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मंगलवार, 8 अगस्त 2023

कविता इस लिए न लिखें कि !

 


लेखक एवं वरिष्ठ पत्रकार प्रिय दर्शन जी द्वारा ! 

कविता इसलिए न‌ लिखें कि

१ किसी से बदला‌ लेना या उसे नीचा दिखाना है।

२ किसी विचार के चाबुक से किसी की पिटाई करनी है।

३ अपने आग्रह को किसी सार्वभौमिक सत्य की तरह थोपना है।


क्योंकि

१ कविता सबसे पहले कवि की पोल खोलती है।

२ वह बता देती है कि कवि के सोचने का तरीक़ा क्या है।

३ कवि जो महान उक्तियां लिख रहा है उसके पीछे के टुच्चे इरादे क्या हैं।


दरअसल

१ कविता लिखना खुद को लिखना है - अपने अनुभव संसार को, अपने संवेदन को।

२ यह अनुभव भी अर्जित करना पड़ता है - वह स्मृति, संवेदना और विवेक की साझा संतान होता है।

३ स्मृति से जो मिलता है, संवेदना उसे ग्रहण करती है और विवेक उसमें से ग्राह्य-अग्राह्य चुनता-छांटता है।


इसके बाद

१ हम जो लिखते हैं वह हमारा अनुभूत सत्य होता है

२ लेकिन इस सत्य की प्रामाणिकता के लिए ज़रूरी है कि उसे बार-बार अनुभवों की कसौटी पर कसते रहा जाए। इससे वह कुछ बदल भी सकता है, लेकिन अंततः वह एक प्रामाणिक अनुभव होता है और विश्वसनीय अभिव्यक्ति में बदलता है।

३ अपने अनुभव की गरिमा इस बात में भी है कि उसे एक अर्जित मूल्य की तरह सहेजा जाए, न कि उसकी तलवार बना कर उससे दूसरों के सिर काटे जाएं।


अगर इसका ख़याल न रहे तो

१ कविता न्याय के नाम पर बहुत अत्याचारी हो जाती है।

२ वह किसी बुलडोज़र की तरह तथाकथित अवैध निर्माणों को ढहाने का काम करने लगती है।

३ बिना यह जाने या समझे कि छोटे-छोटे सपनों के घर कितनी मामूली मगर मूल्यवान सांसों का बसेरा हैं।


यह ख़याल रहे

१ कविता लिखना दूसरों के ज़ख़्मों को अपनी छाती पर महसूस करना है।

२ कविता लिखना अपने ज़ख़्मों के आईने में दुनिया को देखना है।

३ कविता लिखना नैतिक-अनैतिक की निश्चयात्मकता से आगे एक मानवीय अनिश्चय के बीच अपने-आप को टटोलना है।

मैं लौट आता हूं अक्सर ...

लौट आता हूं मैं अक्सर  उन जगहों से लौटकर सफलता जहां कदम चूमती है दम भरकर  शून्य से थोड़ा आगे जहां से पतन हावी होने लगता है मन पर दौड़ता हूं ...