के बाद कहीं आयोजकों  द्वारा नए गेट का निर्माण कराया गया . पर अब तक पड़ोस के मंडी परिसर की छुट्टा जानवरों को पता चल चुका है . बड़े पार्क की घास का स्वाद .

 

इंजिनियर के कुत्तों ने अपनी एक साख इस पार्क में भी छोड़ रखी है . इसलिए पार्क में एन केन प्रकारेण किसी भी तरह इनका प्रवेश कभी वर्जित नहीं हो पाया .

 

पार्क फिर से अपनी रवानी पर आ गया . इधर पिछले कुछ महीनों से पार्क में जबरदस्त मौन , पार्क में बदलाव कर रहा है .

जैसे की , एक परिवार पार्क की बाउंड्री वाल और सड़क के बीच में गाय पालता है . सुबह शाम गाय की सेवा शाम को दूध बन कर घर पर बरस पड़ती है . पर वहां पर हमेशा पानी भरा रहने से सड़क जल्दी खराब हो जाती है . पार्क की बाउंड्री पर कीचड उछालने लगता है .

कुछ परिवारों के घर के सामने छोटे छोटे मंदिर पार्क के भीतर पड़ते हैं . शंकर जी के खुले मंदिर चार बाई चार की जगह में . कुछ परिवारों ने अपने घर के सामने भीतर केले का पेड़ लगा दिया और तख़्त डाल दिया . फिर बाद में उसे मंदिर में बदल दिया .

कुछ भटके हुए लोगों को पार्क के भीतर रोजगार भी दे दिया गया . इस्त्री करने वाले दिन भर अपनी इस्त्री यही करवा लेते हैं . सब के कपडे घर पहुच जाते हैं .

 

इधर पार्क में उद्घाटन होने के बाद थोड़ी बहुत भीड़ आने लगी . इसलिए बबलू की दुकान फिर से खुल गयी . इस बार किराए से दी गयी है किसी और को . बबलू की दकान के ठीक सामने पार्क अ एक छोटा सा गेट खुलता है . जिसको बबलू कि दुकान पर आने वाले सुट्टेबाज अक्सर खुला रखते हैं . एक दो बार समझाने पर वो टेढ़े होने लगे . इसलिए मनोहर उनसे अब नहीं उलझता है .  रोज शाम को इस दुकान पर बैठने वाले नयी रेख के लौंडे , उजाला जाने के बाद पार्क में धक्काने खोलते हैं . रोज  सुबह पार्क की उस जगह पर कांच की दारू की बोतलें , सिगरेट के खोखे , पान मसाला की पूड़ियों के रैपर और चखना के खाली पैकेट  देखने को मिलते हैं .

 

कुल मिला कर धीरे धीरे पार्क में अतिक्रमण होता बढ़ रहा है . मनोहर पार्क को रोज़ भीतर से देखता है और बाहर से देखता है . उसे यह बात महसूस हो रही है कि पार्क में अतिक्रमण बढ़ता जा रहा है . बाकी कोई इस विषय में बात ही नहीं करता . न जाने क्यों .

बच्चे टूटे झूले पर झूल के चले जाते हैं . बुजुर्ग गंदे , उखड़े जॉगिंग ट्रैक पर जॉगिंग कर के चले जाते हैं . बाहर से बड़े बड़े लड़के आकर पार्क में क्रिकेट खेल के चले जाते हैं . पार्क में बब्लू की दुकान के सामने वाले नीम के पेड़ के नीचे एक बिजली वाला खम्बा चार चार इंटों पर रख दिया गया है . जिससे की बैठने वालों कोई तकलीफ न हो . बबलू के दुकान का किराया अचल रहा है .

 

पार्क के चारों तरफ बसे घरों ने अपने अपने हिसाब से पार्क के सामने कुछ न कुछ ऐसा इंतजाम बना लिया . कि उनके नाम से उठीं जगह पहचानी जाए . पार्क में यदि कोई पेड़ भी लगा है तो वो किसी न किसी घर के सामने लगा है . बेतारीब पेड़ों के झुण्ड से पार्क एक जंगले की तरह होता जा रहा है . पार्क के चारों तरफ सडकों पर अब गाड़ियां ही गाड़ियां दिखने लगी हैं . न जाने कहाँ से लोगों के पास पैसा फटा पैड रहा है . कि तीन मंजिला मकान बनाने की होड़ सी लग गयी है . तीन मंजिला वाले घरों में एक एक कार वाले  किरायेदार रहने लगे . इसलिए साड़ी कार पार्क पार्क के किनारे सड़क पर स्थित हैं . एक घर की तीसरी मंजिल पर तेलेफोन टावर वाले लड़के रहने लगे . जो कि आये दिन शराब , नॉन वेज खाते बनाते हैं . और नशे में धुत सारा कचरा पार्क में ही फेंक देते हैं . एक दो बार मनोहर ने भी देखा . उसने टोका . तो एक दिन बंद रहा , फिर से कूड़ा फेंका जाने लगा .

 

पार्क के एक घर के सामने काली पन्नी में बच्चों के दायपर इनके जाते हैं .  जिसे इन्गिनीर के कुत्ते पन्नी फाड़ के दायपर को फाड़ फाड़ पूरे पार क में फैला देते हैं .

 

पार्क अब धीरे धीरे एक बड़े से कूड़ेदान में बदलता जा रहा है .  मनोहर की झुंझलाहट बढती जा रही थी .  आवास विकास कॉलोनी के सारे संभ्रांत लोग क्यों छु फैन पता नहीं . दबी दबी जुबान से विरोध तो हर बात का हो रहा है . होता रहा पहले भी . पर जिससे जो कहना है वह उससे नहीं कहा जाता है .  मनोहर के घर वालों ने पार्क जाना अब छोड़ दिया है .  

मनोहर बच्चों को अब अपनी घर के छत पर ही खिला देता है .  पार्क में आये दिन पुलिस आने लगी है . गालिगालोज , सितियाबजी , और तोड़ा तोड़ी पार्क की शान बन गया था . मनोहर और उसका परिवार अब अपने ही घर में कैद रहने लगे . मनोहर की टोका टाकी बढ़ गयी . इसलिए मोहल्ले में उसके दुश्मन ज्यादा समझने लगे .  

मनोहर ने टोकना बंद कर दिया था . मनोहर का सपना जैसे टूट गया हो .

 

रविवार, 3 अगस्त 2025

लाल स्कूटी ! कहानी

 


शहर की तंग गलियों से एक लाल रंग की स्कूटी सुबह से  नाच रही है .कभी भीड़ भाड़ इलाके में व्यस्त सड़क . तो कभी अनजान गलियों की नयी पहचान की खुशबु में लाल रंग की स्कूटी भटक रही है . बारिश का महीना, तरबतर सड़क , जलभराव से संकरी होती गलियों में वो लाल रंग की स्कूटी गुम हो जाना चाहती थी . 

बारिश तेज़ होने लगती है . स्मिता सोचती है कि चाय की टपरी में रुक के चाय पी जाए . भईया किसी चाय की अच्छी सी टपरी पर रोक लीजिएगा . एक फीकी चाय पीने का मन कर रहा है . रेड कलर की एस यू वी अटल चौक पर रूकती है . कार की पीछे सिकचे से शीशा धीरे स्वतः खुलता है . स्मिता काला चश्मा उतारते हुए . चाय वाले को एक चाय का आर्डर देती है . 2 मिनट के इंतज़ार के बाद कुल्हड़ में चाय सिकचे के पास आती है . स्मिता बड़े ही संभाल के चाय का कुल्हड़ पकडती है . और पहला सिप लेती है . 


चाय तो अच्छी है , ड्राइवर भईया ! आप लेंगे ?

नहीं मैडम ! हम पी कर आये थे . 

स्मिता पैसे देती है . और शीशा बंद कर लेती है . 


तेज़ बारिश में लाल स्कूटी फर्राटा भरते हुए आती है . और कार के पीछे धाड़ से एक जोरदार टक्कर होती है . चाय की टपरी के सारे लोग और सड़क के राहगीरों का ध्यान इस घटना ने खींच लिया था . 

कार से ड्राइवर उतर के आया . कार के थोड़े मुड़े बम्पर ने ड्राइवर का आधा गुस्सा ठंढा कर दिया था . क्या भईया आप को दिखाई नहीं देता ? इस बात का समर्थन करते हुए कुछ और लोगों ने भी इसी बात को दोहराया . वहाँ का वातावरण बढ़ता ही जा रहा था . 


लाल स्कूटी पर सवार एक गठीला नवयुवक अपनी स्कूटी को संभालता है . स्टैंड पर खड़ी  करता है . और हेलमेट निकालते हुए . ड्राइवर से और सभी लोगों की तरफ देख के सॉरी कहने लगता है . लाल स्कूटी का आगे वाला मडगार्ड में थोड़ा डेंट था . बाकी किसी भी प्रकार चोट किसी को नहीं आई . 

अरे भईया इन सब को एक एक चाय पिलाना मेरी तरफ से . आप सभी से मैं माफ़ी माँगता हूँ . आगे से ध्यान रखूंगा . असल में मेरे हेलमेट के वाइज़र पर  बारिश की बूँदें आ रही थीं . तभी अचानक सड़क के आधे किनारे खाड़ी गाड़ी से टक्कर हो गयी . न पार्किंग डिपर और न ही कोई रुके होने का चिन्ह . 


कार से इस पूरे प्रकरण को ध्यान से देख रही स्मिता कार से उतरती है .  और सीन में घुस जाती है . 

देखिये आप लोग , मेरा कुर्ता खराब हो गया है . गर्म चाय के गिरने से मैं कई जगह जल गयी हूँ .  और ये बदतमीज़ कहानी बता रहा है यहाँ . और आप सब को चाय पिला कर बचना चाहता है . 


मैम मेरा नाम समीर है . मैं एक जर्नलिस्ट हूँ . बारिश में शहर के जलभराव की रिपोर्ट कवर करनी थी . कुछ तस्वीरें निकालनी थी . तब तक तेज़ बारिश आ गयी . हेलमेट में कुछ दिखाई नहीं दिया . और आप की कार से टक्कर हो गयी .  आप अपनी गाड़ी चेक कर लीजिये , कोई ख़ास नुक्सान नहीं हुआ है . मेरी स्कूटी और आप की कार का बराबर नुक्सान हुआ है . फिर आप के कार में पार्किंग लाईट भी नहीं जल रही थी . 


दोनों में कुछ देर बेहेस होती है . स्मिता और समीर दोनों ही पढ़े लिखे हैं इसलिए बहस स्तर हीन कभी नहीं हुयी . लेकिन हाँ बहस बिना हार जीत के ख़त्म हुयी . 

स्मिता अपने कुरते को साफ़ करती है . और बाहर बारिश में खड़ी हो जाती है . ड्राइवर दौड़ के आता है . स्मिता कहती है भईया अब जब भीग लिए हैं तो थोड़ा और भीग लूँ . जलन कम पड़ जायेगी . ड्राइवर फिर से टपरी के नीचे चला जाता है . स्मिता कुछ देर पानी से तरबतर हो जाती है . 


अन्दर से समीर की आवाज़ आती है . 

अरे मैम , ज्यादा मत भीगिए तबियत खराब हो जायेगी . 


स्मिता झेंप के टपरी के नीचे आ जाती है . टपरी के नीचे हो रहे ठहाके शांत हो जाते हैं . 

स्मिता पूरी , नीचे से ऊपर तक भीगी हुयी थी . टपरी  के नीचे ज्यादा जगह न होने के कारण स्मिता बाहर की ही तरफ खड़ी थी . 

टपरी में सभी की नज़र स्मिता पर थी . बारिश के शोर में पूरी टपरी में सन्नाटा . 

समीर इस सन्नाटे को ख़त्म करते हुए स्मिता से एक और चाय के लिए आग्रह करता है . 

स्मिता पलट के एक चाय का इशारा टपरी वाले भईया से करती है . 


मैम यहाँ बैठ जाइए . हम लोग आप के लिए जगह बना देते हैं . 

स्मिता फिर एक बार पलट के बोली नहीं मैं यहीं ठीक हूँ . मैं भीगी हूँ इसलिए आप लोगों के बीच अच्छा नहीं लगता . 


स्मिता की चाय उस तक पहुचती है . साथ ही समीर भी एक और चाय लेने उसके पास पहुचता है . समीर को स्मिता के साथ वही चाय मिल जाती है . 

टपरी के नीच बाकी के लोग अब थोड़ा सहज महसूस करते हैं . 


समीर स्मिता से पूछता है . क्या आप वाकई बहुत ज्यादा जल गयी हैं ? 

स्मिता : हाँ ! वो वाकई बहुत तगड़ा झटका था या सिर्फ मुझे ही लगा . मैं जस्ट चाय की पहली दूसरी सिप ली थी . और झटके में खुद को संभाल नहीं पायी . सब चाय मेरी गोद में गिर गयी . पहला ज्यादा जल रहा था . बारिश में भीगने के बाद कुछ आराम है . 

समीर : सॉरी ! ये तो अच्छा हुआ कि जान माल का नुक्सान नहीं हुआ . वरना लेने के देने पड़ जाते . एक्सीडेंट वही अच्छे होते हैं जिनसे कम नुक्सान में बड़ी सीख मिल जाए .  करती क्या हैं आप ? 


मैं भी मीडिया में हूँ .  स्मिता कॉन्फिडेंस के साथ कहती है . 

समीर : ओह !  किस मीडिया में ? 

स्मिता : क्यों ? क्या करना है आप को ? 

समीर : नहीं नहीं पूछा आप से बस ! मैं भी मीडिया में हूँ . इसलिए शायद पुच लिया मैंने आप से . भाई बंदी में . 

स्मिता : हाँ मैं एक कॉर्पोरेट पब्लिकेशन हाउस के लिए काम करती हूँ . आज ऑफ था . तो सोचा शहर के चक्कर लगाऊं . और फिर बारिश भी आ गयी . मेरा दिन बन गया था . पर ..... स्मिता खीज के फिर समीर से पूछती है . क्या आप को वाकई  में नहीं दिखा था ?  But that was extremely shocking !


समीर : आप शायद ध्यान में कहीं खो गयी होंगी . ध्यान में हलके झटके भी बहुत तेज़ से लग जाते हैं . 


स्मिता ने मुंह सिकोड़ते हुए नंब  नोट्स दिए 


बारिश कम होने लगी थी . स्मिता के कपडे भी कुछ हद तक सूखने लगे थे . 

स्मिता काउंटर पर पैसे देने पहुची . तो समीर ने पैसे देने से किसी तरह स्मिता को रोक लिया  . दोनों टपरी के बाहर आये . 

स्मिता अपनी कार में बैठ गयी . पीछे से स्मिता का ड्राइवर भी आ गया . 


समीर अपनी हेलमेट पहन के अपनी स्कूटी स्टार्ट करने लगता है . पर वो स्टार्ट नहीं हो रही है . 

स्मिता ने किसी बहाने से अपनी कार रुकवा रखी थी और रियर मिरर में समीर की स्कूटी न स्टार्ट होना देख रही थी . 

स्मिता ने ड्राइवर को भेज के स्कूटी स्टार्ट करने में मदद के लिए कहा . 

पर स्कूटी स्टार्ट होने से रही . 

स्मिता ने ऑनलाइन बाइक वाला से सर्विस कॉल की . कुछ मिनटों में एक मैकेनिक आ गया . और वह स्कूटी रिपेयर करने लगा . 

स्मिता ने अपने ड्राइवर को चलने  को बोला . 

तब तक समीर दौड़ के आ गया . क्या वो मैकेनिक आप ने बुलाया . समीर ने मुस्कुराते हुए पूछा . 

स्मिता : जी हाँ ! पर उसका बिल आप ही देंगे . मीडिया वाले हो कर भी इतना स्मार्ट न हुआ तो क्या हुआ ! मुझे लगा कि आप उसे घसीट के ले जायेंगे . मेरे पास कांटेक्ट था . इसलिए सर्विस कॉल की . चलिए कोई बात नहीं . टेक केयर ! भईया चलिए ...

समीर : ओके ... ! एक सेकंड ... क्या आप का कांटेक्ट नंबर मिलेगा कोई ? 

स्मिता : हाँ ! देती हूँ . उसने एक नेम कार्ड अपनी पर्स से निकाल के  दिया . स्मिता खन्ना , प्रिंसिपल  कोरेस्पोंडेंट आई बी आई नेटवर्क इंडिया . और कांटेक्ट नंबर . 


समीर :  थैंक यू और एक बार फिर से सॉरी . 

स्मिता इट्स ओके कह कर चली गयी . 

समीर की स्कूटी बन चुकी थी . उसने टपरी के नीचे एक और चाय का आर्डर दिया . कार्ड को बहुत देर तक देखता रहा . उसके दिमाग में पूरा घटना क्रम क्रमबद्ध तरीखे से चल रहा था . नाम , नंबर और काम जान के समीर के चेहरे पर मुस्कान की हंधी हवाएं चलने लगी . 


शनिवार, 2 अगस्त 2025

मायाजाल ! कहानी



 प्रिय तुम ,

आज जिन्दगी के जिस मोड़ पर खड़ा हुआ मैं छटपटा  रहा हूँ .

 वहां से लौटने का कोई भी रास्ता नहीं  दिखाई देता . आगे बढ़ कर कुछ बड़ा कर पाने की हिम्मत भी नहीं बची है . सारी हिम्मत कहाँ चली गयी कुछ पता ही चलता है . शरीर से हष्ट पुष्ट  , मानसिक रूप से एकदम फिट . फिर भी जीवन गर्त में जाने को होता  है . हर समय घबराहट तारी रहती है जिस्म पर . 

घरवाले कहते हैं क्या कमी है ? सब कुछ तो है  जीवन में  ! हम सब भी  ठीक ठाक हैं इश्वर की दया से  . फिर भी तुम इतना हैरान परेशान रहते हो . यही कहते कहते नहीं थकते घर वाले . 

बंधनों से डर लगता है . किसी भी प्रकार का बंधन हो . परिवार , समाज और जीवन का अर्थशास्त्र भी बंधन हैं . जो इनमें डूबा वो डूबा चला गया . क्या कहीं डूबना ही तो बचना नहीं होता ? शायद सभी डूबे रहते हैं इसीलिए बचे रहते हैं . पर मैं तो डूबने से भी घबराता हूँ . घबराहट मेरी नसों में बहती है . यह घबराहट है खो जाने की . मैं  दिखा नहीं तो खो जाउंगा . खोने के डर से घबराहट होती है . 

 ऐसा लगता है जैसा सब कुछ छलावा है . प्रकृति का , जीवन का और जीने के लिए जुटाए जाने वाले सामानों  का भ्रम जाल घेरे हुए है . जो इन मायाजालों से मुक्त हो चुके हैं . क्या वे अपना जीवन सहजता के साथ जी पाते होंगे ! मुक्त होंगे वो सभी मायाजालों से ? पता नहीं . मुझे तो अपना मालूम हो सकता है . मेरा मुझसे ज्यादा कौन जान पायेगा भला . ऐसे दूसरों का दूसरों से ज्यादा मैं कैसे जान सकता हूँ . 

आसमान साफ़ होता है . बादलों के आने से गंदा नहीं होता . धरती साफ़ है . धरती पर उगने , उठने और गिरने वालों से धरती गन्दी नहीं होती . फिर मैं कैसे गंदा हो सकता हूँ . 

हाँ उसने गंदा ही तो कहा था मुझे ! क्या वाकई प्रेम गंदा होता है ? 


एक  मैं 


विवेक मूर्छित हो जाता है . पास की टेबल पर कुछ दवाइयां रखी हुयी हैं . कैलकुलेटर के नीचे , कई सारे कागजों के ढेर ऊपर एक छिट्ठी लिखी रखी है . चिट्ठी में डूबती नाव का कहीं कोई जिक्र नहीं होता है . खिड़की खुली हुयी है . पंखा चल रहा है . हाँथ में सिगरेट जल रही है . शाम ढल जाती है . बारिश बेज़ार हो जाती है . 


सुबह रिती कमरे का दरवाज़ा खटखटाती है . 

विवेक विवेक ... दरवाज़ा खोलो ! 

दो – तीन बार और खटखटाती है . पर कोई हरकत नहीं होती . वो पीछे खिड़की से झांकती है . 

विवेक बेसुध पडा है . 

वो पत्थर का टुकडा उठाती है . और खिड़की पर दे मारती है . 


विवेक ऐसे उठता है जैसे किसी ने उसके सर पर गैलनों पानी डाल दिया हो . 

दरवाज़ा खुलते ही रिती कमरे के अंदर प्रवेश करती है . 

छि .... ऐसे रहते हो आप  ? 

विवेक चुप रहता है और चुप चाप सोफे पर बैठ जाता है . 

रिती किचन  में खाने का टिफिन रख कर टेबल साफ़ करने लगती है . 

उसने मैरून कलर की साडी पहन रखी है . चूड़िया समेट रखी हैं . बाल की कुछ लट उसको और इरिटेट कर रही हैं . 

पूरे जीवन का कबाड़ा बना रखा है . ये भी कोई लाइफ है भला ! नशे में पड़े रहो . 


विवेक : नशें में कौन ? ये क्या बोले जा रही हो ? 

रिती : आप  और कौन ? 

विवेक : ए हेलो ! मैं नशे में नहीं था . कल दिन भर ज्यादा दौड़ना  भागना  हो गया था . शाम को वापसी में एक कडवी दवा पी ली . 

विवेक उठता है और टेबल पर से लेटर उठा लेता है . उसकी तह करके सोफे के साइड में फंसा देता है . 

टीवी ऑन करता है . और चैनेल बदलने लगता है . 

रिती सारी  साफ़ सफाई कर के सोफे के सामने कुर्सी पर बैठ जाती है . हाँ अब बोलो ! 

क्या हुआ ? क्यों इतना परेशान हो ? 


विवेक :  यार पता नहीं क्यों ! जीवन उदासी से भर गया है . इतनी उदासी , कि घबराहट होती है . हमेशा चुप रहने की कोशिश में और चिल्लाने लगता हूँ . बड़ा करने की कोशिश में छोटा गंवाता चला आ रहा हूँ . छोड़ तो दिया सब . और कितना छोडूँ भला . 

यहाँ रहता हूँ सबसे दूर . जिससे किसी को तकलीफ न हो  .कोई मेरे ऊपर तरस ना खाए . और मेरे भविष्य की सीख न दे . पर यहाँ हमारे आस पास अपना कोना नहीं होता . कोना मतलब कुछ अनैतिक ! आस पास के सारे लोग ऐसे जुड़े हुए हैं जैसे सभी रक्तवाहिनियाँ एक हों . पर रक्त किसी को देना न पड़े . 

रिती : आप  घर क्यों नहीं चले जाते हो कुछ दिन ? यहाँ बिना काम के क्यों पड़े रहते हो ? जब काम मिले तो आ जाया करो . मैं तो हूँ ही यहाँ . आप के  जैसे सनकी दोस्त को झेलने के लिए . जल्दी बोलो .... मेरे को घर जाना है . घर में घंटे भर का बोल कर आई थी . घंटे के बाद घर , घर के बाद ऑफिस , ऑफिस के बाद घर , घर में वो कमरा , कमरे में मैं , मेरा लैपटॉप , मेरा फोन और मेरी नींद .


विवेक : हाँ यार ! सही है . तुम्हारा सेट है सब . खाना लाने के लिए थैंक यू और रूम साफ़ करने के लिए भी . वरना ये पड़ा रहता अगले पड़ाव तक . बस अपसेट था कल रात . सोचा तुम्हे मेसेज डालूँ . मेसेज डाल के बेहोश हो गया . मुझे ही रास्ते निकालने पड़ेंगे खुद के साथ बैठ के . खुद से बातें कर के . और चिट्ठियाँ लिखते !  


रिती : चिट्ठियाँ ? वो किसे लिखते हो ?  रिती का चेहरा कोरा था . 

विवेक उठता है और सोफे के किनारे खुसी चिट्ठी  को निकालता है . और रिती के हाँथ में रख देता है . 

रिती चिट्ठी पढ़ती है . और उसे फोल्ड कर के टेबल पर रख देती है . 

ओके !

मैं चलती हूँ . और राजा बनारस जी हुलिया संभाल लीजिये अपना . वरना दुनिया शक करने लगेगी . 

रिती जाने से पहले मंदिर का प्रसाद  विवेक के हाँथ में परोस जाती है . 


विवेक प्रसाद  को पूजा वाली अलमारी में रख देता है . और टी वी का रिमोट नचाने लगता है . 

कुछ देर के बाद , मोबाइल उठाता है . और एक मेसेज रिती को भेजता है . 


Hi , Riti 

Well I thank you ! You have been a great support   . Thank you for holding me  . See you soon  . 


घडी की सुइयों पर  ऑफिस की छुट्टी की सवारी थी . अलसाया दिन फिर से उदासी में डूबने के लिए बेचैन है .  


विवेक नहा धोकर , खाना खाता है . खाने के बाद खाने के स्वाद होने की खबर रिती तक भेज के सो जाता है . गहरी नींद में वो बेसुध पडा हुआ है . जैसे किसी मरुस्थल में रास्ता ढूंढता पथिक थक के चूर हो जाता है . 

दुसरे दिन सुबह आँख खुलने पर , वो अपने पिता और उनके साथी को कमरे के भीतर पाता है . वो चौंक जाता है . वो कमरा अब पापा का घर हो गया था ! 

विवेक की आँखें गहरी लाल रंग में डूबी हुयी हैं . चेहरे पर दाढ़ी बढ़ी हुयी है . पूरा बॉडी पोस्चर ढीला ढाला . आँखों के नीचे डार्क सर्किल . 

विवेक : आप लोग अचानक कैसे आया गए यहाँ ,  क्या हुआ , सब ठीक तो है ? 


पिता ने नज़रे मिलाते हुए कहा कि  कल रात में यहाँ से फोन आया था . कि आप जल्द से जल्द आ जाइये . विवेक को कुछ हो गया है . हम सब उन्हें दिखाने ले जा रहे हैं . हम सब लोग घबरा गए थे . कि आखिर क्या हुआ अचानक . कुछ दिन पहले ही तुमसे बात हुयी थी . यहाँ आकर देखा तो कुछ और ही चल रहा था यहाँ. 


विवेक : पर हुआ क्या ? ये भी तो कोई बताएगा ? मुझे कुछ याद नहीं . मैं कुछ दिनों से अपने काम को लेकर परेशान था . इसलिए थोड़ा रेस्ट लिया घर पर . और आज आँख खुली तो आप लोग सामने हैं . 


पिता  ने सख्त अंदाज़ में विवेक से जल्द से जल्द कमरा छोड़ने की नसीहत दी . और उठ के चल दिए .दरवाज़े से वापस जाते समय वो पलटते हैं . और इशारों में खाने पीने के सामान को ख़त्म करने की बात कहते हैं . विवेक चुप चाप पैर छूता है . और पापा को विदा करता है . 

विवेक इस घटना से सन्न है . ये हो क्या रहा है उसके साथ . उसको कुछ समझ नहीं आ रहा है . उसे साफ़ साफ़ रिती के आने के पहले और जाने के बाद का कुछ याद नहीं . 

वो फिर से गहरी नींद में सोने चला जाता है . 

शाम को रिती फिर आती है . दरवाज़ा खुला देख अन्दर घुस आती है . और चुप चाप सोफे पर बैठ जाती है . विवेक सो रहा है बेड पर बेसुध . 

कुछ देर बाद विवेक की आँख खुलती है . अंगडाई और एक अजीब सी  चीख के साथ वो उठता है . रिती को सामने पाकर फिर चौंक जाता है . 

विवेक : अरे तुम यहाँ कब आ गयीं ? कितनी देर से बैठी हो , दरवाजा खुला था क्या ? 

रिती : आप के ड्रामे इतने चल रहे हैं कि बार बार आना पड़ रहा है . आप के घरवाले आये थे . मिलना हुआ उनसे ? 

विवेक : हाँ , थोड़ा सांस लेकर “ मैं खुद नहीं समझ पा रहा हूँ ये हो क्या रहा है ? “ पापा कह रहे थे ये रूम जल्द से जल्द छोड़ दो . वो कल आये थे , आज सुबह गए हैं . मुझे पता ही नहीं चला . 

तुम लोग मुझे कहीं दिखाने ले गए थे ? वो कह रहे थे यही से किसी ने फोन कर के उन्हें रात में इमरजेंसी में बुलाया था . किसने किया होगा फोन ! कहीं तुमने तो नहीं किया फोन ? 


रिती : आप के कमरे का मोहरा भले ही दूसरी तरफ खुलता हो , पर घर तो एक ही है . आप की सारी हरकतों की आवाज़े हमारे यहाँ सुनाई देती है .


विवेक : देखो ! तुम यहाँ आना बंद कर दो . दीवारों के भी कान कच्चे होते  हैं . मुझे तो हमेशा से ही लगता है कि तुम्हारी मम्मी को मुझ पर शक है . इसलिए मैंने आना जाना बंद कर दिया तुम्हारे यहां. मुझे मालूम है तुम्हे मेरी फिक्र रहती है . जब से मैं इस घर में आया हूँ . तब से तुम से अच्छी दोस्ती हो गयी है . लेकिन ये दोस्तियाँ यारियां , अय्याशियाँ समझी जाती हैं . वहीँ से गड़बड़ियां शुरू हो जाती हैं . 


मेरा इस घर में आने से पहले एक अफेयर था . जो कि अपनी अंतिम साँसे गिन रहा है . बस उसी संताप से भागता फिर रहा हूँ . पेड़ है , उखडा है तो जड़ ले जाएगा अपनी अपने साथ . जड़ जाने की तकलीफ किसे नहीं होती ? 


रिती : मुझे भी ऐसा ही कुछ लगता था . फिर भी कोई आस पास उदास हो तो अच्छा नहीं लगता . फिर वो अडोस पड़ोस में हो तो और भी नहीं लगता . 

ब आप आये थे पहली बार . आप के कमरे से तरह तरह के संगीत की धुनें सुनाई देती थी . कमरा अगरबत्ती की सुगंध से भरा रहता था . आप हमारे घर आते थे . रोज़ शाम की बैठ्कियां होती हंसी ठहाके . लगता ही नहीं था मकान मालिक किरायदार का अंतर . आप हमारे किचन में कई बार अच्छा खाना बनाके हम सब को आश्चर्यचकित कर चुके हैं .

 मामा  की बेटी भी आप से खूब हिल मिल गयी थी . अंकल अंकल कहती घूमती रहती थी . छोडिये ये सब ! आप अपना ख्याल रखिये . बुरे ख्याल दिल से , दिमाग से निकाल दीजिये .  मुझे भी अब यहाँ इस कमरे में आने से अजीब लगता है .  आप चले जाइए ये कमरा छोड़ के . 


रिती उठ कर चल देती है . विवेक उठता है और उसका हाँथ कलाई से पकड़ लेता है . कलाई के जोर से वो रिती को अपने ओर  मोड़ देता है . दोनों कुछ सेकंड गले मिलते हैं . और रिती कमरे से भाग जाती है . 

अच्छा सुनिए ! थैंक यू ... 

आरू को ठीक करने के लिए .  रिती कृतज्ञता के साथ कहती है . 

विवेक : अब मैं उस समय को याद नहीं करना चाहता . किसी तरह से वो बुरा समय टल गया . आरू की परेशानी मुझसे देखी  नहीं जा रही थी . उस दिन जब आरू दोपहर में स्कूल से आई . तो रिक्शा पर वो एकदम  अचेत थी . तुम्हारे घर वाले सब परेशान थे . पर किसी का ध्यान उसकी दवा इलाज पर नहीं जा रहा था . तुम्हारी मम्मी लौंग बाँध रही थी . भाई साहब सुबक रहे थे . भाभी बेहाल हुयी जा रही थी . 

तुम उससे लिपट लिपट कर रो रही थी . उसका शरीर ऐंठा जा रहा  था . जैसे किसी ने उसकी गर्दन कसके पकड़ राखी हो . और वो  उसे मा  ....

तुम्हारी मम्मी उस पूरे घटनाक्रम को लीड कर रही थी . मैं तो बाहरी था . दूर खडा खड़ा तमाशा देख रहा था . कभी हनुमान चालीसा पढ़ी जा रही थी . तो कभी लोबान सुलगाया जा रहा था . दो घंटे आरू तड़पती रही . तुम सब लोग उस पर भूत बलाय उतार रहे थे . कुल देवता की आरती उतार रहे थे . उससे ज्यादा सब धरती सर पर उठाये थे . 

बाल्टी में पानी , नीम की पत्तियां लौंग नीबू ,पता नहीं क्या क्या टोटके तुम लोग किये जा रहे थे . आरू की आवाज़ में भारीपन बढ़ता जा रहा था . तुम्हारी मम्मी आरू के बदहाल देह से पूछती ... छोड़ोगे  कि नहीं .... आरू मरदाना आवाज़ में कहती ... नहीं ... मैं इसे छोडूंगा नहीं . 

रिती : फिर आप  क्यों ढेर हो गए थे ? रिती ने बीच में विवेक की बात काट कर कहा . 

विवेक : मैं क्या करता . मुझे आरू की बदहवासी असहनीय हो रही थी . बेचारी 13 साल की बच्ची . बुखार से तप रही थी . आप सब लोग उसे घेरे हुए थे .  आँगन के किनारे खम्बे के पास खड़ा मैं , मन ही मन कह रहा था . कि जो कोई भी हो आरू पर . उस छोटी बच्ची को छोड़ मुझे परेशान करे . मैंने किसी को इस वाक्य से चैलेन्ज किया . मेरे आँखों के सामने अन्धेरा छाने लगा . मैं खम्बे के सहारे नीचे बैठता चला गया . और तुम लोगों को चुप कराते हुए चीखते हुए ...” छोड़ दो उसे , जो कोई भी हो मेरे से मिलो “ मुझे पक्का यकीन था मेरा कहा कोई अदृश्य शक्ति सुन रही हो या न . पर आरू तो जरुर सुन लेगी . मैंने ठीक वैसा ही किया . जैसे आरू के साथ होता हुआ उसे महसूस हो रहा था . तुम सब लोग मेरी तरफ बढ़ने लगे . आरू की ऐठन कम होने लगी .

मेरा यह प्रयास मुझे न जाने किस लोक में ले गया . तुम सब लोग आरू के साथ मुझे भी उस बाबा के दरबार में ले गए . जहां से मेरे घर पर कॉल किया गया था . 


मुझे याद आ रहा  है . उस बाबा के दरबार में सब कुछ काला काला था . दरवाज़ा काला , दीवारें काली , बाबा का भेष काला और धुएं से काले हुए कमरे में रखे साज ओ सामान . 


बाबा की ऊँची गद्दी के सामने 20 से 30 भक्त हाँथ जोड़े बैठे हुए दिखे . तुम्हारी माँ ने अर्जी लगवाई . बाबा की आँख और मेरी आँख एक दुसरे का पीछा कर रही थी . बाबा ने मेरी तरफ आँखें गड़ा के कहा “ ए तुम , खड़े हो जाओ . क्या चाहिए तुझे ? 

मैंने कहा कि बस यह बच्ची ठीक हो जाए . 

बाबा की आँखें मुझे और ज्यादा देखना नहीं चाह रही थी उस दरबार में . मेरी घूरती हुयी आँखें और बुलंद आवाज़ बाबा की आस्था की दुनिया पर लगातार चोट कर रही थी . बाबा ने तुम्हारी मम्मी को इलाज के नाम पर कुछ और टोटके बताये . मेरे लिए उन्होंने , मुझे उस घर से दूर रहने की हिदायत दी .  और हम सब वहां से वापस आ गए . 


आरू ठीक थी . उसका यह ठीक होना मुझे ठीक उसी समय लगने लगा . जब से मैं खम्बे से नीचे सरकने लगा . आरू की स्थित के सामने एक नयी प्रभावशाली स्थिति को क्रिएट करना और उसे यकीन दिलाना कि अब उसकी पीड़ा किसी दुसरे को ट्रांसफर हो रही है . यही मेरा उद्देश्य था . मैंने उसके ठीक होने को लगातार महसूस किया . 

क्या तुम लोगों ने कभी विचार किया कि आरू को क्या हुआ था ? 


रिती : नहीं ! वो तो एकदम नार्मल बिहेव  करती थी . हमेशा चुलबुली , इठलाती घर भर में फुदकती रहती थी . किसी की नज़र लग गयी होगो स्कूल में . 


विवेक : क्या रिती , तुम भी पढ़ी लिखी होकर इन सब बातों पर विशवास करती हो ? वो तुम लोगों के आँखों के सामने रोज़ रात को एक डरावना टी वी सीरियल देखती थी .  शायद उस सीरियल का कोई सीक्वेंस उसके दिमाग में बस गया हो . भयंकर गर्मी में दिन भर स्कूल के बाद कड़ी धुप में रिक्शा से घर आना बच्चों को परेशां कर सकता है . घर में पूजा पाठ भी सनक के हद तक नहीं होना चाहिए . 

ऊपर से तुम्हारी मम्मी का मुझपर शक करना . कि मेरी वजह से उनकी बेटी के जीवन में फ़िज़ूल की हलचल है . क्या तुम्हे भी ऐसा  लगता है ? 


रिती :  देखो ! मुझे आप की कंपनी अच्छी लगती  है . लेकिन जब मम्मी को अच्छा नहीं लगता . तब मुझे ये बात अखरती है . और मैं अपने आप को आप से  मिलने से रोकती हूँ . जब रोकती हूँ तो और मिलने की इच्छा होती है . बस यही है . मुझे लगता है . कि एक लड़की और लड़का अच्छे दोस्त हो सकते हैं . दोस्त से मिलने की क्रेविंग तो अलग ही होती है .  

आप यहाँ अकेले रहते हो . घर वालों से दूर . मैं यहाँ अपने मामा के यहाँ हूँ . इसलिए घर से दूर रहना कैसा होता है मुझे मालूम है . कभी कभी माँ आ जाती है तो थोड़ा बल मिलता है . वरना ऑफिस से घर , घर से ऑफिस . मेरी सैलरी से मामा के घर के खर्चे निपट जाते हैं . और मैं यहाँ रह कर नौकरी के साथ आगे की पढ़ाई और घर के कामों में सहयोग कर देती हूँ . 


रिती घडी की तरफ देखती है . अरे बाबा रे .. इतना समय हो गया आये हुए . आज तो पक्का मम्मी मुझे मार डालेगी . मैं चलती हूँ . बाय ! 

बाय ! कहकर विवेक रिती को विदा करता है . 

कुछ देर गहरी सोच में रहता है . फिर मोबाइल उठा के उसमें दुसरे शहर में नौकरी की तलाश करने लगता है .





बच्चों को उड़ने दो ..

 उड़ने दो , उड़ने दो  बच्चों को उड़ने दो ... गर नाक अटक जाए  तो भी तो  उड़ने दो ..   जिस ऊर्जा का  संचार प्रवाह  हो उद्दंड  उसको भी  उड़ने दो  कह...