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शुक्रवार, 25 अक्टूबर 2013

चुप रहो,चुप रहने में ही समझदारी है,
न जाने कौन सी बात बतंगड़ बन जाए।
बेवजह बात होती है पत्थर कि तरह,
कही पत्थर से समुन्दर सुनामी न बन जाए।।
.........................................प्रभात सिंह 

रविवार, 20 अक्टूबर 2013

मुंडन बालों का होता है , नर्म मुलायम खाल का नहीं

हो गया मुंडन
नन्ही सी जान के कोमल से सर पर उस्तरा चल ही गया
पेट के बाल अब नहीं रहे
पिता अपने गोद में घुटते हुए सर को लिए "आहिस्ता आहिस्ता "कहता रहा
नन्ही चीत्कार को अपने अन्दर जज्ब करता रहा
कोमल त्वचा पर उस्तरे की धार, वार पर वार करती रही
सुर्ख लाल खून से शर्ट की बाजू लाल हो चली
नन्ही कली की बुआ ने अपने  बहते आंसुओं के साथ
आंटे की लोई में मुलायम बाल बंद कर लिए
हो गया मुंडन ,बधाई गीत गाओ
हो गया मुंडन
माँ कहती है की मुंडन साल भीतर ही शुभ और अच्छे होते हैं
दिल कहता है की कम से कम पांच साल में हो
क्यूँकि मुंडन बालों का होता है नर्म मुलायम खाल का नहीं।।
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, प्रभात सिंह 

मैं लौट आता हूं अक्सर ...

लौट आता हूं मैं अक्सर  उन जगहों से लौटकर सफलता जहां कदम चूमती है दम भरकर  शून्य से थोड़ा आगे जहां से पतन हावी होने लगता है मन पर दौड़ता हूं ...