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सोमवार, 3 जनवरी 2022

छाँव !

 कोहनियों में दर्द फूटता है

घुटनों के नीचे माँस जम जाता है
उंगलिया थक जाती हैं
काँधे जकड़ जाते हैं
दो मुँही हाँथ की लकीरें
रात को खत्म हो जाती हैं

मैं रोज बेदम
इक राह जोतता हूँ
हिज़्र की ,
कुफ़्र से
दो चार होता हूँ

धिक्कारता खुद को
शिकायतें ओढ़ता
तमाम तरह की न सुनते
स्नेह तपकता है

मैं खुद से
भागता हूँ दिन रात
तलाश में एक अदत
छाँव !

मैं लौट आता हूं अक्सर ...

लौट आता हूं मैं अक्सर  उन जगहों से लौटकर सफलता जहां कदम चूमती है दम भरकर  शून्य से थोड़ा आगे जहां से पतन हावी होने लगता है मन पर दौड़ता हूं ...